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वेशभूषा के विविध रंगों से सजा हिमाचल प्रदेश
August 30, 2019 • पवन चौहान

इन पहाड़ी और मैदानी इलाकों में लोगों का पहनावा हमेशा समय के साथ-साथ बदला है। यह प्रक्रिया अनंतकाल से निरंतर चली आ रही है। हिमाचल के लोगों (महिला-पुरुष) के परिधान का एक अपना ही आकर्षण है। यह आकर्षण हमें उनकी, संस्कृति, परंपरा, जन्मभूमि, उनके क्षेत्र विशेष से हमें नजदीक से जोड़ता है। यह तब का दौर था जब कपड़ा बनाने के लिए हाथों से ज्यादा और मशीनों से काम कम होता था।

समय के अनुसार हमारे समाज में बहुत कुछ बदला है। रहने, खानेपीने, शादी, त्यौहार, धार्मिक उत्सव आदि मनाने के तरीकों से लेकर दिनचर्या का हर हिस्सा तक। यदि हम थोड़ा फ्लैशबैक में जाएँ तो हमें अपने समाज के उस कठिन दौर और उनके रोजमर्रा के संघर्षों के दर्शन होंगे जिसका एहसास शायद वर्तमान पीढ़ी नहीं कर पाएगी। इसी कड़ी में बात करते हैं हम हिमाचल प्रदेश के लोगों के पहनावे की। यह भी बताते चलें कि हिमाचल प्रदेश 12 जिलों का प्रदेश है जो ऊँचे-ऊँचे, मध्यम पहाड़ों से होता हुआ मैदानों में भी बसता है। इसी फ्लैशबैक में इन जिलों के पहनावे की बात पर आते हैं। इन पहाड़ी और मैदानी इलाकों में लोगों का पहनावा हमेशा समय के साथसाथ बदला है। यह प्रक्रिया अनंतकाल से निरंतर चली आ रही है। हिमाचल के लोगों (महिला-पुरुष) के परिधान का एक अपना ही आकर्षण है। यह आकर्षण हमें उनकी, संस्कृति, परंपरा, जन्मभूमि, उनके क्षेत्र विशेष से हमें नजदीक से जोड़ता है। यह तब का दौर था जब कपड़ा बनाने के लिए हाथों से ज्यादा और मशीनों से काम कम होता था।

हिमाचल के हर जिले का अपना पहनावा, अपने वस्त्र विशेष के कारण उनकी अलग पहचान की जा सकती है। यदि जिला मण्डी से बात शुरू करें तो इस जिले का कुछ हिस्सा जहां समतल इलाके में बसता है वहीं खूब ऊँची-ऊँची पहाड़ियों में भी लोगों के आशियाने हैं। यहां महिलाओं के पहनावे में मौसम और भौगोलिक विभिन्नता के कारण परिवर्तन आ जाता है। मैदानी इलाके की महिलाएं कमीज, कुर्ता, सलवार, चादरु, चुड़ीदार सुथण लेकिन पहाड़ी इलाके की महिलाएं इसके साथ ढाठु (धाटु) व बास्केट का भी इस्तेमाल करती हैं। सर्दियों में पट्ट, शॉल आदि पहनावे में शामिल होते हैं। शादियों या किसी अन्य किसी उत्सव में लगभग बीस गज कपड़े से बना चुनटदार घाघरा और चोली का रिवाज है। अब इसका स्वरुप जरुर बदला है लेकिन इन समारोहों में इसकी उपस्थिति आज भी बनी हुई है। यदि पुरुषों के पहनावे की बात करें तो जिले के पहाड़ी इलाके और मैदानी इलाके के परिधान में हल्का परिवर्तन रहता है। पुरुषों का पहनावा कमीज, पायजामा, सदरी, बास्कोट, सूती कपड़े की टोपी या पहाड़ी टोपी, साफा मुख्य रहा है। पहाड़ी इलाके के पुरुष ऊनी चूड़ीदार पायजामा, सूती कमीज और कोट पहनते हैं। सर्दियों में कोट, कोटी, पट्ट, गर्म चद्दर, गर्म जुराबें आदि रहते हैं ।

कुल्लू

कुल्लू जिले की बात करें तो यह जिला ऊंची पहाड़ियों से घिरा हुआ प्राकृतिक सौंदर्य से लबरेज है। जहां मौसम का मिजाज लगभग ठंडा ही रहता है। वर्तमान में हालांकि मौसम में काफी परिवर्तन हुआ है लेकिन फिर भी यह एक ठण्डा इलाका है। इस इलाके में महिलाओं का पहनावा मण्डी जिले की महिलाओं से काफी मिलता-जुलता है। भिन्नता में यहां की महिलाएं दोहडू पहनती हैं जो एक ऊनी वस्त्र है। सिर पर 'थिपु' पहना जाता था जो अब चलन में कम है। यह पौना मीटर वर्गाकार का काला या फिर रंगीन रुमाल होता है। इसके एक किनारे को मोड़कर सिर पर टिका दिया जाता है। कुल्लू की ऊनी रंगी-बिरंगी जुराबों का कोई सानी नहीं है। यहां की टोपी तो विश्व प्रसिद्ध है। पैरों में यहां पुलें पहनी जाती हैं। दुनियाँ के सबसे प्राचीन लोकतंत्र कुल्लू के मलाणा की महिलाओं और पुरुषों के वस्त्रों और उनके रंगों में थोड़ी भिन्नता पाई जाती है। महिलाएँ घर में कम चुनट वाली सुथण, कफ वाली कुर्ती, कुर्ती, चूड़ीदार सुथण, पीडी पजामी, ग्रे रंग की मलाणा टोपी, किश्ती टोपी इनके पहनावे का हिस्सा हैं। पंडित विष्ठण पगड़ी पहनते हैं। मलाणा की औरतें बास्कट नहीं पहनती। वे पट्ट (फूल वाला या फिर तारागुड़ी पट्ट ही पहनती हैं) और स्वैटर के बाहर पतुही (बतुही) पहनती हैं। बर्फ में आधी पुलें और पूरी पुलें तथा उनके बाहर पहनने वाले 'खोहभे' पहनते हैं।

मण्डी

वैसे मण्डी और कुल्लू के अंदरुनी क्षेत्रों की वेशभूषा आपस में काफी मिलती-जुलती है। ठंडा इलाका होने के फलस्वरुप पुरुष ऊन की चूड़ीदार या खुली सुथण, चोला (हाथ से काती और बुनी पट्टी से तैयार एक लंबा गर्म कपड़ा जो कमीज के ऊपर पहना जाता है) पहनते है। गर्मी में चोला नहीं अपित ह्यचोलह को पहनते थे।

यदि बात जिला कांगड़ा की करें तो यह जिला हमें धौलाधार पर्वतमाला के बिलकुल पास ले जाता है। बड़ी-छोटी पहाड़ियों और मैदानी क्षेत्र का मिला-जुला रुप है यह जिला। यहां की वेशभूषा में पुरुष कुर्ता (लंबा बंद गले और बिना कॉलर वाला), पायजामा, सिर पर साफा जो मण्डी के साफे से हल्का- सा भिन्न है, पगड़ी, लंगोट, तौलिया, धोती, टोपी और सर्दी में कोटी, स्वैटर, मफलर आदि पहनते हैं तथा महिलाएं सलवार, पजामी, कुर्ती, सुथण, चादरु, रीढ़ा (विवाह के समय दुल्हन को जो ओढ़नी दी जाती है), जंपर (कुर्ते की तरह का वस्त्र), चूड़ीदार पायजामा (वृद्ध महिलाएं पहनती हैं), चोली और घाघरी प्रमुख वस्त्र हैं। शीतऋतु में कोटी, शॉल, स्वैटर आदि इन वस्त्रों के ऊपर पहने जाते हैं। यहां मौजूद गुज्जर समुदाय की महिलाएं एक बड़े घेरे वाला चोला, कुर्ती, सुथण, पायजामी और कमर में रस्सी का पट्टा बांधे रखती हैं। पुरुष भी कमर में रस्सी की लपेट कर रखते हैं।

कांगड़ा जिले की वेशभूषा साथ लगते जिलों हमीरपुर और चंबा जिले से भी मेल खाती है। कांगड़ा के साथ लगता, और जम्मु की सीमा को छूता ठण्डा इलाका है चंबाचंबा पूरा पहाड़ी इलाका है इसलिए यहां वस्त्रों का पहनावा भी उसी अनुरुप है। यहां ज्यादातर ऊनी कपड़े पहने जाते हैं। पुरुषों के पहनावे में ऊनी या फिर सूती सुथण, ऊनी चोला (कई सिलवटों के साथ घुटनों की लंबाई लिए हुए), चोली और चोलु (इसमें सिलवटें कम होती हैं), डोरा, सिर पर टोपु, ऊन गालदार, नोकदार टोपी या फिर सफेद साफा, गले में मफलर, पैरों में पुलें आदि शामिल है। दुर्गम इलाके पांगी के वस्त्रों में पांगी के पंगवाले शादी या उत्सव में अपना परंपरागत चोला के साथ टोपी पहनते हैं। इस परंपरागत जिसकी लंबाई एड़ी तक रहती है को 'लिक्खड़' कहा जाता है। चंबा की महिलाएं कुर्ता, चूड़ीदार पायजामा, सुथण के साथ 'ल्वांचड़ी' (सूती चोला), घघरु, चद्दर आदि पहना जाता है। पगंवाली चिवाहित महिलाएं इसके साथ सिर पर 'जोजी' या 'थुम्बी' पहनती हैं। साथ ही पट्ट, दोहडू भी पहना जाता है। भरमौर की टोपी राजस्थानी टोपी से मेल खाती है। एक और परिधान पहले चंबा शहर के आसपास के इलाके में प्रचलित था 'पिसवाज', जो ल्वांचड़ी से ही मिलता-जुलता है। वह अब प्रचलन में बहुत कम रह गया है।

हमीरपुर

हमीरपुर जिला मैदानी गर्म इलाका है इसमें पुरुषों के पहनावे में कुर्ता, पायजामा, टोपी, पगड़ी, लंगोट, धोती, परना, मफलर, बास्कट आदि प्रमुख है। सर्दियों में कोट, स्वैटर, कोटी, पट्ट आदि पहने जाते हैंमहिलाओं के पहनावे में सलवार, कुर्ती, सुथण, अंगी चोली, दुपट्टा, घघरी, नवविवाहिताओं के लिए रहीड़ा (लाल रंग का किनारियां जड़ा हुआ दुपट्टा), बास्कट आदि प्रमुख है। हमीरपुर के साथ लगता जिला है ऊना। ऊना जिला पंजाब की सीमा 1, को भी छूता है। यह इलाका पूरी तरह से मैदानी और गर्म है। यहां पंजाब और हिमाचल की संस्कृति का मिलाजुला असर है। पुरुषों के पहनावे में यहां धोती, कुर्ता प्रमुख रहा है लेकिन वर्तमान में कमीज, पायजामा प्रचलित है। सर्दियों में कोट, स्वैटर, लोई और पट्ट का इस्तेमाल किया जाता है। महिलाएं पहले लहंगा, कुर्ता, दुपट्टा पहनती थीं। त्योहार के मौके पर यही वस्त्र चटख रंग के होते थे। लेकिन 1970 के बाद लहंगा, कुर्ती का स्थान सलवार, कमीज और दुपट्टे ने ले लिया है।

बिलासपुर

हमीरपुर के साथ लगता एक अन्य गर्म जिला है बिलासपुर। यह इलाका हल्के मैदानी क्षेत्र के साथ छोटी-छोटी पहाड़ियों को अपने में समेटे हैं। यहां कि महिलाएं कुर्ती, सलवार, दुपट्टा, पुसाज (लगभग सात गज कपड़े का काफी बड़े घेरे वाला वस्त्र) पहनती हैं। पहले इस इलाके की महिलाएं घघरी पहनती थीं। नवविवाहित महिलाओं में शरीहड़ाह पहनने का रिवाज है। पुरुष के पहनावे में कुर्ता, लंगोटी, झग्गी (कुर्ते के भीतर पहनी जाने वाली बनियान), परना, मफलर तथा रसूख वाले लोग चुड़ीदार सुथण भी पहनते थे। सर्दी के मौसम में इन कपड़ों के अलावा ऊनी स्वैटर, कोट, टोपी या सफेद साफा पहना जाता था। बता दें हमीरपुर, ऊना, बिलासपुर तथा कांगड़ा के वस्त्रों में काफी समानता है। इन इलाकों में घुघट प्रथा भी थी जो आज भी कहीं-कहीं देखने को मिल जाती है। बिलासपुर, मण्डी, हमीरपुर, ऊना, कांगड़ा, सोलन, सिरमौर में छोटे बच्चों का पहनावा झग्गु, टोपु है। साथ ही मौसम के अनुसार गर्म वस्त्र।

बिलासपुर के साथ का जिला है सोलन। चण्डीगढ़ और शिमला के बीच में बसा यह एक खूबसूरत क्षेत्र है। इसी जिले से होकर 103 सुरंगों वाला कालका-शिमला रेलमार्ग भी गुजरता है। इस इलाके के पुरुषों के पहनावे में मुख्यतः कुर्ता, पायजामा या पतलून, साफा, मफलर, बास्कट या सदरी, पतुही (बनियान की तरह कुर्ते के नीचे पहने जाने वाला वस्त्र), कपीन (लंगोटी), पट्ट, स्वैटर और साथ ही बासणी जोड़ा (चाैड़ी पट्टी का वस्त्र जिसे चांदी के सिक्कों को रखने के लिए कसकर बांधकर रखते थे) और पुले इस्तेमाल में लाई जाती थीं। महिलाएं कुर्ता, पायजामा, चादरु, चोली, लहंगा, पस्वाज (राजघराने और धनी परिवारों की महिलाएं इस्तेमाल में लाती थीं। इसे बनाने में बीस से चालीस गज कपड़ा इस्तेमाल होता था), सर्दी में शॉल, स्वैटर, कोटी का इस्तेमाल किया जाता है। कट या सदरी,

साेलन

सोलन के साथ है सिरमौर। इसका कुछ हिस्सा हल्का मैदानी और काफी हिस्सा पहाड़ी क्षेत्र में है। उतराखण्ड के साथ लगते इस जिले में गर्म और सर्द मौसम साथ-साथ चलते हैं। इस इलाके में पहनावे के अंतर्गत सलवार, लुगड़ी (फिट पाजामी के बाहर पहना जाने वाला घेरावदार वस्त्र), ढाळू, चण्डकु (परांदा), चालणा (सफेद लंबा वस्त्र जिसे किसी विशेष अवसर पर कलाकारों द्वारा नृत्य प्रदर्शन के दौरान पहना जाता है। यह आगे से खुला होता है) आदि पहना जाता है। पुरुषों के पहनावे में झोगटु (कमीज) सुथण, सोछरी गाची, गोंचा या खेशड़ी (गुप्तांग को ढकने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला वस्त्र), लोइया (ओवरकोट-ऊनी वस्त्र का), टोपी आदि मुख्य है।

शिमला

शिमला हिमाचल की राजधानी है। इसके सौंदर्य को निहारने दुनिया भर से पर्यटक यहां पहुंचते हैं। यदि मुख्य शिमला की बात करें तो यहां आपको दुनिया भर के फैशन के रंगों से सजे महिला-पुरुष मिलेंगे लेकिन शिमला के ग्रामीण इलाकों में पुरुषों के पहनावे में लोइया, चोगा, कोट, बास्कट, किश्तीनुमा टोपी, पायजामा, चूड़ीदार ऊनी व सूती सूथण, गाची, गले की ऊन पट्टी, शेल्टी, लाकुटी और साफा मुख्य परिधान है। महिलाएं कुर्ता, पायजामा, अचकन, ढाठू, चोल्ट्र, पाणी, खुरशे (बर्फ के बूट), ऊन का चूड़ीदार पायजामा, खिलका (महिला की कमीज), चपकण (कोटनुमा वस्त्र), सदरी, सलवार, चादर, गाची आदि मुख्य है।

किन्नौर और लाहौल-स्पीति

अब बात किन्नौर और लाहौल-स्पीति की करें तो ये दोनों जनजातीय जिले ऐसे हैं जहां की अनोखी परंपराएं और लोक संस्कृति किसी को भी अपना दिवाना बना दे। कठिन, दुर्गम, अति दुर्गम इलाके में रहने वाले यहां के निवासियों का अपना-रहनसहन, खान-पान और अपनी वेशभूषा है। लाहौल-स्पीति और किन्नौर बहुत ठंडे इलाके हैं और यहां बर्फ काफी समय तक रहती है। लाहौल-स्पीति के लोग इसी ठंड के चलते खुला चोगा पहनते हैं। ये मोटी ऊन की पट्टी से बना होता है। इस चोगे के ऊपर जैकेट पहनी जाती है। टांगों में गर्म पायजामा और सिर पर गर्म टोपी तथा पैरों में पुले पहनने का रिवाज है। लाहुल की महिलाएं ह्चोली पहनती है जिसमें दाईं ओर बटन होते हैं। यहां की महिलाओं को हरी और लाल रंग की शनील की चोलियां बहुत पसंद हैं। गर्म चूड़ीदार पायजामा के साथ सिर पर टोपी प्राय रहती है स्पीति इलाके का पहनावा लाहौल से थोड़ा भिन्न है यहां सिर पर ये लोग टोपी पहनते हैं वहीं पैरों में याक की खाल से बना 'ल्हम' पहनते हैं जो उन्हे बर्फ में ठण्ड से बचाकर रखता है। स्पीति के पुरुषों के पहनावे में मुख्य पहनावा चोगा है जो ऊन या फिर भेड़-बकरी की खाल से बना होता है। स्त्रियों के इसी चोगे में खूबसूरत कढ़ाई की होती है। इसमें 'हूजुक' को भी शामिल किया जा सकता है जो स्त्रियों की बिना कॉलर और बटन की सूती कमीज है।

यदि बात किन्नौर की करें तो हम किन्नौर को दो भागों में बांटकर देखते हैं, एक अप्पर किन्नौर और दूसरा लोअर किन्नौर। अप्पर किन्नौर पूह से ऊपर का क्षेत्र है जो स्पीति की सीमा के साथ छूता है। लोअर किन्नौर पूह से नीचे का सारा क्षेत्र है जो शिमला जिला की सीमा तक जाता है। लोअर किन्नौर के मुकाबले अप्पर किन्नौर बहुत ठंडा इलाका है और इनके परिधान भी उसी तरह से बने हुए हैं। किन्नौर के पुरुषों के पहनावे की बात करें तो लोअर और अप्पर किन्नौर के इनके पहनावे में कोई विशेष अंतर नहीं है। इनके पहनावे में चोगा, ऊनी कोट, सुथण और सिर पर हरी टोपी और कमर पर गाची रहती है। हरी टोपी किन्नौर की खास पहचान है। लोअर किन्नौर की महिलाओं के पहनावे में मुख्य पहनावा दोहडू, ऊनी चोली, ऊनी सुथण, कमर में गाची और सिर पर हरी टोपी है। लेकिन अप्पर किन्नौर की महिलाएं न तो दोहडू और न ही चोली पहनती है। इन महिलाओं के पहनावे में मुख्यतः चोगानुमा वस्त्र, जिसके नीचे तंग मोहरी वाली सुथण, कमर में ऊनी गाची और सिर पर टोपी रहती है। यही नहीं जब किसी त्योहार, उत्सव या विवाह अवसर आदि की बात करें तो इन महिलाओं के पारंपरिक पहनावे और हार-श्रृंगार की खूबसूरती देखते ही बनती है। दोहडू के साथ हरी जेकेट, हरी टोपी, गाची और सुथण के साथ कई किलो गहनों वाले को सच में ही सम्मोहित किए बगैर नहीं छोड़ता। 

बेशक, समय के बहाव के साथ आमजन का कपड़ों का टेस्ट और उनका स्वरुप भी बदला है। अब हमें ठेठ पारंपरिक परिधान शादी, ब्याह या किसी उत्सव के मौके पर ही सही मायने में देखने को मिल सकते हैं। रोजमर्रा की जिंदगी में हमें बहुत कम ये वेशभूषाएं, इनका श्रृंगार अब देखने को नसीब होता है। हिमाचल के ये परिधान पूरी तरह से लुप्त नहीं हुए हैं लेकिन आधुनिकता के फेर में ये अवश्य आए हैं। बावजूद इसके हिमाचल ने आज भी अपनी संस्कृति, परंपराओं को बराबर सहेजकर रखा हुआ है जो गर्व की बात है। हिमाचल अपनी वेशभूषा के विविध रंगों से सजा एक शांत और अद्भुत प्रदेश है। यहां का जनमानस बहुत मेहनती और रचनाकार है। दिनभर की अपनी सारी थकान को अपने घर के किसी कोने में रखकर वह मंगलगीत गाता चला जाता है।

चला जाता कभी आप यहां आएं तो इस जनमानस से मिलकर पहाड़ी संस्कृति, यहां के लोक को जाने, समझें। मुझे पूरा यकीन है, आप अपने में एक नई ताजगी, नई परंपरा के सृजन का एहसास करेंगें।