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‘भारत माता-धरती माता' की संकल्पना की दार्शनिक आधार भूमि
March 1, 2019 • Prof. Rakesh Kumar Upadhayay

माता पृथ्वीः पुत्रोहम पृथिव्याः की चर्चा वेदकाल से करते चले आ रहे हैं। सनातन भारत के षडदर्शन और विशेष रूप से कश्मीर शैव दर्शन के सूक्ष्म स्वरूप का जो निचोड़ पुराणों में सूक्ष्म से स्थूल रूप में व्याख्यायित हुआ, वह बताता है कि संपूर्ण ब्रह्मांड उसी जगत जननी परांबा भगवती भवानी त्रिपुर सुन्दरी का स्वरूप ही है जिसके साथ चैतन्य रूप शिव जब एकाकार होते हैं तो यह ब्रह्मांड प्रकाशित हो उठता है। वह आदि अवस्था में ब्रह्मरूप यानी नाद रूप में रहता है, उसका मूल नाद ओंकार रूप है और समस्त विश्व उसी ओंकार का अलंकार है।

ऊर्जा और पर्यावरण की भारतीय संकल्पना के सन्दर्भ में चेतना और पदार्थ अर्थात कॉन्ससनेस और मैटर या नेचर शब्द की वयुत्पत्ति और इसके अर्थ का विकास समझे बिना विश्व और ब्रह्मांड के मातृ-स्वरूप को नहीं समझा जा सकता। पदार्थ अर्थात् मैटर और मैटेरियल शब्द की वयुत्पत्ति के पीछे भारत की आध्यात्मिक ज्ञान परंपरा के अवदान को समझने से भी मातृ संकल्पना स्पष्ट होती है।

प्रश्न है कि कैसे मैटर या मैटेरियल का सन्दर्भ भारतीय ज्ञान परंपरा और उसके मातृ-स्वरूपात्मक सन्दर्भ से जुड़ता है? इस सन्दर्भ की खोज हमें वेद और संस्कृत भाषा से जुड़े स्रोतों की ओर ले जाती है। हम तो माता पृथ्वीः पुत्रोहम पृथिव्याः की चर्चा वेदकाल से करते चले आ रहे हैं। सनातन भारत के षडदर्शन और विशेष रूप से कश्मीर शैव दर्शन के सूक्ष्म स्वरूप का जो निचोड़ पुराणों में सूक्ष्म से स्थूल रूप में व्याख्यायित हुआ, वह बताता है कि संपूर्ण ब्रह्मांड उसी जगत जननी परांबा भगवती भवानी त्रिपुर सुन्दरी का स्वरूप ही हैजिसके साथ चैतन्य रूप शिव जब एकाकार होते हैं तो यह ब्रह्मांड प्रकाशित हो उठता है। वह आदि अवस्था में ब्रह्मरूप यानी नाद रूप में रहता है, उसका मूल नाद ओंकार रूप है और समस्त विश्व उसी ओंकार का अलंकार है। किन्तु यह प्रक्रिया एकाकार होने के बाद की है, अन्यथा तो उसका स्वरूप अखंड शून्य अर्थात काली कराली (डीप डार्क) रूप ही रहता है।

पुराण काल में ऋषियों ने वेद एवं षड्दर्शनों से निकले इस ज्ञान को मानवीकृत किया। पौराणिक ग्रंथों ने सृष्टि के महालय और महासृजन को मनुष्य समेत पशु-पक्षी, समस्त देहधारियों के जीवन के साथ जड़-चेतन के रिश्ते के आधार पर देखा और सरल-सहज रूप में उसे मानुषीकृत करते हुए समाज को समझाने के लिए व्याख्यायित किया। जैसे मां और संतान का रिश्ता। जैसे गर्भ और सृजन का रिश्ता। ब्रह्मांड को गर्भ में धारण करने वाली भगवती के सम्मुख काल अर्थात समय भी शून्य होकर दंडवत खामोश पड़ा रहता है क्योंकि समय और सृष्टि-सृजन के सूत्रधार काल के महाकाल परम चैतन्य शिव ही भगवती के गर्भ में बीज रूप में अथवा कहिए बिन्दु या ध्यान रूप में निवास करते हैं। माता ही उन्हें जन्म देती है उन्हें और उनके आते ही पद को अर्थ मिलता है, पदार्थ का सृजन होता है। इस पदार्थ को ही आध्यात्मिक भारत ने उसके जागृत चैतन्य स्वरूप में मातृ या मातरम् का नाम दिया, वंदे मातरम। अंग्रेजी शब्द यूनिवर्स (UNIVERSE) भी शाब्दिक दृष्टि से इस सृजन प्रक्रिया को प्रमाणित करता है। अंग्रेजी ज्ञान स्रोतों और शब्दकोष के द्वारा यह स्पष्ट नहीं होता कि यूनिवर्स जिसका तात्पर्य ब्रह्मांड है, यह शब्द किस प्रकार से विकसित हुआ और कहां मौलिक रूप से उत्पन्न हुआ? अंग्रेजी शब्दकोष इसे लैटिन स्रोत से जोड़ते हैं। लैटिन स्रोतों में यूनिवर्सम या यूनिवर्स शब्द मिलता है जिसका तात्पर्य संपूर्ण ब्रह्मांड की वयुत्तपत्ति से लिया जाता है। लेकिन भारत में हम पारंपरिक ज्ञान के द्वारा जानते हैं कि माता के गर्भ से ब्रह्मांड की वयुत्तपत्ति होती है अर्थात ब्रह्मांड समेत हम सभी माता के योनिवर्ष यानी योनिस्थान से ही साकार रूप ग्रहण करते हैं। संसार में समस्त जीवधारियों की जन्म-प्रक्रिया को देखकर ही सृजन के पीछे मातृ स्वरुप की कल्पना करना सहज हो जाता है, इसे समझने के लिए कोई रॉकेट साइंस नहीं पढ़ना है। अंग्रेजी में यूनी अथवा यूनिट का तात्पर्य एक ईकाई बताते हैं तो भारतीय सनातन पौराणिक दर्शन से अनुस्यूत स्वर भी तो यही कह रहा है कि शिव और शक्ति जब एक होते हैं तभी योनिवर्ष (संस्कृत में वर्ष का मतलब स्थान, जैसे भारतवर्ष) से सृजन की प्रक्रिया प्रारंभ होती है। वह योनिवर्ष कहां स्थित है तो सनातन धर्मदर्शन परंपरा कहती है कि वह ज्ञान रूप में अवस्थित है। इस ज्ञान के संकेत को प्राप्त करने के बाद गहन-गंभीर ज्ञान के उच्च केंद्रों को अंग्रेजों ने यूनिवर्सिटी (अपभ्रंश यूनिवर्स-स्थिति) के रूप में परिभाषित करना शुरू किया होगा, ऐसा कहा जा सकता है।

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