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सांस्कृतिक महापुरुष : शिव महादेव
March 11, 2020 • Parmod Kumar Kaushik

शिव का पूर्व नाम 'रुद्र' प्रख्यात रहा, जो उनका भयावह और प्रलयंकर स्वरूप दशार्ता है। उनका 'रुद्र' से शिव नाम आर्यों द्वारा उन्हें अपनाये जाने के कारण भारतीय संस्कृति के उत्तर वैदिक काल में हुआ। इससे पूर्व प्रागैतिहासिक कालीन संस्कृति में उन्हें कृतिवासा' बताया गया, जिसका अर्थ खाल के कपड़े पहनने वाला होता है। प्राग-युगीन जंगली भयावह मानव जैसी संस्कृति के कारण शिव (तत्कालीन रुद्र) की ऐसी प्रचण्ड और घोर शक्तियों के विशाल स्वरूप की कल्पना से मानव-समुदाय उनकी विभिन्न रूपों में मूर्तियां निर्मित करने लगा, जो उनकी प्रचंडता से स्वरक्षा के लिये किये गये बचाव का प्रथम प्रयास था। इसे ही बाद में 'शतरुद्रिय नाम से जाना गया।

भगवान शिव के दार्शनिक, धार्मिक तार्किक विवेचन के अतिरिक्त अनेक जानकारों, विद्वानों, इतिहासकारों ने ऐसे भी प्रमाणभूत साक्ष्य खोज निकाले हैं, जो शिव महादेव को सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक महापुरुष के रूप में प्रमाणित करते है। विश्व-संस्कृति और इतिहास के क्षेत्र में शिव महादेव का शोधपूर्ण विवेचन करने पर यह तथ्य उजागर होता है कि वे प्रारम्भ में अनार्यों के पूज्य महापुरुष रहे। प्रागैतिहासिक और प्राचीन विश्व में अधिकतर अनार्य रहे देशों में शिव महादेव की आराधना, मत के प्रमाण व उनके प्रतीक लिंगों की मूर्तियां काफी संख्या में मिल चुकी हैं, जो उन्हें विश्व का महामान्य मानव प्रमाणित करती हैं। प्रमुखतः अफ्रीका, एशिया-माईनर, बैबिलोनिया, तुर्किस्तान, कारिन्थ (यूरोप), इटली, स्कॉटलैण्ड, काबुल, बलख- बुखारा, अनाम (फ्रेंच), कम्बोडिया, जावा, सुमात्रा, दक्षिण अमेरिका, मेक्सिको, इण्डोचाइना, ईजिप्ट, आयरलैण्ड, जर्मनी, डेनमार्क, मिश्र, यूनान, त्रिनिदाद-त्रिपोली, फारस, अरब से लेकर मोहनजोदड़ो व भारत भर के भू-भाग इस श्रृंखला में आते है। 

शिव का पूर्व नाम 'रुद्र' प्रख्यात रहा, जो उनका भयावह और प्रलयंकर स्वरूप दशार्ता है। उनका 'रुद्र' से शिव नाम आर्यों द्वारा उन्हें अपनाये जाने के कारण भारतीय संस्कृति के उत्तर वैदिक काल में हुआ। इससे पूर्व प्रागैतिहासिक कालीन संस्कृति में उन्हें 'कृतिवासा' बताया गया, जिसका अर्थ खाल के कपड़े पहनने वाला होता है। प्राग-युगीन जंगली भयावह मानव जैसी संस्कृति के कारण शिव (तत्कालीन रुद्र) की ऐसी प्रचण्ड और घोर शक्तियों के विशाल स्वरूप की कल्पना से मानव समुदाय उनकी विभिन्न रूपों में मूर्तियां निर्मित करने लगा, जो उनकी प्रचंडता से स्वरक्षा के लिये किये गये बचाव का प्रथम प्रयास था। इसे ही बाद में 'शतरुद्रिय नाम से जाना गयाशिव एक दृढ़ शक्ति सम्पन्न विशाल भू-भाग के सम्राट रहे और वर्तमान अफ्रीका (जो पूर्व में शिवदान, सूडान, कुशद्वीप नाम से रहा) उनकी राजधानी थी। उनके विशाल भाग में तब अनेक प्रदेश उनके अधीनस्थ थे। यथा-फारस का लिंगात प्रदेश (लिंग पूजकों का स्थल) हिरात (हर-राष्ट्र) तथा उसके निकट रूद्र प्रदेश, एशिया-माइनर का शरवन (शैववन), ईरान (आर्यान) का जट-प्रदेश आदि।

शिव के चार स्थान मुख्य रूप से विद्वानों ने लिखे हैं। इनमें प्रथम स्थान मूंजवान अर्थात् हेमकूट पर्वत (हिन्दूकुश) का प्रत्यन्त पर्वतीय प्रदेश, जो पश्चिम कोह सुलेमान पर्वत से आगे उत्तर की ओर है। यहाँ प्राचीनकाल में सोमरस होता था। दूसरा एशिया माइनर के आसपास अरब का उमावन, यहां के आगे वाले भाग की हवा अत्यधिक प्रचण्ड होने से रूद्र (शिव) को 'तूफानों का महादेव' कहा गयाइस प्रदेश में अनार्य जातियां मरूत, बाल्हिक, मंजूवान बहुतायत से थीं। इतिहास में इन्हीं कारणों से उनका स्थान निर्जन वन व पहाड़ों आदि में था। तीसरा स्थान भद्रवट था, जो लौहित्य गिरि के ऊपर तथा जिसके नीचे ब्रह्मपुत्र नदी बहती है तथा चैथा स्थान कैलाश पर्वत बताया है, जो हिमाचल मानसरोवर के पास का क्षेत्र है। इनमें शिव स्थल मूंजवन हेमकूट के क्षेत्र में कराकुरम (क्रोंचगिरी) में उनके बड़े पुत्र कार्तिकेय का जन्म हुआ था।

अरब का उमा प्रदेश (अर्ब-बालू रेत का प्रदेश) उनकी पत्नी उमा के नाम पर था। उस समय उनके पिता 'दक्ष' यहां के सम्राट थे। यहीं पर शिव का उमा से पाणिग्रहण होने के कारण यहां के निवासी साबा (शैव) कहलाते थे। इस्लाम स्थापना से पूर्व वहां का मूलधर्म 'शेविनिज्म' कहा जाता था। मक्का के पास 'सीदा' नामक प्राचीन नगरी रही, जिसे 'शिव-नगरी' मानाजाता है। उत्तरी अफ्रीका के 'इजिप्ट' प्रान्त में 'मेफिस' और 'अशीरीस' नामक क्षेत्रों में नन्दी पर विराजमान त्रिशुलधारी शिव की अनेक मूर्तियां हैं, जिनका वहां के निवासी बेलपत्र से पूजन और दूध से अभिषेक करते हैं। तुर्किस्तान के 'बॉबिलॉन' में एक हजार दौ सौ फुट का विशाल महालिंग है। संसार में इतना विशाल शिवलिंग कहीं नहीं है। इसी प्रकार 'हेड्रोपोलिस' नगर के विशाल शिवालय में 300 फुट का शिवलिंग है। अमेरिका के ब्रेजिल देश में बहुसंख्या में शिवलिंग हैं। यूरोप के 'कारिन्थ' नगर में तो 'पार्वती' का भी मंदिर मिला है। स्काटलैण्ड (ग्लासगो) में एक सुवर्णाच्छादित शिवलिंग है। फिजियन के 'एटिस' या 'निनिया' नगर में 'एषीर' नामक शिवलिंग है। इसी प्रकार बल्ख-बुखारा, चित्रल, अफरीदिस्तान, काबुल आदि स्थानों में अनेक शिवलिंग हैं, जिन्हें वहां के लोग पंचशेर या 'पंचवीर' नामों से जानते व पुकारते हैं। ईजिप्ट का सुप्रसिद्ध स्थल व आयरलैण्ड के धर्मस्थल को इतिहासकार सर विलियम जोन्स ने शिव का स्मारक लिंग स्थल ही माना है। संभावना है कि 'ईजिप्ट' नाम भी शिव की जटा के नाम पर ही रखा गया हो, क्योंकि उनका एक प्राचीन नाम 'कपर्दी' भी था, जिसका अर्थ जटा-जूट रखने वाला होता है। पर्शिया के एक प्रदेश में 'शंकरा' नामक जाति अभी भी रहती है। असीरिया के फिजिया में 'सेवाजिय' नामक एक देवता की उपासना प्राचीन काल से ही प्रचलित रही है।

मिश्र में भी 'सेवा' देवता के साथ सो क सम्बन्ध जोड़ा गया है। अमेरिका के पेरू देश में 'सिबु' नामक देवता को पूजा जाता है, इसी के आरीजोना प्रदेश में सों को विशेष रूप से आमंत्रित कर उन्हें मुख में लेकर वहां के वासी वर्षा होने के लिए सामुहिक नृत्य करते हैं। यह सब शिव के प्रति प्राचीन आस्था, उपासना व मत के प्रमाण हैं। पेलेस्टाईन देवों का 'पाल' मूल वास था, जो दैत्यों ने उनसे हड़प लिया था। उसी को स्वतन्त्र कराने हेतु शिव ने दैत्यों से त्रैपुर युद्ध किया था। 'डेड-सी' (मुत्यु सागर) ही तब का वह स्थान है, जहां त्रैपुर युद्ध में मारे गये दैत्यों को जल में प्रवाहित किया गया था। इसी के निकट शिश्तान नामक प्रदेश रहां, जहां के सम्राट 'शिवि' भी शिव के वंशज थे।

शिव को मरूतों का पूर्वज भी माना गया। उन्हें वृषभ के समान कठोर परिश्रमी, शक्तिशाली तथा सूर्य के समान दैदीप्यमान बताया गया। वे पूर्व में प्रचण्ड धनुधारी यौद्धा थे, इसी कारण उनका विस्तार कालान्तर में समूची सुर और असुर भूमि में फैला। इन्हीं सांस्कृतिक कारणों से उन्हें सभी का सम्मान प्राप्त था। अफ्रीका का मध्य देश प्राचीन काल में सूडान कहलाता था, जो शिवदान का ही अपभ्रंश है। वहां भूमध्य सागर के अंचल में यवन सागर है, जिसके तट पर वह प्रसिद्ध पुरी त्रिपुरी थी, जो तीन भूखण्डों में विभक्त थी, इसे ही शिव ने भस्म कर (जलाकर) जलमग्न किया था। आज भी उस स्थान पर त्रिपौली (त्रिनिदाद) नगर है, जिसमें 'शिव' नामक एक नगर भी है। इसी प्रकार अफगानिस्तान भू-भाग अर्थात् अपने राज्य वर्तमान कैलाश पर रहते हुए ही उन्होंने निकट के गांधार (कन्धार) के गन्धर्व राज कामभोज या काम्बोज (पौराणिक कामदेव) को परास्त किया था। कारण? दोनों एक दूसरे के शत्रु थे। शिव की इसी घटना को पुराणों में 'काम-दहन' की संज्ञा दी गयी।

मिस्त्र का प्राचीन नाम 'ओसिस आफ शिव' अर्थात् शिवदेश था। वहां के राजा पीछे महिदेव कहलाने लगे, जिन्हें 'प्रिस्टविंग्स' भी कहा गया। ऋग्वेद में 'तृत्स' को 'कपर्दिय' (जटा रखनेवाले लोग) कहा गया। संभावना है, ईजिप्ट (कपर्दी) उन लोगों का 'नेता' या 'सरदार' रहा हो। बेबिलोनियावासियों में जूड़ा बांधने के कारण ही उनका नाम 'ईजिप्ट' हुआ हो। इसी से मिलता ईरान का एक प्रदेश 'जाटा' भी है।

शिव के ससुर अरब सम्राट 'दक्ष' प्रारम्भ से ही शिव के गणों तथा प्रेत, पिशाच, दैत्य, राक्षस, नाग, निषाद आदि से घृणा करते थे। उन्हें वे सदैव त्याज्य और पिछड़ा मानते थे। इन्हीं कारणों से उन्होंने अपने दक्ष-यज्ञ में स्वयं शिव तक को भी आमंत्रित नहीं किया था। इसी से उनकी पुत्री (शिव-पत्नी) उमा अपमानित हुई। यज्ञ के समय पिता-पुत्री में भयंकर विवाद होने के कारण पुत्री ने यज्ञ-कुण्ड में आत्मदाह कर लिया था। इस घटना से शिव ने क्रोध में आकर अपने गणों सहित यज्ञ को उखाड़ फेंका था। इसी दुःख घटना से आहत होकर शिव हिमालय प्रदेश के अलकापुरी राज्य में आ गये थे, तब वहां का सम्राट कुबेर उनका परम् मित्र था। इसी की सहायता से उन्होंने कैलाश पर्वत पर अपना अलग राज्य स्थापित किया। बाद में हिम प्रदेशीय राजा हिमवान की पुत्री पार्वती (हेमवती) से उन्होंने पुनर्विवाह किया, जिससे उनके एक पुत्र 'गणेश' हुए।

शिव युद्ध-विद्या के परम विशारद और उत्तम कोटि के वैज्ञानिक शस्त्रों के आविष्कारक रहे। त्रेतायुग में राजा जनक का शिवधनुष स्वयं शिव द्वारा बनाया गया, अत्यन्त मारक क्षमतावाला वैज्ञानिक आयुध था। उनके इस धनुष का नाम 'पिनाक' था जिस कारण उन्हें 'पिनाकी' या 'पिनाकपाणी' भी कहा गया। हमारे देश में अति प्राचीन काल से ही प्रयोग किये जाने वाले आयुध 'चक्र' का मूल आविष्कारण भी शिव को ही माना जाता है। शिव के इस चक्र का नाम 'भवरेन्दु' था, जो जलीय झंझावात के समान था। वह चक्र हाथ से घुमाने पर वायु-प्रवाह के वेग से युक्त होकर प्रचण्ड वेग धारण करके अग्नि प्रज्ज्वलित करता हुआ शत्रु-पक्ष को भयंकर हानि पहुंचाता थ। 'भवरेन्दु' चक्र कींकर के नुकीले कांटो तथा कठोर शाखाओं से 'फल' के आकार में निर्मित किया जाता था। सम्भावना है कि शिव के ऐसे विराट स्वरूप के कारण ही आर्यो ने उन्हें अजेय महारूद्र, मृत्युदेव, महाकाल, युद्ध-देव प्रलंयकर और संहारक नाम देकर सम्मान दिया था। प्राचीन इतिहास और संस्कृति में शिव महादेव को प्रेतों, राक्षसों, दानवों आदि का महानायक लिखा गया।

शिव की सबसे अलग विचित्र व अलंकारित रूप सज्जा के संदर्भ में भी इतिहास और संस्कृति के प्रमाण परिलक्षित होते हैं। उनका गले में सर्प को धारण करना, उनका नाग-जाति के प्रति विशेष प्रेम का द्योतक है। शरीर पर भस्म मलना उनके गौरवर्णीय होने का संकेत है। उनके नीलकण्ठ होने का तात्पर्य विश्व को उनके द्वारा घोर विषमताओं से बचाने का जनहितकारी महान कार्य है। उनका तृतीय नेत्र उनकी दूरदर्शिता और अन्तर्ज्ञान का परिचायक है। गंगा को शिरोधार्य करना उनके हिमालयवास (जहां से गंगा का उद्गम है) या उस भू-भाग में गंगा को निश्चित सुदृढ़ प्रवाह प्रदत्त कर समतल भूमि तक प्रवाहित कर जनहितकारी कार्य करने का साक्षी है। नटराज रूप में किया उनका नृत्य व निनाद उनके नृत्य-संगीत-ज्ञान और प्रेम का दशार्ता है, जबकि उनका प्रलयंकर ताण्डवनृत्य विनाश धर्मी माना गया, लेकिन वह इस आशय में कि जब विश्व की विकृति-विकार चरम सीमा पर पहुंच जाये, संस्कृतिसड़-गल गयी हो, तो उसका संहार होना आवश्यक है, तभी नवसृजन होगा इस हेतु शिव प्रलयंकर ताण्डव के माध्यम से सृष्टि के नवोन्मेष का मार्ग प्रशस्त करते हैं। शिव का समाधिस्थ तपस्वीवाला स्वरूप उनके ब्रह्माण्ड चर-अचर जगत के चिन्तन और कर्मठता को दशार्ता है। उनका वाहन नन्दी कठोर परिश्रम का पर्याय व धर्म संस्कृति के चार अंगों में से एक कर्मठता व कठिन परिश्रम का पर्याय है। शिव द्वारा शीश पर चन्द्रमा धारण किये जाने का अर्थ शीतलता एवं चन्द्र संस्कृति का शैव संस्कृति में समन्वय है। उनका अर्द्धनारीश्वर रूप विश्व संस्कृति का एक मात्र ऐसा प्रमाण है जो नारी को अपने आधे अंग में बैठाकर परा सम्मान देता है। विश्व इतिहास में ऐसा उदाहरण कहीं नहीं है।

वे पूर्वकाल में देवों से अलग थे, परन्तु वे बड़े तेजस्वी और प्रतापी थे। धीरे-धीरे उनके प्रभाव के कारण देवताओं ने उनसे सद्भाव बढ़ाया। वे आरम्भ से ही नागों के मित्र और संरक्षक रहे। उन्हें भूत-प्रेतों, दैत्यों, दानवों का त्राता और पूजिष्ठों, निषादों का स्वामी बताया गया। वे दयालु थे, परन्तु उनके रौद्ररूप, क्रोध और बाणों से सुरअसुर सभी भयभीत रहते थे तथा संकट की स्थिति में सभी उनकी ही शरण में जाते थे। वे नाद-विद्या के मूल आगम थे। डमरू उनका प्रिय वाद्य था। उन्होंने ही सर्वप्रथम वाणी को उद्घोषित किया। वे 'कामविद्या' के आविष्कारक थे। हजार अध्यायों का काम-शास्त्र उनकी ही रचना है, जिसके कारण उन्हें 'कामजयी' कहा गया। भारतीय संस्कृति में इस आशय के प्रमाण हैं कि देशी ही नहीं, अपितु अनेक विदेशी शासकों ने भी अपनी मुद्राओं पर शिव के विविध आयामों को सम्मान दिया। इन सभी कारणों से सब उन्हें वंदनीय महापुरुष मानकर उनका आदर करते थे।

वे लम्बे समय तक अनार्यो के आराध्य बने रहे, परन्तु उनकी तेजस्विता और अजयेता से प्रभावित होकर बाद में आर्यों ने उन्हें अपनी संस्कृति में समाहित कर रूद्र से शिव, शंकर भोलेनाथ, महादेव, चन्द्रमौलीश्वर, शूलपाणि, जटाशंकर, गंगाधर से पच्चीसमुखी जैसे प्रतीक प्रदत्त कर तथा तीन महान देवों में एक मान कर उन्हें 'अमरत्व' का द्योतक बताया। वे वास्तव में विश्वजनित सांस्कृतिक महापुरुष थे