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बेहतरीन व्यंग्य : आज का सत्य आलू का तला' है
August 30, 2019 • यशोधन शुक्ल 'अल्पेश'

श्री प्रभाशंकर उपाध्याय के व्यंग्य संकलन- 'बेहतरीन व्यंग्य' के पैंतीस व्यंग्य आलेख वर्तमान भारतीय परिवेश की विभिन्न विसंगतियों व तदजन्य विकृतियों पर तीखा व्यंग्यात्मक प्रहार करते हुए पाठक को स्थितियों का सार्थक मूल्यांकन करने के लिए विवश कर देते हैं। व्यंग्यकार की दृष्टि मानव व्यवहार की सहज प्रचलित विसंगतियों को मार्मिक रूप से उजागर करते हुए पाठक को सोचने के लिए विवश कर देती है।

 'कहाँ गया स्कूल' व्यंग्य कथा में राजनीतिक प्रभुत्व की विकृति पर तीखा व्यंग्य करते हुए उपाध्यायजी ने विधायक, मंत्री और कार्यकताओं राजनीतिक लाभ की लिप्सा में अभिव्यक्त किया है।

 'नाश्ता मंत्री का गरीब के घर' में राजनीतिक विद्रूपता पर कड़ा प्रहार किया गया है। 'आह दराज! वाह दराज!' में कार्यालयी कार्य शैली पर करारा व्यंग्य है। 'एक अदद घोटाला' में लेखक को स्वप्न में भी घोटाला आकर्षित करता है। 'गर चाणक्य बनें, प्रधानमंत्री' अप्रतिम कूटनीतिज्ञ कौटिल्य की नीतियों की वर्तमान परिप्रेक्ष्य में विभिन्न दृष्टिकोण से पड़ताल की गयी

'दास्तां-ए-ठंडा बस्ता' में नामुराद ठंडे बस्ते के आगे भगवान भी हार चुके हैं लेकिन अवाम के पास इसके इस्तेमाल का हुनर नहीं अन्यथा वह भय, भूख, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और नेताओं की नकारापंथी को ठंडे बस्ते में सरका देती। 'सिंथेटिक खाओ- सिंथेटिक पीओ' में सिंथेटिक पदार्थ निमार्ताओं पर तीखा व्यंग्य कसा गया है कि शुक्र है कि ईश्वर ने इंसान को जन्म देने से पहले हवा को बना दिया अन्यथा यह उसे भी बना लेता। 

 'अश्वत्थामा का दंश' द्वारा व्यंग्य करते हुए लेखक इस रचना को विश्वव्यापी आतंकवाद से संबद्ध करते हुए यह प्रश्न खड़ा कर देता है कि जाने कब पूर्ण होंगे, अश्वत्थामा के शाप के पांच हजार वर्ष? मानवता के प्रति यह झिंझोड़ देने वाली रचना है।

'तू धन्य है, जीप चालक!' यह अप्रस्तुत प्रशंसा शैली में लिखी ऐसी रचना है, जिसमें वाहन चालकों तथा यात्रियों की मानसिकता पर गहरा व्यंग्य किया गया है।

'रहिमन जिव्हा बावरी' के तो कहने ही क्या? इसमें लेखक ने लिखा है. "जूता और जुबान में जोर हो तो फिर किसी दूसरे अस्त्र की जरूरत नहीं रह जाती है।' 'बयानों की सेल' में बयानवीरों के बयानों का रोचक वर्गीकरण-'फुलझड़ी बयानए पटाखा बयान, चकरघिन्नी बयान और गारंटीड बयान करते हुए, उन्हें आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ा गया है।' ऐसा गारंटीड बयान जो आपकी पहचान को राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित कर दे।

'कचरा उवाच', यह इस संकलन का अंतिम व्यंग्य है। यूँ भी हम अपने जीवन में कचरे के बारे में सबसे अंत में ही विचार करते हैं। जबकि जीवन इसके निष्पादन को वरीयता देना अति आवश्यक है। इस व्यंग्य लेख में कचरा खुद अपने सर्वनाश को आमंत्रित करता हुआ कह रहा है कि मैं सदा विद्यमान थाए हूँ और रहूँगा। मेरी जल-नभथल में समान गति है। मैं, सर्वव्यापी हूँ। अतःए जब मेरा नाश ही करना है तो समूल करो।

कुल मिला कर व्यंग्यकार के तौर पर उपाध्यायजी की दृष्टि समग्र है। विषयों और शैलीगत प्रस्तुति में विविधता और पठनीयता है किन्तु कुछ लेख अत्यधिक ज्ञान भार से बोझिल हो गए हैं। यद्यपि ये हमारी जानकारी में इजाफा करते हैं किन्तु अति तो वर्जित है। आशा है, भविष्य में उपाध्यायजी इस ओर अवश्य ध्यान देंगे। अब लंबे नहीं बल्कि छोटे लेखों का जमाना है।

और अंत में इस संकलन की एक छोटी सी भूल की ओर संपादक प्रमोद सागर का ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा' करजा लेकर मरजा' लेख को उन्होंने अनुक्रमणिका में मार ही दिया है। कहीं वे इस प्रकार पाठकों की सतर्कता पर व्यंग्य तो नहीं कर गए हैं?