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वहम की दवा
March 20, 2020 • पूरन सरमा

यदि वहम की कोई दवा मिलती होती तो मैं उसका सबसे बड़ा खरीददार होता। वहम में मेरा कोई मुकाबला नहीं। बात-बात में वहम। यह मैंने अच्छी तरह मालूम कर लिया है कि वहम की दवा भारत में तो है नहीं। विदेशों में कहीं मिलती हो तो मुझे जानकारी नहीं है। कई बार तो वैज्ञानिकों को लानत देने की इच्छा होती है कि वे एक मामूली रोग 'वहम' की आज तक कोई दवा नहीं खोज पाये। विकास की चकाचौंध को हम बढ़ाते तो गये, परन्तु वहमियों का मर्ज दिन-दिन हरा होता रहा। कई बार तो इच्छा होती है कि वहमियों की यूनियन बनाऊँ और उसका चेयरमैन बनकर मैं इनके हितों के लिए कार्य करूँ। दुनिया के कुल वहमियों में से करीब पचास प्रतिशत वहमी हमारे देश में पाये जाते हैं।

वैसे बुजुगों का कहना है कि वहम की कोई दवा नहीं होती। परन्तु मेरा कहना है कि वहम की दवा होनी चाहिए। यदि नहीं है तो उसे खोजा जाना चाहिये क्योंकि वहम बाकायदा एक रोग है और हर रोक की एक दवा हुआ करती है। वहम भी छूत रोगों में आता है। अतः ऐसे रोगी से बचने का प्रयास करना चाहिए जो इसका शिकार हो। अच्छा-भला-चंगा आदमी भी एक क्षण में इसकी चपेट में आ सकता है। वहम के शिकार लोगों को उजड़ते तथा बरबाद तक होते देखा गया है। उन्होंने अपना जीवन तो नरक बनाया ही है, साथ ही परिवारजनों तथा परिजनों को भी इस महामारी की चपेट में लिया है। आदमी के अन्य काई बड़ा रोग हो जाये परन्तु वहम नहीं होना चाहिये। शंका और सन्देह इस रोग के दूसरे नाम हैं। जरा-सी शंका हो जाये, उसका जब तक समाधन नहीं हो, वह बेचैन किये रहती है।

पिछले दिनों मेरे साथ एक घटना घटी। मैंने बाजार से एक दिन कुछ नाश्ता लाकर किया तथा बाद में वहम हो गया कि उसमें तो कुछ विषैला पदार्थ था। फिर क्या था, रोग के लक्षण प्रकट होने लगे। जी घबराने लगा, मितली आने लगी और बेवजह पाखाना जाने की इच्छा होने लगी। सारे शरीर में गिरावट आ गई तथा पूरा शरीर पसीने से भीग गया। भागा-भागा डॉक्टर के पास गया तो डॉक्टर ने सब कुछ सुनकरदेखकर कहा-'तुम तो ठीक हो, तुम्हें वहम हो गया है तथा वहम की दवा मेरे पास तो है नहीं!'

मैंने कहा- 'वहम नहीं, मुझे पसीना आ रहा है और लग रहा है कि कुछ-न-कुछ होने वाला है।'

डॉक्टर महाशय बोले- 'मेडीकल में एडवांस कुछ नहीं होता। पहले कुछ हो जाने दो, फिर निदान करेंगे। यह सब 'वहम बनाम फियर' की वजह से है। तुम जाकर आराम करो।'

मैं आ तो गया, परन्तु शंका का समाधान नहीं हुआ था। परेशान रहा। पत्नी से कहा कि वह मेरे हाथ-पाँव दबाती रहे। मुझे नींद आई तो वह डर गई, बोली- 'आप आँख बंद मत करिये, मेरा जी घबरा रहाहै।'

मैंने कहा- 'तुम्हें भी हो गया है?'

वह बोली- 'क्या?

मैंने कहा- 'वहम।

सारी रात वहम से पीड़ित होकर गुजारी तथा प्रातः थोड़ा नार्मल हुए।

मुझे अब तो बात-बात में सन्देह होने लगा है। जैसे खाने की चीज खुली थी, पता नहीं बिल्ली, कुत्ता, छिपकमी मुँह दे गई होपानी में कुछ गिर गया है। आज दूध का रंग कुछ नीला-सा है। सब्जी में कहीं कुछ गिर तो नहीं गया। बेवजह पत्नी से झगड़ पड़ता हूँ। वह लाख कहती है कि चीजें ढकी हुई तथा सुरक्षित हैं, आप व्यर्थ में वहम कम किया करो, परन्तु वहम है कि अपना जोर दिखाये बिना नहीं रहता। अनेक बार दूध को फेंका, सब्जियाँ फेंकी तथा नये सिरे से खाने-पीने की तैयारी की गई। घर में अशांति का वातावरण बना, वह अलग था। लोग सनकी-वहमी कहने लगे, वह पृथक् बात थी।

वहम का दायरा बहुत बड़ा है। वह अकेले खाने-पीने तक ही सीमित नहीं रहता। वमार्जी को अपनी धर्मपत्नी पर सन्देह हो गया कि वह उनके दफ्तर जाने के बाद कहीं जाती है तो वे दफ्तर से बीच में आने लगे। चौकस रहने लगे। बात-बात पर पत्नी से झगड़ने लगे। दाम्पत्य में दरार आ गई तथा अच्छा-भला गृहस्थ जीवन बिगड़ गया। लाख समझाया कि जैसा वे सोचते हैं, वैसा कुछ नहीं है परन्तु वमार्जी हर बात की तहकीकात में रूचि लेने लगे। नौबत मनोवैज्ञानिक के पास ले जाने की आ गई। मनोचिकित्सा के बाद थोड़ा सामान्य तो हुये हैं, परन्तु छूत पूरी तरह मिटा नहीं है।

गुप्ताजी का किस्सा भी कम रोचक नहीं है। वे बच्चे पर शक करने लगे कि वह बिगड़ गया है तथा गलत संगत में चला गया है। वे इससे पीड़ित होकर रोज बच्चे को डाँटने-डपटने लगे। सबने समझाया कि बालक बिल्कुल सपूत है, आप व्यर्थ में शक कर रहे हैं, परन्तु उनकी खोपड़ी में वहम को रोगाणु चल चुका था, अतः वे तो उसे बढ़ाये चले गयेएक दिन बालक परेशान होकर घर से भाग गया तो वह कहने लगे- 'लो मैंने कहा नहीं था कि वह बिगड़ गया है, तभी तो नालायक भाग गया है।' उनकी मनःस्थिति इसके बाद ज्यादा डांवाडोल हो गई। उन्हें भी 'फ्यूज' घोषित किया गया तथा मेंटल केस मानकर प्रोपर चिकित्सा के लिये अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। तब तक भागे हुये लड़के को सद्बुद्धि आ गई, वह भी घर लौट आया, तब कहीं जाकर गुप्ताजी की हालत में सुधार हुआ तथा वहम से बचे, वरना वहम तो पराकाष्ठा पर पहुँच चुका था।

वहम का रोगी चिड़चिड़ा तथा शरीर से दुबला-पतला पाया जाता है। उसे क्रोध भी बहुत आता है, इससे खाया-पीया अंग नहीं लगता तथा उसकी स्थिति दिन-दिन बिगड़ती चली जाती है इसलिये डॉक्टरों की सलाह यह रहती है कि ऐसे रोगियों से दूर ही रहना चाहिये। वहम का प्रसार बहुत जल्दी होता है तथा इसका रोगी जीवन से उकताया तथा हताश-सा महसूस करता है अपने आपको। इसमें ताकत की दवा भी कोई असर नहीं करती केवल शंकायें समाधान चाहती हैं। जिस चीज का वहम हो गया है, उसी को खत्म कर दिया जावे तथा समाधान कर दिया जाये, तभी रोगी सन्तुष्ट हो पाता है, वरना उसे नींद आना बंद हो जाती है तथा उसे सदैव अपने खिलाफ किसी साजिश की आशंका बनी रहती है। ऐसे रोगियों का अपने लोगों से भी विश्वास उठ जाता है तथा वे चौकन्ने से कान खड़े करके व्यर्थ की चिन्ताओं में घुलते रहते हैं।

वहम एक बहुत बुरा रोग है। यह जिसे एक बार हो जाये उसे सामान्यतः आजीवन बना रहता है। इसमें स्वस्थ लोगों को भी सूखकर काँटा होते देखा गया है इसलिए इसकी दवा खोजने के प्रयत्न तो किये जा रहे हैं, परन्तु अभी तक सफलता नहीं मिल पाई है। वैसे इसकी मुख्य चिकित्सा उदार, खुले तथा समझदार लोग हैं जो रोगी को समझा बुझाकर शांत कर वहम को दूर कर देते हैं। इसलिए घर में एक व्यक्ति ऐसा अवश्य होना चाहिये जो वहम के लक्षणों को समझकर अविलम्ब उसका 'साइको ट्रीटमेंट' कर दे। अन्यथा अभी तक इस रोग की न तो कोई गोली निकली है और न ही कोई कैपसूल, इन्जेक्शन भी तैयार नहीं हुआ है। मैंने तो सभी लोगों को अभी तक यही कहते सुना है कि वहम की तो कोई दवा है नहीं।