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मालवा प्रदेश के खान-पान
January 24, 2020 • डॉ. भगवती लाल राजपुरोहित

मक्का, ज्वार, बाजरा आदि की मोटी रोटी या रोटा होता है। इनकी घाट या थूली भा बनता है। इनके टापू बनते हैं। मक्का के पानिये भी क्षेत्र में विशेष लोकप्रिय हैं। मक्का, ज्वार के भुट्टे सेककर खाये जाते हैं। भुट्टे को मक्या कहते हैं। सेका हुआ कच्चा चना होला कहा जाता है। सूखे चने सेकने पर भंगड़े कहलाते हैं। गेहूँ, कच्ची ऊँबी सेंककर खाते हैंपकने पर पानी में उकाल कर घुघरी बनाते हैं। गेहूँ की रोटी बनती है जो फुलका कहलाता है। मोटी रोटी गजाकड़ा कहलाता है

मालवा स्वाद भोजन की अभिरूचि से सम्पन्न प्रदेश है। इस क्षेत्र में रबी और खरीफ दोनों ही फसलें भरपूर होती हैं। मक्का, का, ज्वार, बाजरा, तूवर, मूंग, उड़द, चंवला, सोयाबीन, साल (शालि या धान चावल) गेहूँ, चना, सरसों, राजगरा आदि कृषि में उत्पन्न फसलों से घर-घर में चिरकाल से विविध व्यंजन, पकवान बनते रहे हैं और आज भी बनते हैं। जो सामग्री घर में सुलभ है तदनुसार रसोई बनाने की प्रवृत्ति है।

परम्परानुसार विविध रसपूर्ण भोजन बनाया जाता है, घर के उस स्थान को रसोड़ा कहते हैं। जो सार्वजनिक रसोई बनाता है वह रसोईया कन्दोई कहलाता हैकन्दोई इसलिए कहलाता है कि वह कलाकन्द बनाता है वह पकवान (पक्कान) में प्रमुख रहा होगा। रेसाई को हलवाई भी कहते हैं। हलवा बनाने में दक्ष होने से वह हलवाई कहलाता है। समस्त भोजन छः रसों या षड्रस से परिपूर्ण होता है। ये रस हैं- कटु, अम्ल, मधुर, लवण, तिक्त और कषाय। मुख्य आम्वाद इन्हीं रसों का हैइनके परस्पर मिश्रण से भिन्न-भिन्न अगणित स्वाद बनते हैं। इन स्वादों को उत्पन्न करने के विभिन्न अनाज, तरकारी, फल, मिर्च मसाले, रस आदि होते हैं। भोज्य पदार्थ खाद्य, पेय तथा चोप्य, लेह्य (चाटने की चटनी आदि) होते हैं। पेय पदार्थों में दूधदही, छाछ और इनसे बनने वाली विभिन्न वस्तुएँ है- यथा रबड़ी, मावा तथा मावे की विभिन्न मिठाइयाँ, दही से बनने वाली वस्तुएँ श्रीखण्ड आदि तथा छाछ और उससे बनने वाला रायता आदि प्रमुख हैंनींबू का रस भोजन के स्वाद को बढ़ाता हैआम का रस भी स्वादिष्ट होता है। आम रस के पापड़ बनते हैं। आम का आचारमुरब्बा आदि बनाया जाता है। आम की चटनी भी बनती है। आम पकने पर चूसा जाता है। क्योंकि वह चौष्य है। नींबू रस को एकत्र कर विभिन्न शरबत आदि पेय बनाये जाते हैं। पेय में दूध, छाछ, मट्ठा, लस्सी आदि होते हैं। गर्मी में आम का पणा (पानक रस) भी स्वादिष्ट और आरोग्यकारी होता है। छाछ से खाटा या कढ़ी बनती है तथा मका या मकी की थूली या राबड़ी भी बनाई जाती है जो दूध के साथ खाई जाती है। छाछ या दही का स्वाद रायता बनाया जाता है। आम का अचार प्रायः चूसा जाता है।

मक्का, ज्वार, बाजरा आदि की मोटी रोटी या रोटा होता है। इनकी घाट या थूली भी बनती है। इनके टापू बनते हैं। मक्का के पानिये भी क्षेत्र में विशेष लोकप्रिय हैं। मक्का, ज्वार के भुट्टे सेककर खाये जाते हैं। भुट्टे को मक्या कहते हैं। सेका हुआ कच्चा चना होला कहा जाता है। सूखे चने सेकने पर दूंगड़े कहलाते हैं। गेहूँ, कच्ची ऊँबी सेंककर खाते हैं। पकने पर पानी में उकाल कर घुघरी बनाते हैं। गेहूँ की रोटी बनती है जो फुलका कहलाता है। मोटी रोटी गजाकड़ा कहलाता है जो भाद्रपद त्रयोदशी को भील-भीलनी या शिव पार्वती के नैवेद्य रूप बनाकर खाये जाते हैं। हाथ की मोटी रोटी रोट कहलाता है। छोटी रोटी घी तेल में तल कर पूड़ी बनायी जाती है। गेहूँ के प्राचीन काल से ही मालपुए बनाए जाते हैं जो खाटा या कड़ी के साथ खाये जाते हैं। गेहूँ के पराठे को पोताया कहते हैं। यात्रा में ले जाने के लिए दूध में निर्मित पोताये हाजरी या दसमी कहलाती है। गेहूँ के मेदे के खाजा बनते हैं। गेहूँ, मूंग, चना, ज्वार, मक्का, चावल आदि के पापड़ बनते हैं जो सेककर या तलकर खाये जाते हैं। गेहूँ के आटे की गोल-गोल बाटी कण्डे पर सेककर बनायी जाती है। आजकल शहरी लोग इसे ओवन में सेकने लग गये हैं। यही बाटियाँ पानी में उबाल कर सेकने पर बाफले कहलाते हैं। मालवा का यह प्रिय भोजन है। गेहूँ और चने के तले हुए रेलमे भी बनते हैं इन्हें मालवेतर क्षेत्रों में चिकारे भी कहते हैं।

मालवा के मालपुए प्रसिद्ध रहे हैं। राजा भोज ने अपने श्रृंगार प्रकाश में अवन्ति के अपूप या मालपुए की प्रसिद्धि की चर्चा की है- अपूपा हिता एषां आपूपिकाः अवन्तयः। अर्थात् अवन्ति के लोग मालपुआ-पसंद होते हैं। इसी समय के काश्मीरी लेखक क्षेमेन्द्र ने बताया कि काश्मीरी गणिका ने अवन्तिपुर में अपूप की दूकान खोल ली।

- गेहूँ के दलिये की थूली फीकी और मीठी बनती है। गुड़ की मीठी थूली, चावल का भोग माता-पूजन में लगता है जिसके साथ कड़ी बनती है। गोले देकनी पीतल या ताँबे की होती थीताँबे की तामड़ी में माता-पूजन में गेहूँ के वाटी जैसे घास में सेककर ढोकले बनाये जाते हैं। बाटी शब्द संस्कृत की वटी (या गोली) से बना है। बाटी बड़ी गोली है। बाटी पहले जौ की भी बनती रही। विष्णु पुराण में उस बटी का उल्लेख है। गेहूँ के कितने ही प्रकार के भोज्य पदार्थ बनते हैं। होली-दिवाली पर गेहूँ-चेन के बने कितने ही रूप घर-घर में महिलाएँ बनाती हैं। गेहूँ चने की मिसी रोटी गर्मी में खायी जाती है।

सर्वाधिक भोज्य पदार्थ चने के बनते हैं। बेसन, बेसन गटे (सूखे व कढ़ी में) पतोड़, भजिये, सेव, पपड़ी, कचोड़ी, समोसे, आलू बड़ा इत्यादि उसके अनगिन रूप और प्रकार हैं। चने व मूंग के पापड़ लोकप्रिय हैं। शीतकाल में उड़द के लड्डू शक्ति के लिए बनाये जाते हैं जिनमें मेवे मिले रहते हैं। गेहूँ के लड्डू बाटे कूटकर बनाये जाते हैं। ब्राह्मणा मोदकप्रियाः - मोदक ब्राह्मणों का प्रिय भोजन माना जाता है। गणेश को मोदक का भोग लगता है।

उड़द, मूंग, तूवर, चँवला, मसूर आदि की दाल का भोजन में उपयोग होता है। हरी साग (शाक) में मेथी, पालक, खाटी भाजी, चन्दरोई, चील भाजी, अफीम आदि कई प्रकार की पत्तियों का उपयोग होता है। गोभी फूल, गोभी पत्ती, कदू (कीरो), कटेर, किकोड़े, टिंडोरी, भिंडी, गिलकी, तरोई, टिंडा, मूली, आलू, परवल इत्यादि की विभिन्न प्रकार की सब्जियाँ होती हैं। हरा धनिया या कोथमीन का सबके साथ उपयोग होता है। हरा धनिया, पोदीना आदि की चटनी सर्वाधिक प्रचलित है। मौसम आने पर आम, कबोट, इमली आदि की चटनी भी बनती है।

लकड़ी कंडे से चूल्हे पर भोजन बनाना आम बात है। नगरों में पत्थर व लकड़ी के कोयले, लकड़ीचूरी, घासलेट के स्टोव, गैस आदि का उपयोग इन्धन के रूप में होता है। अब गैस का उपयोग अधिक बढ़ गया है। बिजली की सिगड़ी पर भी बना लेते हैं। गाँवों में सम्पन्न घरों में गोबर गैस के चूल्हे भी पाये जाते हैं। सौर ऊर्जा के चूल्हों का उपयोग बहुत कम दिखाई देता है।

मालवा की सर्वप्रचलित मिठाइयाँ में थूली लापसी है। ये राजस्थान में भी लोकप्रिय हैं। राजा जसवन्त सिंह औरंगजेब के समय जब काबुल से सेना सहित लौटे तो लाहौर में उन्होंने लापसी की रसोई कर उत्सव मनाया। मालवा में भी ऐसे उत्सव को गोठ कहते हैं। यह शब्द गोष्ठ का तद्भव है। गोष्ठ गाय बाँधने का ठाण (स्थान) होता है। वही पर्याप्त स्थान होता था। अतः रसोई वहीं बनायी जाती थी। ऐसे ही स्थल पर बैठकर किसी विषय पर बातचीत या बैठक होती थी। अतः वह गोष्ठी कहलाती थी। वहीं बैठकर खेलने वाले बाल साथी गोठी या गोटी तथा गोठण कहलाते रहे।

मालवा में मोतीचूर के लड्डू भी लोकप्रिय रहे। ये नुकती से बनते हैं। नुकती मीठे पीले छरें होते है। बहुधा नुकती बनने के कारण मृत्युभोज को नुकता ही कहने लग गये हैं। इसके अतिरिक्त जलेबी, खीर, हलुआ या सीरा भी लोकप्रिय हैं। हलुआ तथा खीर तो समय-समय पर लोग बनाते ही रहते हैं। अपने-अपने घरों मालवा में मिठाई की सामान्यता, सिरनी या सिन्नी कहते हैं। अतः सीरा मालवा में मिठाई का बोधक हो गया है। आजकल विभिन्न प्रकार की मिठाइयाँ भिन्न-भिन्न प्रदेशों के अनुरूप भी बनने लग गयी हैं। पेड़े, गुलाब जामुन, खोपर पाक, कलाकंद, श्रीखंड आदि मिठाइयाँ अधिक लोकप्रिय हैं। मिठाइयों के असंख्य प्रकार हैं। अपनी-अपनी रूचि और क्षमता के अनुसार जनता उनका सेवन करती है। बेसन की चक्की, मसूरी पाक, मगज के लड्डू आदि बेसन के बनते हैं।

मालवी में पारम्परिक रसोइयों के विभिन्न प्रकारों का लेखा-जोखा प्रस्तुत करने वाली अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी की एक हस्तलिखित पुस्तक भी है। संवत् 1850 (1793 ई.) की इस मालवा की भोजनविध (भोजनविधि) पुस्तक में अनेक विशेष विधियों का वर्णन है। इस पुस्तक की विषय-सूची से उसकी रूपरेखा और विशेषता ज्ञात हो सकती है।

मीठा बेगण, दाख का अथाना (आचार), खारक का अथाणा, केला का अथाणा, भूरा कोला की इमरी (इमरती), खारक की लपसी, दूध का गूंजा, खारक राँदना, दूध कूपी, दाख की पुड़ी, खोपरा का पापड़, सकरकंद का खाजा, बीदाम की रोटी, नींबू का मीठा अथाणा, केरी का अथाणा, दाख की लपसी, दूध को खाटा, दही का हलका माडा, माखण का बड़ा, खारक की अंगाकारी, उड़दा का गोवंद बड़ा, दही दूध का मोतीचूर, चोखा (चावल) की चंदरस, फेनी, भुटा की लपसी, दही का लाडू, गूंद का खाजा, कांदा की लापसी, बीरचुनी की सुखपड़ी, मेथी की केरी भरनी, मूला रांदना, खारक का पापड़, बीदाम पीसता (पिश्ता), मेवा की हाड़ी, खोपरा की लपसी, खोपरा का घेवर, बीदाम पिसता की वाटी, लीलवा की जलेबी, बीदाम का सीरा, बीदाम की पुड़ी, दूध की जलेबी, दही की जलेबी, बेगण का भड़ीता, बेगण बड़ा, कचोरी, साकर मिसरी, कट्या चूरमा पलोटा की रोटी।

मालवा की कई जातियों में मांसाहार भी प्रचलित रहा और आज भी है। इस पुस्तक में भोजन विध मास की' भी लिखी गयी है। इसकी विषयसूची इस प्रकार है-

केरी, नींबू, मास की साबोनी, मीठा मास, मछली का बड़ा, खाजरू की ओथडी की सेव, मास की मीठी रायतो, मास का बेगण, मास का अथाणा, मास की अंगाकारी, मूला की बाघ, उड़दा का सुला, दही का सुला, भूरा कोला का सुला, ड्यावा का मोरा का समोसात्था, राध्या मास, मास की बीडी, राध्या मास की बड़ी, मास का फुल, बंध्या दही की मुडी गुजा, कठ्या (कष्या) दूध की गूंजा, लीलवा की सुला, लीलवा की समोसा, सुला की विध, मास खीचड़ो।

इस सूची से ज्ञात होता है कि मालवा का सम्पन्न वर्ग कई प्रकार के स्वादिष्ट मिष्ठान और व्यंजन से परिपूर्ण भोजन का शौकीन था। इनमें विभिन्न आचार, बड़ी, पापड़, आदि ही आज का मध्यम वर्ग भी स्वयं बनाता और उपयोग करता है। अब कई लोग बने बनाये सामान बाजार से लाकर अपना काम चलाते हैं।

विभिन्न प्रान्तों से बढ़ते सम्पर्क के कारण आजकल रसोई के प्रकारों में पर्याप्त वृद्धि हो गयी है। नगरों में तो कई प्रकार के व्यंजन बनाने के प्रशिक्षणालय भी आरंभ हो गये हैं। परन्तु रसोइये परम्परा से सीखते रहते हैं। विवाहोत्सव के समय के प्रीतिभोज नगरों में प्रायः एक सा होता है। उसमें विभिन्न प्रकार के पकवान, व्यंजन आदि पंजाबी तर्ज पर बनते हैं। ग्रामों में भी इस पद्धति का प्रवेश होता जा रहा है जो पर्याप्त खर्चीला है।

मालवा के ब्राह्मण तथा वैश्य परम्परा से शाकाहारी ही रहे हैं। परन्तु आजकल उनमें भी मांसाहार के प्रति रूचि बढ़ती जा रही है। पर वे प्रकट रूप से यह आहार लेते नहीं सुने जाते हैं। अभी भी शाकाहार की जातिमर्यादा बनी हुई है। यही स्थिति मदिरापान की भी है।

मालवा में भोजन के बाद ताम्बूल का पान खाने या सौंफ-सुपारी खाने की आदत भी पायी जाती है। मालवी पान लोकप्रिय हैं। मालवा में धार, मन्दसौर आदि अनेक स्थानों पर पान की खेती करने की पनवाड़ियाँ है। शाजापुर जिले में तो एक ग्राम का ही नाम पनवाड़ी है। मालवी के सिवा बनारसी, मद्रासी इत्यादि पान भी यहाँ प्रचलित हैं। पान की दुकानें गाँव-शहर सब जगह मिल जाती हैं।

दूध के साथ ही पेय पदार्थों में चाय पर्याप्त लोकप्रिय है। अतिथि का सत्कार आजकल प्रायः चाय से किया जाता है। नगर ही नहीं ग्राम-ग्राम में होटल खुलते जा रहे हैं, कॉफी लोग पीते हैं, परन्तु बहुत कम।

तम्बाखू का उपयोग बड़े-बूढ़े नासिका सूंघने के रूप में करते रहते हैं। तम्बाखू खाने का भी पर्याप्त प्रचलन है। बीड़ी, सिगरेट, चिलम प्रायः पुरुष पीते हैं। मजदूर वर्ग की महिलाएँ कहीं-कहीं बीड़ी पीती पायी जाती हैं। गांजा का सेवन भी होता है। अन्य अवैध चरस, हेरोइन आदि के प्रच्छन्न सेवन की बातें सुनी जाती हैं। भाँग, ठंडाई भी रूचि से पी जाती है। राजा भोज ने अपनी चारुचर्या पुस्तक में जीवन जीने की कला को ही वर्ण्यविषय बनाया है। इसमें जगने से सोने तक की गतिविधियाँ तथा ऋतु के अनुसार भोजन, पेय, बेसन, अलंकार, पुष्प, तामम्बूल इत्यादि का विस्तार से विवरण दिया गया है। यह विवरण नीति, वैद्यक और धर्मशास्त्र के अनुरूप है और ग्यारवीं शती की जीवनचर्या का महत्त्वपूर्ण लेखा-जोखा है।