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"ताना बाना से निर्मित कोटा डोरियाँ की कलात्मक साड़ियाँ"
August 30, 2019 • डॉ. मुक्ति पाराशर (शोध निदेशिका) हनी लड्डा (शोधात्री)

काेटा डोरिया साड़ी जिसने विश्व में अपनी पहचान को वस्त्र उद्योग में सर्वोच्च स्तर पर ला दिया है। आज कोटा डोरिया वस्त्र केवल महिलाओं की ही नहीं वरन् पुरूषों में भी इसको पसन्द किया जाता है। इन साड़ियों को सूती वस्त्र में सबसे आरामदायक माना जाता है। यह सिल्क कपड़े में भी उपलब्ध है। कॉटन की साड़ियों की खासियत है चौकड़ीनुमा डिजाइन से बेहद बारीक व बेहद हल्की होती है।

कोटा डोरिया का इतिहास देखा जाए तो यह साड़िया डोरिया व कोटा मसूरियाँ के नाम से प्रसिद्ध है। इस कपड़े की बुनाई मसुरियाँ नामक स्थान पर हुआ करती थी जिसे वर्तमान में मैसूर के नाम से जाना जाता है। यह वस्त्र मसुरियाँ मलमल के नाम से प्रसिद्ध है।

कोटा से 15 किलोमीटर दूर बुनकरों का एक गाँव है, कैथून। कैथून के बुनकरों ने चौकोर बुनाई से सादी साड़ी को अनेक रंगों और आकर्षक डिजाइनों में बुना है। सूती धागे के साथ रेशमी धागे और जरी का प्रयोग करके साड़ी की अलग डिजाइन बनाते है। साड़ी का काम बुनकर अपने घर में खड्डी लगाकर करते है। इसमें पहले सूत का ताना बुना जाता है फिर सूत या रेषम को चरखे पर लपेटकर लच्छियाँ बनाई जाती है। धागे को लकड़ियों की गिल्लियों पर लपेटा जाता है, फिर ताना-बाना डालकर बुनने का काम किया जाता है। इसमें भी असली व नकली डोरिया की पहचान वर्गो की संख्या से की जाती है। यदि साड़ी के पन्ने में वर्गो (चैक) की संख्या 300 हो तो असली कोटा डोरिया की साड़ी है और जिसमें वर्गो की संख्या 250 होती है वह नकली साड़ी होती है जिसे बनारस के पावरलूम पर बनाया जाता है।

 

ऐसा माना जाता है कि 17-18 वीं शताब्दी के बीच लगभग 1761 ई. में कोटा राज्य के राव किशोर सिंह के समय प्रधानमंत्री झाला जालिमसिंह ने मैसूर से बुनकरों को बुलाया था। इनमें कुशल बुनकर महमूद मंसूरिया था। उसने सर्वप्रथम यहाँ हथकरखा की स्थापना कर साड़ी बुनना शुरू किया। उसी के नाम से साड़ी का नाम मसूरिया साड़ी हो गया। यह चौकर बुनाई लोकप्रिय है। इसे एक पारम्परिक पिट लुम पर बुना जाता है इसके स्टार्ज में प्याज का रस और चावल का पेस्ट डाला जाता है और धागे को इतना मजबूत बनाते है कि अतिरिक्त वरिष्कार की जरूरत न हो।

साड़ियाँ कोटा में मसूरिया व कोटा के बाहर कोटा डोरिया के नाम से ही जानी जाती है। डोरिया का अर्थ है “धागा'। इन्हीं धागों से हथकरधा पर कलात्मकता से तानाबाना से बनी इन साड़ियों में कई विशेषताएँ है। यह शुद्ध कपास और रेशम से बनी होती है उन पर वर्ग की तरह पैटर्न होते है जिन्हें खाट कहा जाता है।

यह साड़ी का बेस ज्यादातर सफेद या बेज रंग का होता है। अब इसमें बदलावों और संशोधनों के साथ कपड़े की अंतहीन मात्रा, रंग और सभी प्रकार के श्रृंगार शामिल है। इसमें जरी के रूप में सोने व चाँदी के तार से भी काम होने लगा जिसे "पक्की जरी की साड़ी" कहा जाता है। इस काम के लिए आज कैथून में लगभग 500 बुनकरों के घर है। इसे अंसारी मुस्लिम समुदाय की ज्यादतर महिलाएँ व पीढ़ियाँ इस परम्परा को बनाये हुए है।

यहाँ हर घर में गढ़े करघे और चरखे देखना सामान्य है। इसमें प्रयुक्त धागे कर्नाटक, गुजरात एवं तमिलनाडु आदि स्थानों से मँगवाये जाते है। इस कपड़े में एक विशेष चमक होने के कारण सुन्दर लगती है और इनकी ज्यादातर आपूर्ति हैदराबाद, बैंगलोर, चैन्नई के साथ अब सम्पूर्ण भारत में पसन्द की जाने लगी है। विदेशों में भी इसकी डिमान्ड की जाती है। आजकल कोटा डोरियाँ से केवल साड़ियाँ ही नहीं वरन् इसकी कलाकारी व शिल्पकारी की उत्कृष्टता व आरामदायकता के कारण इससे शर्ट, कुरते, कुर्तियाँ, लैहंगे, टॉप, सलवार सूट, परदे, लेंपशेड्स आदि कई डिजाइनर उत्पादों में प्रयोग किया जाता रहा है। इसे गरमी में बेहद सुकुन मिलता है किन्तु इसे सर्दी में भी पहना जा सकता है। प्रायः यह तीन प्रकार का कोटा डोरिया होता है - (1) बेसिक प्लेन पोत डोरिया (2) ब्लोक प्रिन्ट (3) जरी बाडर। इन्हीं तीन में कई मोटिफ व बदलाव करके विभिन्न प्रकार का कार्य होने लगा है। बाजार में अब इसका सस्ता उत्पाद भी आने लगा है किन्तु असली डोरिया, पक्की जरी के साथ प्लेन लगभग 800 रु. से 50,000 रु. तक का मिलता है। इसमें प्लेन कोटा डोरिया कॉटन (सूती) व गोल्डन जरी के धागों से बनता है और ये सफेद होता है जिसे रंग चढाया जाता है। यह एक पारम्परिक तरिका है।

यह एक पारम्परिक तरिका है। दूसरे प्रकार में हाथ ठप्पा, छपाई या मुद्रण (Block Printing) से आकर्षक बनाया जाता है ।

जरी बार्डर विभिन्न रंगों व डिजाइन में बनता है। बॉडर पर कई कलात्मक आकृतियाँ या गोटा-पत्ती का प्रयोग होता है। इन्हीं साड़ियों में पक्का सोना व चाँदी लगाकर कीमती बनाया जाता है।

कोटा डोरियाँ में पारम्परिक शिवोरी, धनक, लहरिया, बाटिक, इकल आदि कलात्मक रूप में उपलब्धता है। डिजाइन में पशु, फूल, फल, ज्यामितिय व मानव आकृतियाँ भी आजकल प्रचलन में है। राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे ने इस उद्योग को विष्वस्तरीय बढ़ावा देने के लिए फैशन शो में कैटवाक किया। कोटा में इसका रामपुरा भैरू गली में मार्केट है जिसमें कई दुकाने है। जिन पर केवल यही उत्पाद उपलब्ध है। कोटा डोरिया आज विष्व में अपनी आरामदायकता व कलात्मकता के कारण पहचान बनाये हुए है।