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Thotronics उमरता हुआ व्यावहारिक विज्ञान
May 1, 2016 • Lt. Col. A.V. Gupta (Retd.)

अनतर्दृष्टि से परिपूर्ण अनुभव व अवलोकन प्रायः वास्तविकता व प्रकृति को परखने का प्रवेश-द्वार है। जिस प्रकार पारस्परिक व्यवहार व गतिविधि के पीछे उच्चतम गति के कणों का योगदान होता है, क्या उसी प्रकार हमारे विचारों को, जो हर कण से ज्यादा गतिमान व तेज हैं, 'थॉट्रॉन्स नहीं कहा जा सकता?

थॉट्रॉन्स भले ही वैज्ञानिक खोज नहीं है, तथापि उसे बुनियादी मूलभूत पदार्थ जो कि इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन व क्वार्क तक सीमित है। एक मूलभूत कण होने के नाते उसके स्वरूप की खोज हो सकती है। ग्रंथों में इसका प्रमाण भी प्राप्त होता है। इसके अध्ययन से विज्ञान खास तौर पर भौतिक विज्ञान व अध्यात्मविज्ञान के नये आयाम खोजे जा सकते हैं। चारों मूलभूत शक्तियाँ नयी तरह की सोच-शक्ति को समाहित कर सकती हैं। ग्रंथो के आधार पर भविष्य का योग थॉट्रॉनिक योग होगा।

अकादमिक दुनिया के स्थानों में, ज्ञान के अधिग्रहण में सबसे कठिन हिस्सा धारणा का है। धारणा का मतलब है समझ- समझ की समग्रता। एक समझ है जो किसी के होने का एक हिस्सा बन जाता है। मंच तैयार है और समय देखती है और सूक्ष्म ऊर्जा, थॉट फर्सेज (थॉट्रॉन्स) के क्षेत्र में जाँच के लिए आ गया है।

पृथ्वी इलेक्ट्रो-परमाणु युग में चार सौ वर्ष है। मानव जाति ने सूक्ष्म ऊर्जा को समझने में असाधारण उन्नति की और संबंधित तकनीकी चमत्कार के फलस्वरूप मनुष्य प्रगति का आनन्द ले रहा है। सूक्ष्म ऊ र्जा के पैटर्न (साँचे) की खोज करने का कार्य प्रगति पर है।

आधुनिक भौतिकी ने परत-दर-परत पदार्थों को खोल दिया है तथा कोशिकाओं, अणु, परमाणु, सब-एटॉमिक कणों और ऊ र्जा के विभिन्न रूपों के बारे में सीखा है। जैवविज्ञान के क्षेत्र में भी गुणवत्ता जाँच की गई है। न्यूरो विज्ञान के क्षेत्र में शोध भी अच्छी गति के साथ आगे बढ़ रहा है।

भौतिक शरीर पदार्थ से बना है। यह स्थूल पदार्थ ऊतकों से निर्मित है जो अणुओं से बने होते हैं। अणु की रचना परमाणु से होती है और परमाणु की इलेक्ट्रॉन और प्रोटॉन से। इन प्रोटॉन व इलेक्ट्रांस में बुद्धिमान जीवनचेतना और ऊ र्जा निहित होती है। कई परमाणुओं से बना हमारा शरीर कम्पन व क्षमता में भिन्न होता है। एक परमाणु कंपन और गति का एक बिंदु हो सकता है। यह थरथानेवाली गति पहले एक विचार के रूप में और फिर एक ऊर्जा (थॉट्रॉन्स) के रूप में प्रकट होती है।

‘स्ट्रिंग थ्योरी' के अनुसार सूक्ष्म ऊर्जा के प्रतिरूप को स्ट्रिंग कहते हैं क्यूंकि वह एक वायलिन के गुर्दे की तरह कम्पन करता है। स्टिंग सिद्धान्त ब्रह्माण्ड की ऐसी छवि प्रकट करता है जो लौकिक स्वर-समता की तरह है- दैविक स्वरसंगति। जैसे ॐ की महँ रचना। स्ट्रिंग सिद्धान्त के आने के पश्चात् व हाल ही में खोजे गए मौलिक तत्त्व ‘क्वार्क' के बाद वैज्ञानिक सूक्ष्म ऊर्जा के क्षेत्र पर काफी काम कर रहे हैं।

पूरा मानव शरीर भौतिक, दैविक और सूक्ष्म तरीके से आयोजित किया गया है। जब आत्मा मौलिक कोशिका में प्रवेश करती है तब वह दो प्रकार के रूप में होती है : दैवीयरूपी चिंतन-शक्ति (थॉट्रोंस) व सूक्ष्मरूपी प्राण (लाइफट्रोंस)। हालांकि भौतिक शरीर कुल सोलह रासायनिक तत्त्वों से बना है, सूक्ष्म शरीर उन्नीस तत्त्वों से व दैविक शरीर तेईस सोच अथवा विचार- शक्ति से गठित होता है। (भगवद्गीता)।

पर्याप्त गुंजाईश है कि गहराई में जाकर सूक्ष्म शरीर के बारे में खोज की जाये व
वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर थॉट्रोंनिक शक्तियों के अस्तित्व को स्थापित किया जाये। उन्नत योगियों के अनुभव से यह ज्ञात होता है कि विचार प्रकाश के रूप में होता है, जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता की थॉट्रोंस के लक्षण फोटोंस से मिलतेजुलते होंगे। करेला के फोटोग्राफ़र द्वारा मानव आभा के मानचित्रण तथा चलचित्र द्वारा विचारों का प्रकाश-छवियों में स्थानांतरण इस तर्क को और बल प्रदान करता है कि थॉट्रोंस व फोटोंस में कुछ तो समान विशेषताएँ हैं। इस तर्क को इस बात से भी मजबूती मिलती है कि थॉट्रोंस व फोटोंस एक समान माध्यम ‘आकाश' का ही उपयोग करते हैं।

एक कोशिका से दूसरी कोशिका तक संदेश पहुँचने में सेलुलर कम्युनिकेशन न्यूरोट्रांसमीटर सहायक होते हैं। कोशिकाओं द्वारा मस्तिष्क के आवेगों के संचार को भी वैज्ञानिकों द्वारा समर्थन प्राप्त हो चुका है। इसका मतलब है कि इलेक्ट्रॉनिक व लाइफट्रोनिक शक्तियों का भौतिक व सूक्ष्म शरीर से कोई सामंजस्य है और इसको वैज्ञानिक सबूतों ने प्रमाणित भी किया है। अर्थात् अब वैज्ञानिक प्रमाण की आवश्यकता सिर्फ दैविक शरीर के लिए है। जिसे थॉट्रोंस की कर्मभूमि भी कहा जा सकता है, क्यूंकि यहाँ ही विचार-शक्ति मस्तिष्क में कार्यरत होती है।

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