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सोशल मीडिया और आधी आबादी के सरोकार
March 20, 2020 • आकांक्षा यादव

कभी घर के बड़े-बुजगों के कहने पर मताधिकार का उपयोग करने वाली महिलाएं अब सोशल मीडिया के माध्यम से अच्छे-बुरे नेताओं की पहचान कर मताधिकार का अपने विवेक से उपयोग करने लगी हैं। विभिन्न प्रोडक्ट्स की लांचिंग और कैम्पेनिंग के साथ-साथ सोशल मीडिया पत्र-पत्रिकाओं व पुस्तकों की लांचिंग का एक महत्वपूर्ण जरिया बन चुका है। बेबाक अभिव्यक्ति के रूप में सोशल मीडिया एक ऐसा अचूक अस्त्र बन चुका है, जिसका सकारात्मक इस्तेमाल करने पर समाज को नई दिशा दी जा सकती है। इसने एक तरफ ‘सूचनाओं के लोकतंत्रीकरण' को बढ़ावा दिया है, वहीं सोशल मीडिया के माध्यम से सामाजिक व्यवहार और संवाद के तौर तरीके भी बदलते नजर आ रहे हैं। 

संचार क्रांति के इस युग में सोशल मीडिया एक मजबूत स्तंभ के रूप में उभरा है। तकनीकी विकास के साथ-साथ सोशल मीडिया दिन-प्रतिदिन , लोकप्रियता के शिखर पर चढ़ रहा है। राजनीति से लेकर व्यापार, आम आदमी से लेकर ऊँची हस्तियाँ, साहित्य से लेकर पत्रकारिता, सामाजिक कार्यकर्ताओं से लेकर सरकार तक सभी ने सोशल मीडिया को अनिवार्य अंग के रूप में अपनाया है। आज सोशल मीडिया सामाजिक जीवन का दर्पण बन चुका है। तमाम सोशल साइट्स सिर्फ मनोरंजन और सामाजिकता निभाने तक ही नहीं बल्कि क्रांति तक का हथियार बन चुकी हैं। बात राजनीति की हो या खेल जगत की, भ्रष्टाचार की हो या महँगाई की। हर मुद्दे को लेकर समय-समय पर आमजन एवं सरकार ने सोशल नेटवर्किंग साइट्स के माध्यम से बड़ी ही बेबाकी से अपना पक्ष प्रस्तुत किया है। सोशल मीडिया भ्रष्टाचार के विरूद्ध भी एक महत्वपूर्ण साधन के रूप में उभरा है। इसके द्वारा लोगों के करीब आना, ज्ञान बढाना, देश-दुनिया से जुड़े रहना बेहतर तरीके से होता है। सोशल मीडिया राजनैतिक नेतृत्व और आम जनता को करीब लाने और बेहतर तरीके से सम्पर्क व संवाद स्थापित करने में भी कारगर सिद्व हुआ है। 

भूमण्डलीकरण और उदारीकृत खुली अर्थव्यवस्था हमारे घरों तक दस्तक दे रही है। इससे मुँह मोड़कर रहना संभव नहीं है। आज सोशल मीडिया, देशज स्थानीयता से भूमंडलीय यथार्थ को प्रकट करने का प्रबल माध्यम बन चुका है। ऐसे में सोशल मीडिया ने समाज के विभिन्न वर्गों को भिन्न-भिन्न रूप में प्रभावित किया है। सोशल मीडिया से हर क्षेत्र में नई चेतना व नई क्रांति आई है। सोशल नेटवर्किंग ने वैश्विक पटल पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अत्याधुनिक । अस्त्र देकर हमारे विचारों के आकाश को अनंत बना दिया है। पहले जिस ऑनलाइन दुनिया को फैटेसी और तकनीकी कल्पना की दुनिया माना जाता था, अब वह जीवंत और एक दूसरे से संवाद करने वाली दुनिया के तौर पर विकसित हो रही है। खासतौर पर तब जब आभासी नेटवर्किंग की दुनिया हमारी अंगुलियों पर मौजूद है।

पिछले कुछ वर्षों में दुनिया के कई बड़े आंदोलनों को उपजाने तथा अंजाम तक पहुँचाने में सोशल मीडिया का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। अरब देशों में हुई क्रांति से लेकर भारत में अन्ना हजारे के आंदोलन की बात हो या फिर दिल्ली में 'दामिनी' के साथ हुए गैंगरेप के विरूद्ध जनाक्रोश हो इन सारी घटनाओं में सोशल मीडिया ने बेहद अहम भूमिका निभाई है। ऑड-इवन नम्बरों पर बहस से लेकर नोटबन्दी के नुकसान-फायदों को गिनाती महिलाएं राजनैतिक-सामाजिकआर्थिक मुद्दों पर भी खुलकर अपना पक्ष रखने लगी हैं। कभी घर के बड़े-बुजर्गों के कहने पर मताधिकार का उपयोग करने वाली महिलाएं अब सोशल मीडिया के माध्यम से अच्छे-बुरे नेताओं की पहचान कर मताधिकार का अपने विवेक से उपयोग करने लगी हैं। विभिन्न प्रोडक्ट्स की लांचिंग और कैम्पेनिंग के साथ-साथ सोशल मीडिया पत्र-पत्रिकाओं व पुस्तकों की लांचिंग का एक महत्वपूर्ण जरिया बन चुका है। बेबाक अभिव्यक्ति के रूप में सोशल मीडिया एक ऐसा अचूक अस्त्र बन चुका है, जिसका I सकारात्मक इस्तेमाल करने पर समाज को नई दिशा दी जा सकती है। इसने एक तरफ 'सूचनाओं के लोकतंत्रीकरण' को बढ़ावा दिया है, वहीं सोशल मीडिया के माध्यम से सामाजिक व्यवहार और संवाद के तौर तरीके भी बदलते नजर आ रहे हैं।

भूमिका र वर्तमान में सोशल मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका है। नेटवर्किंग आज का सबसे प्रचलित शब्द हैं। सोशल मीडिया की परिभाषा में कहा गया है कि, "यह इंटरनेट आधारित अनुप्रयोगों का एक ऐसा समूह है जो प्रयोक्ता-जनित सामग्री के सृजन और आदान-प्रदान की अनुमित देता है।" यह एक ऐसे आभासी संसार का निर्माण करता है, जहाँ व्यक्ति भौतिक रूप से मौजूद न रहकर भी अपनी आवाज बुलंद कर सकता है। सोशल मीडिया नेटवर्क ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का रूप बदल दिया है। लैपटॉपटेबलेट, मोबाइल फोन, स्मार्टफोन और आईपैड्स ने इसे और भी सर्वसुलभ बना दिया है। फेसबुक, ट्विटर, गूगल प्लस, लिंक्इडन, माय स्पेस जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स का अंतर्जाल व्यक्ति की सोच, समझ, दृष्टिकोण, वैचारिकता व समाजिकता को नए आयाम दे रहा है। भारत में सोशल मीडिया का उपयोग करने वालों की संख्या 19.1 करोड़ से ऊपर है। इनमें 64 प्रतिशत प्रयोक्ता 8 मेट्रो शहरों में, 24 प्रतिशत प्रयोक्ता 2 लाख से कम आबादी वाले कस्बो में और 11 प्रतिशत प्रयोक्ता अन्य छोटे कस्बों में हैं। सोशल साइट्स में भी 'फेसबुक' प्रमुख वेबसाइट है। वैश्विक स्तर पर भारत अमेरिका के बाद फेसबुक का दूसरा सबसे बड़ा बाजार बन गया है। भारत में मार्च 2016 तक फेसबुक यूजर्स की संख्या 14.2 करोड़ थी । इसमें दैनिक आधार पर बात करें तो भारत में 6.9 करोड़ प्रयोक्ता फेसबुक का हर दिन इस्तेमाल करते हैं और इनमें से 64 प्रतिशत प्रयोक्ता मोबाइल के जरिए फेसबुक तक पहुँचते हैं

इंटरनेट और सोशल मीडिया ने नारी स्वातंत्र्य व नारी सशक्तिकरण को भी नये मुकाम दिये हैं। नारी सशक्तिकरण सिर्फ एक अमूर्त अवधारणा नहीं है बल्कि इसका अर्थ है कि नारी संबंधी समस्याओं की पूरी जानकारी के लिए उनकी योग्यता व कौशल में वृद्धि कर सामाजिक एवं संस्थागत अवरोधों को दूर करने का अवसर प्रदान करना, साथ ही आर्थिक व राजनीतिक गतिविधियों में भागीदारियों में बढ़ावा देना ताकि वे अपने जीवन की गुणवत्ता में व्यापक सुधार ला सकें। इंटरनेट और सोशल मीडिया का फलक बहुत व्यापक है तथा इससे गुजरते हुए स्त्री समाज के प्रति चली आ रही हजारों साल की अवधारणाओं को त्यागना भी पड़ता है। नारी के मन में आज भी छटपटाहट है, कचोट है और कुछ करने का जज्बा। आज भी महिला स्व से संघर्ष करने के साथ-साथ अलग-अलग स्तर पर कड़ा संघर्ष कर रही है। यह संघर्ष खुद को साबित करने का है। बस जरूरत एक माध्यम भर की है। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने घर बैठे उन्हें यह माध्यम उपलब्ध करा दिया है। ऐसे में उनका यह संघर्ष खुद को साबित करने और अपनी अलग पहचान बनाने का जरिया बन गया है। यह उनकी मुक्ति का संघर्ष है, जहाँ कोई रोक-टोक नहीं। यहाँ स्त्री चेतना का भूत, भविष्य और वर्तमान का संगम बहुत अधिक मुखर और प्रखर है। ऐसे में सोशल मीडिया नारी-आन्दोलन, नारीविमर्श, नारी-सशक्तिकरण और नारीस्वातंत्र्य के हथियार के रूप में उभरकर सामने आया है।

ट्राई की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में दिसम्बर 2016 तक तकरीबन 39.15 करोड़ लोग इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे थे। इनमें शहरी क्षेत्रों में 27.64 करोड़ व ग्रामीण क्षेत्रों में 11.51 करोड़ प्रयोक्ता शामिल हैं। गूगल इंडिया द्वारा किए गए महिला एवं वेब अध्ययन के मुताबिक इनमें से 30 प्रतिशत महिलाएँ हैं। इनमें शहरी इलाकों में इंटरनेट उपयोगकताओं में 48 फीसदी पुरुष और 27 फीसदी महिलाएं हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह क्रमशः 35 और 12 फीसदी है। इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार स्मार्टफोन पर इंटरनेट उपयोग करने के बढ़ते चलन के चलते वर्ष 2017 के अन्त तक इसके बढकर 50 करोड़ के पार पहुँचने की उम्मीद है। भारत में महिला सशक्तिकरण में अहम भूमिका निभा कर इंटरनेट उनके जीवन को नई दिशा दे सकता है। महिलाओं में मोबाइल पर इंटरनेट का इस्तेमाल करने का चलन बढ़ रहा है। वर्ष 2013 में सिर्फ 20 फीसदी महिलाएं इंटरनेट का इस्तेमाल करती थीं, लेकिन अक्टूबर 2015 तक यह आंकड़ा 30 फीसदी पर पहुँच गया। ये सभी अपने दैनिक जीवन में इंटरनेट का इस्तेमाल करती हैं और अपने काम निपटाने के लिए ऑनलाइन रहती हैं। अध्ययन के अनुसार इंटरनेट पर भारतीय महिलाएँ सबसे अधिक वेशभूषा और सजने संवरने के लिए गहनों की तलाश करती हैं। इसके अलावा खानपान, बच्चों की देखभाल, केश साज सज्जा और त्वचा स्वस्थ रखने के तरीके ढूँढ़ती हैं। इंटरनेट से भारतीय महिलाओं का सशक्तिकरण बढ़ा है और उनकी जानकारी तक पहुँच बनी है। वे दिन-प्रतिदिन के जीवन के बारे में सही और व्यापक परिप्रेक्ष्य में निर्णय ले पा रही हैं। इंटरनेट पर सोशल मीडिया का भी महिलाएं खुलकर इस्तेमाल कर रही हैं। इसके माध्यम से वे तमाम अनछुए पहलुओं पर सवाल पूछ रही हैं। लोकसभा चुनावों के दौरान फिक्की महिला संगठन को संबोधित करते हुए वर्तमान प्रधानमंत्री और गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी स्वीकार किया था कि सोशल मीडिया के जरिये महिलाओं ने उनसे सवाल पूछे थे और तमाम सुझाव भी दिए थे। उन्होंने कहा कि इसके चलते उन्हें मुददों को समझने व उन पर भाषण तैयार करने में काफी सहूलियत हुई।

 इंटरनेट की उपलब्धता सर्वत्र बढ़ रही है। घर, साइबर कैफे और कार्यालयों में इंटरनेट का इस्तेमाल बढ़ रहा है। इसके अलावा मोबाइल फोन पर भी इंटरनेट का इस्तेमाल होता है। इनका इस्तेमाल महिलाओं द्वारा कई बार सही और मनपसंद उत्पाद का चयन करने के लिए किया जाता है। अध्ययन बताते हैं कि महिलाओं के ऑनलाइन आने से एक बहुत ही सकारात्मक प्रभाव उनके जीवन, उनकी स्थिति और साथ ही समाज पर होता है। इंटरनेट इस्तेमाल करने वाली महिलाएं अपेक्षाकृत युवा और आत्मनिर्भर हैं। हालांकि महिलाओं के सामने इंटरनेट का इस्तेमाल करने में व्यावहारिक समस्याएं भी आती हैं। मसलन, घरों में नेटवर्क की समस्या, घर के काम के साथ-साथ परिवारजनों को समय देना और फिर समय मिला तो नेट पर बैठना सम्भव हो पाता है। ऑनलाइन आने में महिलाओं के आगे तीन महत्वपूर्ण बाधाएं हैं - पहुँच, ज्ञान और जागरूकता। संयुक्त राष्ट्र की ब्राडबैंड सेवा आयोग के अनुसार इंटरनेट सेवाओं के मामले में महिलाओं की स्थिति पुरुषों से ज्यादा खराब है। विकासशील देशों में ऐसे सेवाओं से जुड़ी महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में 25 फीसदी कम है। इसी दिशा में महिलाओं को इंटरनेट का इस्तेमाल करके सशक्त बनाने के लिए गूगल ने 'हेल्पिंग वीमेन गेट ऑनलाइन' नाम से एक प्रयास भी शुरू किया था, इसके तहत वर्ष 2014 के अंत तक पाँच करोड़ और महिलाओं को इंटरनेट से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया था। ऐसे प्रयासों से महिलाओं को इंटरनेट-फ्रेंडली होने में आसानी होती है।

सोशल मीडिया आधी आबादी के लिए एक अचूक हथियार के रूप में सामने आया। इसने महिलाओं को खुलकर अपनी बात रखने का व्यापक मंच दिया है। यहाँ अल्हड़पन है तो गंभीरता भी। महिलाओं की शिक्षा, कैरियर, स्वास्थ्य, कन्या भ्रूण हत्या, यौन शोषण, घरेलू हिंसा, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न, दहेज, खान-पान, संगीत, ज्योतिष, धार्मिक विश्वास से लेकर राजनैतिक- सामाजिक परिप्रेक्ष्य, भ्रष्टाचार, मंहगाई, पर्यावरण, इत्यादि जैसे तमाम मुद्दे यहाँ पर चर्चा का विषय बनते हैं। यहाँ पर खुलेपन की बातें हैं तो सीमाओं का एहसास कराते संस्कार भी हैं। सोशल मीडिया के स्टेट्स में न जाने कितने प्रश्नों के कोलाहल छिपे हैं। यहाँ समय के गर्भ में न जाने कितनी सीता, सावित्री, द्रोपदी, अहिल्या, अनुसूइया, गार्गी और कोई निर्भया अपनी महाभारत खुद ही लिख रही है। यहाँ वैदिक भारत की नारी चेतना से लेकर मीराबाई और महाश्वेता देवी तक समझने और संवाद करने का रास्ता बनता है। मन के गागर में छिपे अनेक सागर और मुक्ति संघर्ष सोशल मीडिया के माध्यम से बखूबी प्रतिबिम्बित हो रहे हैं। मन, विचार और सपनों की यह दृष्टि कुछ इस तरह सोशल मीडिया की अन्तधारी बनी है कि कई बार उससे एक ईमानदार आत्मालाप का आनंद जन्म लेता है। घरेलू मुद्दों से लेकर सामाजिक, राजनैतिक मुद्दों पर प्रखरता से की-बोर्ड पर अंगुलियाँ चल रही हैं। कई सोशल मीडिया एक्टविस्ट इस प्लेटफार्म के माध्यम से अपनी अलग पहचान स्थापित कर रही हैं। घर में रहने वाली महिलाएं सोशल मीडिया को एक ऐसे मंच के रूप में प्रयुक्त कर रही हैं, जहाँ विभिन्न विधाओं में उनकी अभिव्यक्तियाँ प्रस्फुटित हो रही हैं। छंदबद्ध काव्य, गीत, गजल, हाइकु, क्षणिका, अतुकांत कविताएँ, लघुकथा, कहानी, लेख, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत, प्रेरक प्रसंग, पुस्तकों की समीक्षा से लेकर तमाम जाने-अनजाने पहलुओं से महिलाएं सोशल साइट्स को समृद्ध कर रही हैं। यहाँ नारी मन का अनहद नाद है वहीं रीतियों, रूढ़ियों, वाद-अपवाद और निरपवाद को लांघती हुई चुनौती भी है।

विचारों के आदान-प्रदान से लेकर संवाद-प्रतिसंवाद तक नारीवादी विमर्श सोशल मीडिया के जरिये विस्तत हो रहा है। भारत में अकेले फेसबुक से अभी 30 प्रतिशत महिलाएं जुड़ी हुयी हैं। अब तक घरों और परिवारों के दायरे में रही महिलाएं यहाँ अपनी क्षमता दिखाने और पहचानने को तत्पर दिखती हैं। तभी तो महिलाएं घर में घरेलू कायों के साथ-साथ अपने दिलोदिमाग में यह भी मंथन कर रही होती हैं कि आज वह किस मुद्दे को लेकर सोशल साइट्स पर लिखेंगी? जिन मुद्दों व बातों को लेकर घर और समाज में बोलने की बंदिशें हैं, वे सोशल साइट्स पर खुलकर शेयर की जा रही हैं और उन पर अच्छी-खासी बहस भी हो रही है। यहाँ तक कि सोशल मीडिया के मामले में घरेलू महिलाएं कामकाजी महिलाओं से ज्यादा सक्रिय हैं। घरेलू महिलाओं द्वारा सोशल मीडिया इस्तेमाल करने का आंकड़ा जहाँ 55 फीसदी है, वहीं कामकाजी महिलाओं का 52 फीसदीअनुभवों और आपबीती को साझा करने से व्यक्तित्व के कितने सुखद पहलू सामने आ सकते हैं, आगे बढ़ने का किस कदर संकल्प जाग सकता है, सोशल मीडिया इसका ज्वलंत उदाहरण है। दिल्ली में हुए गैंगरेप और 5 साल की बच्ची के साथ हुये वीभत्स बलात्कार के बाद उत्पन्न स्थिति में तमाम महिलाओं ने सोशल मीडिया के जरिए न केवल आंदोलन की रूपरेखा तय की बल्कि महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता से लेकर असहिष्णु होते समाज पर लाखों लोगों द्वारा की गई टिप्पणियों ने ऐसे कुकृत्य के विरूद्ध एक माहौल भी बनाया। नतीजा सामने था और सरकार को कार्रवाई करनी पड़ी।

फेसबुक पर महिलाओं की बढ़ती भागीदारी का ही असर है कि केन्द्रीय महिला और बाल विकास मंत्रालय ने वर्ष 2015 में फेसबुक के साथ 'रु100महिलाएं पहल' शुरू की। इसके तहत लोग किसी भी ऐसी महिला को मनोनीत कर सकते थे जिसने समाज पर गहरा असर डाला हो और समाज को बेहतर बनाया हो। फेसबुक पर न सिर्फ महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है बल्कि फेसबुक भी महिलाओं के प्रति संजीदा हुआ है। फेसबुक के फ्रेंड्स आइकन में आगे पुरुष की छवि होती थी और पीछे महिला कीइसकी वजह से पुरुष के मुकाबले महिला का आइकन थोड़ा छोटा भी था। फेसबुक ने 2015 में इसमें बदलाव कर महिला को आगे और पुरुष को पीछे कर दिया है। इतना ही नहीं, पुरुष और महिला के बालों और शारीरिक आकृति को भी कंधे से कंधा मिलाकर बराबर रखा गया है। माइक्रो ब्लॉगिंग साइट ट्विटर ने भी घोषणा की कि वह वर्ष 2016 से महिलाओं को ज्यादा नौकरी देगा। इसका उद्देश्य महिलाओं और पुरुषों के बीच अंतर को पाटना है। इसके तहत टेक्निकल जॉब में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 13 से बढ़ाकर 16 प्रतिशत किया जाएगा। वहीं लीडरशिप में महिलाओं की हिस्सेदारी 22 से बढ़ाकर 25 प्रतिशत की जाएगी। गौरतलब है कि ट्विटर के वर्तमान में दुनिया भर में 4100 कर्मचारी हैं, जिनमें महिलाएं 1400 मात्र हैं। निश्चिततः इस सबसे एक सकारात्मक सन्देश जाता है।

सोशल मीडिया में सब कुछ अच्छा ही हो रहा है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। हर बात के सकारात्मक व नकारात्मक दजऊ पहलू होते हैं। तमाम नकारात्मक लोग भी सोशल मीडिया से जुड़ रहे हैं। कई बार महिलाओं के नाम से फर्जी प्रोफाइल बनाकर भी दुरूपयोग किया जाता है। कई बार इंटरनेट पर महिलाओं को बदनाम करने की साजिश की जाती है। सोशल नेटवर्किग साइट्स पर डाली गई जानकारी व फोटो के दुरुपयोग के कई मामले सामने आये हैं। कुछेक महिलाओं के एकाउंट को उनके ही दोस्तों द्वारा हैक करके आपत्तिजनक स्टेट्स और फोटो पोस्ट करने जैसी तमाम शिकायतें सामने आई हैं। ऐसे में अपनी किसी निजी बात या निजी जानकारी मसलन ई-मेल, पता, फोन नम्बर को शेयर करना खतरनाक भी हो सकता है। छद्म नामों से बढ़ती प्रतिक्रियाओं और आरोप-प्रत्यारोपों के चलते भी कई बार महिलाओं को असहज स्थितियों का सामना करना पड़ता है। कई बार तो कुछेक लोग महिलाओं की स्वतंत्रता को बर्दाश्त नहीं कर पाते और और सोशल मीडिया में अनाप-शनाप टिप्पणियाँ भी करते दिखते हैं। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में 73 फीसदी यानी इंटरनेट व सोशल मीडिया पर सक्रिय दुनिया की लगभग तीन-चौथाई महिलाओं ने माना है कि उनके साथ ऑनलाइन छेड़छाड़ हुई है। 66 फीसदी लड़कियों ने स्वीकार किया कि उनके साथ फेसबुक पर छेड़छाड़ हुई है46.7 फीसदी महिलाओं ने माना कि इंटरनेट पर वे अश्लील टिप्पणियाँ झेल चुकी हैं लेकिन उन्होंने इसे अनसुना किया। 35 फीसदी महिलाओं ने ही साइबर छेड़छाड़ की शिकायत दर्ज कराई। 86 देशों में केवल 26 फीसदी ऐसे मामलों में कानूनी कार्रवाई होती है। तमिलनाडु के तिरुनेलवली में क्रिमनॉलॉजी के प्रोफेसर डॉ. जयशंकर और वकील देबरती हल्दर ने इंटरनेट पर हमलों में महिलाओं को निशाना बनाए जाने पर शोध कर, 'क्राइम एंड द विक्टिमाइजेशन ऑफ वीमेन' नामक किताब लिखी है। इसमें उन्होंने स्पष्ट लिखा है कि, "हमारे समाज की पुरुषवादी मानसिकता इंटरनेट पर भी झलकती है, महिलाएं बहस करें या जवाब दें, ये मर्दो को पसंद नहीं। जानीमानी हस्तियों को अभद्र भाषा से निशाना बनाया जाता है और आम महिलाओं का पीछा कर उनसे असल जिन्दगी में संपर्क करने की कोशिश की जाती है। ऐसे में सोशल मीडिया का इस्तेमाल संभलकर ही करने में समझदारी है।

आज सोशल मीडिया, परम्परागत मीडिया का न सिर्फ एक विकल्प बन चुका है बल्कि 'नागरिक पत्रकार' की भूमिका भी निभा रहा है। ऐसे में सोशल मीडिया पर ऐसी बातें जो नारी के विरूद्ध हैं, का उसी अंदाज में भरपूर जवाब भी दिया जा रहा है, आखिर यही तो सशक्तिकरण है। कई बार तो सोशल मीडिया पर नारियों द्वारा लिखी गई विभिन्न पोस्ट उस खिड़की की तरह दिखती है जहाँ से हम पूरे समाज का अक्स देख सकते हैं। सोशल मीडिया में महिलाओं की आवाज और रचनाएँ सवालों की बौछार करती, अन्याय के विरुद्ध ललकारती हुई खड़ी हो जाती हैं। वे हर पाठक के मनोमस्तिष्क पर सवाल खड़ा करती हैं और सोचने के लिए विवश कर देती हैं। महिलाओं के लिए उलूल-जुलूल लिखने एवं उन्हें परंपरागत रूढ़िवादी बंधनों में बाँधने के हिमायती विचारों पर महिलाएं अपना वैचारिक प्रतिरोध भी दर्ज कर रही हैं। अब वह बोलने से एवं आवाज उठाने से कत्तई नहीं कतराती हैं। अपने व्यक्तिगत प्रोफाइल के साथ तमाम ग्रुप व पेजों पर भी महिलाएं अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। कई बार इन स्टेट्स में वे अपने वक्तव्यों को ऐसे प्रस्तुत करती हैं कि पाठक भी हैरान हो जाते हैं। अपनी लेखनी के जरिए वे जहाँ तमाम छुएअनछुए मुद्दों को स्थान दे रही हैं, वहीं 21वीं सदी में तेजी से बढ़ते नारी के कदमों को भी रेखांकित कर रही हैं। उनकी रचनाओं में नारियों की व्यथा-कथा से लेकर उपलब्धियों और गाथाओं तक एक लम्बी सूची है, जो समाज में नारियों को अन्याय और शोषण के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए प्रेरित करती हैं। सोशल मीडिया की दुनिया पूर्णतया स्वतंत्र, आत्मनिर्भर और मनमाफिक तेवरों से भरी है। न रूढ़िगत बाधाएं, न समय का फेर और न दूरी का झंझट, बस एक क्लिक की जरूरत है। यहाँ कल्पना, वैचारिक गहनता और संश्लिष्ट संवेदनात्मकता के साथ रच-बस कर जिस अंतर्दृष्टि की रचना की जाती है, वह कई बार जीवन को लार्जर दैन लाइफ बनाने में सहायक होती है। ऐसे में सोशल मीडिया द्वारा नारी स्वातंत्र्य व नारी सशक्तिकरण को भी नए आयाम मिले हैं।