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भक्ति एवं शक्ति का संगम महाशिव रात्रि
March 11, 2020 • सुषमा सागर मिश्रा

वैज्ञानिको के अनुसार शिवलिंग एक ऊर्जा पिण्ड है जो गोल, लम्बा वृत्ताकार एवं गोलाकार पटल पर शिव मन्दिरों में स्थापित होता है। यह ब्रह्माण्ड में व्याप्त रेडियों-एक्टिव शक्तियों को अवशेषित करता रहता है। रुद्राभिषेक, जलाभिषेक, भस्म आरती, भांग धतूरा, बेलपत्र एवं आकपत्र आदि के अपण के माध्यम से उस शक्तिशाली ऊर्जा को स्वयं में समाहित करता है, जिससे उसमें अच्छे एवं शुद्ध विचारों का उद्गम होता है साथ ही शरीरिक एवं मानसिक रोगों से जनित व्याधियों का निवारण हो जाता है।

भारतीय संस्कृति विभिन्न सामाजिक एवं धार्मिक त्योहारों से परिपूर्ण है। वर्ष के 365 दिनों में कोई न कोई त्यौहार अथवा उत्सव निहित रहता है। जिसमें विभिन्न कारण और जीवन के उद्देश्य जुड़े होते हैं। इन्हें विविध ऐतिहासिक घटनाओं, विजयश्री तथा जीवन की कुछ अवस्थाओं जैसे फसल की बुआई, रोपाई एवं कटाई आदि से जोड़ा गया है। इन्हीं उत्सवों की खूबसूरत श्रृंखला की एक कड़ी है "महाशिवरात्रि।

प्रत्येक माह की आमावस्या से पूर्व के दिन को 'शिवरात्रि' के नाम से जाना जाता है अर्थात् पूरे वर्ष में 12 शिवरात्रि में से फाल्गुन महा (फरवरी, मार्च) में पड़ने वाली शिवरात्रि को 'महाशिरात्रि' के नाम से जाना जाता है। यह शिवरात्रि धार्मिक, वैज्ञानिक एवं अध्यात्मिक रूप से अत्यन्त महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस रात्रि पृथ्वी का उत्तरी गोलार्ध इस प्रकार अवस्थित होता है कि मनुष्य की आन्तरिक ऊर्जा प्राकृतिक रूप से ऊपर की ओर प्रवाहित होती है जो कि उसे अध्यात्मिक शिखर तक ले जाने में मदद करती है। इसी स्वर्णिम अवसर का उपयोग करने हेतु महाशिवरात्रि के उत्सव को बहुत ही हर्षोल्लास एवं भक्ति के साथ दिन-रात मनाते हैं।

शिवरात्रि एक बोधोत्सव है, यह ऐसा महोत्सव है जिसमें स्वयं के शिवांश होने का बोध होता है। ऐसा महसूस होता है कि सम्पूर्ण जगत के प्राणिमात्र शिवजी के संरक्षण में हैं। ऐसी मान्यता है कि महाशिवरात्रि की आधी रात्रि में भगवान शिव के निराकार रूप का (ब्रह्म से रुद्ररूप में) अवतरण हुआ था। इसी दिन अर्थात फाल्गुन माह की कृष्ण चतुर्दशी की रात आदि-देव भगवान श्री शिव करोड़ों सूर्यों के समान आभामण्डल से युक्त लिंगरूप में प्रकट हुए थे। देवों के देव महादेव की यह विशेषता है कि केवल वे ही इस संसार में निराकार और साकार दोनों रूपों में पूज्यनीय हैं। पूरे देश में कुल 12 ज्योर्तिलिंग स्थापित हैं जो स्वयं में अत्यन्त पूज्यनीय और माननीय हैं एवं प्रत्येक ज्योर्तिलिंग के साथ उनकी विशेषताएं जुड़ी हुई हैं।

उनकी विशेषताएं जुड़ी हुई हैं। वैज्ञानिको के अनुसार शिवलिंग एक ऊर्जा पिण्ड है जो गोल, लम्बा वृत्ताकार एवं गोलाकार पटल पर शिवमन्दिरों में स्थापित होता है। यह ब्रह्माण्ड में व्याप्त रेडियों- एक्टिव शक्तियों को अवशेषित करता रहता है। रुद्राभिषेक, जलाभिषेक, भस्म आरती, भांग धतूरा, बेलपत्र एवं आकपत्र आदि के अर्पण के माध्यम से उस शक्तिशाली ऊर्जा को स्वयं में समाहित करता है, जिससे उसमें अच्छे एवं शुद्ध विचारों का उद्गम होता है साथ ही शारीरिक एवं मानसिक रोगों से जनित व्याधियों का निवारण हो जाता है। शिवरात्रि सम्पन्न होने के पश्चात् सूर्य उत्तरायन में अग्रसर हो जाता है और ग्रीष्म ऋतु के आगमन की आहट सुनाई देने लगती है।

शिव जी को देवों के देव महादेव के रूप में साकार और निराकार दोनों ही रूपों से मानव जीवन को स्वाभाविक एवं सरल जीवन जीने की प्रेरणा मिलती है। शिव के शाब्दिक अर्थ के अनुसार “जो नहीं है" की धारणा ही सत्य एवं सुन्दर है अर्थात् संसार में किसी का कुछ भी नहीं है, सब शून्य है। हमारी सृष्टि शून्य से ही जन्मी है और शून्य में समाप्त हो जाना ही जीवन है। शिव जी का यह निराकार रूप प्राणियों को सन्देश देता है कि भोगविलास से दूर रहकर सादा जीवन व्यतीत करना और एक फकीर की भाँति जीवन जीने की प्रेरणा देता है।

ऐसी मान्यता है कि शिवजी का निवास कैलाश पर्वत पर है अतः उन्हें 'कैलाशपति' के नाम से भी जाना जाता है, अपने इस रूप में उनका सन्देश है कि विकट स्थिति में भी सदैव पहाड़ की भाँति मजबूती से खड़े रहो, इसीलिये शिवजी को लोक गाथाओं में इस अलौकिक संसार का गुरू माना जाता है।

शिवजी का 'नीलकण्ठ' रूप मानव जाति को सन्देश देता है कि समाज में अच्छाई के सर्वधन हेतु यदि विष भी धारण करना पड़े तो उसे भी सहर्ष स्वीकार करना चाहिये एवं बलिदान हेतु सदैव तत्पर रहना चाहिये। ऐसी मान्यता है कि संसार के कल्याण हेतु समुद्र मन्थन से प्राप्त हुए अमृत को देवताओं के लिये छोड़ दिया और विष को स्वयं धारण कर लिया चूँकि विष को उन्होंने गले के नीचे उतरने न दिया था फलस्वरूप उनका गला विष के प्रभाव से नीला पड़ गया था इसी कारण उनका नाम नीलकण्ठ पड़ा।

शिवजी सभी विषैली प्रजातियों के स्वामी माने जाते हैं वे साँप, बिच्छू छिपकली आदि को अपने निकट स्थान देते हैं, साँप को तो वे अपने गले में धारण कर यह सन्देश समाज को देते हैं कि सभी प्राणियों से प्रेम करो और मिलजुल कर जीवन यापन करें, घृणा एवं नफरत को अपने से दूर रखें। शिवजी के पूजन में प्रयुक्त पूजन वनस्पतियाँ भी अधिकतर विषैली ही होती हैं जिनके परिप्रेक्ष्य में भी यही सन्देश होता है।

शिवजी का एक नाम भोला ‘भण्डारी' भी है अर्थात् सीधे और सरल। इनका यह रूप भी समाज को सन्देश प्रेषित करता है कि मानव को स्वभाव से भोला ही रहना चाहिये। बनावटी जीवन जीने वाले कष्ट पाते हैं जबकि सादा और स्वाभाविक जीवन जीने वाले सदैव प्रसन्न रहते हैं एवं कष्टों से दूर रहते हैं एवं दूसरों के लिए दया भाव रखने वाले होते हैं। जिससे वे सभी के प्रिय बने रहते हैं।

शिवजी का 'रुद्रावतार' रूप समाज को यह सन्देश देता है कि सरल व सहज होने के साथ-साथ समाज में जब-जब धर्म हानि हो, पाप की वृद्धि होने लगे एवं निर्बलों पर जुल्म एवं अन्याय बढ़ने लगे तो अपने कर्तव्यों से बिना विमुख हुए इनके विरोध में खड़े होने के लिये सदैव तत्पर रहना चाहिये।

शिवजी का 'अर्धनारीश्वर' रूप समाज को यह सन्देश देता है कि सम्पूर्ण सृष्टि नर और नारी दोनों के संयोग से ही बनी है, एक के बिना दूसरा अपूर्ण है एवं अस्तित्वहीन है अतः दोनों ही सम्मान योग्य एवं सृष्टि के परिचालन में महत्व पूर्ण हैं। जहाँ पुरुष शिवरूप है वहीं स्त्री शक्ति रूपा होती है।

ऐसा माना जाता है कि सृष्टि के समापन का दायित्व भगवान शिव ही वहन करते है, यही कारण है कि इन्हें 'कालेश्वर' के नाम से भी जाना जाता है, इनका इस रूप में अवतरण शिवरात्रि की रात्रि में ही हुआ था। शिवजी अनादि, अनन्त एवं सृष्टि प्रक्रिया के आदि स्त्रोत माने जाते हैं। यूँ तो शिव का तात्पर्य कल्याणकारी होता है मगर ये हमेशा लय और प्रलय दोनों को अपने अधीन रखते हैं, जब तक समाज की धारा लय में रहती है शिवजी 'आशुतोष' रूप में रहते है और लय के बाधित होते ही 'रौद्र रूप धारण कर प्रलय को उत्पन्न करने में विलम्ब नहीं करते हैं। सभी को समभाव से देखने के कारण ही इन्हें महादेव भी कहते हैं।

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि शिव के अनेकों रूप हैं और अपने हर रूप के माध्यम से समाज को एक नवीन सन्देश देते हैं जिसमें कोई न कोई शिक्षा एवं ज्ञान निहित होता हैमहा-शिवरात्रि के पावन अवसर पर व्रत रखकर शिवजी के निराकार एवं साकार दोनों रूपों की उपासना करते हैं। व्रत रखने से तन और मन दोनों का शुद्धीकरण होता है, रक्त शुद्ध हो जाता है, पाचन तंत्र एवं उत्सर्जन तन्त्र दोनों ही अशुद्धियों से मुक्त हो जाते हो जाते है। उपवास से शरीर में कैलेस्ट्रोल की मात्रा भी कम हो जाती है एवं स्मरण शक्ति में वृद्धि होती है शिवलिंग पर चढ़ाया गया जल औषधिय गुणों से युक्त होता है। पूजन में अर्पित किया गया बेलपत्र, आक, धतूरा आदि सभी पदार्थ शिवलिंग की रेडियो एक्टिव ऊर्जा को स्वयं में अवशोषित करने की क्षमता रखते हैं।

महाशिवरात्रि के पवित्र अवसर पर हम सभी यह प्रतीज्ञा ले करें कि शिवरात्रि को मात्र एक त्योहार अथवा व्रत रखने के नजरिये से न देखकर उनकी सभी रूपों के सन्देशों एवं शिक्षाओं से प्रेरणा ले। आधुनिक युग में होने वाले मानवीय मूल्यों के पास के कारण जो सामाजिक पतन हो रहा है उसमें शिव के दर्शन को अपनाएँ जिससे समाज की दिशा और दशा दोनों में सुधार हो सके और सम्पूर्ण समाज लयबद्ध होकर शिवमय हो सके। शिव ही सत्य है और सत्य ही सुन्दर है