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सोरों सूकरक्षेत्रस्थ तथा आंचलिक शिलालेख
March 11, 2020 • उमेश कुमार पाठक

सोरों (सूकरक्षेत्र) के सीताराम मन्दिर के अतिरिक्त सैकड़ों अन्य शिलालेख भी हैं जो इतिहास पुराविदों की वाट जो रहे हैं। ये शिलालेख-मन्दिरों में, देवमूर्तियों के पद भाग में, महापुरूषों की मूर्तियों के आसपास, भवनों के निर्माण में, जलस्रोतों के आसपास, शासकीय कार्यों के विविध प्रकार के निर्माण, शिलान्यास, उद्घाटन व मार्गों पर नगर व गाँवों आदि की दूरियाँ बताने वाले शिलालेख हैं।

भारतीय इतिहास के विविध स्रोतों में शिलालेख का अपना विशिष्ट स्थान है इतिहास पुराविदों की दृष्टि से व्यापारिक या व्यवहारिक, उपदेशात्मक, धार्मिक, दान अभिलेख प्रशासकीय, प्रशस्ति, स्मारक, साहित्यिक आदि प्रकार शिलालेख रहे हैं इनमें इतिहास प्रसिद्ध व्यक्तित्वों का कार्य उत्कीर्ण हैं यदि कहीं जन सामान्य के शिलालेख हैं तो वे उतने महत्वपूर्ण नहीं समझे गये न हीं इतिहास की दृष्टि से उनका मूल्याकंन हुआ।

सोरों (सूकरक्षेत्र) के सीताराम मन्दिर के अतिरिक्त सैकड़ों अन्य शिलालेख भी हैं जो इतिहास पुराविदों की वाट जो रहे हैं। ये शिलालेख-मन्दिरों में, देवमूर्तियों के पद भाग में, महापुरूषों की मूर्तियों के आसपास, भवनों के निर्माण में, जलस्रोतों के आसपास, शासकीय कार्यों के विविध प्रकार के निर्माण, शिलान्यास, उद्घाटन व मार्गों पर नगर व गाँवों आदि की दूरियाँ बताने वाले शिलालेख हैं।

सोरों (सूकरक्षेत्र) में सीताराम मन्दिर, गृद्ध वट जयापीठ, रघुनाथ मन्दिर की छतरी, वल्लभाचार्य के मन्दिर निर्माण तथा बिलराम नगर का शिलालेख, सोरों के लहरा वार्ड मार्ग की धर्मशालाओं मन्दिरों, बगीचों कुओं आदि के शिलालेख महत्वपूर्ण हैं।

सूकरक्षेत्र के सीताराम मन्दिर के स्तम्भों व भित्तियों के शिलालेख का ही ऐतिहासिक महत्व मानकर अध्ययन किया गया है यहाँ-जनरल कनिंघम 1862 ई., दयाराम साहनी 1917 ई., (आर्कि. सर्वे रिपोर्ट पंजाब 1913-19 पृ.-15-16), डॉ. शिवबहादुर सिंह, श्री अशोक कुमार चरौरे 1975 ई., डॉ. श्रीनिवास वर्मा शास्त्री, डॉ. नरेश चन्द्र बंसल 1998 ई., श्री प्रेमनारायण गुप्त-2006 ई. आदि ने इनका अध्ययन किया है।

सोरों सूकरक्षेत्र के पूर्वोत्तर (लहरा वार्ड मार्ग पर) में पुराण पुरूष राजा वेणु चक्रवर्ती (सोलंकी राजपूतों) द्वारा निर्मित दुर्ग के टीला अवशेष रूप में "सीताराम मन्दिर" अभिहित कंकड प्रस्तर से निर्मित है। जो कंकड प्रस्तर की प्राचीर के परिवेश में पश्चिमी भू-भाग में एक प्राचीन भवन है। इस मन्दिर में स्तम्भों और दीवालों पर अनेक शिलालेख हैं। जो सूकरक्षेत्र की सांस्कृतिक यात्रा करने वाले धर्मप्राण सामान्य जनमानस द्वारा समय-समय पर अंकित किए गए हैं। यह स्थान महाकवि विश्ववन्द्य तुलसीदास व अष्टछाप के महाकवि नन्ददास की संगीत साधना स्थली भी है।

जनरल कनिंघम ने माना है कि सीताराम मन्दिर के शिला स्तम्भों की शिल्प शैली दिल्ली की कुतुबमीनार में स्थित उत्तर पूर्व के स्तम्भों से मिलती है जिन पर सं. 1124 अंकित है। मेरे अध्ययन में इसी प्रकार का प्राचीन निर्माण झालावाड़ (राजस्थान) के पिड़ावा तहसील के कोटरी गाँव में भी है जो होल्कर राज्य का महत्वपूर्ण स्थान था।

जनरल अलेक्जेण्डर कनिंघम ने सीताराम मन्दिर के यात्री लेखों का जिक्र करते हुए उनकी संख्या न्यूनाधिक 38 मानी है तथा डॉ. शिवबहादुर सिंह ने इन शिलालेखों की संख्या 75 मानी है, डॉ. नरेश चन्द्र बंसल के अनुसार उनका विवरण भी अपूर्ण है वस्तुतः इस मन्दिर में 90 लेख हैं और शेष सोरों सूकरक्षेत्र की छतरियों कुंजों मूर्तियों आदि पर हैं हमने सोरों में प्रायः 100 शिलालेख खोज निकाले हैं। मेरे अध्ययन में संख्या अनुमानित 150 से अधिक है।

कर्नल कनिंघम ने अपनी प्रथम पुरातात्विक यात्रा में सन् 1862 में यहाँ आगमन कर सर्वेक्षण किया था। आर्कियोलॉजीकल सर्वे रिपोर्ट के प्रथम खण्ड 1862-65 पुरातत्व विभाग के महान संस्थापक कर्नल कनिंघम की दी हुई मूल आख्या देना उचित है। - A Great Annual Fair is Hold Near Temple (Varah Ji) on The 11th of the waven moon of Margshirsha in remembrance of the destruction of the demon by the Bore incarnation of Vishnu. It contains a statue of Varah-Lakshmi and is visited by crowds of Pilgrims. P. 265-268.

डॉ. नरेश चन्द्र बंसल ने इस मन्दिर में वि.सं. 1198 का सबसे पुराना शिलालेख खोजा है। इस मन्दिर के स्तम्भ विविध शैलियों के हैं इसके पीछे का कारण यह है कि यहाँ विविध आक्रान्ताओं के आक्रमणों ने यहाँ का वैभव नष्ट-भ्रष्ट किया और गंगा की बालू में दब गया। जो बचा उससे इस मन्दिर का निर्माण हुआ है।

सोरों सूकरक्षेत्र के सीताराम मन्दिर के शिलालेखों का अध्ययन 'सोरों' शब्द की व्युत्पत्ति या 'सूकरक्षेत्र' कहाँ अवस्थित है इस बात को लेकर अधिक हुआ एतिहासिक दृष्टि से कम। डॉ. नरेश चन्द्र बंसल ने 'सोरों' शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार बताई है-सूकर- सौकरव-सौरवं-सौरम/सोरम-सोरों/सोरू। इस पर प्रो. अगनेलाल उपकुलपति डॉ. राममनोहर लोहिया वि.वि. फैजाबाद का कहना है-डॉ. बंसल जी की सूकरक्षेत्र की शब्द यात्रा भाषा विज्ञान की कसौटी पर कदाचित खरी नहीं उतरतीडॉ. अगनेलाल उल्लिखित करते हैं-"भारतीय पुरातत्व के जनक महोदय अलेक्जेण्डर कनिंघम ने सोरों का सर्वेक्षण और प्रारम्भिक उत्खन्न कार्य करवाया थाउन्होनें लिखा है कि इसका प्राचीन नाम “उकल क्षेत्र" था जो बाद में "सुकर क्षेत्र' (अच्छे पुण्य कर्मों वाला क्षेत्र) कहलाया पुराने नगर के स्थान पर अब किला कहलाने वाला उजड़ा हुआ विशाल टीला है। यह टीला गंगा के पुराने स्रोत (सोता) के ऊँचे तट पर स्थित है। उनका यह भी मत है कि कालान्तर में इस केन्द्र को इस कथानक के साथ जोड़ दिया गया कि यहीं पर विष्णु ने वराह का अवतार धारण करके हिरण्याक्ष दैत्य को मारा था। इसी सुकर्म के कारण "ऊकल क्षेत्र" "सुकर क्षेत्र" कहलाया।

डॉ. अगनेलाल आगे कहते हैं-सोरों का नाम पालि बौद्ध साहित्य में "सोरेय्य' उल्लिखित हैं जो कि ईसवी सन् के सैकड़ों वर्ष पहले का है।... सोरेय्य ही धीरे-धीरे सोरों बन गया है। छठवीं और पाँचवीं शताब्दी ई.पू. में स्वयं तथागत गौतम बुद्ध सोरेय्य पधारे थे। उनके पहले के भी दो बुद्धों ने सोरेय्य में उपदेश दिये थे। यह स्पष्टतः प्रतीत होता है कि सोरों प्रसिद्ध श्रमण बौद्ध धर्म का प्रसिद्ध केन्द्र था जिसमें बाद में वराहवतार के कथानक को जोड़कर ब्राह्मण धर्म का पौराणिक नगर बनाया गया। डॉ. नरेश चन्द्र बंसल का शिष्य होने को कारण डॉ. अगनेलाल जी से मेरा मेरा प्रति प्रश्न करने का अधिकार बनता है - कनिंघम महोदय ने जो बात कह दी आप उस पर विश्वास करते हैं तथा प्रामाणिक मानते हैं क्योंकि वे ही भारतीय ऋषि परम्परा व चेतना के प्रतिनिधि हैं? तब तो यह बात भी तय हो जाय कि मनुष्य बन्दरों का विकसित रूप है या सृष्टिकर्ता ने मानव को स्वतन्त्र रूप में जन्म दिया। दुष्टों का वध सुकर्म कहलाने योग्य नहीं है तो फिर अताताई दुष्ट या आतंकियों को जेलें क्यों बना रखी हैं स्वतन्त्र रूप से समाज में छोड़ दिये जाय? डॉ. बंसल के शोध पर आपकी आपत्ति है तो यह भी पूछ लिया जाय-अवन्तिका से उज्जैन, इन्द्रप्रस्थ से दिल्ली, साकेत से अयोध्या, प्रयाग से इलाहाबाद भोजपाल से भोपाल कैसे और किसने बनाया। और भी उदाहरण हैं ।

सोरेय्य ही सोरों बना महोदय ! बुद्ध ने ही भारतीय संस्कृतिसाहित्य, इतिहास, समाज आदि को जन्म दिया था उसके पूर्व तो...डॉ. अगनेलाल जी ब्राह्मण और बौद्धधर्म तक ही संकुचित वराहवतार का वैदिक विवरण भी तो अनुशीलन का विषय है पुराण बुद्धकाल के बाद के हैं तो वेद क्या हैं?

आपोवा इदम्रगे सलिल मासीत् तस्मिन्प्रजापतिवार्युर्भूत्वाऽचरत्। स इमाम् पश्यत् तां वराहो भूत्वाऽऽहरत्।।

तें.ति.सं.का. 7 प्र.1 अनु.1

महिव्रतः शुचिर्बन्धु पावकः यदा वराहो अभ्येति रेमन।

ऋ.मंडल-9

स वराहो रूप कृत्वोपन्य मज्जत स पृथ्वमिध आर्छत।

आर्छत। -तैति.सां. 1/1/6

इतीयती हवा इयमग्रेपृथि व्यास प्रादेषमात्री तामेमूष इति वाराह उज्जधान सोऽस्याः पतिरित।

-शतपथ 14/1/2/11

सोरों सूकरक्षेत्र में यवन राजा मिनान्डर ने आक्रमण कर यहाँ के बहुमंजिले भवनों को नष्ट भ्रष्ट किया था। शकों ने भी यहाँ अपनी बर्बरता का परिचय दिया था। कुषाण काल में सोरों में अनेक विशाल यज्ञ किये गये तथा वास्तु और मूर्तिकला का सृजन हुआ।

था। सन् 1193 ई. मोहम्मद गौरी ने सोरों सूकरक्षेत्र पर आक्रमण किया सन् 1206-12 ई. के मध्य कुतुबुद्दीन ऐवक सन् 1265-87 ई. गयासुद्दीन बलवन् ने इस क्षेत्र में 5-6 महीने कत्लेआम कराया। 1389-91 ई. इस क्षेत्र में हत्याओं का दौर चला। सिकन्दर लोदी के समय में भी यहाँ आने वाले यात्रियों की संख्या कम है पर आते थे। 18 सितम्बर 1658 को औरंगजेब ने सोरों को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया था।

दीघ्रकाल तक तोड़फोड़ के बाद जो शेष बचा उन्हें वैदिक सनातन धमार्नुयाईयों ने सहेज संभारा। सोरों का सीताराम मन्दिर सन् 1860 ई. मारहरा के एक धनाढ्य वैष्य ने बनवाया था। आज जो स्तम्भ व शिलालेख है वे उन्हीं के द्वारा संरक्षित किये गये है।

डॉ. नरेश चन्द्र बंसल के अनुसार सोरों सूकरक्षेत्र में गुप्त काल में वराह और योगेश्वर शिव मन्दिर था। सीताराम मन्दिर में 1198 वि.सं. 1621 वि.सं. तक के शिलालेख हैं। यह मन्दिर सूकरक्षेत्र के विविध मन्दिरों के अवशेष से बनाया गया है। इस मन्दिर में पीले प्रस्तर के स्तम्भ वराह मन्दिर के है मन्दिर की पश्यिमी दीवार में लगा हुआ शिलालेख वि.सं. 1245 का है इस शिलालेख को इस प्रकार पढ़ा गया है

1- ऊँ यज्ञवराहाय नमः

2- उद्धत्य लीलय क्षोणीं योऽन्तांमी भनुप्रयन।

3- अन्वगड. मूर्तिमद्विभ्रद्वराहः स पुनातु वः।।1।।

4- श्री मन्मदनपालस्य राज्ये वष्यदसेविनि।

5- आसीद् वादामयू (ता) यां विप्रो गोडंकुलोद्भवः।।2।।

6- कोन्तहालशुभं ग्रामे गांगडंयों नामतोऽपि च।।

7- श्रोतकर्मरत शस्तो राचउ तस्याभवत प्रिया।।3।।

8- सोभावयत् सुतं.... कोल्हूक

9- उद्गाहि सत्वशतः........ पितृ............. तः।।4।।

10- उपचरताः प्रासादं जीर्ण......... ततः।

11- अतीते शरदां पंचवेद हंस समन्विते।।5।।

12- ....... शनैवारे वैषाखस्यामलस्य च

13- द्वादष्यां कृतकृत्योऽभूत् सिद्धिविन्निज धर्मतः ।।6।।

14- ....... महायषः।

15- कीर्तिस्तस्य स्थिराभूयादाचन्दार्क स तारकम्।।

16- इति सम्वत् 1245 वैसाख शु. 121 इस शिलालेख से स्पष्ट है कि सोरों (सूकरक्षेत्र) के श्री सूकर (वराहजी) प्रधान आधिदेव विग्रह थे जिनका विशाल मन्दिर स्थापत्य था और 1245 वि.सं. में इसी मन्दिर का पुनः द्धार कौन्तहाल कोल्हूक ब्राह्मण ने कराया था। अतः वराह मन्दिर सं.-1198-1245 के मध्य ध्वस्त हुआ होगा। जो मोहम्मद गौरी के आक्रमणों का काल निर्धारित होता है।

वि.सं. 1226 के स्तम्भ लेख में 'श्रीसूकर आख्या देव विग्रह के लिए ही प्रयुक्त थी तथा 1198 के शिलालेख में भी अंकित है-'देव श्री सूकरस्य'। सं. 1231 और 1235 वि.सं. के शिलालेखों से पुष्टि होती है कि क्रमशः पंडित साल्हण के पुत्र सीकर ने सूकर में पुण्यार्थ (मृतक) संस्कार किया और नायक श्रीकल्हे के पुत्र महादेव शला ने सूकर स्थान नामक द्वारकायां (मुक्ति क्षेत्र) में सक्रिय करते हुए देव लोक प्राप्त किया।

वि.सं. 1395 की उत्कीर्ण शिलालेख अत्यन्त महत्व का है भारतीय धर्म साधनाओं में नाथपंथ का विशेष स्थान योगीश्वर शिव उनके इष्ट हैं और सोरों का योगमार्ग मोहल्ला इन नाथपंथियों का गढ़ था। तब यहाँ कर्मनाथ योगी साधना रत थे। उनसे पूर्व ही गृद्धवट (वराह पुराणोंक्त) तीर्थ में स्थित बटुक भैरव बटुकनाथ कहलाने लगे हैं। अभी भी सोरों में दो मोहल्ले जोगी नाथों के हैं एक बदरिया में है। दूसरा सोरों तुलसीदास जी के घर के समीप है। इस शिलालेख को डॉ. नरेश चन्द्र बंसल जी ने इस प्रकार पढ़ा है :

शिलालेख संवत् 1395

जितेन्द्री जोगी प्रणम्य शिक्षा1 वरत ज्ञानी जोगी कु दिक्षा 2 कंटक जोगी ब्रामीमेश्रु 3 ब्रु म सास्त्र वेद 4 उत्कांण षु 5 कामः भष्किा तृष्णा लु 6 पवन मा..... पलमे षटु 7 तंर्त संकुदेन 8 ज्ञान रूपं जनु 9 अकर्ता करंतु 10 उनमनं बरे तु 11.....................देव श्रु कर्मनाथ जं मीश्र सही ऐवं वे चरंतु वही 11 श्री कर्मनाथ जोगी

__-संवत् 1508 के शिलालेख से अवगत होता है कि कंपिला के विरतिया भूमि ग्राम के वासी एक स्वर्णकार 4 कहारों के साथ सूकरक्षेत्र के जोगतीर्थ (योगेश्वर तीर्थ) के जल में श्राद्ध करने पधारा। सम्भवतः वह पालकी में बैठकर गंगातीर पथ से आया होगा। कम्पिल से सोरों (सूकरक्षेत्र) में आने-जाने का मार्ग सड़क द्वारा भी था

शिलालेख सीताराम

सिद्धि संवतु 1508 वरशे च त्र सुदी 15 बुधदि ने साधुरमु सुत स्व अस ऊँ सुना रू कंपिला को वि रतिया भूमि ग्राम ते आयो जोगतीर्थ ज ल श्रार्द ममें। सूकर क्षेत्र। जेष्ठ पुत्र ना म मकरू। तथा दुति य पुत्र रकम। लिशित सहगू सेन तु लूला। कहार 4 संग आए

__ सोरों (सूकरक्षेत्र) स्थित राजा सोमदत्त (सोलंकी) के दुर्ग के ध्वंस पर कनिंघम कथित सीताराम मन्दिर के शिल्पी स्तम्भों पर उत्कीर्णित आख्याएँ इस प्रकार है- 1 सूकर- संवत् 1226 श्रावणवदि-4

2- सूकरस्य-संवत् 1231 फाल्गुन सुदि 2 शुक्रे

3- सूकरस्थाने-संवत् 1335 ज्येष्ठ सुदी 6 शनिवासरे

4-सूकरक्षेत्र-संवत् 1331, 1332, 1334, 1360, 1434, 1508, 1513, 1621, आदि वस्तुतः शिलास्तम्भ लेखों में सुकुरशेतु, सुकारशेत्रे, सुक्रशेत, सूकरशेत्र, सूकरशेत्रे आदि शब्दावली वहाँ की लिपि-प्रवृत्ति के अनुरूप उत्कीर्णित है।

सीताराम मन्दिर के वि.सं. 1231 से लेकर 1621 तक के शिलालेखों में सू और सु दोनों पाठ बहुतायत से मिलते हैं तथा लेखों में उकार बहुलता की भाषात्मक प्रवृत्ति भी है।

शिलालेखों में सबसे प्राचीन शिलालेख सं0 1226 का है जिसमें सूकरक्षेत्र के लिए 'श्रीसूकर' अंकित है।

सं.-1231 में शिलालेखों में भी सूकर अभिधान आया है किन्तु सं. 1235 के स्तम्भ लेख में सूकरस्थाने आया है। यहाँ कुछ शिलालेख जो मैंने पढ़े पाये हैं

सं.-1231 का शिलालेख          संवत् 1515 का शिलालेख

सिद्धिः संवतु                          सियि

1231 फाल्गुन सुदि                राजगंगाए........व ..........1515 

3 शुक्रे 11 पंडित श्री म            वर्षे स्रवन सु

त सुत पंडित साल्ह                  दी...... सोम

लस्य संस्वता पल्ण                  ....... नीषी

वेर्वृत्वा 11 सूकरस्य।                को ननिदए

तो स को वेट।....

सं. 1521 का शिला

संवतु 1521

वर्षे माह वेस

हु म मी न वो....

न व म ना जा ग

सि हा दे व पुत्र गज

सह देव लाल ज

.. ला नि वं द्र देव

सो रौ आए दिन म

न से .. अर्द्ध जल योग

मार्ग स्वर्ग प्राप्ति त

इसरू गमनु किये

स्त्री न्दा अरजुनदा

से गनिदुहका दे।।

सु घ व.न दासील स दोप घान ती पदु

स दोप घान ती पदु

मु । ना जो । प पा गो

कु न निः नवए

स ह गम नु किय

पुत्र साथ आए मदन

सिंह नाम सी घु। म

ल शानु कैया मे दि

जी मलु । सती जात

न बुद नष्ठिान

सं. 1486 का शिलालेख                      1425 का शिलालेख

श्री गजपति                                        संवतु 1425

.. साहतु सं.                                      वर्षे मर्ग सुदी

वतु 1486                                        11 सवोन्तसु

वर्षे फ लगु                                      घ भैको

न सुदि 6                                        सी हौग्पैगु

है म वा श्रेह                                     कौ पुत्र ती तु

ग त ह नु                                        म ते लडयो सी ह्यो

सु त दि..                                      ह्यो

.. वैसु वौ...                                  16 पनिस ले

क सुक्रशेन                                  टेके

आनसवने                                    सीह देवता

सीदि 15                                      संवत 1513 का शिलालेख

                                                 सिधि संवत 1513

                                                 वर्षे अस्वन वदि 30

                                                रविवरा ने श्री यो

                                                गन देव सुत स

                                                सुषेने देवस्यष्यै

                                                क्रशेत्र अनसन 30

                                                अर्यजलु सायोस

                                                गौनुरैयो देवी जैस

                                                अजीतमल के बेटा

                                                स्वर्ग प्रप्ति जैसव

सीताराम मन्दिर के शिलालेखों की लिपि देवनागरी है। संस्कृत तथा हिन्दी भाषा के शब्दों का प्रयोग किया गया है प्राकृत के शब्द भी हो सकते है मन्दिर सामने वाली दीवार शिलालेख बहुत अस्पष्ट है स्तम्भों के भी कुछ लेख बहुत अस्पष्ट हो गये हैं। इन लिपि चिह्नों में कहीं भी नारी नाम मेरे पढ़ने में नहीं आया है पर देवी शब्द मिलता है। लिपि विज्ञानियों के लिए यह लेख महत्वपूर्ण हो सकते है जैसे 'संवत्' लिखना विविध रूपों व मात्रा के अन्तर के साथ है 'सूकरक्षेत्र' शब्द विविध रूपों में है 'सिद्धः' भी कई रूपों में उकेरा गया है। 'र' वणकों 'न' वर्ण की तरह लिखा गया है 'य' वर्ण के नीचे 'य' बिन्दु लगाया गया है 'द' व 'ध' वर्णा का भेद भी कई स्थानों पर नहीं है।

विक्रम संवत् 1226 व 1395 का शिलालेख लेखन कला की दृष्टि से बहुत सुन्दर हैं इन्हें लेखन कला के कला विकास की दृष्टि से अध्ययन किया जा सकता है।

श्री गृद्ध वट तीर्थ जया शक्तिपीठ सूकरक्षेत्र में स्थापित भगवती की महिषासुर मर्दिनी की प्रतिमा थी जो सन् 1971 ई. में चोरी हो गई इस प्रतिमा के प्रस्तर पर जो शिलालेख था वह इस प्रकार था-

श्री दुर्गाजी के मन्दिर का शिलालेख कारीगर लालाराम-(दुगानमः) श्री गणेशाय नमः सं. 1647 वर्षे शाके 1472 प्रवर्तमाने दक्षिणायन गते श्री सूर्य महा मांगल्यप्रद भाद्रपद वदि 12 रवौ पुण्य नक्षत्रे तदिन प्रतिमा वा. मंडपी (कारीगर लालाराम) तत्न्या जनी....... मुत्रं कायथ यां संकर सुवपी पेमराज प्रतिमा कप्तरी सूभती...........शूकरक्षेत्र। पृ.-45

सोरों सूकरक्षेत्र रघुनाथ मन्दिर की छतरी में शक संवत् 1711 का शिलालेख है यह 17 पंक्तियों का है। नगर के अन्य शिलालेखों में वि.सं. 1987 का भी एक शिलालेख भी महत्वपूर्ण है जिसमें वल्लभाचार्य जी के मन्दिर निर्माण का उल्लेख है। यहाँ यह बताना आवश्यक वल्लभाचार्य की 23वीं बैठक सोरों में है तथा विट्ठलनाथ वर्ष पर्यन्त यहाँ रहे थे। यह शिलालेख 19 पंक्ति का है।

हनुमान मन्दिर हरिपदी गंगाजी के तट पर पन्नालाल की धर्मशाला के पास एक शिलालेख है इसमें फारसी लिपि और हिन्दी दोनों लिपि का है।

बिलराम का  शिलालेख 

कासगंज से सोरों तो आठ मील और बिलराम ढाई मील है एक शिलालेख से ऐसा विदित होता है कि बिलराम का शुद्ध नाम बलराम है। बलरामसिंह नाम का एक चौहान था जो कन्नौज की राज सभा का सदस्य था। अपने नाम पर उक्त नगर बसाकर वह शक संवत् 1095 में पंच तत्व को प्राप्त हुआ। जहाँ उसने प्राण त्यागे वह स्थान था सूकरक्षेत्र अर्थात् सोरम। राजपूताने से आने वाले यात्री भी सोरों को सोरम कहते हैं। निम्नलिखित शिलालेख में जो मार्गशीर्ष शुक्ला दशमी, संवत् 1095 शक का है सोरों और सोरम का तादात्म्य ध्यान देने योग्य है

कालीसरिद्धनददिग्भवभूविभागे, प्राकारियेननगरं बलराम संज्ञम।

स्वर्गम्-गतो.........मधर्म भूतां वरिष्ठः चौहानवंशतिलकों बलरामसि।

श्री कान्यकुब्ज-नरपाल-सभा सदस्यः श्रेष्ठाश्रयष्च सुधियो विदुषां कवीनाम्।

श्रेष्ठाश्रयष्च सुधियो विदुषां कवीनाम्। येन स्वकीययशसा धवलीकृता भू स्वर्गभूगतः स नृपतिर्बलरामसिंहः।

शुक्लेऽग्रहायण दले च तिथौ दशम्याम्।

श्री सोरमे अथितसौकरवे सुतीर्थे स्वर्ग गतः सः नृपतिर्बलरामसिंहः।।

संदर्भ -सहयोगी -ग्रन्थ

1- पन्चाल पत्रिका सूकरक्षेत्र विशेषांक2002 सम्पादक-डॉ. करूणा शंकर शुक्ल-कानपुर

2- श्री संकट मोचन धाम स्मारिका सैलई जनपद कासगंज-2002

जनपद कासगंज-2002 3- डॉ. नरेश चन्द्र बंसल व्यक्तित्व एवं कृतित्व-लेखक डॉ. साहब दीन रावत प्रकाशक-सूकरक्षेत्र शोध संस्थान

4- तुलसी जन्मभूमि एक मौलिक चिन्तनलेखक प्रेमनारायण गुप्त, प्रकाशकमहीधर शास्त्री तुलसी साहित्य प्रकाशन मण्डल सोरों सूकरक्षेत्र

5- मनीषा पत्रिका- के.ए. महाविद्यालय कासगंज सन् 1975।

6- एटा जनपदः साहित्य संस्कृति सन्दर्भ ग्रन्थ।

7- मंगलम-सम्पादक-डॉ. महावीर प्रसाद द्विवेदी

8- एटा जनपद का राजनैतिक इतिहासलेखक-प्रो. चिन्तामणि शुक्ल।

9- तुलसी जन्मभूमि सूकरक्षेत्र (सोरों) परिचय-ले. आचार्य वेदव्रत शास्त्री।। परिवार