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'उपवास' याने स्वास्थ्य के भी साथ, परमात्मा के भी पास
January 23, 2020 • ओम प्रकाश मंजुल

'उपवास' दो शब्दों से मिल कर बना है- 'उप' और 'वास' से उप के दो अर्थ होते हैं- एक, 'छोटा' या 'सहयोगी', जैसे उपप्रभाव और उप संपादक वाला 'उप' तथा पूजा 'निकट', जैसे उपस्थिति (उप+स्थिति) और उपासना (उप+आसना) माला जप, 'उपासना' की भीति रूढ़ वन कर आध्यात्मिक वचनावली का शब्द बन चुका है और इन दोनों ही शब्दों में 'उप' का तात्पर्य ईश्वर की निकटता से है इस प्रकार 'उपवास' का अर्थ हुआ संसार के बाँस अर्थात् परमात्मा का सामीप्य, उसके निकट वसन्त- रहना

समान्यत उपवास को 'व्रत' का पर्याय माना जाता है, पर व्रत नितांत धर्म और अध्यात्म से जुड़ा हुआ शब्द है व्रत से आत्मा की शुद्धि एवं पापों का प्रक्षाखन होता है, जबकि उपवास शारीरिक स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है, यह काया के कषाय-कलाषों के निष्कासन की साधना है और साधन भी व्रत पुण्य प्राप्ति की आशा में कठिन एवं सख्त विधि विधान से निराहार रहने का अनुष्ठान है, तो उपवास पाप को मूर्छित करने के विश्वास से प्रागश्चित स्वरूप, कुछ अधिक सरलता से संपादित निराहार रहने की तपश्चर्या है इसके साथ शारीरिक-स्वास्थ्य संवर्धन का लक्ष्य-उपलक्ष्य भी संल्पन रहता है, व्यक्ति को कभी-कभार अभाव या यौग वश भूखा रह जाना पड़ता है यह न व्रत है और न उपवास ही इसे 'मजबूरी का पर्याय' कहा जा सकता है, संत स्वभाव के व्यक्ति ही अधिकतर उपवास रखते हैं, इसलिए यह शब्द अब आध्यात्मिक भाषा का शब्द बन चुका है, जैसा कि मैं इसका अर्थ बताते समय पूर्व में भी कह चुका हूँ, 

सामान्य रूप से व्रत आत्मा की उन्नति और उपवास शारीरिक स्वास्थ्य के उत्कर्ष हेतु किए जाने के बावजूद व्यवहार में ये दोनों परस्पर पूरक भी है और पर्याय भी उपवास का जितना सफल, सामाजिक और अधिक उपयोग महात्मा गाँधी ने किया, उतना अन्यकिसी ने भी नहीं जब भी देखा कि उनका अपना व्यक्ति उनकी बात नहीं मान रहा है, तो उपवास पर बैठ गये-दंगे शांत नहीं हो रहे हैं, दलितों का उत्पीड़न हो रहा है, स्वयं से कोई भूल हो गई है या उनकी इच्छा के प्रतिकूल कोई कार्य होने लगा है तो ऐसी हर स्थिति में ने उपवास पर बैठ गये, उपवास उनके लिए सौ मरजों की एक दवा थी यहाँ गाँधी जी के उपवासीय आचरण का एक छोटा सा उदाहरण देना ही पर्याप्त होगा प्रतिदिन प्राय-सायं प्रभु की प्रार्थना-उपासना करना उनकी दैनन्दिन का अटल-अडिग क्रम था शाम को उपासना के बाद ही वे सोते थे एक दिन कार्य की अधिकता वश थक जाने के कारण दिन के भोजनों उपरान्त वे ऐसे सोए की अगली प्रातः को ही जाग सके उस दिन उन्होंने कुछ भी ग्रहण नहीं कि शाम की उपासना छूट जाने के पाप को मूर्छित करने के प्रायश्चित स्वरूप उन्होंने दिन भर उपवास रखा लोगों ने उन्हें काफी समकाया कि उपासना उन्होंने जान-बूझकर नहीं छोड़ी महतो संयोग से छूट गयी यह भी प्रभु की ही लीला थी, इसलिए उनका कोई दोष न होने के कारण उन्हें भोजन कर लेना चाहिए, पर गाँधीजी नहीं माने उनका तर्क था कि जिस प्रभु ने उन्हें मनुष्य रूप में पैदा किया है, उनका किसी भी स्थिति में विस्मरण नहीं होना चाहिए निस्मता से होने वाले पाप की क्षति पूर्ति उपवास के प्रायश्चित से ही की जा सकती है, और वे उपवास रहे ही गंभीरता से मनन करे, तो ज्ञात होगा कि सत्याग्रह के बाद उपवास उनका दूसरा बड़ा हथियार था अंग्रेजों का विरोध करने के लिए वे सत्यग्रह का सहारा लिया करते थे और अपनों के प्रति असहगति प्रकट करने के लिए वे उपवास का आश्रय लिया करते थे, गाँधीजी के बाद उपवास का सबसे अधिक साधना एवं शस्त्र के रूप में प्रेम करने वाले भी गाँधी ने ही अनुयायी एवं उनके प्रथम सत्याग्रही, विनोबा जी थे

शारीरिक स्वास्थ्य-संवर्धन के क्षेत्र में उपवास की महिमा वर्णनातीत है, सर्व प्रथम उपवास से आदमी का मोटापा छंटता हैमोटापा (obesity), आलस्य और निष्क्रियता को तो बढ़ाता ही है, गुर्दा, हृदय, विषम खत-चाप आदि रोगों का भी जनक है, उपवास से शरीर की इंद्रियाँ अनुशासित होती है, इन्द्रियों के अनुशासित होने पर मन और तदुपरान्त आत्मा भी अनुशासित होने लगता है, हकीम लुकमान कहा करते थे, “आदमी अपनी कब्र अपनी जीभ के रखने से खोदता है," उनका मानना था कि पेट भरा होने पर आदमी की बुद्धि सो जाती है और मौन हो जाती है, अस्तु बुद्धि को जाग्रत और विवेक को मुखर रखने के लिए वकतन-व-तरतन उपवास रखना जरूरी है, प्रत्येक योगी एवं संत ने उपवास का गुणानुवाद किया है, 'अति ऑफ लिविंग' के मास्टर, श्रीश्री रविशंकर जी के अनुसार उपवास से तन और मन दोनों ही परिमार्तित होते हैं, व्यक्ति का मन पाचक अग्नि की ओर नहीं जा पाता ऊर्जा संग्रहण से उसकी चेतना बढ़ती है, ऊर्जा ऊर्ध्वगामी बनती है और उसका ध्यान केन्द्रित होता है, गायत्री उपासना-पद्धति के जनक और आधुनिक यज्ञानुष्ठानों के प्रणेता, पूज्य, श्रीयुग जी रामशर्मा आचार्य उपवास को बहुत महत्व देते थे वे अपने आश्रम 'शान्ति कुञ्ज', हरिद्वार में एक-एक मास के 'जीवन साधना सत्र' चलया करते थे, जिस में व्यावहारिक रूप से 'चन्द्रायण व्रत' करवाया करते थे शिविरार्थी साधणों को मास की प्रथमा से पूर्णिमा तक प्रशिक्षण दिया जाता था, प्रथमा से अमावस्या तक शिविरार्थी (साधक) को चन्द्रमा के घटते हुए आकार- क्रम की भाँति अपने भोजन को प्रतिदिन क्रमशः एक मास कम करना पड़ता था अमावस्या के बाद उसका भोजन इसी क्रम से बढ़ता हुआ पूर्णिमा तक सामान्य हो जाता था आचार्य जी के यहाँ प्रत्येक गुरुवर को मौन व्रत के साथ 'अस्वादव्रत' की भी व्यवस्था थी 'अस्वादव्रत' में बिना नमक- मिर्च और मीठा वाला भोजन लिया जाता था, यह भी उपवास का ही उप प्रकार था (इन पंक्तियों के लेखक ने शान्ति कुञ्ज में साधक के रूप में रहते हुए इन उपवासों को कई बार किया है)

ज्योषि एवं आयुर्वेद भी उपवास के महत्व को प्रतिपादित करते हैं ज्योतिष के अनुसार पृथ्वी के समान ही चन्द्रमा का गुरुत्वाकर्षण हमारे शरीर के अन्दर मौजूद द्रव को प्रकाशित करता है, जिससे हम भावनात्मक स्तर पर अस्थिर हो जाते हैं, ऐसी दशा में उपवास विषनाशक औषधि के रूप में काम करता है, यह-शरीर में स्थित अम्ल को कम करता है, जिससे व्यक्ति स्वयं में प्रसन्नचिन्त अनुभव करता है आयुर्वेद के अनुसार पाचन तंत्र में विषैले पदार्थ जमा होने के कारण ही कई रोग होते है उपवास से हमारे पाचन तंत्र को आराम मिलता है और शरीर का संपूर्ण सिस्टम प्रक्षालित हो जाता है 

'जन्माष्टमी', 'रामनवमी' तथा 'नवरात्रों' आदि साधनावालों में उपवास का सापेक्षतः अधिक महत्व है, इन पावन अवसरों पर साधना के साथ उपासना का क्रम भी चलता है, पूजा, उपासना के समय खाली पेट होने के कारण आत्मा जाग्रत रहती है तथा आलस्य-उन्माद व मल-मत्र के निष्कासन से निजात मिलती है, भारतीय संस्कृति में उपरोन्तादि उल्लास के अवसरों पर उपवास रखने का प्रावधान इसीलिए रखा गया है, ताकि लोग-बाग इन खुशी के मौको पर उल्लास-गलयम रखकर स्वास्थ्य चौपटन कर लें उपवास का अर्ण यह भी नहीं है कि उपवास के समय कुछ भी न खाया जाये हमारे शरीर को काम चलाने भर के लिए कुछ कार्बोहाइट्रेट, प्रोटीन, विटामिन तथा खनिज लवणों की जरूरत होती है, उपवास के दिन थे तत्व यथावश्यक मात्रा में बने रहें, इसलिए हमें उपवासवधि में कुछ बार फल, दूध, दही, छाछ, पनीर आदि ले लेना चाहिए कुछ लेय उपवास के दिनों 'व्रत' का बहाना लेकर बर्फी, कलाकंद आदि का डटकर भोग लगाते हैं या कुटू के आटे से घी लेकर जायके दार व्यंजन बनाकर खाते हैं, ऐसे गरिष्ट भोजनों से बचना चाहिए रामदाना तथा साबूदाना आदि से निर्मित व्यंजन लिए जा सकते है उपवास रहना मेहदी बटने जैसा कार्य है, मेंहदी बटने वाले के हाथ बिना मेंहदी रखे ही लाल हो जाते है, इसी प्रकार उपवास स्वास्थ्य सुधारने के लिए रखा जाता है, पर भगवान फ्री में पास आ जाते हैं

उपवास से उपरोक्त जान्मों के अतिरिक्त एक बड़ा लान्म यह भी है कि इससे रोगों से तो बचते ही हैं, अनाज, ईधन तथा समय आदि की भी बचत होती है, भारत के भू.पू. एवं त्यागवृत्ति प्रधान मंत्री, अद्वेय लाल बहादुर शास्त्री ने अकाल के समय इसीलिए देश से अपील की थी कि देश के हर नागरिक को सप्ताह में एक दिन उपवास रखना चाहिए सोचा जा सकता है कि राष्ट्रीय स्तर पर सलाह में एक दिन के उपवास से जिनता अधिक अन्न, उसको पकाने वाले ईंधन और खाने वाले समय में बचत की जा सकती है आपको ‘खाने वाले समय की बचत' की बात हास्यास्पद लाभ सकती है, पर जरा हिसाब लागाइये कि ढाई बार वे भोजन में एक व्यक्ति का लगभग एक घण्टे की दर से देश के लगभग एक अरब घण्टे बचे, इतने घण्टों में कई लाख वर्ष बनते हैं, यह बचत मात्र सप्ताह के एक दिन में होती है, संपूर्ण वर्ष में कितना समय मात्र भोजन न करके बचाया जा सकता है इतने समय को पक्षक राष्ट्रहित में लगा दिया जाये, तो राष्ट्र का कायाकल्प ही हो जाये मेरे एक मित्र, जो इस समय उत्तर प्रदेश के एक 'ए' सिटी में स्थित स्टैटबैंक की 'ए' शाखा में मैंनेजर हैं, 'कभी दोपहर वाला लंच' नहीं लेते प्रातः 10 बजे ब्रेड का बड़ा पूरा पैकेट खाकर जाते हैं और फिर सारा कार्य निपटाकर शाम को ही भोजन लेते हैं लोगों को यह हास्यास्पद ही लग सकता है, जबकि उन्हें प्रेरणा लेनी चाहिए कि कोई अनुकरणीय व्यक्ति भोजन का समय बचाकर बैंक मैनेजर का दायित्व कितने मनो योग एवं जिम्मेदारी से निभाकर कितना अधिक कार्य कर लेता है।