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कबीर की वाणी एक औषधि
October 17, 2019 • वीना सिंह

निराकार के समर्थक कबीर एक महान संत थे। ध्यान ही उनकी मुख्य साधना थी, इसलिए ध्यान के बल पर उन्होंने सत्य को जाना। उनका मानना था कि अच्छे सुकर्मों का फल यहीं इसी पृथ्वी पर मिल जाता है। उसी प्रकार बुरे कर्मो का फल भी मनुष्य इसी पृथ्वी पर उपेक्षा, तिरस्कार, निंदा व सामाजिक बहिष्कार के रूप में भोग लेता है। स्वर्ग- नरक कहीं अनयंत्र नहीं हैं। वह तो हमारे कर्मों के अनुरूप ही निर्मित होते हैं। कबीर ने समाज में व्याप्त गलत अवधारणाओं को नहीं माना, सही मान्यताओं का मंडन किया परन्तु अंधपरंपराओं का पुरजोर खंडन किया। उनकी नीतिसंगत वाणी से लोग आल्हादित होते, तथा अपने जीवन में उनके बचनों को उतारते तथा जीवन की कठिनाइयों से मुक्ति पातेंकबीर के शब्द अबोल अनमोल हैं। उनका कहना था कि बहुत सी बातों को लिखा नहीं जा सकता, कहा भी नहीं जा सकता, उन्हें तो केवल अनुभूति से ही जाना जा सकता है और जब बोलना आवश्यक हो तब मन को परिष्कृत करते हुए सुखदायी वचन ही बोलें। उनका मानना था कटु वचन दूसरों को तो कष्ट पहुंचाते ही हैं, स्वयं को भी अशांत करते हैं। हमारी वाणी पीड़ा को बढ़ा भी सकती है और घटा भी सकती है इसीलिए कहा है-

ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोय।

औरन को शीतल करै, आपहुं शीतल होय।।

कबीर जी दूसरों में कमियां निकालने से पहले अपनी कमियों को दृष्टि डालने की सलाह देते थे। यह कटु सत्य है कि हम स्वयं की कमी नहीं देख पाते इसलिए अपना सही आंकलन भी नहीं कर पाते और हमेशा इसी भ्रम में रहते हैं कि मुझसे तो कोई गलती हो ही नहीं सकती। हम जो सोच रहे हैं वह सही है हम जो कर रहे हैं वह सही है और हम जिस राह पर चल रहे हैं वह सही है। हमारी सोच समझ का ऐसा नजरिया ही हमें गर्त में ले जाकर छोड़ता है। यह एक तरह का अहंकार ही है जो हमारी सोच को संकुचित करता है जिससे कि हम अपनी खामियों को न देखकर दूसरों में दोष देखते हैं। इसी के आधार पर हम जीवन में आगे कदम बढ़ाते हैं। नकारात्मक नजरिया जहाँ हमें सीमाओं में कैद करता है हमारे लिए बहुत सी परेशानियाँ और मुसीबतें बढ़ाता है वहीं सकारात्मक नजरिया सीमामुक्त करता है। जीने की नई राह दिखाता है। यदि नजरिया साफ सुथरा कुंठारहित हो तो जीवन की दिशा ही बदल जाती है, रंगत निखरती है। यदि नजरिया कुंठित और नकारात्मक हो तो जीवन की दिशा उस गर्त में जाती है जहां से उबरना, निकलना आसान नहीं होता। हम ऐसी स्थिति में स्वयं को हारा और असफल महसूस करते हैं और अवसाद के शिकार हो जाते हैं। अवसाद नकारात्मक सोच का ही स्रोत है जो विकास में बाधक बनता है। वैसे तो प्रत्येक व्यक्ति में बुराई तथा अच्छाई स्वभावतन विद्यमान होती है और वह अपनी स्थितियों परिस्थितियों के चलते कभी अच्छा तो कभी बुरा व्यवहार भी करता हैं विचार करने और सोचने की षक्ति केवल हम मनुष्यों के पास है। फिर भी हम दूसरों में ही गलतियों को ढूंढने में समय जाया करते हैं। अपनी हर परेशानियों व कार्य में विघ्न-बाघाओं के लिए दूसरों को ही दोशी ठहराते हैं। परन्तु आज भी संत कबीर दास जी की यह पंक्तियां व्यक्ति को सही दिशा प्रदान करने में कारगर हैं। इन पंक्तियों का अनुसरण करते ही जीवन में अचानक आयीं दुश्वारियों, परेशानियों तथा असफलताओं का सामना करने में हम स्वयं को सक्षम पाते हैं 

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।

जो दिल खोजा आपन, मुझ सा बुरा न होय।

इसी तरह ईश्वर से निकटता के बारे में अपने विचार व्यक्त करते हुए कबीर दास जी कहते हैं। परमात्मा तो प्रत्येक मनुष्य के हृदय में ही निवास करता है परन्तु हम सब अज्ञानता बस उसे मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और तीर्थस्थानों में खोजने का भरसक प्रयत्न करते रहे हैं परन्तु उसका साक्षात्कार नहीं पा सके। मनुष्य दर्शन पाए भी तो कैसे? जहाँ वह है ही नहीं, वहाँ हम सब उसे तलाश रहे हैं और जहाँ वह उपस्थित है वहां तक हमारा ध्यान ही नहीं पहुँचता। क्या ऊँचे पर्वतों पर चढ़ जाने से प्रभु के दर्शन हो जायेगे। वहाँ तो पहले से सजाई गई उनकी मूर्ति मात्र ही मिलेगी जो स्वयं मनुष्य ने ही स्थापित की है। यह बिडम्बना ही है कि जो मेरे सबसे निकट है उसे हम दूर-दूर तक ढूंढ कर थके जा रहे है कबीर ने कछ ऐसा ही अपनी वाणी में कहा है - मोको कहाँ ढूंढे रे बन्दे, मैं तो तेरे पास में, ना तीरथ में ना मूरत में ना एकान्त निवास में। अर्थात् मैं तुम्हारे अन्दर ही विद्यमान हूँ मैं तुम्हारे सबसे निकट हूँ। यदि अज्ञानता एवं भौतिकता के अंधकार से निकल कर ज्ञानरूपी प्रकाश से मन को प्रकाशित करोगे तो पाओगे कि ईश्वर अपने समस्त गुणों के साथ हमारे अन्दर ही उपस्थित है। स्वयं में प्रभु की अनुभूति पाना कठिन अवश्य है पर असंभव नहीं है। सच्चे मन से, दृढ़ विश्वास से तथा कठिन परिश्रम से जिस प्रकार दुर्लभ से दुर्लभ वस्तु को प्राप्त किया जा सकता है तो उस सर्वव्यापी परमात्मा को क्यों नहीं खोजा जा सकता? आवश्यकता है सच्ची निष्ठाभाव की, मन के पूरे विश्वास की, आत्मशुद्धि की, पराकाष्ठा की तथा निरन्तरता की। कबीर की वाणी एक औषधि के समान है जो जीवन की कटुता को जड़ से खत्म करती है।