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पुष्टिमार्गीय मंदिरों में दीपोत्सव
October 19, 2019 • प्रीति शर्मा

इन्हीं उत्सवों में एक सर्वप्रमुख उत्सव है दीपोत्सव-कार्तिक अमावास्या पर दीपोत्सव मनाया जाता है। प्राचीन समय से यह पर्व लक्ष्मी की पूजा के पर्व के रूप में सम्पूर्ण देश में उत्साह व उमंग के साथ मनाया जाता है। माँ महालक्ष्मी के साथ दीपावली को श्री राम की लंका विजय से भी जोड़ा जाता है। इस पावन पर्व पर महालक्ष्मी की पूजा के पश्चात् राष्ट्र की सम्पन्नता उन्नति एवं अपरा धन-धान्य की प्रार्थना की जाती है। घर-घर में महालक्ष्मी की पूजा की का विधान होता है।

पुष्टिमार्गीय सम्प्रदाय में उत्सवों को अत्यधिक महत्ता प्रदान की गई है। आनन्द, उल्लास एवं हर्ष का विशद् रूप लोगों में प्रसारित कर उनके उत्साह में वृद्धि करना ही उत्सव है। सम्पूर्ण उत्साह एवं उमंग को अपने प्रभु पर स्थित कर लौकिक आसक्ति को हटाने तथा भगवद्- विमुखों को प्रभु के सम्मुख करने के लिए उत्सवों का विधान किया गया है।

उत्सव = 'उद् + सू + अप' के योग से बना है जो आनन्द का पर्याय है। यद्यपि उत्सव को किसी भी परिभाषा में बांधना अत्यन्त कठिन है फिर भी अपने तन-मन को पूर्ण रूप से विस्मरण कर हर्ष एवं उल्लास के रसमय आनन्द में लीन हो जाना उत्सव है। पुष्टिमार्ग में उत्सव प्रियता की अपनी विशिष्टता है। जहां प्रभु की नित्य सेवा में राग भोग एवं श्रृंगार होता है वहां उत्सवों में प्रभु सेवा में विशिष्टता होती है। उत्सव, महोत्सव एवं मनोरथ के अवसर पर राग, भोग एवं शृंगार की उत्कृष्टता के दर्शन होते हैं।

महाप्रभु वल्लभाचार्य ने श्रीमद्भगवत्, रास पंचाध्यायी के प्रसंग में 'रासोत्सवे सम्प्रवृते गोपी मण्डल मण्डिते' की सुबोधनी में उत्सवों की व्याख्या इस प्रकार की है -

"उत्सवोनाम् मनसः सर्वविस्मारकः आह्लाद उत्सवत्व सम्पादनाय सजातीयान एक रसोत्पादनार्थ विशेषमाह।"

अर्थात् उत्सव में अपने तन को, मन को, एवं स्वयं को पूर्ण रूपेण भुला देना हर्षोल्लास से रसमन्त हो जाना, एक रस बनने के लिए आनन्द में सजातियों को अपने समान धर्म लागों को उस आनन्द में मग्न कर देना ही उत्सव है।

उत्सवों के समय प्रभु अपूर्व रस का दान करते हैं जिससे नेत्रों के साथ सर्वांग को सुख प्राप्त होता है एवं परमानन्द की प्राप्ति होती है। अतः उत्सवों में देर तक प्रभु के दर्शन का सुख प्राप्त होता है।

इन्हीं उत्सवों में एक सर्वप्रमुख उत्सव है दीपोत्सव - कार्तिक अमावास्या पर दीपोत्सव मनाया जाता है। प्राचीन समय से यह पर्व लक्ष्मी की पूजा के पर्व के रूप में सम्पूर्ण देश में उत्साह व उमंग के साथ मनाया जाता है। माँ महालक्ष्मी के साथ दीपावली को श्री राम की लंका विजय से भी जोड़ा जाता है। इस पावन पर्व पर महालक्ष्मी की पूजा के पश्चात् राष्ट्र की सम्पन्नता उन्नति एवं अपरा धन-धान्य की प्रार्थना की जाती है। घर-घर में महालक्ष्मी की पूजा की का विधान होता है।

प्रकाश की पूजा हमारी भारतीय संस्कृति की विशिष्ट पहचान है। अग्नि एवं सूर्य की उपासना हम लोगों के द्वारा की जाने वाली प्रकाश की उपासना का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं दीपावली पर दीप पूजा, दीप प्रवाह, देवपूजा-अर्चना का अभिन्न अंग है। दीपावली पर दीपक की महत्वपूर्ण भूमिका है।

अतः दीपक को नमस्कार करते हुए कहा भी है -

शुभं करोति कल्याणमारोग्यं धनसंपदा।

शत्रुबद्धि विनाशाय दीप ज्योतिर्नमोस्तुते।।

दीप ज्योतिः परब्रह्म दीप ज्योतिर्जनार्दनः।

दीपो हरतु में पापं दीपज्योर्तिनमोऽस्तुते।।

शुभं भवतु कल्याणमारोग्यं पुष्टिवर्धनम्।

आत्मत्व प्रबोधाय दीप ज्योतिनमोस्तुते।।

कार्तिक मास की अमावस्या को दीपोत्सव मनाया जाता है। यह त्यौहार पांच उत्सवों का समुच्चय है। ये है कार्तिक बदी त्रयोदशी को धनतेरस, कार्तिक बदी चतुर्दशी को रूप चतुर्दशी उत्सव, कार्तिक अमावास्या को दीपावली, कार्तिक सुदी एकम को गोवर्धन पूजा एवं कार्तिक सुदी द्वितीया को भाई दूज पुष्टिमार्गीय मन्दिरों में ये उत्सव अत्यन्त हर्षोल्लास एवं धूमधाम से मनाए जाते हैं। दीपोत्सव के दिन शयन के दर्शनों में घी तथा तेल के दीपकों का ठाकुर जी के समक्ष प्रकाश किया जाता है। गायों का पूजन किया जाता है। इस दिन ठाकुर जी को हटड़ी में विराजमान किया जाता है तथा उनकी सेवा की जाती है। मन्दिर को सुन्दर फूलों से सजाया जाता है। ठाकुरजी को अति उत्तम वस्त्र आभूषण धारण कराए जाते है। इस दिन दीपमालिकाएं सजाई जाती हैं। प्रभु के समक्ष दीप जलाएं जाते हैं एवं मन्दिर को दीपमालाओं से सजाया जाता है। दीपोत्सव के क्रम में पुष्टिमार्गीय मन्दिरों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण उत्सव होता है - 'गोवर्धन पूजा' भागवत के अनुसार इन्द्र की घन घोर वर्षा के प्रकोप से श्रीकृष्ण ने बृज की रक्षा की तथा उसका मान-मर्दन किया। उन्होंने गोवर्धन (गिरिराज) पर्वत को अपनी कनिष्ठा अंगुली पर धारण किया था तथा उसी दिन से 'गोवर्धन पूजा' को प्रारम्भ किया था। यह पूजा परम्परा आज भी दीपावली के दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा के रूप में विद्यमान है। गोवर्धन पूजा का आधार हमारी अरण्य संस्कृति, पर्वत, वृक्ष, लता, गुल्म, गौ एवं पर्यावरण संरक्षण है। इन्द्र का मान भंग करने की पृष्ठभूमि में अन्याश्रय का समापन है। गोवर्धन पूजा भारतीय सांस्कृतिक परम्परा में गोधन की महत्ता की द्योतक है। वेद, स्मृति पुराण, इतिहास एवं भारतीय साहित्य में गाय को माता के रूप में स्थान प्रदान है।

'मातरः जगतां गावः सर्व सुखप्रदाः'

भागवत् में श्रीकृष्ण द्वारा गोरस एवं दानलीला का रहस्य यह है कि दूध, दही, मक्खन आदि पोषक आहारों का घर में भरपूर उपयोग हो।

पुष्टिमार्गीय सेवा पद्धति में गोवर्धन पूजा वाले दिन गोधन की पूजा की जाती है। गो-पूजा से एक दिन पूर्व 'कान जगायी' में गायों के कान में पूजा का निमंत्रण दिया जाता हैं गायों को रंग बिरंगे माण्डने, माण्ड कर मस्तक पर मोरड़ी बांध कर सुन्दर सजाया जाता है। इसके पश्चात् धूप, दीप, नैवैद्य से उनका सांगो पांग पूजन होता है। इस दिन गोबर से बनाए गए गोवर्धन को विभिन्न लताओं वृक्ष की शाखाओं एवं पुष्पों से सजाया जाता है।

पुष्टीमार्गीय मन्दिरों में गोवर्धन पूजा वाले दिन ही अन्नकूट एवं छप्पन भोग का मनोरथ होता है। श्रीमद्वल्लभाचार्य ने गोवर्धन पूजा एवं अन्नकूट को भगवान श्रीकृष्ण की 'आलौकिक लीला' कहा है। उन्होंने श्रीकृष्ण के समय इस महोत्सव को विशेष महत्व व गौरव प्रदान किया है। पुष्टिमार्गीय परम्परा में मन्दिरों में अन्नकूट एवं छप्पन भोग का महोत्सव देखते ही बनता है।

अन्नकूट एवं छप्पन भोग की सामग्रियों का आधार श्रीमद्भागवत है। 56 भोगों में आठ निधि स्वरूपों गुणित सात घरों की कुल 56 (8X7) प्रकार की पाक सामग्रियों का समावेश है। आचार्यों के अनुसार वैष्णव भक्त जन्म-मृत्यु के चक्र से छूटने के लिए भोग की अपनी समस्त कामनाओं को 56 भोगों के माध्यम से प्रभु के चरणों में समर्पित करता है। पुराणों के अनुसार मान्यता है कि इन्द्र के मानमर्दन के पश्चात् 56 गोपियों ने 56 प्रकार के व्यंजन श्रीकृष्ण को अर्पित किए थे। आचार्यो का यह भी मानना है कि ब्रज की संकल्पना कमल के आकार की है। कमल के तीन संपुटों में 8, 12, 36 पंखुड़ियों का योग 56 होता है। छप्पनभोग से पूर्व प्रभु कुण्डवारा अरोगते है। जो 'छाक-लीला' का प्रतीक है। तात्पर्य यह है कि वन में प्रभु गोप-गोपियों, गो-गोपालों के साथ 'छाक' भोजन करते हैं। अन्नकूट में भांति-भांति की भोजन सामग्रियाँ तैयार की जाती हैं। पुष्टिमार्गीय मन्दिरों में दशहरे से ही सामग्रियों की तैयारी आरम्भ हो जाती है। श्रीमद्वल्लभाचार्य के समय से ही भोग में 'सरवरी' (कच्चा भोजन) एवं 'अनसरवरी' (पक्का भोजन) की प्रधानता है। दूध से बनी सामग्रियों एवं फलों को भी इसमें सम्मिलित किया जाता हैं। गोवर्धन पूजा के दिन अन्नकूट महोत्सव में भात (चावल) में कोट के साथ व्यंजनों का ऐसा ढेर लग जाता है कि इसके मध्य विराजमान प्रभु अदृश्य हो जाते है- 'लाग्यो भात्त को कोट, ओट गिरिराज छिपाने।'

पुष्टिमार्गीय मन्दिर में गोवर्धन पूजा का उत्सव अत्यन्त धूम-धाम से मनाया जाता है तथा इस दिन अन्नकूट एवं छप्पन भोग की अद्भुत छटा देखते ही बनती है।

दीपोत्सव के इसी क्रम में कार्तिक शुक्ल दूज को भाईदूज का उत्सव भी मनाते हैं। दीपोत्सव का पर्व गो-धन-गोवर्धन पूजा तथा दूज पूजा का ऐसा अनूठा संगम है जो हमारे राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक जीवन में विशेष महत्व रखते हैं। पुष्टिमार्ग में दीपावली उत्सव की भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण है। पुष्टिमार्ग के मन्दिर में मनाया जाने वाला यह त्यौहार सम्पूर्ण वैष्णव समुदाय को अत्यधिक आनन्दित एवं हर्षोल्लासित करने के साथ अनन्य भक्ति एवं अटूट आस्था से भी भर देता है।