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डेहरी-लंघन
October 18, 2019 • रजनी शर्मा बस्तरिया

धूप डेहरी से पसरते घर के भीतर दालान तक जा पहुँची। अभी कहाँ रूकने वाली? वह तो तुलसी के चोरे तक जा पहुँची। सफेद उजलारंग, माँ दुर्गा सी तिर्यक आँखे, परशुराम के धनुष सी वक्राकार भँवें, मंझोला कद, फक सफेद साड़ी। यही वेशभूषा थी दुबईन काकी की। “बाल विधवा'' काकी जाने सधवा होती तो उनके रूप की लुनाई किसी होती ?

सूरज ने सबेरे की ओर अपना पहला कदम जैसे ही बढ़ाया, हजारों नन्ही रश्मियों ने “दुबईन काकी" की डेहरी पर अपने आगमन का छींटा डाल दिया। धूप डेहरी से पसरते घर के भीतर दालान तक जा पहुँची। अभी कहाँ रूकने वाली? वह तो तुलसी के चोरे तक जा पहुँचीसफेद उजला रंग, माँ दुर्गा सी तिर्यक आँखे, परशुराम के धनुष सी वक्राकार भँवें, मंझोला कद, फक सफेद साड़ी। यही वेशभूषा थी दुबईन काकी की। "बाल विधवा" काकी जाने सधवा होती तो उनके रूप की लुनाई कैसी होती?

दो मंजिला हवेली, जिसमें आंगन में चम्पा का पेड़, उसके चारों ओर का चबूतरा, रात की रानी, दरवाजे के दोनों किनारे में झूमती ओर आने वालों का सत्कार करती। पूरी हवेली में मात्र दुबाईन काकी ओर उसकी दस बिल्लयों का साम्राज्य हुआ करता था। बाल विधवा वह भी निःसंतान । काकी के पति भी अपने चार चाचाओं व पिता के बीच इकलोते संतान थे जो असमय ही कालकलवित हो गयेनो वर्ष की आयु में गौना व ग्यारह वर्ष में वैधव्य। इन सबने “काकी की मृत्वत्सा होने की वसीयत पर मानो दस्तखत कर दिये थे।"

काकी की गठीले रूप में सात्विकता, सौम्यता, गरिमा का सुवास झरता था। काले बालों का इतना कस कर जूड़ा बनाती कि अगर हफ्ते भर कंघी न की जाये तो भी कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। बड़ी सी हवेली में सुबह चार बजे ही घंटी की आवाज व अगरबत्ती की खुशबु से पूरा मोहल्ला जागता था। ब्राम्हणी काकी ने न जाने कितने कुंवारियों को भोज कराया। सधवाओं को न्योता दिया। बच्चों को रेवड़ी बाँटी। मंदिरों में पानी से भरे कलशपर भीतर का सूनापन बाँटने वाला कोई नही था। अपनी इस दशा को नियती का आदेश मान चार गाँव की मालकिन अपने गोंटनिन होने का दायित्व अपने सुकर्मों का साथ बखुबी निभाये जा रही थी।

सुबह उठकर मंदिर दर्शन फिर गीले कपड़े में ही भोजन बनाना, चंपा का ताजे फूलों के साथ ठाकुर का भोग लगाती, फिर बारी आती गाय, कुत्ते, कौंआ की। अंत में दूध का भगोना लिये बिल्लयों की सेवा में जुट जाती। जाने कैसे-कैसे अंदेशे, उलाहनों, भय से उन्होंने पार पाया होगा। कितने दंश "न कोई नाम लेने वाला न कोई खाने वाला।" सुन-सुनकर उन्होंने इन सब पर ध्यान देना बंद कर दिया था।

आज काकी का माथा ठनका हुआ था। हवेली के सामने की नाली बजबजा रही थी। दुर्गंध ऐसी थी धुप, अगरबत्ती का सुवास भी हथियार डाल चुका था। आसपास डेहरी के भीतर से ही दूर तक नजर घुमाई तो देखा एक भीमकाय व्यक्ति सड़क के किनारे सफाई का कार्य कर रहा था। पुकारने वाली आवाज को एक बारगी काकी ने मुँह के भीतर ही दबा लिया। बरसों से आवाज सुन पलटने की ही नियति ने तय कर दिया था। उसकी आवाज पर कोई पलटेगा? असंभव। पर ब्राम्हणी, विदूषी, धार्मिक ज्ञान में सिद्धहस्त काकी ने एक बार बजबजाती नाली को देखा फिर अपने घर के सामने स्थित मंदिर को। मन ही मन बुदबुदाने लगी सफाई नहीं हुई तो 'ठाकुरजी' क्या सोचेगें? चंपा के सुवास जो उनके घर से मंदिर तक पुरवाई बिना किराया लिये, बिना नागा रोज पहुँचा आती थी क्या अब इस बदबूदार झोंको से ठाकुर का मंदिर गमकेगा। नहीं... कदापि नहीं...। कुछ तो करना ही पड़ेगा। परलोक तक बात जायेगी। सुनो.... एक बार, फिर दूसरी बार। अचानक वह व्यक्ति पलटा क्या है माँजी? भैया ये नाली जरा साफ कर देना। पैसे लगेंगे। हाँ ... काकी के कदम अभी भी डेहरी की भीतर ही थे। नाली होते ही दोने में बताशा और स्टील के गिलास में चाय और गुड़ की ढेली, डेहरी पार किये बिना ही, डेहरी से बाहर रख दिया।

घनी मूंछे, राक्षस काया, लाल आँखें, शरीर से शराब की दुर्गंध युक्त उस मानुष ने गुड़ की ढ़ेली को साथ पानी पिया। पैसा दो। हाँ ये लो। काकी ने सिक्का उसकी हथेली पर उछाल दिये। यह अब हर हफ्ते का क्रम बन चुका था। काकी की डेहरी साफ सुथरी, पवित्र सी लगने लगी थी। पर अपवित्रता तो उस मलेच्छ के भीतर हिलारे मार रही थी। अकेली सुकुमार, धनाढ्य महिला जिसके आगे पीछे कोई नहीं, ऊपर से ब्राम्हणी वो भी बाल विधवा। मलेच्छ को कपाल में षडयंत्र का कीड़ा जनमने लगा। 

अब नित नई फरमाईश आज चाय दे दो, आज चना दे दो, आज पैसा ज्यादा दे दो...। काकी विधाता द्वारा प्रदत्त कुशाग्र मति की स्वामिनी तो थी ही। उसने दहाड़ते हुए कहा क्यों हूँ ज्यादा पैसा? नाली की क्या लंबाई बढ़ गई है। जो पैसे ज्यादा लेगे। अब काकी के नथुनो से शराब का भभका टकराया। पाँच रुपये तो देना ही पड़ेगा। बिल्कुल नहीं..... नहीं दूंगीमलेच्छ ने लाल आँखों के काकी को ततेरा। दाल न गलते देख उसने आखिरी दाँव फेंका। पैसे नहीं दोगी तो डेहरी के भीतर आ जाऊँगा। इतना सुनना था कि काकी सन्न। मानव मन-मलेच्छ का इतना शातिर। यह डेहरी के भीतर आया ओर मुझे स्पर्श किया तो क्या होगा? सातों पुरखे अपवित्र, ठाकुर अपवित्र, कुल गोत्र सब गये रसातल में। मलेच्छ जान चुका था कि पैसे ऐंठने का इससे शानदार तरीका कोई दूसरा नहीं हो सकता। अपवित्रता का भय उस ब्राम्हणी का आजीवन मेरा दास बना ही देगी।

मलेच्छ का पैर काकी को कालिया सर्प लगा ओर उसकी नीयत जहर। हृदय की धड़कन तेज हो गई, आँखों की पुतलियाँ फैल गई, शरीर पसीने से तरबतर। मलेच्छ ने जैसे ही डेहरी के भीतर एक पग धरा काकी को अपना सर्वनाश नजर आया। मदद के लिये पुकारती तो भी किसे। अगर मलेच्छ ने उसे छू लिया तो? काकी को स्पर्श करना मलेच्छ का ध्येय नहीं था। वह तो उसके डर की आड़ में उससे आजीवन पैसे ऐंठने के फिराक में था। जैसे ही वह डेहरी के भीतर लड़खड़ाता आया। ठाकुर के मंदिर की घंटी, आरती के बजते शंखनाद ने जाने काकी के कानों में कुछ प्राण मंत्र सा फूंक दिया। बाल विधवा, ब्राम्हणी जिसे अपने स्वर्गीय पति का स्पर्श तक याद नही थाअब रणचंडी बन चुकी थी। उन बढ़ते हाथों को अपनी सुकुमार कलाइयों से रोका ओर धकक्लते डेहरी के बाहर जा पटका। धुत्त मलेच्छ नाली में ही समाधिस्थ हो चुका था। अगले ही दिन काकी गंगा दर्शन हेतु प्रस्थान कर चुकी थी। डेहरी को लांघ कर, अपने भय की डेहरी से परे...। डेहरीलंघन.... आखिर उन्होंने कर लिया।