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बर्बर हूणों के दमन का दलन करने वाले गुप्त सम्राट स्कन्दगुप्त विक्रमादित्य
October 17, 2019 • प्रो. राकेश उपाध्याय

मौर्य काल से ही भितरी का इलाका गंगा के इस पार पश्चिमी दिशा में पाटलीपुत्र की सुरक्षा के लिए अभेद्य रक्षा कवच था, यहां पर जो सैनिक छावनी कौटिल्य और चंद्रगुप्त मौर्य के समय निर्मित हुई वह गुप्त साम्राज्य के समय में भी सुगठित ढंग से संचालित होती रही थी। आज भी इस इलाके के युवाओं का डीएनए सबसे पहले भारत की सेना में ही करियर खोजता है, आंकड़े गवाही देते हैं कि भारत की फौजों में गाजीपुर के हर गांव से युवकों की टोलियां तब से ही भर्ती होती चली आ रही हैं, देश की रक्षा के लिए लहू बहा देने और अपना सब कुछ लुटा देने का यह पाठ उनके दिलो-दिमाग में स्कन्दगुप्त जैसे महानायकों की छाया में और प्रबलित हुआ था

राणसी से गोरखपुर जाएंगे तो सड़क के रास्ते या रेल के रास्ते वाराणसी से करीब 30 किलोमीटर दूर स्थित औड़िहार जंक्शन पर सभी ट्रेनें और बसें ठहरती हैं। भारतीय इतिहास के वीर प्रवाह को समझने के लिए यह स्थान बेहद महत्वपूर्ण है। बिल्कुल गंगा के किनारे बसा यह छोटा सा गांव मध्य एशिया के बर्बर हूणों के समूल विनाश का साक्षी है। गंगा की कलकल धारा के किनारे सदियों पहले यह वीरान गांव आज भी आबादी के लिहाज से बहुत ही छोटा है, किन्तु यहां के क्षत्रियों समेत चारों वर्गों की कीर्ति पताका पूर्वांचल के इलाके में सबसे अधिक चर्चित रहती है। पता नहीं कि यहाँ बसी आबादी के लोग ये जानते हैं कि नहीं कि उनके गांव का नाम औड़िहार क्यों पड़ा लेकिन इतिहास साक्षी है और औड़िहार के पास सैदपुर-भितरी नामक गांव में मौजूद स्कन्दगुप्त की लाट गवाही देती है कि यह औड़िहार वही स्थान है जहाँ बर्बर हूणों की फौज को स्कन्दगुप्त ने अपने बाहुबल से प्रबल टक्कर दी थी कि हूणों कि इस जगह का नाम ही हूणिहार या हुणिआरि पड़ गया। मतलब वह जगह जहाँ हूणों की हार हुई, जहाँ हूणों की पराजय का इतिहास लिखा गया, जो भूमि दुर्दीत हूणों के लिए अरि यानी शत्रु समान खड़ी हो गई, वह जगह ही आज अपभ्रंश रूप में औड़िहार के रूप में मौजूद है।

1600 साल पहले की यह महान क्रांति गाथा है। औडिहार के बिल्कुल बगल से बहने वाली मां गंगा की धारा में ही तब स्कन्दगुप्त विक्रमादित्य के विक्रम ने नई लहर उठाई थी जिसमें हूणों का कहर सदा के लिए विलीन हुआ था। गंगा की लहरों पर जब पहली बार हूणों की बर्बरता की काली छाया पड़ी थी तब से लेकर आज तक कितना पानी बह गया किन्तु प्रयाग से पाटलीपुत्र के मध्य काशी और बलियाग तक के हजारों गांव और करोड़ों लोगों के मन से उस खौफनाक अध्याय की स्मृतियां आज तक मिट नहीं सकीं। यहां के गांवों के नाम हूणों की पराजय के नाम से बसे, औड़िहार, मुड़ियार, हौणहीं, तैतारपुर ऐसे दर्जनों गांव हैं, जहां बसे लोगों के पुरखों ने स्कन्दगुप्त की महासेना के सैनिक और कमांडर के रूप में इस महायुद्ध में हिस्सा लिया था। अब ये इलाका गाजीपुर जनपद का हिस्सा है। बनारस की भूमि से सटकर बहने वाली गोमती और गंगा के संगम के तीर्थ कैथी मारकण्डेय महादेव से बिल्कुल ही सटा हुआ। हूणों से निपटने के लिए इस जगह का चुनाव स्कन्दगुप्त ने सोच-समझकर किया था। मौर्य काल से ही भितरी का इलाका गंगा के इस पार पश्चिमी दिशा में पाटलीपुत्र की सुरक्षा के लिए अभेद्य रक्षा कवच था, यहां पर जो सैनिक छावनी कौटिल्य और चंद्रगुप्त मौर्य के समय निर्मित हुई वह गुप्त साम्राज्य के समय में भी सुगठित ढंग से संचालित होती रही थी। आज भी इस इलाके के युवाओं का डीएनए सबसे पहले भारत की सेना में ही करियर खोजता है, आंकड़े गवाही देते हैं कि भारत की फौजों में गाजीपुर के हर गांव से युवकों की टोलियां तब से ही भर्ती होती चली आ रही हैं, देश की रक्षा के लिए लहू बहा देने और अपना सब कुछ लुटा देने का यह पाठ उनके दिलोदिमाग में स्कन्दगुप्त जैसे महानायकों की छाया में और प्रबलित हुआ था। हूणों से जो टक्कर तब हुई थी, आज तक उसकी स्मृति यहां के जन-जीवन के मन से मिटती नहीं।

उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में आज भी यह संवाद गांव-गांव प्रचलित है कि बचवा सुत जा, नाहीं त हुणार आ जाई। अब तक लोग इस प्रचलित शब्द हुणार को कोई जंगली जानवर मानते आए हैं जो बच्चों को उठा ले जाता है, जैसे कोई लकड़ सुंघवा या कोई लकड़ बघ्या। लेकिन इतिहास की गुफाओं में प्रो. आरसी मजूमदार, जयशंकर प्रसाद और आचार्य वासुदेवशरण अग्रवाल जैसे कुछ यशस्वी लेखक-विद्वान जब पहुंचे तो पता चला पूर्वांचल के लोक-मन में यह जो हूणार शब्द है, यह किसी असल सियार, लकड़ सुंघवा, लकड़ बग्घे या किसी भेड़िये का नाम नहीं बल्कि भेड़िये के रूप में उन्हीं भयानक हूणों का मन के किसी कोने अंतरे में छिपा वह खौफ है जिसे भेड़िये की तरह पशुवत् हिंसक जीवन को अपनाकर ही हूणों ने विश्व इतिहास का सबसे बर्बर अध्याय लिखा और आज से 2000 साल पहले भारत की धरती पर भी अपनी तलवारों से मानवता के विरूद्ध अत्याचार और अपराध को सबसे भयावह रक्तरंजना दी थी।

किन्तु हूणों को तब शायद यह नहीं पता था कि जिस यूनान, मिस्र और रोम को वह मटियामेट कर अपनी अतृप्त लुटेरी पिपासा लिए भारत की बरबादी, लूट, हत्या, बलात्कार और डकैती का खौफ लिखने गंगा-यमुना की लहरों पर चढ़े चले आ रहे हैं, उसके जर्रे जर्रे में भारत की उठती जवानी उनकी ही मौत का इतिहास लिखेगी, इसीलिए स्कन्दगुप्त की महागाथा आज भी हमारे मन और दिलों में बार बार उठती है, न पहले कभी मिट सकी है और न ही भविष्य में कभी मिट सकेगी। जबजब धरती पर अत्याचार और बर्बरता का रौरव नरक बरसेगा तब-तब यह देश अमरता की अपनी उस महायात्रा को पुनर्जीवित करेगा जिसमें से स्कन्दगुप्त जैसे वीर नायक जन्म लेते हैं, इस देश के अमर संजीवन प्रवाह से शक्ति प्राप्त करते हैं और फिर अपना सब कुछ मातृभूमि की सेवा और सुरक्षा में लुटाकर चुपचाप धराधाम से विदा हो जाते हैं, जिनके कारण हमारा आपका अस्तित्व यूनान-रोम-मिस्र जैसी सभ्यताओं के मिट जाने के बाद भी संसार की छाती पर अपना ध्वज गाड़कर युग युग से जीवंत है, आज उसी महाप्रतापी वीर योद्धा महा सेनानी हुणारि विक्रमादित्य स्कन्द गुप्त की सत्य इतिहास गाथा आपको सुनाने जा रहा हूं मैं।

स्कन्दगुप्त को महान इतिहासकार प्रो. आरसी मजुमदार ने 'द सेवियर ऑफ इंडिया' की उपाधि यूं ही नहीं दी है। सेवियर ऑफ इंडिया अर्थात भारत का रक्षक, भारत का त्राता, भारत को बचाने वाला। इतिहास में हूणों की दुर्दात सेनाओं को अपने बाहुबल से स्कन्द गुप्त ने ही सबसे बड़ी टक्कर दी, इस हद तक टक्कर दी कि मध्य एशिया में हूणों के ठिकानों में विधवाएं ही विधवाएं बचीं और उन इलाकों में पुरूषों का मानो अकाल ही पड़ गया।

स्रोतों से जो जानकारी मिलती है उसके आकलन के अनुसार, कम से कम दो लाख हूणों की अश्वबल से सम्पन्न सेना में सबके मारे जाने की सूचना देने के लिए मुट्ठीभर ही बचे जो सुरक्षित मध्य एशिया के अपने उन वीरान ठिकानों तक पहुंच सके जहां से हूण जत्थे दनादन निकले थे ये सोचकर कि भारत के सुन्दर बसे समृद्ध ऐश्वर्यशाली स्वावलंबी और प्रचुर धन-संपदा से सम्पन्न गांवों और आबाद लोगों को लूटकर वह सदा के लिए मालामाल हो जाएंगे, किन्तु वीर स्कन्दगुप्त और उसकी महासेना के पराक्रम के सामने हूणों का सारा अभियान ही धरा रह गया, आए तो थे गरजती-लपलपाती तलवारों को झनझनाते हुए, भारत के लोकजीवन को डराते-मारते-लूटते लेकिन स्कन्द गुप्त की कुशल व्यूह रचना के कारण गंगा-यमुनागोमती आदि नदियों के प्रवाह में ऐसे फंसे कि भागने के लिए भी जगह नहीं बचीजिन कुछ हूण-टुकड़ियों को स्कन्दगुप्त ने क्षमादान दिया भी तो पश्चिम की ओर जाने वाले उत्तरापथ से जुड़े गणराज्यों यौद्धेय, मालव, क्षुद्रक के वीरों ने मार-मारकर यमलोक पहुंचा डाला।

हूणों पर स्कन्दगुप्त की यह ऐतिहासिक विजय इतनी आसान नहीं थी जितनी कि हम आप कुछ पंक्तियों के जरिए इसे समझ पा रहे हैं। गुप्तचरों ने जब पहली बार हूणों की टक्कर से तबाह हुए पुरु और कुरु, गंधार आदि गणराज्यों का हाल बताने तब के केंद्रीय साम्राज्य पाटलिपुत्र (पटना) पहुंचाना प्रारंभ किया तो लगभग 60 वर्ष की उम्र पारकर बुढ़ापे की दहलीज पर खड़े सम्राट कुमार गुप्त की छाती भी धस्स कर गई। ईस्वी सन् 413 के करीब सिंहासन पर बैठे सम्राट कुमार गुप्त महेंद्रादित्य ने चालीस वर्ष तक कुशलतापूर्वक भारत को केंद्रीय नेतृत्व प्रदान किया। जिनके अमर पुरखों के पराक्रम से सजी-धजी राजधानी पाटलीपुत्र के ऐश्वर्य की कहानियां सारे संसार को तब चकित और स्तंभित कर देती थी। परम भागवत महाराजाधिराज चक्रवर्ती सम्राट समुद्रगुप्त विक्रमादित्य और उनके अजेय बलशाली पुत्र परमभागवत महाराजाधिराज चक्रवर्ती सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य द्वितीय के द्वारा खड़े किए गए साम्राज्य की सेवा में कुमार गुप्त ने कोई कमी नहीं रख छोड़ी। यूनान और रोमन साम्राज्य या तबके रंक यूरोप के हिस्से तो भारत की समृद्धि के सम्मुख कहीं खड़े तक नहीं होते थे। राम- कृष्ण जैसे महान धुरंधरों को जन्म देने वाली जगत जननी मातृभूमि भारत की पताका तब पश्चिम में गांधार के पार यूनानी-ग्रीक राज्यों तक फहर रही थी तो पूरब में आज का जो मलेशिया, इंडोनेशिया, बाली आदि अनेक द्वीपसमूह हैं, सबके सब भारत के चक्रवर्ती साम्राज्य के अभिन्न अंग थे, भारत में लोकतंत्र तब शिखर पर था, सैकड़ों जनपद और गणराज्य अपने केंद्रीय चक्रवती साम्राज्य की देख-रेख में प्रत्येक ग्राम और पुर तक स्वायत्त शासन और ग्रामीण स्वावलंबन की बेमिसाल गाथा लिख चुके थे, मनुष्य मात्र को तो सुखी जीवन-समृद्ध जीवन की गारंटी थी ही, मानव संबंध अर्थात आज का जो Human Relation का कॉरपोरेट सिद्धांत है, वह पशुओं और जीवों तक के जीवन के लिए भी सुख की अमोघ गारंटी बन चुका था जिसकी बुनियाद अहिंसा परमो धर्मः के परम सिद्धांत के द्वारा सम्राट अशोक ईसा पूर्व तीसरी सदी में ही रख चुके थे, हर जीवजानवर और चौपाए के लिए तब भारत के कुशल शिल्पियों ने म्यूजिक सिस्टम विकसित किया था, बैलों के गले में घंटिया थीं, और घोड़े-गधे और सवारी ढ़ोने वाले पशुओं के पैरों में भी घुघरू थे। घर-गांवकृषि और मानवता के प्रति दुधारु गाय की सेवाओं को देखते हुए तब पशुओं की सूची से इसे बाहर निकालकर इस देश ने माता का रूप दे दिया था, अहिंसा-करुणा से भरी इस भूमि का जीवों के प्रति दयाभाव की सचमुच पराकाष्ठा का पुनीत पावन यह इतिहास। भारत ने मनुष्य-मनोविज्ञान तो छोड़िए, पशु-विज्ञान के शिखर तक को छू लिया था कि मानव समुदाय को स्वयं सुखी रहने के लिए अपने पालतू पशुओं के साथ किस तरह दयापूर्वक व्यवहार करना चाहिए ताकि उनका पूरा सदुपयोग हो सके। उस दौर में कोई पशु नहीं था जिसके लिए भारत ने संगीत संगत विकसित नहीं किया। आज भी बंदरों को मदारी डमरू सुनाते हैं, सांपों को सपेरे बीन की संगीत पर नचाते हैं, कोयल और पक्षियों के कलरव की नकल कर वैसा ही संगीत सुनाने वाले और उनकी आवाज सुनकर उनकी बातचीत तक का पता लगाने वाले विशेषज्ञ भारत के वन्य प्रदेशों में शिक्षित-प्रशिक्षित थे। हाथी और घोड़े ढोल-नगाड़े की आवाज सुनकर और मुख से लेकर पैरों तक सोने-चांदी के साथ अपने महावत के संकेत मात्र को समझकर सज-धजकर शान दिखाते यूं खड़े हो जाते थे मानो सारे संसार का ऐश्वर्य भारत के चरणों में आ गिरा हो।

वह भारत आज केवल हम कहानियों और किस्सों में ही देख पाते हैं जिसे तब हमारे पुरखों ने अपने परिश्रम और प्रताप से इतना सुन्दर बनाया था कि संसार इसे सोने की चिड़िया कहता था तो कोई सोने के अंडे देने वाली मुर्गी बता-बताकर दुनिया को भारत पर कब्जे के लिए उकसाता था। उसी भारत की बुनियाद पर जो गुप्त साम्राज्य खड़ा हुआ था, उसे संसार की सबसे बर्बर हूण सेनाओं से मुकाबले की जब चुनौती मिली तो वीरों की भुजाएं फड़क उठीं, तनी छाती प्रतिकार के लिए धड़क उठी, तलवारें रक्तपान को मचल गईं किन्तु देश के सामने नेतृत्व का संकट खड़ा था कि रणभूमि में सेना की कमान संभालेगा कौन? देश के लिए मृत्यु बन खड़े इस विकराल संकट को ललकारेगा कौन? सम्राट कुमार गुप्त का स्वास्थ्य इस स्थिति में नहीं था कि वह स्वयं सेनाओं का नेतृत्व कर रणभूमि में हूणों को ललकारने उतर पड़ते। सबके मन में प्रश्न था तो स्वयं सम्राट नेतृत्व नहीं करेंगे तो कौन? राजपुत्रों में उत्तराधिकार तय नहीं था और प्रश्न यह भी कि हूणों के साथ सैन्य संघर्ष में जीवित बचकर लौट आने की गारंटी नहीं। तब कांपती भुजाओं वाले उस पिता कुमार गुप्त के सबसे युवा पुत्र स्कन्दगुप्त ने स्वयं ही आगे बढ़कर पिता का धर्म संकट दूर करते हुए भरे दरबार में सिंह गर्जना के साथ हूणों के मुंडों की माला से भारत जननी के शृंगार का संकल्प लिया।

हूणों के पराभव से जुड़े पुरातत्व के अक्षर-गीत

भितरी के शिलालेख में लिखी उपर्युक्त पंक्ति का अर्थ लिखते हुए कलम भी रोमांचित हो उठती है। उस महाप्रतापी के बल-विक्रम का स्मरण भारत के अपराजेय स्वरूप का ध्यान दिलाने लगता है। जरा खुली आंखों से पढ़िए कि इन पंक्तियों में क्या भाव लिखा है। लिखा है कि- "समरभूमि में हूणों के सामने आने पर दोनों हाथों में तलवार लिए स्कन्दगुप्त और उसके सैन्यबल ने अपने प्रबल बाहुबल से जो पराक्रम प्रकट किया, उसे देख सुनकर बर्बरता का पर्याय बने हूणों का ह्रदय ही नहीं बल्कि समस्त भूमंडल का अत्याचारी वर्ग मानो कंपित हो उठा।"

अश्व पर सवार होकर वह बाहुबली महावीर स्कन्दगुप्त विक्रमादित्य दोनों भुजाओं से अपनी तलवारें नचाता हुआ जिधर से भी निकलता था कि उधर ही उधर रक्त से सने हूणों के नरमुंडो से पृथ्वी पट गई। भितरी के पास जो मुड़ियार गांव है, वहां स्कन्दगुप्त और उसकी महासेना ने हूणों के मुंडो का पहाड़ खड़ा किया, हौणहीं गांव में हूणों की लाशों से कितने ही गड्डे-गड़ही पाट दिए, औड़िहार में उस महाप्रतापी ने हूणों के खिलाफ संगर प्रारंभ करने का जो शंखनाद किया, इस संगर ने ही उसे इतिहास में सदा के लिए अमर कर दिया।

भितरी शिलालेख स्कन्दगुप्त के संपूर्ण जीवन चरित्र और हूणों के साथ हुए महायुद्ध पर सूत्रों में गंभीर प्रकाश डालता है। इसकी एक पंक्ति में औड़िहार अर्थात हूणिआरि या अवनिहार का संकेत में वर्णन आता है। इसमें लिखा है- स्वैर्दण्डैः... बाहुभ्याम अवनिं विजित्य हि जितेष्वात्तेषु कृत्वा दयाम्...। इस पंक्ति में अवनि अर्थात पृथ्वी पर उसके द्वारा शत्रुओं (हूणों) को हराने का सीधा वर्णन है। अवनि पर विजय अर्थात अवनि-हार या हूणिआरि शब्द यहां पर प्रतिध्वनित होता दिखाई देता है। पूरी पंक्ति का जो भाव निकलता है उसके अनुसार, "अपने बाहुबल से उसने (स्कन्दगुप्त ने) पृथ्वी (अवनि) पर अर्थात शत्रुओं पर विजय प्राप्त की, (पराजित हूणों में) जिन आर्तजनों ने उससे दया की भीख मांगी और प्राणों की गुहार लगाई उन्हें स्कन्दगुप्त ने छोड़ दिया लेकिन ऐसा करते समय उसमें रंचमात्र भी अहंकार नहीं आया और ना ही उसके चेहरे पर किसी प्रकार का क्षुब्धभाव ही दिखाई पड़ा।"

अनेक इतिहासकार भितरी अभिलेख में गंगा नदी के वर्णन के आधार पर भी मानते हैं कि हूणों से स्कन्दगुप्त का आमना-सामना औड़िहार के गंगा तट के समीप ही कहीं हुआ था। भितरी अभिलेख में एक पंक्ति में लिखा है- शत्रष शरा...विरचितं प्रख्यापितो दीप्तिदा न द्योति... नभीषु.. लक्ष्यत इव श्रोत्रेषु गार्ङ्गध्वनिः (गंगध्वनिः)।। अर्थात शत्रुओं के बाणों..के प्रत्युत्तर में जब स्कन्दगुप्त के धनुर्यंत्रों से बाणों की बौछार निकलती थी तो...आसमान पर बाणों का भंवर छा जाता था...शत्रुओं के कानों में तीखे बाणों की सनसनाती बौछार इस तरह सुनाई पड़ती थी जैसे कानों में गंगा की कलकल ध्वनि सुनाई पड़ रही हो।

गाजीपुर-भितरी से स्कन्दगुप्त का कैसा गहरा रिश्ता था, यह तथ्य इतिहास में सिद्ध द्ध है। स्कन्दगुप्त की लाट और उसका शिलालेख और उसके द्वारा वहां स्थापित विशाल विष्णु मंदिर के भग्नावशेष सारी कहानी खुद ही बयां कर देते हैं। किन्तु स्कन्दगुप्त का रिश्ता तो संपूर्ण भारत-भुवन की रक्षा के प्रश्न से कहीं गहरे जुड़ा था, उसने भितरी और औड़िहार की भूमि से हूणों के विरुद्ध जिस महायुद्ध का प्रारंभ किया उसके बारे में इतिहास के स्रोत और लोकमन की स्मृतियों के जरिए हम अनेक कथाएं सुनते हैं। इतिहासकारों की कलम से, पुरातत्व के द्वारा सामने लाई गई जानकारी से और लोकस्मृतियों से छनकर आने वाली कथात्मक जानकारी, इन सबको मिलाकर ही स्कन्दगुप्त की सही तस्वीर आधुनिक भारत के सम्मुख रखी जा सकती है।

औड़िहार (गाजीपुर) से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर गोरखा नामकी न्याय पंचायत हैइसी में जो तेलियाना मौजा पड़ता है वहां हुणरही माता का करीब एक बिगहे में फैला हुआ विशाल परिसर आज भी सुरक्षित है, इसके चारों ओर कई एकड़ भूमि ऊसर है, आबादी थोड़ी है, हालांकि इसके बड़े इलाके में अब लोग खेती करते हैं। जो चित्र यहां दिया गया है, यह उसी हुणरही माता के मंदिर परिसर का है जहां रहने वाले 80 साल के पुजारी के कथनानुसार, उन्हें नहीं पता कि यह मंदिर परिसर कितना पुराना है। पुजारी और स्थानीय निवासियों के अनुसार, उनके दादे-परदादे के जमाने से माता की पिंडी यहां लोग देखते आ रहे हैं, साफ है कि यह स्थान सैकड़ों साल पुराना है। सवाल है कि क्या इस स्थान का कोई संबंध हूणों और स्कन्दगुप्त की टक्कर से संबंध हूणों और स्कन्दगुप्त की टक्कर से हो सकता है? जैसा कि मैंने पिछले भाग में बताया था कि पूर्वांचल के लोकमन में आज भी हूणों का खौफ विविध किम्वदंतियों के रूप में जीवित है। यहां माताएं आज भी बच्चों को सुलाते वक्त कहती हैं कि बचवा सुत जा, नाहीं त हूणार आ जाई, अर्थात बेटा सो जा नहीं तो हूण आ जाएगा।

गोरखा-तेलियाना के इस हुणरही मंदिर के बारे में और लोक किम्वदंतियों पर अगर गौर करें तो इतिहास के अनेक रहस्यों से पर्दा उठ सकता है। स्थानीय लोग बताते हैं कि मंदिर परिसर में पीपल के पेड़ के नीचे जो पिंडी रखी है, वह असल में हूणों का अन्त करने वाली हूणरही (हूण-अरि) चौरा माई का स्थान है। स्कन्दगुप्त ने हूणों के विरुद्ध जो सैन्य व्यूह की रचना की थी इसमें यह स्थान कहीं ना कहीं केंद्र में अवश्य रहा होगा क्योंकि आज भी इस स्थान के प्रति लोकमन में असीम श्रद्धा का भाव भरा हुआ है। हो सकता है कि यहीं पर हर युद्ध के पहले रणक्षेत्र में परंपरा रूप में भवानी भगवती की प्रतिमा स्थापना का कार्य स्कन्दगुप्त ने पूरा किया हो। हूणारि यानी हूण-अरि अर्थात हूणों का वध करने के लिए प्रेरक भवानी भगवती महिषासुर मर्दिनी देवी दुर्गा की प्रतिमा की स्थापना के बिना तब भारत में युद्ध जीतने की कल्पना कठिन थी।

इस हुणरही मंदिर के बारे मे लोकमन में प्रचलित कहानी है कि एक गड़ेरिए की मासूम बच्ची को रात के अंधेरे में हुणार उठा ले गए और फाड़कर उसे खा गए, उसकी क्षत-विक्षत लाश के अवशेष जब देखे गए तब स्थानीय लोगों ने माता से हुणारों के विनाश के लिए यहीं पर प्रार्थना की, माता ने उनकी सुनी और हुणारों के विनाश के लिए सिंह पर सवार होकर अपनी तलवारों से सदा के लिए हुणारों का खात्मा करना तय कर लिया। भारत की लोकस्मृति में दर्ज यह कहानी और हूणों के अंत से जुड़ा यह हूणांतक स्थान रोमांचकारी है। लोककथाओं में माता जिस सिंह पर सवार होकर हूणों का वध करने निकली थीं, वह सिंह कोई और नहीं बल्कि वही नरव्याघ्र स्कन्दगुप्त था जिसका नाम कालांतर में इतिहास ने भूला दिया लेकिन जिस खौफ से उसने भारत को बचाया, वह खौफ लोगों के मन में अब तक बसा रह गया।

आचार्य वासुदेव शरण अग्रवाल उसकी वीरता का बखान करते हुए लिखते हैं, "मध्य एशिया से चींटियों की तरह असंख्य दल बांधकर जंगली और बर्बर हूण चीन से फ्रांस और यूनान तक समस्त भूभाग में फैल गए थे। डैन्यूब से वोल्गा तक तथा थ्यूरिंजिया और रोमन साम्राज्य तक इनकी लपलपाती हुई तलवारों ने अनगिनत मनुष्यों को चाट लिया था। हूणों के कंधे बड़े-बड़े और नाक बैठी हुई थी, माथे का हिस्सा छोटा था और जैसे उनकी आंखें काली-काली उनके उठे सिरों में ही घुसी रहती थीं, क्रोध के समय पुतलियां इधर से उधर डोलने और नाचने लगती थीं, होठों के दोनों किनारों से पतली मूंछे खड़ी फड़कती थीं और मृत्यु को गेंद की तरह ठुकराते हुए ये बलशाली वेग से सम्पन्न घोड़ों पर सवार होकर समस्त जन-धन, नगर और देशों को रौंदते हुए ऐसे चलते थे जैसे कि खेतों को नष्टकर झुंड में चलने वाला असंख्य टिड्डी दलों का झनझन सुर में उड़ता समूह। इन हूणों के अत्याचारों से यूरोप कांप उठा, इनकी लगातार टक्कर और ठोकर से यूनान-मिस्र और रोम धरती के धूल में मिल गए। ऐसे विश्व को कंपा देने वाले प्रलयंकारी हूणों से समरांगण में लोहा लेने जब स्कन्दगुप्त अपने सैन्यबल के साथ दो-दो हाथ करने उतर पड़ा तो जैसे बाजी ही पलट गई। स्कन्दगुप्त के रणकौशल, बाहुबल और पराक्रम को देखकर हूणों की सेनाएं थर्रा उठीं, उसकी अद्वितीय वीरता देखकर जन-मन के भीतर पसरा डर जाता रहा, ऐसे महान सेनानी स्कन्दगुप्त को भारत का महान रक्षक, असल गोप्ता या महात्राता अर्थात The Saviour of India नहीं कहें तो फिर कौन है इतिहास में जिसे भारत-रक्षा-केसरी की उपाधि से नवाजा जाए।

आप सभी ने इस आलेख के प्रथम भाग में पढ़ा है कि जैसे ही हूणों ने तक्षशिला विश्वविद्यालय को नष्ट-भ्रष्ट किया वैसे ही तब के भारत के केंद्र पाटलीपुत्र में सैन्य हलचल बढ़ गई, दरबार में केवल एक ही चर्चा कि हूणों पर लगाम कैसे लगेगी, इनका संख्याबल कितना है, जो समूचे विश्व को रौंदते चले आ रहे हैं क्या उन्हें रोक पाने के लिए आवश्यक सैन्यबल और संसाधन हमारे पास हैं? और सबसे अहम सवाल ये कि आखिर युद्ध का नेतृत्व कौन करेगा क्योंकि सम्राट तो बुजुर्ग हो चले हैं, रणभूमि में उतरने की हालत में नहीं हैं और उनके तीन पुत्रों पुरुगुप्त, स्कन्दगुप्त और घटोत्कचगुप्त में उत्तराधिकार भी तय नहीं है। कहते हैं कि संकटों से घिर जाने के समय ही महानायक की पहचान होती है। स्कन्दगुप्त ने स्वयं ही आगे बढ़कर हूणों के विरुद्ध सैन्यबल का नेतृत्व करने का प्रस्ताव दिया और इस प्रकार राष्ट्र रक्षा के महायज्ञ में उसने अपने जीवन की आहुति देने जैसा बड़ा फैसला कर अपनी कर्तव्यपरायणता और सम्राट का वास्तविक उत्तराधिकारी होने की योग्यता सिद्ध कर दी।

इतिहास के स्रोत बताते हैं कि हूणों ने पहला धावा किसी पुष्यमित्र या व्यूढ़मित्र नाम के व्यक्ति के नेतृत्व वाले सैन्यदल को आगे रखकर बोला था। इसमें यह रहस्य भी जाहिर होता है कि हूणों ने गुप्त साम्राज्य के केंद्र को कब्जे में लेने के लिए पहले देसी शक्तियों को साथ आने का लालच दिया था जिसमें से यह पुष्यमित्र नामक गद्दार हूणों से जाकर मिल गया। इस तथ्य की ओर प्रोफेसर आर.सी. मजूमदार ने संकेत किया है कि 'पुष्यमित्र के जत्थे हूणों से संबंधित ही थे। क्योंकि स्कन्दगुप्त की हूणों से अन्तिम टक्कर के बाद इनका भारतीय इतिहास में अता-पता तक नहीं चलता है।

इतिहास के स्रोतों के मुताबिक, हूणों के इन जत्थों से स्कन्दगुप्त की पहली टक्कर इतनी भयानक थी कि गुप्त साम्राज्य की बुनियाद तक हिल उठी। सैन्यबल हताश हो चले और एक बारगी ऐसा भी लगने लगा कि भारत का संपूर्ण राज्य सदा सदा के लिए हूणों को हस्तगत हो जाएगा। गुप्तचरों ने जब हूणों के सम्मुख स्कन्दगुप्त के सैन्यबल के पीछे हटने का समाचार अस्वस्थ सम्राट कुमार गुप्त को सुनाया तो पराजय की आहट में बिखरते साम्राज्य के स्वरूप की कल्पना कर उनका ह्रदय ही टूट गया, भीषण हृदयाघात से वह उसी समय मृत्यु को प्राप्त हो गए जबकि स्कन्दगुप्त रणभूमि में देश के शत्रुओं से जूझ रहा था। भितरी शिलालेख संकेत करता है कि अपने सैन्यबल को उत्साह से भरने के लिए इस महान सेनापति युवराज ने सैनिक शिविर के बिस्तर का ही त्याग कर सैनिकों के साथ ही भूमि पर सोना शुरू किया।

भितरी शिलालेख के अनुसार,

'विचलितकललक्ष्मीस्तम्भनायोद्यतेन

क्षितितलशयनीये येन नीता त्रियामा'

अर्थात उस महापराक्रमी ने राज्य बचाने के लिए समरभूमि में सैनिकों के साथ पृथ्वी पर रात्रि व्यतीत की। उसके इस फैसले ने एक बार फिर से निराश सैन्यबल में देश के लिए सब कुछ कर गुजरने का ताव भर दिया।

आचार्य वासुदेव शरण अग्रवाल लिखते हैं कि- "जिस देश में सेनापति इस तरह से कड़ी जमीन पर रात गुजारकर तपस्या करते हैं भला उस देश को संसार में कौन समाप्त कर सकता है।" फिर जो हुआ उसे उस समय के संसार ने देखा कि हूणों के मुंड के मुंड भारत की धरती पर कट कटकर गिरने लगे। हूणों के राजा को रणभूमि में घसीटते हुए उसके सीने को चरण-पीठ बनाकर स्कन्दगुप्त ने समस्त हूण जाति के अत्याचारों पर मानों अपना बायां पैर स्थापित कर अंतिम विजय का डंका बजा दिया। भितरी शिलालेख में लिखा गया कि-...अमित्रांश्च जित्वा क्षितिप-चरणपीठे स्थापितो वामपादः। हूणों को जीतकर उनके राजा के सीने को चरणपीठ बनाकर स्कन्दगुप्त ने उस पर अपना बायां पैर रख दिया।

लोकजीवन तब यह देखकर पुलकित हो उठा कि जिस गड़रिए की बेटी के पेट को फाड़कर उसकी अंतड़ियां हूणों ने निकाल बाहर की, उन्हीं हूणों के राजा को उन्हीं आम लोगों के सम्मुख भारत के महानायक ने घसीटते हुए उनके पैरों के तले ला खड़ा किया। बच्चों और महिलाओं के साथ हूणों के बर्बर बर्ताव को देखकर ही स्कन्दगुप्त ने तब हूणों के समूल विनाश का निर्णय ले लिया था। पहले तो उसने आर्तस्वर में दया की भीख मांगने वाले हूणों को वापस मध्य एशिया लौट जाने का मार्ग देने का निर्णय लिया था, कितने ही वापस लौट भी गए और कितने ही हूणों को उसने हिंसक स्वभाव छोड़कर शांतचित्त सहिष्णु होकर रहने की शर्त पर क्षमादान भी दिया किन्तु हूणों के दुश्चरित्र और धूर्त-धोखे वाले बर्बर स्वभाव के कारण अंत में उसे यही फैसला करना पड़ा कि समरभूमि में क्षमादान और दयादान से काम नहीं चलेगा और अगर कोई उपाय कारगर होगा तो केवल हूणांतक हूणों का भीषण संहार ही होगा, एक ओर हूणों की गर्दनें होंगी और दूसरी और बाहुबली की तलवार।

अनेक शिलालेख बताते हैं कि हूणों के बर्बर आतंक खासतौर पर निर्दोष बच्चों को मार डालने और युवतियों को मारकर भूनकर और जलाकर खा डालने तक वाली वीभत्स मनुष्य जाति के इस स्वरूप को देखकर उस महावीर के ह्रदय से हूणों के प्रति दया भावना और मानवता समाप्त हो गई। हूणों को बार-बार सर उठाते और भारत को ललकारते देखकर स्कन्दगुप्त के क्रोध का पारावार नहीं था, और तब समर भूमि में उसने ऐसा रौद्र रूप दिखाया कि हूणों का नामलेवा भी धरती पर मिलना मुश्किल हो गया। भितरी शिलालेख की यह पंक्ति उसके पराक्रम का जीता-जागता प्रमाण है- हुणैर्यस्य समागतस्य समरे दोभा धरा कम्पिता भीमावर्त करस्य...। अर्थात समरभूमि में स्कन्दगुप्त का रौद्र रूप देखकर बर्बर हूणों की बर्बरता तक कांप उठी।

इतिहास के स्रोत बताते हैं कि तब चीन के सम्राट ने राजदूत के द्वारा पाटलीपुत्र में संदेश भेजकर हूणों के विरुद्ध इस महान पराक्रम के लिए स्कन्दगुप्त को असंख्य शुभकामनाएं प्रेषित कीं। चीन जैसे देश के लिए इस बात से बढ़कर क्या खुशी हो सकती थी कि जिन हूणों की बाढ़ में यूनान-रोम और मिस्र की सभ्यताएं बह गईं और वह चीन भी विराट दीवाल का बांध बना लेने के बावजूद उनकी बर्बरता पर प्रभावी लगाम लगा पाने में नाकाम था, उन्हें भारत के गुप्तवंशैकवीर स्कन्दगुप्त विक्रमादित्य ने धरती से समूल उखाड़ डालने का संकल्प पूरा कर दिखाया।

महापराक्रमी स्कन्दगुप्त विक्रमादित्य यहीं पर नहीं रुके। हूणों के राजा के मारे जाने के बाद उसकी शेष शक्ति के उन्मूलन का व्यापक अभियान उन्होंने हाथ में लिया। कई कई रातें अश्व पर सवार होकर अपने सैन्यबलों के साथ उसने हूणों की भागती सेना को खदेड़ते हुए बिताईं। पश्चिमोत्तर में पेशावर पार तक पीछा किया तो हूणों के भागते और रास्ता भटके सैनिकों का सफाया गुजरात तक में हुआ। बीन बीनकर उसने हूणों के आतंक से भारत की धरती को मुक्त कराया। संपूर्ण उत्तर भारत ने मानो राहत की सांस ली। बच्चे-महिलाएं और बुजुर्गों ने उस महान व्यक्तित्व को हूणों पर असम्भव लगने वाली विजय प्राप्त कर वापस लौटते अपनी आंखों से देखा तो उसकी जय जयकार से आसमान गूंजा दिया, उसे देख देखकर झूम झूमकर असंख्य पुष्प मालाओं से गले लगा लिया।

इतिहास में अत्यंत प्रसिद्ध गुजरात के गिरनार पर्वत पर अंकित जूनागढ़ अभिलेख स्कंदगुप्त के गुजरात अभियान पर प्रकाश डालता है, जिसमें लिखा है कि- नरपति भुजंगानाम मानदोत्फणानाम प्रतिकृति गरुड़ानां निर्विषी चाव कर्ता....अर्थात जैसे गरुड़ भुजंग आदि सों का रक्तपान कर जाते हैं उसी तरह से उस महापराक्रमी ने हूण नामक विषैले सो के आतंक और अहंकार रूपी फन को सदा के लिए कुचल दिया