ALL Cover Story Story Health Poems Editorial
मनुष्य का वास्तविक रूपांतरण
March 20, 2020 • सीताराम गुप्ता

प्रथम मिलन बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। कई बार वो हमारे जीवन को पूरी तरह से बदल देता है, रूपांतरित कर देता है। हमें सातवें आसमान पर पहुँचा देता है। कारण उस समय हम अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शित करने में पूरा जोर लगा देते हैं। जीवन में किसी कार्य में सफलता भी उन्हीं लोगों को मिलती है जो उस काम में अपनी सारी ताकत लगा देते हैं। उसी संपूर्ण शक्ति अथवा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के कारण एक खूबसूरत रिश्ते की शुरूआत होती है। लेकिन यदि वो सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन मात्र दिखावा अथवा दूसरों को मूर्ख बनाने के लिए होता है तो जीवन तमाशा बन कर रह जाता है। यदि किसी खूबसूरत रिश्ते को स्थायित्व प्रदान करना है अथवा जीवन के अन्य क्षेत्रों में सफलता के पथ पर अग्रसर होना है तो प्रथम मिलन के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन को चिरस्थायी बनाना अनिवार्य है। इसके लिए प्रथम मिलन के अवसर पर जिस शिष्टाचार, विनम्रता, स्वच्छता व सौंदर्य-बोध का परिचय दिया था उसे नियमित रूप से व्यवहार में लाना ही होगा।

कहते हैं कि प्रथम प्रभाव या पहली छवि चिरस्थायी होती है। फर्स्ट इम्प्रैशन इज द लास्ट इम्प्रैशन। इसलिए जब भी हम किसी से पहली बार मिलते हैं तो बहुत सतर्कता से काम लेते हैं और मिलने वाले पर अपना अच्छे से अच्छा प्रभाव छोड़ने में कोई कसर नहीं रख छोड़ते। सलीके से साफ-सुथरे कपड़े पहनते हैं। धूम्रपान नहीं करते। प्रयास करते हैं कि मुख अथवा वस्त्रों से किसी भी प्रकार की अप्रिय गंध न आने पाए। शिष्टाचार ही नहीं तमाम औपचारिकताओं का भी पूरी तरह से निर्वाह करते हैं। पहली बार मिलने वाले से ही नहीं उस समय वहाँ उपस्थित अन्य सभी से भी अत्यंत विनम्रता से पेश आते हैं। क्रोध जैसी चीज आसपास नहीं फटकने पाती। ऊंची आवाज में बात करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। सहयोग की भावना का प्रदर्शन ही नहीं वास्तविक सहयोग करने के लिए भी तत्पर रहते हैं। आदर्शों की बात करते हैं। यथासंभव नैतिकता का दामन थामे रहते हैं।

पहली बार किसी के साथ भोजन करना पड़ जाए तो न केवल अत्यंत शिष्टतापूर्वक भोजन करते हैं अपितु सही मात्रा में भी करते हैं। घर हो या होटल भोजन परोसने वाले से भी सम्मान से पेश आते हैं। विषम परिस्थितियों में कोई अप्रिय घटना घटित हो जाए तो भी प्रतिक्रिया व्यक्त करने की बजाय शांत-सौम्य बने रहते हैं। कहने का तात्पर्य ये है कि हम स्वयं को एक बहुत अच्छे इंसान के रूप में पेश करने की पूरी कोशिश करते हैं। एक आदर्श और सुसभ्य व्यक्ति के रूप में। लेकिन वास्तविकता ये भी है कि यदि हमारा व्यवहार बदलता है तो मात्र फर्स्ट इम्प्रैशन अथवा प्रथम प्रभाव के आधार पर हम कितने दिन तक लोगों को प्रभावित कर पाएंगे। जैसे ही हमारा व्यवहार बदलेगा न केवल लोगों का व्यवहार और प्रतिक्रिया बदल जाएगी अपितु उसका नकारात्मक प्रभाव भी लोगों पर पड़ेगा।

प्रश्न उठता है कि क्या हम अच्छे इंसान नहीं होते या हैं? निस्संदेह हमसे अच्छा कोई नहीं हो सकता यदि हम अपनी इन सभी आदतों अथवा व्यवहार को हमेशा प्राथमिकता दें, उन सभी आदतों अथवा व्यवहार को जीवन में स्थायी रूप से अपने आचरण में सम्मिलित कर लें जो किसी से पहली बार मिलने पर हम व्यवहार में लाते हैं। ये कठिन अवश्य हो सकता है असंभव नहीं। मैं ऐसे अनेक व्यक्तियों को जानता हूँ जो हर बार हमेशा बड़े उत्साह से मिलते हैं और यथोचित अभिवादन करते हैं। आगे से पहले बोलने का प्रयास करते हैं। यदि कोई व्यक्ति मिलने पर हर बार अभिवादन करने की पहल करता है तो उसका कुछ घट नहीं जाता अपितु लोग उसे पसंद करने और उसका मन से सम्मान करने लगते हैं। इसी प्रकार से दूसरी अच्छी आदतों और व्यवहार का संपर्क में आने वाले व्यक्तियों पर बड़ा अच्छा प्रभाव पड़ता है।

पहली बार मिलते हैं तो उस पर अच्छा प्रभाव डालना संभव है लेकिन रोज-रोज शिष्टाचार का पालन करना संभव नहीं। अत्यधिक शिष्टाचार से जीवन में सहजता नहीं रहती। व्यवहार में एक कृत्रिमता सी आ जाती है। ये बात किसी भी तरह से ठीक नहीं है। रोजरोज संतुलित व पौष्टिक भोजन करने से क्या हमारा स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता? लोगों का ये भी मानना है कि शिष्टाचार, सद्गुण अथवा अच्छी आदतें जन्मजात होती हैं उन्हें बाद में नहीं सीखा जा सकता जो अत्यंत भ्रामक विचार है। कुछ विशेषताएँ जन्मजात होती हैं लेकिन अधिकांश आदतें हम अपने परिवेश से सीखते हैं। हम प्रयास करके अपने जीवन में अच्छी आदतों को स्थान दे सकते हैं। इसका उलटा भी उतना ही सही है।

कहा गया है मनुर्भव। क्या हम मनुष्य नहीं हैं? मनुष्य बनना पड़ता है। अच्छी आदतें ही हमें मनुष्य बनाने में सक्षम हैं। जब तक हममें अच्छी आदतें हैं हम मनुष्य हैं। जब हममें अच्छी आदतों के स्थान पर बुरी आदतें अथवा विकार आने प्रारंभ हो जाते हैं तो हम मानव से दानव होने की प्रक्रिया में आ जाते हैं। हमें न केवल अच्छे लोगों की अच्छी आदतों का अनुकरण करके स्वयं में अच्छी आदतें विकसित करनी चाहिए अपितु उन आदतों को निरंतर व्यवहार में लाकर अपने परिवेश को भी सकारात्मक रूप से प्रभावित करने का प्रयास करते रहना चाहिए जिससे पूरा समाज शिष्टाचार के दायरे में सम्मिलित हो जाए

जब हम किसी से पहली बार मिलने पर अच्छी तरह से पेश आ सकते हैं तो बाद में अथवा हमेशा क्यों नहीं? यदि पहली बार मिलने पर अच्छा प्रभाव छोड़ना मात्र नाटक है तो इस नाटक को बार-बार क्यों नहीं दोहराया जा सकता? अच्छाई अथवा अच्छा प्रभाव डालने के इस नाटक को इतनी बार दोहराइए कि वो जीवन की वास्तविकता बन जाए। यदि हम ऐसा कर पाएंगे तो नुकसान नहीं लाभ ही होगा। हम अच्छी आदतों व व्यवहार के अभ्यस्त हो जाएंगे। यही मनुष्य का वास्तविक विकास व रूपांतरण है। हमें हर हाल में हमेशा ही अपने अच्छे व्यवहार से लोगों पर अच्छा प्रभाव डालना चाहिए और इसके लिए स्वयं को महत्त्व न देकर जो व्यक्ति हमें ये अवसर उपलब्ध करवाते हैं उनके प्रति कृतज्ञ होना चाहिए।

यही कारण है जब भी हम किसी व्यक्ति से पहली बार मिलते हैं तो बहुत अच्छी तरह से उसका अभिवादन करने का प्रयास करते हैं। उस समय हम पूर्ण शिष्टाचार का पालन करते हुए चेहरे पर मुस्कान भी बनाए रखते हैं। साथ ही भावों के अनुरूप हमारी बॉडी लैंग्वेज भी अत्यंत अनुकूल व सकारात्मक बनी रहती है। लेकिन जैसे-जैसे हमारा मिलना-जुलना आम हो जाता है हम न केवल इन सब बातों की परवाह करना छोड़ देते हैं अपितु कई बार उपेक्षात्मक तरीके से भी पेश आने लगते हैं। अभिवादन करना तो दूर दूसरे के अभिवादन का ठीक से उत्तर भी नहीं देते। आखिर क्यों? क्योंकि हम एक दूसरे की कमियों को जान लेते हैं और उसी के अनुरूप व्यवहार करना प्रारंभ कर देते हैं। हमें इस प्रकार के व्यवहार से बचना चाहिए। हमें दूसरों के दोष अथवा कमियां देखने के बजाय अपने व्यवहार के बारे में अधिक सतर्क रहना चाहिए। दूसरों के व्यवहार के कारण हम अपना व्यवहार क्यों बिगाडे अथवा अपने व्यक्तित्व को कमजोर क्यों करें?

हम अपने व्यवहार के लिए उत्तरदायी हो सकते हैं दूसरों के व्यवहार के लिए नहीं लेकिन अपना व्यवहार बदल कर निश्चित रूप से दूसरों को बदलने का अवसर ही प्रदान करते हैं। दूसरों के व्यवहार के कारण हमारा व्यवहार बदल न जाए इसके लिए अनिवार्य है कि हम हर व्यक्ति से हर बार ये सोचकर ही व्यवहार करें जैसे आज पहली बार उससे मिल रहे हैं। इससे न केवल संबंधों में आत्मीयता व गरमजोशी बनी रहेगी अपितु लगातार सकारात्मक रहने के कारण मिलने वाले लाभ भी हमें अनायास ही मिल जाएंगे। जब हम किसी को दोनों हाथ जोड़कर और मस्तक झुकाकर नमस्कार करते हैं तो इससे हमें स्वाभाविक रूप से व्यायाम के लाभ व मुस्कराकर किसी का स्वागत करते हैं तो ध्यान के लाभ मिलते हैं। बार-बार हमारी मनोदशा सकारात्मक होने से हम स्वस्थ व तनावमुक्त रहते हैं।

यदि हम किसी के साथ कोई अच्छाई करते हैं तो हमें प्रसन्नता होती है। किसी का स्वागत-सत्कार करने से भी कम प्रसन्नता नहीं मिलती? यदि हम हर मिलने वाले का हर बार मन से स्वागत-सत्कार करेंगे तो हमारी प्रसन्नता में वृद्धि ही होगी। यही प्रसन्नता हमारे अच्छे स्वास्थ्य के लिए उपयोगी होती है। जब हम किसी से पहली बार मिलने जाते हैं तो अपना अच्छा प्रभाव डालने के लिए उस समय न केवल अच्छे से अच्छे कपड़े-जूते पहनते हैं अपितु सही तरीके से भी पहनते हैं। शेविंग वगैरा भी ठीक से करते हैं। इन बातों का सामने वाले पर निश्चित रूप से अच्छा प्रभाव पड़ता है लेकिन यदि हम चाहते हैं कि हमारा अच्छा प्रभाव हमेशा के लिए बना रहे तो हमें इन आदतों को स्थायी रूप से अपना लेना चाहिए। इन आदतों से हमारी दिनचर्या व जीवनचर्या भी व्यवस्थित होती है जो स्वयं में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है।

इसी प्रकार से नम्रता हो अथवा सहनशीलता इन विशेषताओं को भी अपने व्यवहार में स्थायी रूप से सम्मिलित करने से लाभ ही होगा। यदि हम पहली बार किसी से मिलने पर भोजन करते समय शिष्टाचार का पालने करते हैं तथा सही मात्रा में ही भोजन लेते हैं तो हमारे लिए लाभदायक होगा। हम स्थूलकायता व उसके दुष्प्रभावों से बचे रहेंगे। इसी प्रकार से यदि हम पहली बार मिलने पर धूम्रपान नहीं करते अथवा स्वच्छता का विशेष ध्यान रखते हैं तो हर बार मिलने पर इन बातों का ध्यान रखने से तो जीवन में क्रांति ही हो जाएगी। अनेक दोषों से सहज ही छुटकारा मिल जाएगा जिससे हमारा व्यक्तित्व हमेशा के लिए प्रभावशाली बना रह सकेगा। प्रभावशाली व्यक्तित्व के विकास में लोगों के प्रति हमारा व्यवहार व हमारी दूसरी आदतें ही महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करती हैं।

जहाँ तक किसी से पहली बार मिलने का प्रश्न है वास्तव में जब भी हम किसी से मिलते हैं वो एक नया क्षण ही होता है। हर क्षण ही नहीं हर क्षण हर व्यक्ति भी पूर्ण रूप से नया व्यक्ति ही होता है क्योंकि हम हर क्षण परिवर्तित होते रहते हैं। यदि हर बार इस परिवर्तित नए व्यक्ति से मिलते समय हम उस पर अपना अच्छा प्रभाव छोड़ने का प्रयास करें तो सचमुच हमारा जीवन बदल जाए। उन्नत हो जाए। ये हर तरह से हमारे हित में होगा कि हम न केवल अपने फर्स्ट इम्प्रैशन अथवा प्रथम प्रभाव को चिरस्थायी बनाने का प्रयास करें अपितु उसे और अधिक अच्छा बनाएं। जीवन अथवा व्यवहार में अच्छी बातों अथवा आदतों को सम्मिलित करने का इससे प्रभावशाली और अच्छा तरीका और क्या हो सकता है? और इससे अच्छा अवसर और कहाँ मिलेगा?

इस संबंध में एक बात और है जो बहुत महत्त्वपूर्ण लगती हैं। यदि किसी कारण से किसी व्यक्ति पर हमारा फर्स्ट इम्प्रैशन अथवा पहला प्रभाव अच्छा नहीं पड़ा तो क्या हम उसके लिए पुनः प्रयास करें अथवा नहीं? जीवन में असफल होने पर हम हाथ पर हाथ रख कर नहीं बैठ जाते अपितु सफलता के लिए पुनः प्रयास में जुट जाते हैं। यह हमारे अस्तित्व के लिए अनिवार्य भी है। यदि किसी कारण से किसी व्यक्ति पर हमारा फर्स्ट इम्प्रैशन अथवा पहला प्रभाव अच्छा नहीं पड़ा तो हमें तब तक प्रयास करना नहीं छोड़ना चाहिए जब तक कि उस व्यक्ति पर हमारी सही छवि अंकित न हो जाए। जब हर हाल में लोगों पर अपेक्षित अच्छा प्रभाव छोड़ना महत्त्वपूर्ण है तो फर्स्ट इम्प्रैशन अथवा पहले प्रभाव को चिरस्थायी बनाना उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण व उपयोगी है इसमें संदेह नहीं।