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लोक मंगल के देवता महादेव
March 11, 2020 • गायत्री शर्मा

समस्त संसार में शिव की पूजा अर्चना अनादि काल से ही चली आ रही है। शिव ही एकमात्र ऐसे देव हैं, जिनकी निराकार और साकार स्वरूप में अर्चना की जाती है। शिवलिंग उनके ज्योतिर्मय निराकार का स्वरूप है। विश्व ब्रह्मांड का प्रतीक मानकर लिंग रूप में उनकी उपासना सर्वत्र भूमण्डल में की जाती है। इस प्रकार सर्वव्यापी सत्ता केकारण शिवपूजा, लिंग रूप में प्रचलित रही है। शिव से अलग जो अन्य देवता है, वे साक्षात् ब्रह्म नहीं हैं, अतः उनकी पूजा निराकार और लिंग रूप में नहीं होती। शिवपुराण से यह सिद्ध होता है कि लिंग का मूल तात्पर्य ओंकार (प्रणव) सूक्ष्म और स्थूल रूपों से हैं अर्थात् वह समान रूप से सर्वत्र व्यापक है।

शिव और विज्ञान

ज्योर्तिलिंग के रूप में शिव की उपासना प्रचलित होने के दो कारण हैं, जो विज्ञान और पुराण के तर्क पर खरे उतरते हैं। प्रथम तो यह कि जो सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त हैं और जिसमें समस्त ब्रह्मांड समाहित है। वस्तुतः उसके आकार-प्रकार की संकल्पना करना एक दुष्कर और विलक्षण कार्य है। वैज्ञानिक अनुसंधानों के अनुसार ब्रह्मांड अंडाकार है। विश्व विख्यात वैज्ञानिक और गणितज्ञ अलबर्ट आइन्सटीन ने अपने अनुसंधान में अनन्त आकाश को वक्राकार माना है। ग्रहों की कक्षा भी वलयकार होती है और यही वलय ब्रह्मांड का आकार निरूपति करता है, जिसका प्रतीकात्मक चिन्ह 'ज्योतिर्लिंग' है। शिव व लिंग पुराण में लिंग का विशद वर्णन ब्रह्मांड के आकार का ही 'द्योतक' बताया गया है। देश, काल और पदार्थ से विनिर्मित विश्व ब्रह्मांड लिंगवत वक्राकार है और शिवलिंग उसका प्रतीक चिन्ह है, जो समस्त सृष्टि को अपने में आत्मसात करने पर 'आत्मलिंग' भी कहलाता है। इस प्रमाण से 'शिव' की विराटता का अनुमान लगाया जा सकता है। लिंगोपासना का दूसरा कारण यह है कि योगीजन समाधिवस्था में जिस ज्योति का दर्शन करते हैं, उसका प्रतीक भी लिंग ही है और इसी से शिवलिंग (शिव-चिन्ह) को ज्योतिर्लिंग कहा जाता है। निराकार परब्रह्म का प्रतीक शिवलिंग का अर्थ भी यही है कि सृष्टि साकार होकर भी उसका आधार आत्मा है। ज्ञान की दृष्टि से उनके भौतिक सौंदर्य का कोई बड़ा महत्त्व नहीं है। मनुष्य को आत्मा की उपासना करनी चाहिए और उसी का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। सांसारिक रूप सौन्दर्य और विविधता में घसीटकर उस मौलिक सौन्दर्य को तिरोहित नहीं करना चाहिए।

अणुशक्ति केंद्रेः शिव की आकृति 

यहां यह भी उल्लेखनीय होगा कि वर्तमान भारत देश में स्थित जितने भी एटोमिक पावर प्लांट (अणु ऊर्जा केन्द्र) हैं, वे सब शिवलिंग की आकृति की ही भांति है। अर्थात् शिव का मूल समागम जहां (ई) शक्ति से है (अर्थात् बिना शक्ति के शिव-शव है) वहीं शक्ति (ई) से सम्बद्ध होने के कारण वे ऊर्जा तथा व्युत्पत्ति के भी प्रतीक हैं। सारतः शिव ही ऊर्जा और उत्पत्ति के कारण होकर संहारक रूप में रूद्र अथवा प्रलयंकर हैं। आदि, मध्य और अंत सब उसी अनन्त देव महादेव शिव में है। इसी आशय के कारण शिव का अर्थ लोकमंगल अर्थात कल्याकारी होता है। वे जगत के कल्याण का ही कार्य सम्पादन करते हैं। सम्पूर्ण ब्रह्मांड को शिवलिंग का आकार स्कंद पुराण में बताया गया है। शिव अति दयालु, आशुतोष, कल्याणकारी और सब कुछ दे देने वाले हैं। महाबली रावण और उसके पुत्र मेघनाद को ऐसी आलौकिक सिद्धियां उन्होंने प्रदान की, जो देवताओं के पास भी नहीं थीं, चाहे इसके लए उन्हें महादेवी पार्वती से ही लड़ाई क्यों न करनी पड़ी। वहीं भस्मासुर को भी वरदान देते समय उन्होंने आगा-पीछा नहीं सोचा, यहां तक कि उनके स्वयं के प्राण ही संकट में पड़ गये। अंत्तोगत्वा शिव के सर्वप्रिय भगवान विष्णु को मोहिनी रूप धारण करने के अलावा और कोई उपाय नहीं सूझा।

ऐसे हैं लोककल्याणकारी 'शिव' जो भांग-धतूरा चढ़ाकर कभी-कभी ऐसे वरदान दे बैठते है कि जान के लाले आ पड़ते हैं। इसी 'शिव' की व्युत्पत्ति संस्कृत की जिस धातु से हुई उससे स्पष्ट होता है कि जिसे सब चाहते हैं और जिसकी अभिलाषा सभी को रहती है। यह अभिलाषा कल्याण, मंगल एवं आनन्द की रहती है और इसी से शिव का अर्थ 'कल्याणकारी' अथवा मंगलमयी, आनन्द प्रदाता होता है।

नत्य और संगीत हैं शिव

शिव नृत्य और संगीत के भी प्रवर्तक हैं। तांडव और लास्य दोनों प्रकार के नृत्य तथा संगीत के सप्त-स्वर एवं समस्त तालधमाल उन्हीं के पदचाप एवं डमरू के निनाद से उद्भव हुए है। अपने नटराज रूप में शिव विश्व के प्रथम जनक एवं आचार्य हैं। भारतीय नृत्यकला मूलतः नृत्यदेव नटराज की ही देन है। शिव ने एक बार नृत्य के अंत में चौदह बार डमरू बजाया तो उससे आ, ई, उ, झ, लू, ए, ओ, ऐ, और ह, य, ब, र, त, ल आदि 14 सूत्रों की उत्पत्ति हुई, जो सृष्टि की आदि भाषा संस्कृत में परिणित होकर वेद-भाषा के वेद-भाषा के नाम से आज भी सम्पूर्ण संसार में प्रख्यात है। शिव का तांडव विनाशधर्मी (संहारक) माना जाता है लेकिन वह इस आशय में कि जब विकृति-विकार चरम-सीमा पर पहुंच जाए अर्थात् जो सत्यं, शिवं, सुन्दरं नहीं हो, अनिष्ट व अमंगलकारी हो। संस्कृति सड-गल गयी हो, तब तो उसका विनाश होना ही चाहिए ताकि फिर नवसृजन हो सके और नवोन्मेश का मार्ग भी प्रशस्त हो सकें। इसके हेतु सड़ी-गली संस्कृति को नष्ट करने के लिए जगतपिता शिव जब गले में मुण्डमाला डाले, भस्म लिप्त देह, डमरू, त्रिशूल इत्यादि धारण कर जहां मुक्त होकर तथा मृत्यु के पाश महासर्प को गले में लपेटकर तृतीय नेत्र खोलते हैं, तब वे हुंकार के साथ प्रलयंकर हो उठते हैं। नृत्यारंभ में उनके पैरों की टंकार से ऐसा लगता है, मानो समस्त भू-मण्डल मिट्टी के घड़े की भांति टूट रहा हो, सक्रिय हाथों के घेरे में आकर आकाश अस्त-व्यस्त होकर घूमता-सा प्रतीत होता है। चारों ओर आग बरसती है। उनके चरणों की थिरकन जैसे- जैसे गतिशील होती है, वैसे-वैसे ही सड़ी- गली संस्कृति का कूड़ा-करकट प्रभूत दावानल में जल-जलकर अंतरिक्ष में विलय हो जाता है। उस समय उनके उठे प्रथम दाहिने हाथ से अभय मिलता है, जबकि जगत के प्राणियों के क्रोध में बायें पैर की धरती की टंकार मारने से अग्नि उत्पन्न होती है, जो विनाश करती है। उनका दाहिनां उठा पैर मुक्ति का प्रतीक है।

शिव की बिखरी जटाए

उस समय शिव की बिखरी जटाएं (ब्रह्मांड), उन पर फुफकारता नागराज (वासना) गंगा (आध्यात्म), चन्द्रमा (ज्योति), तृतीय नेत्र (अग्नि), मुंडमाला (निस्सारता) व पैरों के नीचे अपस्सार (अज्ञान) का प्रतीक होती है। फिर ताण्डव के बाद होता है, नयी-नूतन संस्कृति का निर्माण, सृष्टि का सृजन-कल्याण, जो शिव-शक्ति द्वारा किया जाता है। ऐसे विचित्र देव इस विश्व के आदि देव हैं। अनादि युग से राष्ट्रपिता हैं और उन्हें विधाता के अमिट लेख में भी संशोधन करने का विशेषाधिकार है। तृतीय नेत्र खोलने पर वे 'रूद्र' बन जाते हैं। युद्ध में रूद्र ही सर्वोसर्वा होता है। प्राचीनकाल से हमारे राष्ट्र के वीरों का युद्धघोष “हर-हर महादेव" ही रहा है और इसी कारण शिव को युद्ध का देवता भी कहा/माना गया है। महर्षि वेदव्यास ने लिखा हैः

"शिव के समान कोई देवता नहीं है, शिव के समान कोई गति नहीं है, दान में भी शिव के समान कोई दानी नहीं है और युद्ध में भी भगवान शिव के समान अन्य कोई वीर ही नहीं है।"

शिव का कंठ नीलवर्णीय है अर्थात् उसमें कालकूट 'विष' भरा है। कंठ का नीलवर्ण उनकी परमार्थ-वृत्ति का द्योतक है, जिसे वे लोक-कल्याण के लिए विष पीकर प्रसन्नता का अनुभव करते हैं।

है कोई ऐसा जिसने लोक-कल्याण, ब्रह्मांड को बचाने में हलाहल जैसा भयंकर विष पीने की हिम्मत दिखायी है? और फिर उसे कंठ के नीचे भी नहीं उतरने दिया। इस मूल का तात्पर्य योग की दुष्कर सिद्धि की प्राप्ति से है। योगी पुरूष अपने सूक्ष्म शरीर पर अधिकार पा लेते हैं, जिससे उनके स्थूल शरीर पर कड़े तीक्ष्ण विष का तनिक भी असर नहीं पड़ता और उन्हें वे सामान्य मानकर पूर्णतया आत्मसात कर लेते हैं तथा विश्व-कल्याण की अपनी आत्मिकवृत्ति निश्चल भाव से बनाये रहते हैं।

उनका पंचाक्षर मंत्र "ओम नमः शिवाय" जन-साधारण के लिए सिद्धि प्रदाता है। रावण कृत 'शिव तांडव स्त्रोत' की अनुपम महत्ता तो सर्वविदित है, जिसके जप से शिव को रावण के समक्ष आना ही पड़ा था। शिव के परम समर्पित भक्तों में रावण का स्तर सबसे उच्च थाएक बार रावण की मां कैकसी ने उसे ऐसा शिव-मंत्र दिया था, जिसके जप से जब शिव रावण के सम्मुख उमा सहित प्रकट होकर कारण पूछने लगे तो उस मंत्र के द्वारा रावण ने शिव को अपने अंजुल में ही मांग लिया था। ऐसे भोले-भण्डारी हैं शिव, जो देव-असुर दोनों में मान्य है।

सागर मंथन और शिव

सतयुग में देव-दानवों के मध्य अमृत की प्राप्ति के लिए सागर-मंथन हो रहा था। सागर से अमृत के पूर्व कालकूट-हलाहल (विष) निकला, उसकी भंयकर लपटो से पीड़ित उपस्थित देव-दानव भाग खड़े हुए और अंत में ब्रह्मा के पास पहुंचे। ब्रह्मा ने उन सभी से कहा "विष की तीक्ष्णता तो मैं भी सह नहीं सकता। अब तो ब्रह्मांड में एक मात्र 'शिव' ही इसका उपाय कर सकते हैं।" तब देव-दानवों सहित ब्रह्मा ने 'शिव' का ध्यान किया। शिव तुरन्त वहां प्रकट हो ब्रह्मा से बोले, "मैं आपका क्या हित कर सकता हूं?" ब्रह्मा ने सागर-मंथन से निकले तीक्ष्ण विष से विश्व के संरक्षण की मांग सभी की ओर से प्रस्तुत की। कार्य अति दुष्कर था, परन्तु भोलेनाथ शिव ने सोचा कि अधिक देरी से तो ब्रह्मांड का सर्वनाश हो जाएगा। अतः उन्होंने शीघ्र ही कालकूट विष को अपने कंभ में उठाया और दोनों हाथों में पकड़कर विश्व कल्याणार्थ उसे पी लिया। कालकूट उनके कंठ में ही ठहर गया, तभी से उनका कंठ नीलवर्ण हो गया और वे 'नीलकंठ' कहलाने लगे। देवताओं में प्रसन्नता लौट आयी और उन्होंने शिव को देवों का देव 'महादेव' को उपाधि से विभूषित किया। यदि शिव विष नहीं पीते तो दूसरे अमृत नहीं पी सकते थे।

शिव ऐसे ही कारणों से 'मृत्युंजयी' है। उनके महामृत्युंजय मंत्र जाप से विधिनुसार करने से मृत्यु के मुख से जाने वाले रोगी भी आश्यचर्यजनक रूप से स्वस्थ होते देखे गये है। ऐसी रामबाण औषधि है, शिव का मंत्र जाप।

महाशिवरात्रि पर भोलेनाथ शिव के पूजन की विधि भी अत्यन्त सरल है। शिवरात्रि के प्रत्येक प्रहर में अलग-अलग पूजन की व्यवस्था रहती है। सारी रात जागकर भी जागरण करना होता है लेकिन शिव को प्रसन्न करने के लिए यह सब आवश्यक नहीं है। मात्र एक लोटा जल और कुछ बिल्वपत्र उन्हें प्रसन्न करने हेतु काफी है और यदि वह भी नहीं मिले तो कोई चिन्ता नहीं। बस किसी भी बहाने उनका स्मरण कर लेना ही काफी है। गुणनिधि नामक एक चोर चोरी करने एक शिव मंदिर में घुस गया गया। गहरे अंधकार में रोशनी के लिए उसने कपड़ा ढूंढा और उसे जला दिया। भोलेनाथ शिव ने उसके ऐसे काम को स्वयं के लिए रोशनी की व्यवस्था समझा और शीघ्र ही उससे प्रसन्न हो उठे। इसी प्रकार एक भील एक वृक्ष पर चढ़ने के लिए शिव की मूर्ति पर चढ़ गया तो भोलेनाथ ने समझा कि इस भक्त ने स्वयं को (स्व-शरीर को) मुझ पर ही न्यौछावर कर दिया है और वे तुरन्त प्रसन्न हुए।

प्रस्तुत लेख इसी आशय को इंगित करता है कि जो परमार्थवृत्ति का पालक है वहीं शिवत्व लोक का सदस्य हैं। आज हमारे देश के नेता यदि शिव की इस कार्य शैली को हृदयगंम कर ले तो भारत स्वर्ग बन सकता है।