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हाड़ौती का खानपान
January 23, 2020 • डॉ मुक्ति पाराशर

वैसे तो हाड़ौती में लगभग समान ही प्रकार के व्यंजन मिलते है। फिर भी क्षेत्रीय विशेषताओं के कारण अलग-अलग जिलों में अलग-अलग चीजें खास हैं। कोटा में उड़द की दाल के मसाले की कचोरी, कोटा के कडके विशेष प्रसिद्ध हैं। दशहरे में गोभी के पकोड़े, अंगूरी पेठा, मोहन खीर। सादी और मसाले की बाटी, बाफले, चूरमा, कत, बेसन के गट्टे, लहसुन की चटनी दाल और कड़ी को भी पसंद किया जाता है। जिसे देसी घी में बनाया जाता है। सर्दियों में तिल और मूंगफली विशेष हैं।

राजस्थान के समध और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ा भाग जो सम्पूरित है अन्न व जल भाग जो सम्पूरित है अन्न व जल से। राजस्थान के दक्षिण पूर्वी भाग में स्थित गोंडवाना लैंड का भाग हाड़ौती कहलाता है। इसमें कोटा बूंदी झालावाड़ वह बारा जिले प्रमख रूप से सम्मिलित हैं। इसमें कोटा जिला कालिदास रचित मेघदूत में वर्णित चर्मण्यवती नदी के तट पर स्थित हैं। इसमें वर्ष भर पानी का स्तर एक सा रहता है जिसके कारण सम्पूर्ण हाड़ौती क्षेत्र हरा भरा रहता है।

खान-पान की दृष्टि से देखा जाए तो यहाँ की सामान्य जनता एवं रियासती भोजन परम्परा एक ही है हालांकि बदलते परिवेश में खाना परोसने का तरीका बदल गया है। फिर भी शादी में एक भोज तो पंगत (नीचे दरी पर बैठकर भोजन) होता ही है। यहाँ कई फसलें बोई जाती हैं, मुख्यतः गेहूं, बाजरा, मक्का और सोयाबीन सबसे अधिक मात्रा में होता है। यहाँ के क्षेत्र के निवासियों का खान-पान पूर्णता उत्तर भारतीय है। जिसमें शाकाहारी भोजन की अधिकता है। ग्रामीण क्षेत्र में तो अधिकांश लोग शाकाहारी हैं यद्यपि नगरीय क्षेत्र में मांसाहार का प्रचलन अधिक है। सामान्य खान-पान में मौसमी सब्जियों के अतिरिक्त आल का प्रयोग अधिक होता है। टमाटर, मटर, फूल गोभी, पत्ता गोभी, सेम पालक, मेथी, टिंडा, भिंडी, बैंगन, बथुआ आदि के साथ अरहर, मसूर, चना, मूंग, उड़द व लोबिया की दाल का भी भोजन मे प्रयोग होता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में दूध की अधिकता के कारण दही, मट्ठा, छाछ आदि का भोजन में प्रयोग अधिक है। रोटियाँ प्रायः गेहूँ के आटे की बनाई जाती हैं। किंतु सर्दी में जवार व मक्के की रोटियाँ पसंद की जाती हैं।

दादौती क्षेत्र में उत्सत त त्यौहारों पर विशेष व्यंजन

दीपावली : कोटा के हिंदू समाज में दीपावली पर्व के अवसर पर घर पर विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं। इनमें प्रमुख हैं बेसन की बर्फी, खोपरा पाक, आटे और गुड़ की मीठी पापड़ी, बेसन की पापड़ी नमकीन, शक्कर की चाशनी चढ़े मीठे खुरमे, मैदे के व मावे की गुंजिया, चावल के लड्डू आदि। किंतु अब यह सब मिठाई घर पर बनाने के बजाय दुकानों से लाई जाती हैं। दिवाली के बाद पापड़ी व मिठाई को एक दूसरे के घर पर और पड़ोस में देने का रिवाज भी यहां पर प्रचलन में है।

मकर संक्रांति : कोटा में हिंदू समाज में तिल्ली और गुड़ के लड्डू या त्तिलपटी बनाई जाती है। यह परम्परा यहाँ पर वर्षों पुरानी है और आज भी प्रचलन में है। इस अवसर पर पतंग भी उड़ाई जाती है। 

होली पर बेसन की बर्फी, मावा एवं मैदा की गुजियाँ, नमकीन व मीठी पापड़ी बनाकर एक दूसरे को खिलाते हैं।

गणगौर पर्व : गणगौर पर रियासत के समय से ही घर की महिलाओं द्वारा आटे और गुड़ के छलेदार गुणे व आटे की मीठी तथा बेसन की नमकीन पापड़ी बनायी जाती हैं। जिनको तेल या घी में तलकर तैयार किया जाता है। ईद पर्व : यह मुस्लिम समाज का सबसे बड़ा त्यौहार है इस अवसर पर घर-घर में दूध में सवैया पकाई जाती हैं। इसमें शक्कर, केवड़ा, मेवा, आदि डाला जाता है। इनको 'शीर खुरमा' कहा जाता है। सेवइयाँ उबालकर भी बनाई जाती हैं। पानी नितारने के पश्चात उस पर उबला दूध, शक्कर, देशी घी, खोपरा, किशमिश, काजू, पिस्ता डालकर परोसा जाता है। फिर मीठा पीला रंग डालकर उबालकर बनाया जाता है। इसमें शक्कर इलायची पाया जाता है।

इन पर्यों के अतिरिक्त राखी, जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी, अनंत चतुर्दशी, ढोल ग्यारस पर्व आदि पर भी इस प्रकार के कई व्यंजन बनाने की परंपरा हाडौती में रही है।

वैसे तो हाड़ौती में लगभग समान ही प्रकार के व्यंजन मिलते हैं। फिर भी क्षेत्रीय विशेषताओं के कारण अलग-अलग जिलों में अलग-अलग चीजें खास है। कोटा में उड़द की दाल के मसाले की कचोरी, कोटा के कड़के विशेष प्रसिद्ध हैं। दशहरे में गोभी के पकोड़े, अंगूरी पेठा, मोहन खीर। सादी और मसाले की बाटी, बाफले, चूरमा, कत, बेसन के गट्टे, लहसुन की चटनी दाल और कड़ी को भी पसंद किया जाता है। जिसे देसी घी में बनाया जाता है। सर्दियों में तिल और मूंगफली विशेष हैं। झालावाड़ जिले की झालरापाटन की फीणी, गुलकंद तथा सवाई माधोपुर के स्टेशन पर मूंग की दाल व चवले की दाल की पकौड़ी और बांरा में तिल की मावा बाटी बहुत अधिक प्रसिद्ध है।

यहाँ घरों में बनाई जाने वाली मिठाइयों और व्यंजनों में बेसन की बर्फी, मूंग की बर्फी, खोए की बर्फी, मालपुए, बेसन और सूजी मैदा के हलवे इत्यादि नमकीन व्यंजनों में बेसन की पकौड़ी, मूंग की दाल की पकौड़ी नमकीन मठरी व पपड़ी आदि आते हैं यह सभी व्यंजन व मिठाइयां परंपरागत रूप से यहां बनाई जाती हैं। हलवाई की दुकान पर भी विभिन्न प्रकार की मिठाइयां अधिक प्रचलित हैं जैसे मोतीचूर के लड्डू, बेसन के लड्डू, बेसन में मूंग की बर्फी, गुलाब जामुन, मावे की बर्फी, कलाकंद, रबड़ी, जलेबी, इमरती, बालूशाही, खोपरा पाक, मोती पाक, रसगुल्ले, मूंग की दाल का हलवा, गाजर का हलवा रियासती युग से ही कोटा में बनते आ रहे हैं और आज भी बनाए जाते हैं। किंतु अब नए युग में इनका कुछ स्वरूप बदल गया है रियासत कालीन समय में नमकीन में मोटे बारिक सेव, पपड़ी, तली मूंगफली मिर्च वाली, नमकीन खुरमा आदि बेची जाती हैं। यहाँ पर बच्चों का सुबह का नाश्ता प्रायः कचोरी समोसे व जलेबी ही प्रिय है।

यहाँ पर विवाह उत्सव में कच्ची और पक्की रसोई की भी परंपरा है, कच्ची रसोई के अन्तर्गत दाल बाटी चूरमा भी बनाया जाता है और उसके साथ चावल का पुलाव उड़द की दाल बेसन के लड्डू, लहसुन की चटनी काफी लोकप्रिय हैं। पक्की रसोई के अन्तर्गत सब्जी पूरी के साथ मोतीचूर के लड्डू, बेसन की बर्फी, जलेबी, इमरती, खोपरा पाक, बालू शाही, गुलाब जामुन आदि की परम्परा बहुत पुरानी है। अमीर वर्ग के लोग पूड़ी सब्जी के साथ मिठाईयाँ बनवाते हैं। सब्जी में कद्दू की सब्जी, आलू, टमाटर, मटर की सब्जी, बैंगन आदि और आर्थिक रूप से कमजोर लोग सब्जी के साथ मीठा दलिया (लापसी) कासिरा, पूड़ी के साथ छाछ की कड़ीया खाटा बनवाते हैं। जुलाहा समाज में पूड़ी के साथ खाटा काफी लोकप्रिय है। मुस्लिम समाज में खाटा के साथ पूड़ी काफी प्रचलन में है। इसके अलावा मीट मांडे चावल की दुरलकती का भी यहाँ पर खूब चलन है।

इस प्रकार हाड़ौती में विभिन्न जिले आने के बावजूद भी यहाँ के खान-पान में ज्यादा अंतर दिखाई नहीं देता।