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सांस्कृतिक मूल्यों की जीवंत ताजगी
January 23, 2020 • पूरन सरमा

जयुपर से सुबह आठ बजे से रवाना होकर प्रातः दस बजे के आस- पास ही अजमेर में था। नवम्बर का महीना, हल्की ठण्ड शुरू हो गई थी, लेकिन गर्म कपड़ों की जरूरत नहीं थी। साथ में कोई नहीं था। बस अकेला थैला लटकाए। जयपुर से रवाना हुआ था। अजमेर उतरते ही हजरत मोहनुद्दीन चिश्ती की दरगाह जाने की इच्छा प्रबल हो गई। सीधा रिक्शा लेकर वहाँ पहुँचा। सकड़ी गली के सामने विशाल दरबार लगा था, गरीब नवाज का। गुलाबों की सुगंध से वातावरण महक रहा था। सिर पर रूमाल ढ़का और प्रवेश किया तो एक आत्मिक शांति का अनुभव हुआ।

भीतर यात्रियों की आवाजाही और भीड़। सर्वधर्म समभाव का अनुपम उदाहरण है ख्वाजा साहब की यह दरगाह। सभी धर्मावलम्बियों का मनोती मानने और चौखट पर सजदा करने का हार्दिक भावअगरबत्तियों और ताजे गुलाबों की वही प्यारी महक। फकीरों का हुजूम, विशाल देग और मजार के दर्शन के बाद बाहर निकला तो सूरज करीब-करीब सिर के ऊपर आ गया था। बाहर आकर चाय पी। वापस बस स्टैण्ड पर आकर तीर्थ-राज पुष्कर की और रवाना हो गया। आधा घण्टे में मैं पुष्कर में था।

छोटा-सा कस्बा है, पुष्कर। नगरपालिका है। देश का बड़ा तीर्थ-स्थल होने से सुविधाओं से सुसज्जित इस कस्बे का माहौल देखते ही बनते हैं। देशी-विदेशी पर्यटकों का अनवरत आवागमन। कुछेक विदेशी लोग तो वर्षो से यहाँ अपना अड्डा बनाए हुए हैं। प्रचारित यह है कि यह यहाँ अवध चीजों का व्यवसाय करके इसे अपनी व्यापारिक मण्डी बनाए हुए हैं।

पर इन बातों से बेखबर यह तीर्थ-राज अपने आध्यात्मिक माहौल में डूबा मशगूल है अपने ही संगीत में। बस स्टैण्ड पर उतरते ही पण्डे घेरने लगे। मैंने पूजा-अर्चना की एवज अपने पर्यटन का उद्धेश्य बताकर उनसे मुक्ति पाई। साफ-सफाई विशेष नजर नहीं आने पर एक चाय की थड़ी वाले से प्रश्न कर लिया मैंने-'क्यों इतनी गंदगी क्यों फैली है। क्या पालिका प्रशासन ध्यान नहीं देता?'

देता?' 'नहीं बाबूजी, अभी तीन दिन पहले, मेला उठा है। अबकी बार दो लाख लोग आए हैं। हर वर्ष कार्तिक की पूर्णिमा को लगने वाले इस मेले में देश-विदेश के लाखों लोग आते हैं। पुष्कर झील में स्नान करने, पुण्य कमाने के लिए।'

'तो यह सब व्यवस्था कौन देखता है?' 'व्यवस्था, राज्य पर्यटन निगम के अलावा स्थानीय प्रशासन व जिला प्रशासन की और से बखूबी निभाया जाता है। फिर पशुओं की खरीद-फरोख्त का भी बाजार भी लगता है। मेले में कृषि का सामान, ऊँटों की खरीद, ग्रामीण संस्कृति से जुड़ दूसरे सामान की बिक्री होती है। दूर-दूर से दूकानदार महीने भर पहले ही आकर दूकान तैयार करने लगते हैं। इतनी रेलम-पेल मची रहती है कि हमारे यहाँ के स्थानीय व्यवसायी भी अपनी पूरे वर्ष की जीविका कमा लेते हैं।

मनोरंजन के लिए सांस्कृतिक कार्यक्रम, ऊँट दौड़ तथा पर्यटकों के लिए लोक-संगीत के अन्य मनोरंजक कार्यक्रम भी आयोजित होते हैं। पूरा पर्यटक गाँव बसाया जाता हैसिंगल बैड एवं डबल बैड दोनों ही तरह के कक्ष सहित मिल जाएगें। पूरा कस्बा एक अजीब आवजाही के कारण मस्ती में सराबोर होकर पूरी रात जागता रहता है।'

आगे बढ़ा तो गऊघाट आ गया था। घाटों की तरफ देखा तो पुष्कर सरोवर में पानी धूप से चमक रहा था। घाटों का अद्भुत दृश्य देखकर मन-विभोर हो गया। चारों तरफ से धाटों से घिरी है यह झील। बस सामने का थोड़ा पहाड़ी क्षेत्र खुला हुआ है, जहाँ से वर्षा का पानी बहकर आता है। पूजातर्पणादि करते यात्री, पानी में नहाते-धोते यात्री और बस जिधर नजर जाती है, उधर यात्री ही यात्री।

भगवान ब्रह्मा का धाम पुष्कर समुद्र तट से 3-30 मीटर ऊँचा है। पद्मपुराण की एक कथा के अनुसार भगवान ब्रह्मा ने मृत्यु-लोक में यज्ञ करने हेतु एक कमल को तीन बार उछालकर उछाला तो उसकी तीन पंखुड़ियाँ तीन जगह गिरी। उस जगह ज्येष्ठ, महेश मध्य एवं कनिष्ठ पुष्कर बने। इनके स्थाई बने ब्रह्मा, विष्णु व महेश। यज्ञ कार्तिक शुक्ला एकादशी से शुरू हुआ तथा उसकी पूणार्हति हुई पुर्णिमा को। तब से तिथियों पर हजारों वर्षो से मेला आयोजित हो रहा है।

पूजा-अनुष्ठान कराने वाले एक पण्डित ने इस कथा के क्रम में आगे बताया कि यज्ञ दीक्षा लेने के समय ब्रह्माजी के पास उनकी धर्मपत्नी सावित्री नहीं थी, सावित्री जी को संदेश मिला तो उन्होंने अपने यहाँ लक्ष्मी, पार्वती, पवन व इंद्राणी को बुलवाने भेजा। इस बीच मुहुर्त टलने लगा तथा सावित्री जी को पहुँचने पर विलम्ब हो गया। इसी बीच ब्रह्माजी ने इन्द्र महाराज को कोई दूसरी कन्या लाने का आदेश दिया। इन्द्र एक गूजर कन्या को लाए तथा उसे गोमुख निकालकर संस्कारित कर दिया। सावित्रीजी जब यज्ञ स्थल पर पहुँची तो गायत्री को ब्रह्माजी के बराबर बैठा देखकर क्रोधित हो गई तथा उन्होंने ब्रह्माजी को श्राप दे दिया।

अपने बल से गायत्री ने ब्रह्माजी को श्राप से निवारित किया और वह यज्ञ सम्पन्न हुआ। यह घटना सतयुग की है। इसी तरह त्रैता में भगवान राम ने अपने पिता दशरथ का श्राद्धतर्पण भी नहीं किया। द्वापर में पाण्डवों ने कुछ समय अपने वनवास का यहाँ बिताया। इसके अलावा अनेक प्रख्यात ऋषियों ने भी अपनी तपस्या पूरी की थी। कर्नल टाड महोदय यहाँ प्राकृतिक आभा देखकर मंत्र-मुग्ध हो गए थे तथा उन्होंने इसकी चर्चा अपने इतिहास में भी की है।

इस बीच मैंने पुजारी से अनुरोध किया कि वह मुझे यहाँ के अन्य स्थलों की जानकारी देकर उन स्थानों को दिखा भी दें। वह मुझे सबसे पहले ब्रह्मा मंदिर ही ले गया, बहुत ही भव्य परिसर में स्थित है। ब्रह्मा मंदिर, ऊपर स्वर्ण कलश है तथा संगमरमर के काम से सुसज्जित यह मंदिर आदिकाल में नष्ट हो गया था, लेकिन आदि शंकराचार्य ने इसका जीर्णोद्वार करवाया। इस मंदिर में इसी पीठ के आदेश से मठाधीश नियुक्त किए जाते हैं। इसी मंदिर परिसर में गौरी शंकर, सूर्य नारायण, नवग्रह, पंचमुखी महादेव व नारद आदि के मंदिर पृथक से हैं।

मंदिर की शिल्पकला को देखकर मन आल्हाद से भर उठा। एक अन्य भव्य मंदिर है रंगजी का। यह मंदिर सवा सौ वर्ष पुराना है। काले पत्थर की प्रतिमा का पूजन पूरे विधि-विधान से होता है तथा यहाँ की पूजा महात्म्य विशेष हैं। यहाँ की आरती में सैंकड़ों नर-नारी इकट्ठे होते हैं तथा घण्टे भर तक भजन-कीर्तन चलता है।

पुजारी जी मुझे नागकुण्ड ले गए इसकी भी एक कथा बताने लगे कि ब्रह्माजी के पौत्र वंटु ने यज्ञशाला में यज्ञ छोड़ दिया था, जो भुगु ऋषि के पाँवों से लिपट गया। भुगु महाशय ने उसे सर्प बनने का श्राप दे दिया। ब्रह्माजी ने उसे धीरज बंधाया तथा कहा कि वे नागों के नवें कुल का संचालन करेंगे। वे वहीं नाग पर्वत पर रहने लगे। वहीं आश्रम के पास ही नागकुण्ड है। सावन में नागपंचमी को स्नान पुण्य करना महत्वपूर्ण माना गया है। आगे काफी चलना पड़ा और रत्नगिरी पर्वत पर सावित्री मंदिर के दर्शन किए।

यहाँ माता सावित्री के दो चरण तथा पुत्री सरस्वती की प्रतिमा स्थापित की हुई है। बहुत ही अलौकिक प्राकृतिक आभा से भरपूर स्थल है यह भी। श्राप विमोजनी गायत्री का मंदिर सरोवर से उत्तरपूर्व पर एक छोटी पहाड़ी पर है। यहाँ से पुष्कर और उसके आस-पास का पूरा दृश्य दिखाई देता है। गायत्री जी ने सावित्री के पास से ब्रह्माजी को श्राप मुक्त करवाया था, इसलिए इसका महत्ता अपने आप ही बढ़ गई है।

'शिव मंदिरों की अनंत श्रृंखला है, पुष्कर में।' पुजारी (पण्डा) बोला'आत्मतेश्वर महादेव का मंदिर अद्भुत तथा चमत्कारिक है। यह गर्भ में है तथा 1819 ई. में जब अजमेर में मराठा शासन था, बनवाया था।' इसकी भी एक कथा सुनाई जिसमें एक नंग-धडंग व्यक्ति द्वारा ब्रह्माजी के यज्ञ में खोपड़ी फैंकने का प्रसंग आता है। यह नंग-धडंग व्यक्ति अन्य कोई नहीं स्वयं भगवान शंकर थे जिनकी कि स्थापना इसी जगह भगवान ब्रह्मा ने की। कई अन्य महादेव मंदिर भी यहाँ देखने को मिले।

रमा बैकुण्ठनाथ मंदिर की मुँह बोलती छवि को देखकर मन हर्ष से विभोर हो गया। रामानुज सम्प्रदाय के इस मंदिर की मेले के अवसर पर भव्य शोभायात्रा भी निकाली जाती है। यहाँ का गरूण स्तंभ का भव्य कलात्मक वैभव भी दर्शनीय हैं। प्राचीसरस्वती नदी में ब्राह्मण कार्तिक में स्नान करके अपने वंशजों को याद करते हैं। आगे जाकर यह नदी करणी बन जाती है तथा कच्छ की लाड़ी में जा गिरती है।

अण्डाकार पुष्कर झील के चारों ओर बसा है, पुष्कर गाँव भी। दस मीटर गहरी इस झील के पाँच किलोमीटर का परिधि में पानी है। करीब 60 घाट है यहाँ, इनमें से गऊ घाट, ब्रह्मा घाट, नृसिंग घाट तथा ब्रह्मा घाट मुख्य हैं।

इन घाटों पर यजमानों तथा पण्डों की भीड़ हर समय देखी जा सकती है। गऊ घाट का विशेष महात्म्य लिए है कि एक तो यह बीच बाजार में है तथा यहाँ से सरोवर का दृश्य बहुत ही मनोहारी रूप में दिखाई देता है। दूसरे यहाँ गुरू गोविन्द सिंह जी ने गुरू ग्रन्थ का 1705 में पाठ किया था। राजस्थान के विविध राजाओं तथा रजवाड़ों के जागीरदारों ने अनेक घाटों का निर्माण तथा जीर्णोद्वार करवाया जो आज भी मन मोहक स्वरूप में हमें यहाँ उपलब्ध है।

पुष्कर में बीसियों धर्मशालाएँ, खानेपीने के शाकाहारी ढ़ावे, नल-पानी, बिजली, बैंक, स्कूल सारी सुविधाएं हैं। राज्य सरकार इसे अधिक सुन्दर बनाने की ओर अधिक सचेष्ट हो तो यह देशी-विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बना रह सकता है। देर रात को मैं बस से जयपुर लौट आया था, लेकिन स्मृतियाँ अभी भी ताजी बनी हुई हैं।