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किशोर मन की व्यथा और जिजीविषा की जीवन्त दास्तां: कोचिंग/कोटा
January 23, 2020 •  वीरेन्द्र 'सरल'

किसी भी साहित्यिक कृति की मूल्यांकन की कसौटी तो यही है कि उसका सामाजिक सरोकार कितना है। समाज मे प्रगतिशील सोच के प्रचार-प्रसार में उस कृति की क्या भूमिका है। समाज मे वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने में उस कृति का क्या योगदान है। वह कृति समाज में उत्पन्न किस समस्या के समाधान के लिए क्या सार्थक उपाय प्रस्तुत करती है और मानवीय मूल्यों के विकास में कितना सार्थक सन्देश देती है। मान्यताओं के स्याह पक्ष का कितना विरोध करती है और धवल पक्ष का कितना समर्थन करती है। आज समाज जितना उन्नत होता जा रहा है उसी अनुपात में नई नई समस्याएं भी उत्पन्न होती जा रही है। आज हम गलाकाट प्रतिस्पर्धा के दौर से गुजर रहे हैं। हर कोई एक दूसरे को पीछे छोड़कर आगे निकलने की होड़ में शामिल है। बड़े तो बड़े अब इस होड़ में बच्चे और किशोर भी शामिल हो गए हैं या पालकों के द्वारा शामिल कर दिए गए हैं। हर इंसान की बुद्धिलब्धि और कार्य क्षमता अलग अलग होती है। संसार को देखने का नजरिया अलग होता है। पर हम सभी से एक ही तरह की सफलता की आशा करते हैं जो मुमकिन ही नही है पर हम इस प्रतिस्पर्धा की आग में अपने मासूम बच्चों को झोंक रहे है। आज का बचपन अपेक्षाओं के बोझ तले दबकर दम तोड़ने लगा है। हमारी अपेक्षाओं की आग को हवा देने का कार्य कोचिंग सेंटरों का है। कोचिंग सेंटर के मनमोहक विज्ञापन के मायाजाल में उलझकर हर पालक अपनी संतान को डॉक्टर, इंजीनियर या प्रशासनिक अधिकारी बनाने पर ऐसे जी जान से तुला है जैसे इन पदों के सिवाय जीवन में और कुछ भी नहीं है या समाज को इनके अतिरिक्त और किसी की आवश्यकता ही नहीं है। कोचिंग सेंटर में बच्चे किस मानसिक दबाव से गुजर रहे हैं, उन पर क्या बीत रही है, वे किस षड्यंत्र के शिकार होकर जीवन पथ से भटक रहे हैं और कुंठा तथा अवसाद से घिरकर अपनी जीवन लीला तक समाप्त कर रहें है। इससे किसी को कोई मतलब नहीं हैं।

उच्च और मध्यवर्गीय समाज के पालकों और किशोरों की इस समस्या को अरुण अर्णव खरे जी ने अपनी नवीनतम कृति कोचिंग/कोटा में बड़ी शिद्दत से उठाया है। कोटा को पूरे देश में इंजीनियर और डॉक्टर बनाने का कारखाना माना जाने लगा है। जहाँ देश के अलग अलग प्रान्तों के अलग अलग परिवेश से बच्चे आते हैं। सबकी पारिवारिक पृष्ठभूमि अलग होती है और संस्कार भिन्न भिन्न होते हैं। सबकी मनः स्थिति अलग अलग होती है। समीर और चित्रा के इर्द गिर्द बुने हुए इस कथानक में जहाँ समीर दब्बू, संवेदनशील और संस्कारी हैं वहीं चित्रा साहसी, अल्हड़, बेबाक और प्रतिभाशाली है। कोचिंग के शुरूआत के पहले टेस्ट में पिछड़ कर निराश हुए समीर को चित्रा का आलंबन और प्रोत्साहन मिलते ही उसकी दबी प्रतिभा बाहर आती है। उसका आत्मविश्वास जागृत होता है। वह निरन्तर अपने शैक्षणिक स्तर को सुधारता जाता है और अंत में अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है। चित्रा अपने विवेक से अपनी हर समस्या को हल कर लेने का माद्दा रखती है और सदैव समीर के साथ ही अन्य विद्यार्थियों के सहयोग के लिए तत्पर रहती है पर समीर के लिए उसके मन में असीम प्यार है। दोनों एक दूसरे के आकर्षण के डोर से बंधे होने के बावजूद दिल में पनपे प्यार के अहसास को प्रगट नहीं कर पाते हैं। वैसे भी प्यार दिखावे की चीज नहीं बल्कि मीठा अहसास है, पूजा है, इबादत है, अरदास है। चित्रा प्रतिभाशाली होने के बाद भी नियति का इस तरह शिकार होती है कि निर्धारित समय को अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाती। इस कथानक के बीच में लेखक ने जीवन के विविध रंग और मनोभावों को पिरोने का स्तुत्य प्रयास किया है। जिसमें कहीं अंकल के प्रेरक वचन और साहित्यिक अभिरुचि है तो कहीं आंटी का मातृवत व्यवहार है। पिता के कठोरता के पीछे छिपे प्यार की अभिव्यक्ति है तो माँ के भावुक हृदय से छलकते प्यार का सागर है। दोस्तों की मस्ती और उमंग है तो समाज के सफेदपोश भेड़ियों के षड्यंत्र है। जीवन के हर रंग के समुचित संयोजन से इस कृति में लेखक ने चार चांद लगा दिया है। किशोर मन के भाव को अभिव्यक्त करने के लिए लेखक ने जिस खूबसूरती से उन्हीं के शब्दावली का प्रयोग किया है जिसकी सम्प्रेषणीयता देखते ही बनती है। दूसरों के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर देने की भावना का नाम प्यार है, यह लिखते हुए लेखक ने प्यार के असीम भाव को शब्दों में बांधने का प्रणम्य प्रयास किया है। कुल मिलाकर इस कृति का सन्देश यही है कि जिंदगी की जंग आंसुओं के सैलाब से नहीं बल्कि हिम्मत के हथियार से जीती जाती है। बड़े आदमी बनने से एक बेहतर मनुष्य बनना ज्यादा महत्वपूर्ण है। उपन्यास की कसौटी पर यह कृति कितना खरा उतर पाती है यह तो साहित्य के आचार्य ही तय करेंगे पर एक पाठक की हैसियत से मुझे यह लिखने में कतई संकोच नहीं है कि यह केवल किशोरों के लिए ही पठनीय नहीं अपितु पालकों के लिए भी पठनीय और मननीय है। उत्तम कृति के लिए अरुण अर्णव खरे जी को हार्दिक बधाई तथा उनकी लेखनी की निरन्तरता के लिए अशेष शुभकामनाएं।।