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ब्रज के विरक्त संतः पद्मश्री रमेश बाबा
October 18, 2019 • संजु कुमार शर्मा

यमुना मुक्तिकरण हेतु भी बाबा के निदेर्शानुसार 'मान मन्दिर सेवा संस्थान' के नेतृत्व में यमुना मुक्ति आन्दोलन चलाया तथा इसके लिए दो बार दिल्ली तक पद यात्राएं भी की। बाबा की प्रेरणा से ही आज देश के 32 हजार गांवों में हरिनामसंकीर्तन' चल रहा है।

'बाह्मणाः श्रुतिशब्दाश्च

देवानां व्यक्तभूर्तयः।

सम्पूज्या ब्रह्मणा येतास्तेन

संतः प्रचक्षते।'

(मत्स्य पुराण)

ब्राह्मण ग्रन्थ एवं वेदों के शब्द, ये देवताओं की निर्देशिका मूर्तियां है। जिनके अन्तःकरण में इनका एवं ब्रह्म का संयोग बनता है, वह संत है।

भारतीय संस्कृति के जनमानस में संतों के प्रति अपार श्रद्धा एवं आस्था का भाव विद्यमान है। सच्चा संत अपनी सेवा भावना एवं इन्द्रिय संयम से विद्यमान तमस को समाप्त कर संसार को प्रकाशवान करता है। संसार में भूले भटके एवं अज्ञानी जीवों के कल्याण एवं उनके जीवन को सार्थक बनाने हेतु प्रभु की शरण में ले जाता है। गुणातीत महापुरुष संतों का जीवन समस्त मानव जाति के लिए अनुकरणीय होता है। अध्यात्मक ही नहीं वरन् समस्त मानव जाति के कल्याण हेतु इनका जीवन समर्पित होता है।

ऐसे ही एक संत है-रमेश बाबा, जो श्री राधाकृष्ण की क्रीड़ा स्थली ब्रजमण्डल के स्नेह से अभिभूत थे। अपने तन एवं मन के कष्टों से अविचलित बाबा ब्रज वसुन्धरा में नित्य निवास का सौभाग्य कैसे प्राप्त हो बस इसी उपाय में थे। ब्रजभूमि से अत्यधिक स्नेह व लगाव होने के कारण एक दिन वे अपनी विधवा माँ को भगवद् भरोसे छोड़ ब्रजधाम आ गए।

1938 ई. में तीर्थराज प्रयाग में विख्यात ज्योतिषाचार्य बलदेव प्रसाद शुक्ल के घर इनका जन्म हुआ। इनकी माता का नाम हेमेश्वरी देवी था। इस दम्पति ने पुत्र प्राप्ति की इच्छा से रामेश्वरम् में 'पुत्र कामेष्टि' यज्ञ किया। शिव कृपा से सन् 1938 में पौष मास की कृष्ण पक्ष की सप्तमी को बाबा का जन्म हुआ। इनका ललाट देखते ही ज्योतिषाचार्य पिता ने इनके ब्रह्मचर्य की घोषणा कर दी। प्रयाग में शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात् बाबा की आध्यात्मिक ज्योति ब्रज आने के लिए इन्हें प्रेरित करती रही किन्तु मां का स्नेह उन्हें रोकता रहा। दो बार असफल होने के बाद तीसरी बार प्रत्येक बंधन को तोड़कर बाबा ब्रजधाम आने में सफल रहे। यहां आकर आप संत प्रियाशरण जी के शिष्य बने। यहां बाबा मान मन्दिर (बरसाना) में भजनसंकीर्तन करते एंव लाड़लीजी मन्दिर की आरती में हिस्सा लेते। उस समय बरसाना के ब्रह्मांचल पर्वत पर स्थित मानगढ़ पर डाकूओं का कब्जा था। जिससे लोगों में भय व्याप्त रहता। इस वजह से श्रीकृष्ण के ये स्थल जनमानस से दूर थे। बाबा के आगमन से वहां धार्मिक गतिविधियां बढ़ी एवं लोगों का आवागमन भी बढ़ा इससे वहां की निर्जनता कम हुई एवं डाकूओं को यह स्थल छोड़कर जाना पड़ा। बाबा की वजह से ब्रज के अनगिनत दुर्लभ एवं लुप्त प्रायः धर्म स्थलियां प्रकाश में आई।

उसी समय बरसाना का गहवर वन भी नष्ट होने के कगार पर था। वन को अवैध कब्जों से बचाने के लिए उन्होंने बहुत संघर्ष किया तथा इस स्थल को संरक्षित करवाया। इसके पश्चात् ब्रज स्थित प्राचीन धर्म स्थलों के जीर्णोद्धार का क्रम भी शुरू हुआबाबा के प्रयासों से ही रत्न कुण्ड (नन्दगांव), लालकुण्ड (दुदावली), बिछुवाकुण्ड (बिछोर), गयाकुण्ड (कामवन), गोपालकुण्ड (डीग), ललिता कुण्ड (कमई), गोमती गंगा (कोसी), नयन सरोवर (सेऊ), रूद्र कुण्ड एवं बिछुआ कुण्ड (जातीपुरा), धमारीकुण्ड, लोहाखारी कुण्ड एवं मेंहदला कुण्ड (हताना) का जीर्णोद्धार हुआ। बाबा ने ब्रज क्षेत्र में होने वाले खनन को रोकने के लिए बहुत प्रयास किए। ब्रज क्षेत्र के धार्मिक महत्व के पर्वतों पर होने वाले खनन से इन पर्वतों का रूप विकृत हो चला था तथा श्रीकृष्ण की लीला स्थलियों के चिह्न भी असुरक्षित हो चले थे। इस कार्य को देख बाबा बहुत ही विचलित हो गए तथा इन्हें बचाने हेतु आगे आए। बाबा ने इन पर्वतों को एवं कृष्ण कालीन स्थलियों को बचाने हेतु एक लम्बी लड़ाई लड़ी। उनकी यह लड़ाई धार्मिक स्थलों के साथ-साथ प्रकृति की रक्षा की भी थी। बाबा के प्रयासों से ही अंत में 5253 हेक्टेयर भू-भाग को आरक्षित घोषित किया गया।

यमुना मुक्तिकरण हेतु भी बाबा के निदेर्शानुसार मान मन्दिर सेवा संस्थान के नेतृत्व में यमुना मुक्ति आन्दोलन चलाया तथा इसके लिए दो बार दिल्ली तक पद यात्राएं भी की। बाबा की प्रेरणा से ही आज देश के 32 हजार गांवों में 'हरिनाम- संकीर्तन' चल रहा है।

ब्रज में भगवान श्रीकृष्ण की प्रिय गायों की दुर्दशा को देखकर बाबा का मन बहुत ही दुःखी था। अतः उन्होंने गायों की दशा सुधारने हेतु बरसाना (उ.प्र.) के गहवर वन में सन् 2007 में 'माताजी गौशाला' का निर्माण करवाया। दो गायों से प्रारम्भ इस गौशाला में वर्तमान में 55000 से अधिक गायें हैं। यह भारतवर्ष ही नहीं अपितु विश्व की एकमात्र ऐसी गौशाला है जहां एक साथ एक ही स्थान पर 55 हजार से अधिक देशी नस्ल का गौवंश मातृत्व पालित पोषित हो रहा है। देश में जो अन्य गौशालायें पोषित की जा रही है, उनके संचालन हेतु किसी न किसी संस्थान द्वारा अथवा चुने हुए धनाढ्य लोगों द्वारा धन अर्जित करवाया जाता है, किन्तु 'माताजी गौशाला' के संचालन हेतु किसी संस्था अथवा व्यक्ति से दान की मांग नहीं की जाती। इसके पश्चात् भी इस गौशाला का संचालन अनवरत सुचारू रूप से हो रहा है। बाबा द्वारा प्रारम्भ 'हरिनाम संकीर्तन' के द्वारा गौशाला के संचालन में मदद मिलती है। 'माताजी-गौशाला' में गोबर गैस प्लांट है, जहां गैस से बिजली बनाई जाती है। इस बिजली का उपयोग गौशाला की लाईट एवं एक हजार लोगों की प्रसादी बनाने मे किया जाता है। गैस प्लान्ट से 1350 घनमीटर बिजली तैयार की जाती है। जिसे 125 किलोवाट के 2 जनरेटरों द्वारा सप्लाई किया जाता है। गैस बनने के बाद बचे गोबर से जैविक एवं कम्पोस्ट खाद बनाई जाती है तथा यह खाद गुजरात, मुम्बई सहित उद्यान विभाग को सप्लाई की जाती है। इसके अतिरिक्त गौशाला में गोबर द्वारा कई तरह के पौधे लगाने के लिए गमले भी तैयार किए जाते है।

बाबा द्वारा गौवंश के अतिरिक्त अन्य पशुओं के लिए भी एक अस्पताल का निर्माण कार्य शुरू किया गया है। जिसमें श्री महावीर प्रसाद अग्रवाल, विख्यात उद्योगपति, श्याम स्टील ग्रुप, कोलकत्ता के आर्थिक सहयोग से 10 एकड़ भूमि पर आधुनिक चिकित्सालय एवं विशाल अनुसंधान केन्द्र का निर्माण किया जा रहा है। जिसमें एक साथ 2000 पशुओं की चिकित्सा व्यवस्था उपलब्ध रहेगी। दुर्घटना ग्रसत गोवंश हेतु एम्बूलेंस भी उपलब्ध रहेगी। इसी वर्ष गणतन्त्र दिवस की पूर्व संध्या पर भारत सरकार द्वारा संत रमेश बाबा को 'पद्मश्री' सम्मान देने की घोषणा की गई। बाबा को यह सम्मान सामाजिक कार्य एवं पशुकल्याण हेतु भारत के राष्ट्रपति द्वारा 11 मार्च 2019 को प्रदान किया गया 'पद्मश्री' प्राप्त करने के पश्चात् संत रमेश बाबा ने कहा कि “यह सम्मान यमुना एवं गौसेवा के लिए लोगों के जनजागृति का काम करेगा।"

संत रमेश बाबा ने ब्रज के पौराणिक स्वरूप को बचाने हेतु खनन माफियाओं से एक लम्बी लड़ाई लड़ी एवं सफलता भी प्राप्त की। ब्रज संत परम्परा में संत रमेश बाबा के अतिरिक्त शायद ही कोई दूसरा होगा जिसने राधा-माधव की भक्ति करते हुए ब्रज के पौराणिक स्थलों एवं पर्यावरण की रक्षा हेतु एक आन्दोलन की शुरूआत की। ब्रज रसिकों की ओर से बाबा को 'ब्रज के विरक्त संत' की उपाधि दी गई तथा इन्हें 'पर्यावरण-परोधा संत' भी कहा जाता है। हाल ही में बाबा का स्वास्थ अत्यन्त नाजुक बना हुआ है। ईश्वर से प्रार्थना है कि इन गुणातीत, परोपकारी, दयालु एवं ब्रजप्रेमी श्री राधा-माधव भक्त महान संत को उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करें।