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जैसलमेर के प्रसिद्ध-ऊनी वस्त्र
August 30, 2019 • बृजकिशोर शर्मा

भारत विविधता से भरा देश है। जहाँ मौसम (ऋतु) के भी विविध रूप दिखाई देते है, इसी कारण यहाँ खान-पान, रहन-सहन में भिन्नता देखी जा सकती है जो देश को सतरंगी स्वरूप प्रदान करती है। देश के वृहद प्रांत राजस्थान में सभी ऋतुओं के अनुरूप भोजन, पहराण स्पष्टतः झलकता है। इसीलिए इसे रंगीला राजस्थान कहा जाता है।

पूर्वकाल से ही मानव शरीर को शीत से बचाने के लिए गर्म वस्त्रो का उपयोग करता आया है। जिसके साक्ष्य पुरातत्व अवशेषों से ज्ञात होते है। ऊनी वस्त्र उद्योग की गणना प्राचीन उद्योगों में की जाती है। कश्मीर, राजस्थान के ऊनी वस्त्र पूर्वकाल से ही लोकप्रिय रहे है। उत्तम श्रेणी की ऊन पशुओं के बाल से तैयार की जाती है। उत्तम ऊन के लिए भेड़ों को विशेष रीति से पालना पड़ता है। राजस्थान में ऊन भेड़, घोड़े, ऊंट, बकरी के बालों आदि से भी प्राप्त कर ऊनी वस्त्रों का निर्माण किया जाता है। राजस्थान में ऊनी वस्त्रों में पट्ट, नमदा, लोई.. आदि फेल्टिंग प्रक्रिया द्वारा निर्मित किये जाते है। ऊनी वस्त्र के लिए ऊन के रेशे प्राप्त कर ऊन को छांटा जाता है। छटनी के पश्चात ऊन की सफाई, सफाई के बाद कार्डिग कर उसे सूत के रूप में परिवर्तित करने की प्रक्रिया के पश्चात ऊनी वस्त्रों के लिए रेशों को सुलझाया जाता है। यह कार्य रोलर द्वारा किया जाता है। धुनाई के बाद कंघी करना, धागे खीचना, घुमाना और बुनाई का सोपान आता है।

गर्म वस्त्रों की विशेषता को देखा जाए तो ऊन ही एक मात्र ऐसा रेशा है जिसमें गंधक पाया जाता है। अन्य तत्वों में कार्बन, ऑक्सीजन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन और गंधक मिलकर किरेटिन नामक प्रोटीन का निर्माण करते है। इस लिहाज से कहना गलत नही होगा कि प्रोटीन से ऊन का रेशा निर्मित होता है अतः ऊन प्रोटीन प्रधान रेशा है। रेशों के आधार पर देखा जाए तो गर्म वस्त्रों को दो वर्गों में विभाजित किया गया है। (1) ऊनी वस्त्र-स्वेटर, कार्डिगन, शाल.. आदि। (2) वसर्टेड वस्त्र- यह गर्म वस्त्र महंगे होते है जिसमें गर्मसूट, सूटिंग, लोई.. आदि।

राजस्थान के पश्चिमी भाग में स्थित है जैसलमेर जिला जो ऊनी वस्त्रों (जैसलमेरी) कम्बल, पट्ट, लोई के लिए विश्वभर में लोकप्रिय है। यह कलात्मक वस्त्र हस्तशिल्प के अंतर्गत मानी गयी है जो जैसलमेर जिले के कुशल कारीगरों द्वारा मेरिनों ऊन से निर्मित किये जाते है। कुशल बुनकरों द्वारा तैयार ऊनी सामग्री में मलाई शाल, लेडिज शाल अधिक प्रचलन में है। टाई-डाई से तैयार चूनरी शाल देश- विदेश की खास पसंद बनता जा रहा है, जिसमें लालसूर्ख पल्लू वाली चुनरी की मांग विशेष रूप से है। पुरुष वस्त्रो में ढाई मीटर लम्बी एवं डेढ़ मीटर चौड़ी हीरावल (पट्ट) की बात ही निराली है। पत्र- पत्रिकाओं से प्राप्त जानकारी के आधार पर वर्णित है कि बसिया समग्र विकास परिषद ने मेरिनों ऊन से पाँच मीटर लम्बी आठ सौ ग्राम वजन की सोनिया साड़ी का उत्पाद निर्मित किया। मेरिनों ऊन से ही जैसलमेर की खादी संस्थाओं द्वारा जयललिता कोट भी निर्मित किये जा रहे है। सफेद रंग का पट्ट और उसके चारों तरफ डिजायनदार अलग-अलग रंगों की पट्टी देखते ही मन को भा जाती है।

उल्लेख मिलता है कि इस उद्योग के अन्तर्गत जैसलमेर में जिला खादी ग्रामोद्योग परिषद की स्थापना सन् 196162 में हुई। जैसलमेर में कबीरबस्ती में सर्वप्रथम करघे पर बरडी तथा पटू की बुनाई का आरम्भ हुआ। वर्तमान में जिले में कई कुशल बुनकर कारीगर स्वस्थ प्रतिस्पर्धा से इस हस्तशिल्प को आगे बढ़ा रहे है। जैसलमेर में सीमा ग्राम स्वराज्य संघ, मंधा में खादी ग्रामोद्योग संस्थान, कनोई में नभ डूंगर क्षेत्रीय सघन विकास समिति, कोटड़ी में तेमडेराय क्षेत्रीय सघन विकास समिति.. आदि अपने उत्पादों की बदौलत अपनी एक विशिष्ठ पहचान कायम की है। कताई-बुनाई के अतिरिक्त टाई-डाई के कार्य से भी कई महिलाओं को रोजगार के अवसर मिलें है। ऊनी वस्त्र शाल पर फिनिशिंग एवं अलंकरण का कार्य खादी संस्थाओं द्वारा जोधपुर, बीकानेर.. आदि से करवाया जाता है।

जिला प्रशासन ने जिले के श्रेष्ठ बुनकर को बुनकरश्री नाम से प्रति वर्ष 5000 रुपए का नकद पुरस्कार देने की योजना भी प्रारम्भ कर रखी है।

देश के वृहद प्रान्त का सबसे बड़ा जिला होने के साथ जैसलमेर एक पर्यटक स्थल है द्य इस धोरों की धरती ने अपने कला, शिल्प, ऊँट सवारी के साथ अपनी हस्तशिल्प की ख्याति को ऊनी वस्त्रों के माध्यम से विदेश तक पहचान बनायी है।