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भारतीय संत-परम्परा का प्रवर्तन व विकास
October 18, 2019 • डॉ. हरिकृष्ण अग्रहरि

पन्द्रहवीं शताब्दी में महात्मा कबीर का आविर्भाव हुआ, जिन्होंने अपनी प्रखर प्रतिभा, सुहद व्यक्तित्व और प्रौढ़ चिन्तन एवं कवि-सुलभ सुहृदयता एवं मार्मिक व्यंजना-शैली के बल पर संत-मत और संत-काव्य का प्रचार शीघ्र ही सारे उत्तरी भारत में कर दिया। नामदेव के व्यक्तित्व में मेमलता अधिक होने के कारण वे अपने विरोधियों से संघर्ष और वाक युद्ध में प्रवृत्त नहीं हुए, किन्तु कबीर ने काशी के पंडितों और दूसरे विद्धानों को शास्त्रार्थ के लिए ललकारा और अपनी युक्तियों से उनका मुँह सदा के लिए बन्द कर दिया। इस तरह संत-मत के मार्ग से बीच के कंकड़-पत्थरों, झाड़ियों एवं काँटों को दूर करके उसे साफसुथरा व प्रशस्त बनाने का कार्य कबीर के द्वारा हुआ। उनके पश्चात् तो संत-मत नये-नये पंथ का रूप धारण करके निबधि रूप से आगे बढ़ता रहा।

भारतीय संत-परम्परा का इतिहास काफी प्राचीन है। सामान्यतः इस परम्परा के प्रवर्तन-का श्रेय कबीर को दिया जाता है, किन्तु उनसे पूर्व भी अनेक संत हो चुके थे, जिन्होंने हिन्दी में रचना की। इनमें नामदेव का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इनका जन्म सम्वत् 1326 (सन् 1260) कार्तिक शुक्ला दशमी रविवार को महाराष्ट्र में हुआ था। इन्होंने 80 वर्ष के दीर्घ जीवन-काल में अनेक लम्बी यात्राएँ करके उत्तरी-भारत का भ्रमण किया और अपने सिद्धान्तों का प्रचार किया, जिसके स्मारक अब भी राजस्थान और पंजाब के अनेक स्थानों पर उपलब्ध हैं। कबीर, रैदास, रज्जद, दादू आदि संतो ने भी नामदेव का नाम का बड़ी श्रद्धा से लेते हुए उनकी गणना उच्च कोटि के संतों के रूप में की है। नामदेव की हिन्दी में रचित पदावली बड़ी संख्या में मिलती है। इन सभी तथ्यों से स्पष्ट है हिन्दी सन्त-काव्य परम्परा के प्रवर्तन का श्रेय कबीर की अपेक्षा नामदेव को अधिक है।

पन्द्रहवीं शताब्दी में महात्मा कबीर का आविर्भाव हुआ, जिन्होंने अपनी प्रखर प्रतिभा, सुदृढ़ व्यक्तित्व और प्रौढ़ चिन्तन एवं कवि-सुलभ सुहृदयता एवं मार्मिक व्यंजना-शैली के बल पर संत-मत और संत-काव्य का प्रचार शीघ्र ही सारे उत्तरी भारत में कर दिया। नामदेव के व्यक्तित्त्व में मेमलता अधिक होने के कारण वे अपने विरोधियों से संघर्ष और वाक युद्ध में प्रवृत्त नहीं हुए, किन्तु कबीर ने काशी के पंडितों और दूसरे विद्धानों को शास्त्रार्थ के लिए ललकारा और अपनी युक्तियों से उनका मुँह सदा के लिए बन्द कर दिया। इस तरह संतमत के मार्ग से बीच के कंकड़-पत्थरों, झाड़ियों एवं काँटों को दूर करके उसे साफसुथरा व प्रशस्त बनाने का कार्य कबीर के द्वारा हुआ। उनके पश्चात् तो संत-मत नयेनये पंथ का रूप धारण करके निर्बाध रूप से आगे बढ़ता रहा। इन पंथों में कबीर-पंथ के अतिरिक्त रैदासी पंथ, सिख पंथ, दादूपंथ (16 वीं-शती), निरंजी सम्प्रदाय (16 वीं शती), बावरी पंथ (16 वीं शती), मलूम पंथ (16-18 वीं-शती), दरियादासी सम्प्रदाय (18 वीं-शती), चरणदासी सम्प्रदाय (18-19 वीं-शती), आदि उल्लेखनीय हैं। यद्यपि प्रायः अनेक संतों द्वारा उन्नीसवीं शती तक अनेक नये-नये पंथ स्थापित किये गये, किन्तु सिद्धान्त व विचारधारा की दृष्टि से इनमें विशेष मौलिकता नहीं मिलती-मूल स्वरूप इस सबका एक ही है। इतना अवश्य है कि धीरे-धीरे ये पंथ भी अपने मूल उदेश्य से दूर हटकर रूढ़ियों-विधि-विधानों, पाखण्ड प्रवर्तन एवं माया-ज्ञान की बुराइयों से ग्रस्त हो गये। किन्तु इसमें कोई संदेह नहीं कि संत-काव्य की परम्परा हिन्दी में 14-15 वीं शती से प्रारम्भ होकर बीसवीं शती तक अखण्ड रूप से चलती रही, अतः इसे भक्ति-काल की ही काव्य-धारा कहना उचित नहीं।

संत कवियों में सबसे अधिक प्रभावशाली व्यक्तित्व महात्मा कबीर का ही था। उनके नाम पर हिन्दी में 61 रचनाएँ उपलब्ध हैं, किन्तु उसमें अधिकांश अप्रामाणिक है। प्रामाणिक समझी जानेवाली रचनाओं में डॉ. श्यामसुन्दर दास द्वारा सम्पादित 'संत कबीर', डॉ. रामकुमार वर्मा द्वारा सम्पादित-'संत कबीर' और कबीर पंथियों के साम्प्रदायिक ग्रंथ 'बीजक' का उल्लेख किया जा सकता है। कबीर साहित्य को विषय-वस्तु की दृष्टि से तीन वर्गों में विभाजित कर सकते हैं

(1) जिसमें अपने विचारों का प्रतिपादन किया गया है। (2) जिसमें विभिन्न धर्मों व सम्प्रदायों की रूढ़ियों का खण्डन किया गया है। और (3) जिसमें कवि ने वाद-विवाद और खण्डन-मंडन से ऊपर अपनी मौलिक अनुभूतियों का प्रकाशन भाव-पूर्ण शब्दों में किया है। उनके कवित्व का सर्वोत्त्कृष्ट रूप तीसरे वर्ग के काव्य में जिसमें उन्होंने अपने अलौकिक प्रियतम के प्रेम की अभिव्यंजना की है- मिलती है।

रामानन्दजी के शिष्यों में रैदास का भी उल्लेख किया जाता है, जो उच्च कोटि के संत-कवि थे। प्रसिद्ध भक्त कवयित्री मीरा ने अनेक पदों में इनका स्मरण गुरु के रूप में किया है। रैदास के कुछ पद गुरु-ग्रंथ साहब में संकलित हैं। इनके काव्य में व्यक्तित्व की कोमलता, अनुभूति की तरलता और अभिव्यक्ति की सरलता मिलती है।

डॉ. हजारी प्रसाद के शब्दों में"अनाडम्बर सहज शैली और निरीह आत्म-समर्पण के क्षेत्र में रैदास के साथ कम संतों की तुलना की जा सकती है। यदि हार्दिक भावों की प्रेषणनीयता काव्य का उत्तम गुण हो तो निस्संदेह रैदास के भजन इस गुण से सम्बद्ध है।"

कबीर के अनुयायी संत-कवियों में धर्मदास का नाम उल्लेखनीय है। अपने गुरु की वाणी का संग्रह 'बीजक' के रूप में करने का श्रेय इन्हें ही दिया जाता है। इनके स्वरचित पर्यों का संग्रह भी 'धनी धरमदास की बानी' नाम से प्रकाशित हुआ है। इनके पद भक्ति-भाव से ओत-प्रोत है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ला का मत है कि इनकी रचना थोड़ी होने पर भी कबीर की अपेक्षा अधिक सरल भाव किये हुए है इसमें कठोरता और कर्कशता नहीं है। इनकी अन्योक्तियाँ के व्यंजक चित्र अधिक मार्मिक है क्योंकि इन्होंने खण्डन-मण्डन के विशेष रूप से प्रयोजन न रख, प्रेमतत्व को लेकर अपनी वाणी का प्रसार किया है। कहीं-कहीं इनकी भाषा में पूर्वीपन झलकता है।

सिक्ख-धर्म के प्रवर्तक गुरु नानक का भी संत कवियों में बहुत ऊँचा स्थान है। इनकी रचनाएँ “गुरुग्रंथ साहिब" में संकलित है। जिनमें निर्गुण ब्रह्म की उपासना संसार की क्षण-भंगुरता, माया की शक्ति, नाम जप की महिमा, आत्मज्ञान की आवश्यकता, गुरु-कृपा का महत्त्व, सात्त्विक कर्मों की प्रशंसा, आदि विषयों पर विचार प्रकट किए गये हैं।

संत-परम्परा में महत्त्वपूर्ण कवियों - दादू दयाल, सुन्दरवास, रज्जबदास, यारी साहब, पलटू साहब, मलूकदास, प्राणनाथ, आदि तथा प्रसिद्ध कवियित्रियों - दयाबाई व सहजोबाई ने उत्कृष्ट कोटि की काव्य रचना की दादू दयाल जाति के धुनिया थे तथा उन्होंने दादूपंथ की स्थापना की। इनके काव्य में भी ईश्वर की व्यापकता, हिन्दू-मुस्लिम एकता, संसार की अनित्मता, अलौकिक प्रियतम में प्रेम और विरह का चित्रण हुआ है। दादू की वाणी में यद्यपि कबीर का-सा उक्तियों का चमत्कार नहीं मिलता, किन्तु प्रेम-भाव का निरूपण उन्होंने अधिक सरलता और गम्भीरता से किया है। खण्डन-मण्डन में इनकी रूचि कम थी। इनकी भाषा में राजस्थानी का पुट अधिक है। इन्हीं के शिष्य सुन्दरदास थे जिन्होंने 5 वर्ष की अवस्था में ही घर को त्यागकर इनसे वैराग्य की दीक्षा ग्रहण कर ली। ग्यारह वर्ष की अवस्था में काशी जाकर उन्होंने प्राचीन साहित्य और दर्शन का गम्भीर अध्ययन किया। वस्तुतः संत कवियों में अध्ययन की दृष्टि से सुन्दरदास का स्थान सबसे ऊँचा है। इनके द्वारा रचित ग्रंथों में 'ज्ञान समुद्र' और 'सुन्दर विलास' उल्लेखनीय है। दादूदयाल के दूसरे प्रसिद्ध शिष्य रज्जबदासजी ने भी लगभग पाँच हजार छन्दों की रचना की, जो उनकी 'बानी' में संकलित है। इन्होंने ईश्वर-विषयक प्रेम की व्यंजना अनुभूतिपूर्ण शब्दों में की है।

यारी साहब और पलटूसाहब का सम्बन्ध बावरी सम्प्रदाय से थाइन दिनों की कविता में भाषा की सरलता और भावों की स्पष्टता परिलक्षित होती है। पलटू साहब ने अनेक शैलियों-शब्द, साखी, कुण्डलिया, झूलना, अरिल्ल आदि का प्रयोग किया है। अपनी फक्कड़पन के लिए प्रसिद्ध सन्त कवि मलूकदास ने भी अनेक काव्य ग्रंथों की रचना की, जिनमें ज्ञान बोध, रतन खान, भक्त बच्छावनी, भक्त विरूदावती, पुरुष-विलास, गुरु-प्रताप, अलख-बानी आदि उपलब्ध हैं। प्राणनाथ जी के द्वारा रचित ग्रंथों में रामग्रंथ, प्रकाशग्रंथ, षटऋतु, सागर-सिंगार आदि उल्लेखनीय हैं।

सहजोबाई और दयाबाई- दोनों प्रसिद्ध संत-चरणदासी की शिष्या थी। सहजो बाई के उद्गार “सहज प्रकाश'' में तथा दया बाई की महत्त्वपूर्ण उक्तियाँ 'दया-बोध' और 'विनय-मालिश' में संगृहित है। इनके काव्य में नारी-सुलभ-कोमलता, अनुभूति की तरलता एवं अभिव्यक्ति की सरलता दृष्टिगोचर होती है।

इसके अतिरिक्त भी अनेक सन्त कवि एवं कवियित्रियाँ हुई, जिनमें जगजीवनदास, दरियासाहब, शिवनारायण, तुलसी साहब, रामचरण दास, बावरी आदि का नाम उल्लेखनीय है।

यहाँ संत नामदेव की रचनाओं से कुछ उदाहरण द्रष्टव्य है :

(अ) परमात्मा के प्रति प्रेम

"मोहि लागत ताला बेनी! बछरे बिनु गाय अकेली।

पानीआ बिनु मीन तलफे! ऐसे राम बिन बापुरो नामा।।"

मैं बडरी मेरा राम भरतार। रचि रचि तकाऊँ करऊँ सिंगार।

(आ) अद्वैत दर्शन

'सभु गोविन्दु है सभु गोविन्दु है, गोविन्दु नहीं कोई।'

जल तरंग अरू फेन बुदबुदा, जल ते भिन्न न कोई।

(ई) गुरु का महत्त्व

'जऊ गुरु बेऊ न मिलै मुरारी।

जऊ गुरुदेऊ न ऊतेरे पारि॥'

(इ) मूर्तिपूजा व जाति-पाँति का विरोध

ऐके पाथर कीजै पाऊँ। दूजे पाथर गरिए याँऊ।

जै इहु देऊ लू उह भी देवा। कहि नामदेव दृष्टि की सेवा।'

कहा करके जाती, कहा करउ पाती।

राम को नाम जपऊ दिन राती।।

(छ) यौगिक साधना का खंडन

'सबहि अतीत अनाहदि राता, आकुल कै घटि जाऊगों।

इड़ा पिंगुला, अउरू सुखमना, पउनै बघि-रहाऊगौं।'

विरहानुभूतियों की अभिव्यक्ति में कबीर साहब से पूरी सफलता मिली है। कुछ पक्तियाँ दृष्टव्य हैं :

'विरहनि अभी पंथ सिरि पंथी वुझै धाई।

एक सबद अहि पीव का, कब रै मिलैगें आई।'

बहुत दिनन की जोबती, बाट तुम्हारी राम।

जिब तरसै तुझ मिलन कै, मनि नाहीं विश्राम।

आई म समै तुज्झ पै, सकूँ न तुज्झा बुलाई।

जियरा योंही लहुगें, विरह तपाई-तपाई।।

कबीर

कौन विधि पाइये रे, मीत हमारा सोई।

पास पीय परदेस है रे, जब लग प्रगटई नाहि।

दिन देखे दुःख पाइए रे, यह सलाह मन माँहि।।

जब लग नैन देखिये रे, परगट मिलइ न आइ।

एक रोज संग रहइ रे, यह दुःख सहा न जाई।।

कहा करहूँ कइसे मिलहि रे, तलफइ मेरा जीवन।

दादू आतुर विरहिनी रे, कारन आपने पीस।।

'दादू दयाल'

तीव्र-विरह वेदना की अनुभूतियों के अनन्तर इन कवियों के भावुक जीवन में मिलन की घड़ियों का भी आगमन होता है। वे अपना सारा पौरुष, सारा गर्व, सारी अक्खड़ता को भूलकर किसी नवीना किशोरी के हृदय की भाँति कोमलता से गदगद, लाज से विभोर और प्यार से विह्वल हो उठते हैं।

प्रियतम के महल की ओर अग्रसर होते हुए उनके पैर सौ-सौ बल खाने लगते हैं, हृदय में तरह-तरह की शंकाओं का आन्दोलन उठने लगता हैउठन लगता हैं।

"मन परतीत न प्रेम रस, ना इस तन में ढंग।

क्या जाणों उस पीव तूं, कैसे रहसी रंग।।"

-'कबीर'

और अन्त में मधुर-मिलन के वे क्षण भी आते हैं, जबकि उसकी सारी शंकाएँ, सारी लज्जाएँ और समस्त तर्क-वितर्क रस प्रवाह में बह जाते हैं

"जोग-जुगत री रंग-महल में, पिय पाये अनमोल रे।

कहत कबीर आनन्द भयो है, बाजत अनहद ढ़ोल रे।।"

इस प्रकार इनके काव्य में प्रणय की दोनों अवस्थाओं- विरह और संयोग का चित्रण अनुभूतिपूर्ण शब्दों में हुआ है। उपदेशपरक उक्तियों में शान्त रस की भी व्यंजना हुई है!