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‘योग’ बनने तक करें ‘योग’
July 1, 2018 • Devendra Singh Sisuodiya

'योग' शब्द को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिल गई है। विडम्बना है कि इस शब्द की उत्पत्ति जहाँ हुई, वहीं पर उसका विरोध होने लगा। ‘योग’ तो विरोधी भी करते पर करे क्या, विरोध करना तो विपक्षियों का मूलभूत धर्म है, यही अनुलोम-विलोम का पहला अभ्यास है। वे शब्द का विरोध नहीं कर रहे, बल्कि उस प्रक्रिया का विरोध कर रहे जो युगों-युगों से हमारे वेदों में, इतिहास में, जीवनशैली में रची-बसी है। प्रक्रिया में कोई दोष नहीं, दोष इस शब्द को प्रचारित करनेवाले बाबाजी का है। याने ‘दुश्मन का दोस्त' हमारा 'दुश्मन' । 

‘योग’ एक प्रक्रिया है। योग जोड़ने का काम करता है- लौकिक को आलौकिक से, शरीर को आत्मा से, लोक को परलोक से, ...इसका काम है जोड़ना। पता नहीं क्यों इसका विरोध कर हम इसके मर्म की हत्या कर रहे हैं। एक बार पक्ष और विपक्ष- दोनों ‘योग’ कर देखे, सारी समस्या ही हल हो जायेगी, क्योंकि यह “अहंकार' को मारने का भी काम करता है।

ज्योतिष में ‘योग’ का अर्थ ‘संयोग' से है। देखो भाई आप इसे अपना लो, ‘योग’ से हो सकता है, आपके भी प्रधानमंत्री बनने के ‘योग’ बन जाए। क्योंकि ‘योग’ के बगैर कुछ सम्भव नहीं है। चाहे आप कितने भी युवा अनुभवी और पार्टी के चहेते क्यों न हों, ‘योग’ न होगा तो ज्यादासे-ज्यादा आप पार्टी के संरक्षक या मार्गदर्शक दल के सदस्य बनकर ही रह जायेंगे। मार्गदर्शक के हाल तो आप जानते ही हैं। बड़ी आस लिए बैठे थे कि कुछ ही दिनों में मुगल गार्डन की खुशबू से महक उठेगा जीवन, पर क्या करें उसके भी योग नहीं बने।।

'योग' शब्द संस्कृत की ‘युज' धातु से बना है, जिसका अर्थ है जोड़ना यानि शरीर, मन और आत्मा को एकसूत्र में जोड़ना। महान् ग्रन्थ योगसूत्र में पतञ्जलि ने कहा है- योगश्चित्तवृत्ति निरोध, यानि मन की वृत्तियों पर नियन्त्रण करना ही योग है। गीता में कहा गया है- योगः कर्मसु कौशलम्, यानि कर्मों में कौशल या दक्षता ही योग है। ‘योग’ को किसी ‘धर्म- सम्प्रदाय' से 'योग' याने अपने शरीर को आत्मा से अलग रखना है। जो अंधेरे से बाहर निकालता है, उसके अस्तित्व को हम कैसे नकार सकते हैं। वह हमें प्रकाश देता है। जो देता है, उसे तो नमन करने में कोई हर्ज नहीं। जब हम बस और हाईकमान की चरणवन्दना कर सकते है तो सूर्य को नमस्कार करने में क्या हर्ज है?

‘योग’ से मानसिक शान्ति मिलती है। सोच सकारात्मक होती है। यह दीगर बात है, सोच सकारात्मक हो गई तो हम राजधर्म कैसे निभायेंगे? हर काम में खोट कैसे ढूढेगे, सरकार के हर कदम का विरोध कैसे करेंगे, भगवाकरण को हवा कैसे देंगे? योग से एकाग्रता बढ़ती है और हम एक होकर तो रह नहीं सकते। एक हो गए तो किस मुद्दे पर राजनीतिक रोटियाँ सेकेंगे। खैर, जो भी हो ‘योग’ में बड़ी शक्ति है। भैया, इसी गली से निकलता है राजयोग का मार्ग ! राजपाठ मिले या न मिले, लेकिन स्वस्थ शरीर और मन ज़रूर मिलेगा। जब तक कोई ‘योग’ न बने, चलो ‘योग’ ही करते हैं, यही काम आनेवाला है।