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‘फीना' (बिजनौर) की स्वतंत्रता आंदोलनों में सहभागिता
January 1, 2019 • E. Hemant Kumar

भारत में स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन का लंबा इतिहास रहा है। विभिन्न पाठ्य पुस्तकों तथा अन्य पुस्तकों में हम यह इतिहास पढ़ते हैं। अत्यधिक विस्तृत होने के कारण स्वतंत्रता आंदोलन में बड़े नेताओं तथा बड़ी जगहों का ही विवरण मिलता है। देश के दूर- दराज इलाकों, ग्रामीण क्षेत्रों में स्वतंत्रता आंदोलन किस रुप में और किस गति से चला तथा वहाँ के गुमनाम सेनानियों ने किस प्रकार का संघर्ष किया यह विवरण बहत कम पढ़ने को मिलता है। इसी विषय पर शोध करते हुए प्रस्तुत लेख के लेखक इं. हेमन्त कुमार जी ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जनपद बिजनौर में स्थित, अपने गाँव फीना में घटित हुईं स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियों को कहानी के रूप में लिखा है। अगले 17 पृष्ठों पर फैला यह लेख उनके द्वारा लिखी जा रही ‘ग्राम फीना का परिचय एवं इतिहास' नामक पुस्तक का परिशोधनशील अंश है। इस कहानी में ग्राम फीना जैसे दूरस्थ क्षेत्रों में हुए स्वतंत्रता आंदोलन के अनेकानेक रंगों, पहलुओं तथा सामाजिक मनोवृतियों की झलक मिलती है, जिनका ऐतिहासिक रुप से अत्यधिक महत्व है। देश को आजाद हुए लगभग 70 वर्ष हो चुके हैं, इसलिए जिन क्रांतिकारियों ने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया था, उनमें से बहुत कम जीवित बचे हैं, तथा अनेक गुमनाम हैं।इस लेख को ग्राम फीना के दो ऐसे ही गुमनाम क्रांतिकारियों श्री प्रताप सिंह सैनी 'बेचैन', एवं श्री रामपाल सिंह ‘सब्दलपुरिया' तथा क्षेत्र के अन्य बुजुर्गों और जानकारों से वार्ता के आधार पर तैयार किया गया है, जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया था तथा सौभाग्य से अभी तक जीवित हैं।ग्राम फीना में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान घटी घटनाओं के बारे में बहुत ही कम जानकारी उपलब्ध है। एक-दो पुस्तकों में इसका उल्लेख अवश्य है, परंतु वह भी 10-15 लाइनों में ही है। इन लाईनों को पढ़कर तत्कालीन वातावरण, वास्तविक घटनाओं एवं देशकाल का अनुमान नहीं लग पाता, इस कमी को पूरा करने के लिए लेखक ने कहानी की शैली का प्रयोग करते हुए यह विस्तृत लेख लिखा है।इस कहानी की पटकथा एवं विभिन्न लोगों के बीच हुए संवादों की रचना उन्होंने अपनी कल्पना के आधार पर की है, और ऐसी शैली में है कि इतिहास-सम्मत होने के साथ-साथ पाठकों को उस समय की परिस्थितियों, देशकाल तथा वातावरण का आभास करा सके।

'दी कोर' का जनवरी 2019 अंक, इस लेख के माध्यम से, परतन्त्र भारत के स्वतंत्रता प्रेमी ग्रामीण जन मानस तथा वहाँ के गुमनाम रह गए अनेकानेक क्रांतिकारीयों को नमन करते हुए, उनके देशप्रेम एवं बलिदानों के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करता है।     -सम्पादक

कई दिक्कतों के बावजूद, 'ईस्ट इंडिया कंपनीने धीरे-धीरे भारत के कई हिस्सों से बड़ा व्यापार करना शुरू कर दिया था, इससे कम्पनी काफी बड़ी होती चली गयी। सन् 1750 तक आते-आते इसका लाभ कई गुना बढ़ गया था, और कम्पनी बहुत मालदार हो गयी थी। इंग्लैंड के अलावा पुर्तगाल तथा फ्रांस की भी कुछ व्यापारिक कंपनियां भारत में व्यापार कर रही थीं।'ईस्ट इंडिया कंपनी' को लगता था कि उनके कारण हमारा लाभ कम हो जाता है। एक तो 'ईस्ट इंडिया कंपनी' को व्यापार से होने वाले लाभ का लालच बढ़ता जा रहा था।....

भारत में स्वतंत्रता आन्दोलन की पृष्ठभूमि

इतिहास के अनुसार, अनेक विदेशियों ने भारत आकर, राज करने का प्रयास किया। सिकंदर, शक, कुषाण, मोहम्मद बिन कासिम, मोहम्मद गजनी, मोहम्मद गौरी, मंगोल, तैमूर, बाबर, नादिरशाह, डच, फ्रांसिस, ब्रिटिश इनमें प्रमुख थे। ब्रिटिश सबसे बाद में आए, इन्हें आमतौर पर अंग्रेज नाम से भी जाना जाता है। इनमें से अनेक आक्रांता वापस चले गए, परंतु कई ने यहाँ भारतीयों को हराकर लंबा राज किया। यूँ तो भारत के लोगों ने यथासम्भव सभी विदेशियों का विरोध किया और लड़ाई लड़ी। परंतु इतिहासकार अंग्रेजों से देश को आजाद कराने के लिए लड़ी गई लड़ाई को ही स्वतंत्रता आंदोलन कहते हैं। भारत में अंग्रेजों का प्रथम आगमन व्यापार करने के उद्देश्य से हुआ था। यह सन् 1600 के आस-पास की बात है। भारत के साथ व्यापार करने में उनको बहुत लाभ हुआ, अच्छा लाभ देखकर चार-पाँच सालों के अंदर ही यूरोप तथा इंग्लैंड से अनेक लोग, व्यापारिक समूह बनाकर भारत आने लगे। सन् 1612 में 'ईस्ट इंडिया कंपनी नाम की एक व्यापारिक कंपनी, इंग्लैण्ड से भारत आयी। इसने व्यापार से बहुत लाभ तथा सफलता प्राप्त करीतब भारत में मुगल शासक जहाँगीर का राज था। जहाँगीर के व्यापारिक नियम एकदम स्पष्ट, साफ-सुथरे तथा सभी के लिए एक समान थे। उसके दरबार का एक नियम, यह भी था कि, व्यापारी लोग दरबार में राजा के सामने बैठ नहीं सकते तथा खड़े-खड़े और झुककर ही बात करेंगे। इसके साथ ही कम्पनी के मालिक को पुत्र समान सम्बोधन किया जाता था। अंग्रेज व्यापारी इसे अपमानजनक समझते थे, परंतु लाभ के लालच में कुछ कह नहीं पाते थे। साथ ही अंग्रेजों को जहाँगीर नियमों से भी नुकसान महसूस होता था, क्योंकि अन्य व्यापारियों की तुलना में उनका देश अधिक दूर था, जिससे आनेजाने का खर्च बढ़ जाता था। उन्हे व्यापारिक नियमों का बंधन तथा शासकों की जी-हुजूरी करना बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था।

कई दिक्कतों के बावजूद, ‘ईस्ट इंडिया कंपनी ने धीरे-धीरे भारत के कई हिस्सों से बड़ा व्यापार करना शुरू कर दिया था, इससे कम्पनी काफी बड़ी होती चली गयी। सन् 1750 तक आते-आते इसका लाभ कई गुना बढ़ गया था, और कम्पनी बहुत मालदार हो गयी थीइंग्लैंड के अलावा पुर्तगाल तथा फ्रांस की भी कुछ व्यापारिक कंपनियां भारत में व्यापार कर रही थीं'ईस्ट इंडिया कंपनी को लगता था कि उनके कारण हमारा लाभ कम हो जाता है। एक तो 'ईस्ट इंडिया कंपनी को व्यापार से होने वाले लाभ का लालच बढ़ता जा रहा थादूसरे साथ ही उन्हें मुगल दरबार के नियम भी अच्छे नहीं लगते थे। इसलिए उसके मन में आया कि, यदि भारत की जमीन पर हमारा कब्जा हो जाए तो बहुत लाभ होगा। एक तो अपने मनमुताबिक नियम बना सकेगे दूसरे वस्तुओं के मूल्य निर्धारण तथा व्यापार में मनमानी की जा सकती है, तीसरे जमीनों पर कब्जा करके, कृषि उपज के माध्यम से कई गुना अधिक लाभ कमाया जा सकता है, चौथे किसी भारतीय राजा के आगे झुकना भी नहीं पड़ेगा। यह सोच कर 'ईस्ट इंडिया कंपनी ने चोरी-छिपे अपनी सैन्य शक्ति बढ़ानी शुरू कर दी और किसी छोटेमोटे राजा से युद्ध करके जीतने के उचित अवसर की तलाश करने लगी। धीरे-धीरे कंपनी की सैनिक शक्ति काफी बढ़ गई थी, अब उसके बल पर वह बंगाल के क्षेत्रीय प्रशासन में अनावश्यक दखल देने लगी और व्यापार में मनमानी करने लगी। बंगाल के तत्कालीन नवाब को ईस्ट इंडिया कंपनी के अनुचित मनसूबों का पता चल गया और उसने 'ईस्ट इंडिया कंपनी को नियमों के अंदर रहकर काम करने के लिए कहा। परंतु 'ईस्ट इंडिया कंपनी' तो युद्ध की फिराक में थी, उसने एक न सुनी और उल्टे, नवाब को उकसाने वाले काम करने लगी। पानी सिर के ऊपर जाता देख, बंगाल नवाब ने ईस्ट इंडिया कंपनी पर अंकुश लगाने के लिए युद्ध का ऐलान कर दिया। 30 जून 1757 को बंगाल के प्लासी नामक स्थान पर युद्ध हुआ। ईस्ट इंडिया कंपनी का सेनापति लॉर्ड क्लाइव था। लॉर्ड क्लाइव बहुत चतुर था, उसने युद्ध से पहले ही बंगाल नवाब के कई प्रभावशाली लोगों को लालच-रिश्वत देकर अपनी तरफ मिला लिया था। इसलिए बंगाल का नवाब बहुत आसानी से हार गया। इस तरह 'ईस्ट इंडिया कंपनी ने सन् 1757 को भारत की जमीन पर अपना पहला राज्य स्थापित किया। बंगाल के ऊपर जीत से 'ईस्ट इंडिया कंपनी' को लगभग 52 करोड़ रुपए का बहुत बड़ा खजाना मिला।

कम्पनी को आशंका थी कि, चूंकि हम लोग विदेशी हैं, इसलिए कहीं भारत के सभी राजा एक होकर हमारे खिलाफ देशी-विदेशी की भावना से लड़ाई न करने लगे। परंतु भारतीय राजाओं में न तो एकता थी और न ही दूरदृष्टि। इसलिए किसी एक की हार पर दूसरे भारतीय राजा खुश होते थे। अंग्रेजों ने भारतीय राजाओं की यह कमी अच्छी तरह समझ ली और वे दुगने उत्साह से भारत के अन्य राजाओं पर विजय हासिल करने की योजना बनाने लगे। 'ईस्ट इंडिया कंपनी ने एक के बाद एक अनेक राजाओं को जीतना शुरू कर दिया। सन् 1800-1810 तक कंपनी ने बंगाल से दिल्ली तक अपना राज स्थापित कर लिया था। इस क्षेत्र में मुरादाबाद-बिजनौर का भी क्षेत्र सम्मिलित था।

कर वसूली का नया तरीका और जनता का आक्रोश

सन् 1750-1800 के बीच भारत में कोई एक मजबूत राजा नही था। पूरा भारत अनेक छोटे-छोटे देशों में बटा हुआ था, इनके शासक अपना-अपना राज्य बढ़ाने के लिए एक-दूसरे पर आक्रमण की कोशिश में लगे रहते थे, दिल्ली से लखनऊ के बीच स्थित क्षेत्रों में भी अनेक लड़ाईयाँ हुई। आपसी लड़ाईयों से जहां एक ओर क्षेत्र की जनता त्रस्त थी, वहीं राजा भी आपस में लड़-लड़कर धन और बल से कमजोर हो गए थे। राजाओं की आय का बहुत बड़ा हिस्सा अपने क्षेत्र की सुरक्षा में ही खर्च हो जाता था, साथ ही जान का जोखिम भी रहता था। ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपनी आय बढ़ाने के लिए कई नीतियां तैयार की जिसमें एक यह थी कि राजाओं को कंपनी के सैनिकों द्वारा सुरक्षा प्रदान की जाएगी, और इसके बदले राजाओं को कंपनी द्वारा तय की गई रकम जनता से वसूल करते हुए राजस्व के रूप में चुकानी होगी। यह रकम खेतों के रकवे तथा उपज के अनुमान के आधार पर तय की जाती थी। धनराशि तय करके, उसे वसूलने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी क्षेत्रीय राजाओं को ठेका दे देती थीइस नीति में कम्पनी जनता से सीधे कर नहीं वसूलती थीक्षेत्रीय राजा इस रकम को वसूल कर अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी को देते थे। इस नीति के कारण कुछ ही वर्षों में क्षेत्रीय राजाओं की प्रतिष्ठा एवं ताकत घटकर बहुत कम हो गई। वह अंग्रेजों के पिछलग्गू भर रह गए। उनकी सैन्य शक्ति घटकर एकदम कम हो गई तथा वह किसी के भी साथ युद्ध करने लायक नहीं बचे। घटती शक्ति के कारण धीरेधीरे इन राजाओं को चौधरी, राय साहब या जमींदार के नाम से पुकारा जाने लगा, और इनके क्षेत्र को आमुक देश के बजाय रियासत कहा जाने लगा। चौधरी, राय साहब या जमींदार कहने भर को रियासत के मालिक होते थे, हुक्म ईस्ट इंडिया कंपनी का ही चलता था। एक रियासत में कुछ से लेकर सैकड़ों गाँव तक हो सकते थेजमींदार अंग्रेजों से तय हुई ठेके की रकम से जितना चाहे उतना अधिक कर वसूल सकते थे। कर वसूलने के बदले अंग्रेज अपने सैनिक दस्ते की सहायता से उसकी जमींदारी में किसी और को नहीं घुसने देते थे। अंग्रेजों को सिर्फ ठेके की रकम से मतलब था। तय रकम से ऊपर की आमदनी पर जमींदार का अधिकार हो जाता था। इस कारण जमींदार लोग अधिक से अधिक कर वसूलने के चक्कर में लग गए और किसानों तथा व्यापारियों का भारी शोषण होने लगा। (हालांकि फसल नष्ट होने या किसी आपदा के कारण उपज कम होने पर कुछ दयावान जमींदार कर में छूट भी कर देते थे। यदा-कदा कम्पनी प्रशासन से कह-सुनकर भी करों में छूट मिलने के प्रसंग सुनने में आते हैं।) इस तरीके से अंग्रेजों को किसानों का सीधा सामना नहीं करना पड़ता था और कमरतोड़ कर उगाही से पैदा हुए जन-आक्रोश तथा गालियों से वह बच जाते थे। सीमा से अधिक कर वसूली में जनता जमींदारों को ही दोषी समझती थी।

ईस्ट इंडिया कंपनी की मजबूत तथा उस समय के आधुनिक हथियारों से सुसज्जित सेना के अपने साथ होने से, जमींदारों को किसी के आक्रमण का डर नहीं रहता था। इसलिए 1840-50 के दशक के आते-आते सभी रजवाड़े-नवाब, छोटे-बड़े शासक 'ईस्ट इंडिया कंपनी को अपने पक्ष में करना चाहते थे। जिन राजाओं ने ‘ईस्ट इंडिया कंपनी' की उक्त नीतियों का विरोध किया, दुर्भाग्य से उनमें से अधिकतर को सीधे युद्ध में हरा दिया गया। सन् 1810 तक, ‘ईस्ट इंडिया कंपनी ने दिल्ली पर भी कब्जा कर लिया, इसके बाद 'ईस्ट इंडिया कंपनी का लालच और बढा, उसने अधिक-से-अधिक धन कमाने के उद्देश्य से शोषणात्मक नीतियाँ बनाना शुरू कर दियाजमींदारों ने इन नीतियों का पालन करते हुए आम जनता का खूब शोषण किया। जो भी व्यक्ति इन नीतियों का विरोध करता, उस को कड़ी से कड़ी सजा दी जाती थी, तथा उसकी आवाज को दबा दिया जाता।

'ईस्ट इंडिया कंपनी के भारी शोषण से तंग आकर अन्ततः 10 मई 1857 को मेरठ छावनी में सैनिक विद्रोह हो गया। जिसकी आग शीघ्र ही पूरे देश में फैल गई। भारत में स्वतंत्रता आंदोलन की शुरूआत 10 मई 1857 को मेरठ में हुए इसी विद्रोह से ही मानी जाती है। यह क्रांति 'ईस्ट इंडिया कंपनी को देश से भगाने के लिए हुई थी। यह प्रयास पूर्णतया विफल हो गया थाइस बीच इंग्लैंड के शासकों ने ईस्ट इंडिया कंपनी से भारत का राज छीनकर अपने पास ले लिया। 1858 से 1947 तक भारत में ब्रिटिश राज रहा। ब्रिटिश राज में भी भारत से अधिक-से-अधिक लूट मचाने की नीति में कोई बदलाव नहीं आया और नए तरीकों से शोषण शुरू कर दिया गया।

10 मई 1857 को आरम्भ हुई क्रांति एक साल के अन्दर ही अंग्रजों द्वारा दबा दी गई थी। इस हार से भारतीयों के स्वाभाविमान को बहुत ठेस पहुँची थी, और उन्होने बहुत अपमानित महसूस किया। प्रतिक्रिया स्वरूप, सबमें एक नई सोच का विकास हुआ, कि हमें हर हाल में अंग्रेजो को देश से भगाना है, और अपना खुद का राज अर्थात स्वराज लाना है। इस समय तक जनता में राष्ट्रीयता की भावना का विकास नहीं हो पाया था, स्वराज पाने के लिए जनता का सहयोग जरूरी था। इसलिए जनता में राष्ट्रीयता की भावना का विकास करने के लिए अनेक बुद्धिजीवी प्रयत्नशील हो गए, शुरूआत ऋषि दयानंद ने की। बाद में विवेकानन्द, गोखले, तिलक, लाला लाजपत राय आदि लोगों ने इस अभियान को आगे बढ़ाया। इन सब ने मिलकर राष्ट्रीयता तथा स्वराज की भावना एवं जरूरत को जन-जन तक पहुँचाने में अथक परिश्रम किया। अंग्रेजों ने इस काम में बहुत अवरोध पैदा किए, परन्तु राष्ट्रीयता की भावना फैलती ही गई। महात्मा गाँधी, सुभाषचन्द्र बोस, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, भगत सिहं, उधम सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, राजगुरू, सुखदेव, रामप्रसाद बिस्मिल आदि महान सेनानियों की नई फौज इस आन्दोलन में कूद पड़ी। ये सेनानी अपना पूरा समय देशहित में व्यय करने लगे, और कई ने अपना जीवन देश को समर्पित कर, लोगो के सामने देशभक्ति की नई मिशाल पेश की। इनके त्याग, सर्मपण और बलिदान से आम जनता पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा, और वह भी इनके साथ अन्दोलित हो उठी। नेताओं ने जनता के सहयोग से, अंग्रेजों की भारी खिलाफत करनी शुरू कर दी। शासन का विरोध करने पर अंग्रेजो ने लाखों भारतीयों को मरवा दिया। परन्तु देशवासी 15 अगस्त 1947 को आजादी मिलने तक, किसी न किसी आन्दोलन के माध्यम से अंग्रेजों का विरोध करते ही रहेइस दौरान देश में अनेक घटनाएँ एवं आन्दोलन हुए, जिनमें से महत्वपूर्ण, का विवरण आगे दिया गया है।

(1) सन् 1857 का पहला स्वतंत्रता संग्राम

(2) सन् 1885 में कांग्रेस की स्थापना एवं प्रसार

(3) सन् 1919 का असहयोग आंदोलन

(4) सन् 1930 का नमक सत्याग्रह एवं सविनय अवज्ञा आंदोलन

(5) सन् 1940 का व्यक्तिगत सत्याग्रह

(6) सन् 1942 का अंग्रेजों भारत छोड़ो' अथवा भारत छोड़ो अथवा 'करो या मरो' आंदोलन

सन् 1885 में कांग्रेस की स्थापना एवं प्रसार

सन् 1857 की क्रांन्ति में हालांकि ईस्ट इंडिया कंपनी' जीत गई थी, परन्तु इसमें ईस्ट इंडिया कंपनी के अनेक लोग मारे गए तथा अपमानित किए गए थेचूंकि इनमें से अधिकतर इंग्लैंड के थे, इसलिए दुनिया भर में इंग्लैंड की भी बहुत बदनामी हुई। तत्कालीन ब्रिटिश राज, ने झेंप मिटाने के लिए 'ईस्ट इंडिया कंपनी' से सन् 1858 में भारत की सत्ता छीनकर अपने अधिकार में कर ली। हालांकि सत्ता छीनने के और भी कारण थे, जैसे-ब्रिटिश सत्ता सोचने लगी थी कि भारत से जो लाभ व्यापारी उठा रहे थे, वह हमें मिलने लग जाए। 1858 से स्वतंत्रता प्राप्ति तक भारत पर किए गए शासन को ‘ब्रिटिश राज के नाम से जाना जाता हैसत्ताधारी बदलने से भारतीयों को आगे के संर्घष इंग्लैण्ड राष्ट्र अर्थात ब्रिटिश राज के खिलाफ करने पड़े, जिसकी सैन्य तथा कूटनीतिक ताकत ईस्ट इंडिया कम्पनी की तुलना में कई गुना अधिक थी।

ब्रिटिश राजतंत्र बहुत दूर तक सोचता था। उन्होने 1857 में भारतीयों द्वारा की गयी क्रांति के कारणों को ढूंढना तथा विश्लेषित करना शुरू किया, ताकि भविष्य में ऐसी परिस्थितियाँ दोबारा न पैदा हों। क्रांति का एक बड़ा कारण यह निकल कर आया कि अंग्रेजों और भारतीयों के रहनसहन, वेष-भूसा, विचार, धार्मिक रीति-रिवाजों में जमीन-आसमान का अंतर था। इस कारण भारत के अनेक बुद्धिजीवी तथा प्रभावी लोग अंग्रेजों के अधीन रहने के खिलाफ हो गए थे। अंग्रेजों ने भारतीय राजाओं की इस सोच के निराकरण के लिए अनेक उपाय किए। जैसे

1. भारत के लोगों को ब्रिटेन में बुलाकर अंग्रेजी शिक्षा लेने की परिपाटी शुरू की। उन्होंने सोचा जब भारत के सबसे बुद्धिमान लोग इंग्लैंड में कई साल रहकर अध्ययन करेंगे तो अवश्य ही वो हमारे अनुयायी बन जाएंगे और भारत में लौटने पर हमारे सहयोगी के रूप में काम करेंगे। इंग्लैण्ड में रहने के दौरान हम उन्हें अपनी संस्कृति का आदी बना देंगे, जिससे भारत वापस लौटने पर वे हमारी संस्कृति को ही श्रेष्ठ बताएंगे, और भारत की जनता भी गुमराह होगी। इस योजना के अंतर्गत भारत से हर वर्ष सैकड़ों छात्र इंग्लैण्ड जाकर वहाँ की पद्धति से शिक्षा ग्रहण करने लगे। हालांकि यह दांव भी अंग्रेजों को उल्टा पड़ा। राष्ट्रीय स्तर के अधिकांश स्वतंत्रता सेनानी इंग्लैण्ड से पढ़कर लौटने वाले ही थे। और इनमें भी अधिकतर वकील थे। भारतीयों ने अंग्रेजी शिक्षा पद्धति से जो ज्ञान और कुशलता प्राप्त की, उसका प्रयोग अंग्रेजों को देश से निकालने में किया।

2. एक रिटायर्ड अंग्रेज अधिकारी ए.ओ. ह्यूम ने भारत में सन् 1885 को ‘कांग्रेस' नामक संगठन की स्थापना की। जिसका दिखावटी उद्देश्य भारत के आम लोगों तथा ब्रिटिश शासन के बीच सौहार्दपूर्ण वातावरण बनाना था। तथा असली उद्देश्य, स्वराज की मांग को दबाने के लिए, भारत के मुखर तथा महत्वाकांक्षी लोगों को ब्रिटिश शासन में नाम भर का हिस्सेदार बनाना था, ताकि ये लोग स्वराज की माँग पर यह सोचकर चुप रहें कि आखिरकार वह तो ब्रिटिश शासन में शामिल हैं हीं। एक प्रकार से यह भारत के सक्षम-सबलविचारवान लोगों को अपना पिटू बनाने का नया तरीका था, जैसा 'ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने यहाँ के योद्धा वर्ग को राय साहब तथा जमींदार बनाकर अपना पिछलग्गू बना लिया थाअंग्रेजों की यह योजना सफल नहीं रहीहालांकि इसमें शुरू से ही बड़ी संख्या में भारतीय लोग शामिल होने लगे थे, परंतु कुछ ही समय में उन्होंने इसकी घातक तथा परोक्ष नीतियो को कुचलकर अपने स्वदेश प्रेम से ओत-प्रोत कर दिया। महात्मा गाँधी के स्वतंत्रता आंदोलन में कूदने के बाद तो कांग्रेस देश-प्रेम का दूसरा नाम बन गई। भारत के स्वतंत्र होने से पहले ‘अंग्रेजी सरकार' कांग्रेसियों को अपना दुश्मन मानती थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के कुछ समय बाद तक लोग कांग्रेसी होने पर गर्व करते थे(कांग्रेस को बढ़ावा, देश को स्वतंत्रता दिलाने के लिए दिया गया था, इसलिए 1947 में जब स्वतंत्रता मिल गयी थी तब गांधी जी ने इसे खत्म करने का आव्हान किया था, ताकि राजनैतिक दल सत्ता हासिल करने के लिए कांग्रेस के नाम का गलत फायदा न उठाने लगे।)

फिर भी उक्त दोनों नीतियों से भारत में कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। जैसे कांग्रेस के प्रयास से भारत के मूल निवासी प्रतिनिधि के रूप में ब्रिटिश शासन में पहुँचने लगे तथा वहाँ उन्हे देशहित की बात करने और उसके अनुसार नीतियाँ प्रस्तुत करने का भी कुछ अधिकार मिल गया। दादाभाई नरौजी सबसे पहले भारतीय प्रतिनिधि बने थे। इंग्लैण्ड से पढ़कर भारत लौटने वाले बहुत लोग कांग्रेस में शामिल होने लगे, क्योंकि उस समय ब्रिटिश सत्ता के सामने अधिकार प्राप्ति के लिए वही सबसे आसान रास्ता था। कांग्रेस की एक सभा में ही भारत के प्रतिनिधियों द्वारा सबसे पहले अखिल भारतीय एकीकृत राष्ट्रवाद की अवधारणा पर चर्चा की गई थी। उधर जैसे-जैसे भारतीय लोग ब्रिटेन से पढ़ाई करने के बाद लौटकर भारत आए, वैसे-वैसे कांग्रेस में शामिल होने वाले बुद्धिजीवी लोगों की संख्या बढ़ती गई। इस कारण भारत में राष्ट्रीय एकीकरण तथा एकीकृत राष्ट्रीय शासन प्रणाली की इच्छा मजबूत होती गयी। प्रतिवर्ष पचासों छात्र इंग्लैंड जाकर वहां की शिक्षा प्राप्त करने लगे। इंग्लैंड में रहने के दौरान उन्होंने वहां की शासन पद्धति, आम जनता के अधिकार तथा शासन द्वारा दी जाने वाली सुविधाएँ, कर वसूली की संतुलित प्रणाली, और मजबूत राष्ट्रवाद को गहराई से देखा-समझा। इंग्लैंड से लौटने वाले अधिकांश भारतीय, ब्रिटिश जैसे राष्ट्रवाद के भारत में होने की कल्पना करते थे।

भारत के लोग स्वतंत्रता प्रेमी, सहासी तथा वीर तो थे, परंतु उनमें एक तो राष्ट्रीयता की भावना का घोर अभाव था, दूसरी ओर अंग्रेजों के लड़ने के हथियार अधिक उन्नत थे, इस कारण युद्ध में अंग्रेजों से जीतना संभव नहीं था। ऐसे में भारतीय बुद्धिजीवियों ने इंग्लैण्ड के शासकों से बातचीत के माध्यम से ही स्वतंत्रता हासिल करने की बात सोची। अंग्रेजों के राज में भी कार्यालयों के ज्यादातर काम भारतीय कर्मचारी ही निबटाते थे, तथा सेना में भी अधिकांश भारतीय लोग ही थे। इसलिए एक आशा की किरण नजर आ रही थी कि, यदि सभी भारतीय लोग अंग्रेजों का साथ देना छोड़ दें तो वे लोग खुद-ब-खुद मजबूर हो कर चले जाएंगे। अग्रणी देशभक्तों के सामने यह चुनौती थी कि वे आम जन मानस को जागरूक करके अंग्रेजों के विरुद्ध कैसे खड़ा करें? यह बहुत चुनौतीपूर्ण काम था, क्योंकि एक तो भारत का विस्तार बहुत अधिक है, और दूसरे अधिकांश लोग दूर-दराज के गाँवो में रहते थे और देश के प्रति जागरूक नहीं थे। इन परिस्थितियों में जनता तक अपनी बात पंहुचाना आसान काम नहीं था। इस काम के लिए एक ऐसे मजबूत संगठन की आवश्यकता थी, जिसे देशभक्त, कर्मठ तथा निडर लोग चलाए।

इसी बीच महात्मा गाँधी विदेश से शिक्षा आदि प्राप्त करके भारत लौटे। डॉ राजेंद्र प्रसाद, नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, महादेव देसाई, सुभाषचंद्र बोस, चितरंजन दास, लाला लाजपत राय, बिपिन चंद्रपाल, बालगंगाधर तिलक जैसे महान सेनानियों के बीच गाँधी जी ने अपनी शैली से विशिष्ट छाप छोड़ी। उनके नेतृत्व से आन्दोलनों को नई ऊँचाईयाँ मिली। वह सर्वमान्य नेता हो गए। यह काल महात्मा गाँधी युग कहलाया। गाँधी जी सहित अन्य शीर्ष नेताओ ने जनता तक अपनी बात पहुँचाने तथा आम आदमी को भी स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ने के लिए कांग्रेस को उपयुक्त पाया। महात्मा गाँधी ने देशवासियों से भारी संख्या में कांग्रेस में शामिल होने की अपील की। गाँव-गाँव, शहर-शहर कांग्रेस की ईकाईयाँ/कमेटियाँ बनाई जाने लगी। इस अपील के कारण हजारों लोग 'कांग्रेस में शामिल हो गए। गाँधी युग में कांग्रेस स्वतंत्रता आंदोलन का दूसरा नाम बन गई थी। कांग्रेस द्वारा अनेक महत्वपूर्ण आंदोलन किए गए। एक समय ऐसा आ गया, जब कांग्रेस से जुड़ने वाले हर व्यक्ति को, अंग्रेज अपना दुश्मन मानने लगे थेउन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन को अवरूद्ध करने के लिए कांग्रेस पर प्रतिबंध भी लगा दिया था। कांग्रेसियों को पुलिस प्रताड़ित करती थी, इसलिए अनेक लोग इसमें शामिल होने से बचते भी थे।

ग्राम फीना में स्वतंत्रता आंदोलनों की लहर

फीना, जिला बिजनौर का एक ऐतिहासिक और बड़ा गाँव है। यह गांव बिजनौर शहर से दक्षिण-पूर्व में, नूरपुर-नौगावां-अमरोहा मार्ग पर स्थित है। जिला मुख्यालय बिजनौर से सड़क मार्ग द्वारा इसकी दूरी लगभग 50 किलोमीटर है। अंग्रेजी काल में जब संचार के साधन बहुत कम थे, तब यह दूरी, बहुत अधिक मानी जाती थी, और ऐसे गाँवों को दूरस्थ गाँवों में गिना जाता थाइस हिसाब से फीना भी एक दूरस्थ गाँव थादेखने में आया है कि मुख्य शहरों से दूर बसे गाँवों में विकास, और समसामयिक खबरों के साथ-साथ आंदोलनों की लहर भी देर से पहुँचती है। परन्तु दूरस्थ गाँव होने के बावजूद भी फीना के लोगों की, स्वतंत्रता आंदोलन में सहभागिता 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम से ही होने लगी थी, जोकि उत्तरोतर बढ़ती गई। इस गाँव ने उपरोक्त वर्णित सभी आंदोलनों में से सबसे उल्लेखनीय तथा अग्रणी भूमिका सन् 1942 के अंग्रेजो भारत छोड़ो' में निभाई। हालांकि स्वतंत्रता के शुरूआती आंदोलनों की गतिविधियां भी यहाँ चल रही थीजिनमें भाग लेने वाले कुछ सेनानियों का पुस्तकीय प्रमाण भी मौजूद है। सरकारी अभिलेखों के अनुसार ग्राम फीना से सन् 1942 के अंग्रेजो भारत छोड़ो आंदोलन में 14 लोग जेल गए थे, तथा अन्य स्रोतों के अनुसार लगभग डेढ़ सौ लोगों ने भाग लिया था। किसी एक गाँव के लोगों द्वारा स्वतंत्रता आंदोलन में इतनी बड़ी संख्या में भाग लेने का उदाहरण कहीं और सुनने को नहीं मिलता

फीना में कांग्रेस की स्थापना एवं प्रसार

कांग्रेस की कमेटी, ग्राम फीना में भी गठित की गई। फीना निवासी श्री बसंत सिंह उर्फ वालिएंटर साहब, पुत्र न्यादर सिंह कदरु तथा श्री रणधीर सिंह पोटिया पुत्र मुन्ना सिंह सन् 1925-26 में कांग्रेस से जुड़ गए थे। ये लोग कांग्रेस में शामिल होने वाले ग्राम फीना के आरंभिक कार्यकर्ता थे। इनके अलावा जयदेव सिंह दिसौन्धी, दिलीप सिंह, धर्म सिंह, क्षेत्रपाल सिंह दिसौन्धी, डॉ. भारत सिंह तथा होरी सिंह भी निश्चित रूप से कांग्रेस में शामिल हुए थे

रतनगढ़ में 1892 में जन्में महावीर त्यागी एवं इनके बड़े भाई धर्मवीर सिंह त्यागी, राष्ट्रीय स्तर के नेताओं के साथ आंदोलन करने वाले, जिला बिजनौर के कुछ एक आंदोलनकारियों में से थे, और इन्होने जिला बिजनौर में कांग्रेस की स्थापना करने में अग्रणी भूमिका निभाई थी। चूंकि ग्राम रतनगढ, फीना से लगभग 3.50 किलोमीटर ही दूर है, इसलिए अनुमान है कि फीना में भी 1920-21 के आस- पास कांग्रेस कमेटी का गठन हो गया होगा।

‘नमक सत्याग्रह' एवं 'सविनय अवज्ञा आंदोलन' में फीना की भागीदारी

नमक सत्याग्रह को ही विस्तार देते हुए ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन किया गया था। इसमें फीना के दो सत्याग्रहियों के प्रमाण पुस्तकों में मिलते हैं जो इस आन्दोलन में शामिल हुए थे। बसंत सिंह पुत्र न्यादर सिंह एवं क्षेत्रपाल सिंह पुत्र मुन्ना सिंह ने इन आन्दोलन में भाग लिया था। फीना के निवासियों में मिलजुलकर रहने तथा आंदोलनों में बड़ी संख्या में भाग लेने की परंपरा रही है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि कुछ अन्य लोगों ने भी इस आंदोलन में भाग लिया होगा। परंतु उनके बारे में जानकारी देने वाला कोई व्यक्ति जीवित नहीं बचा है।

व्यक्तिगत सत्याग्रह' में फीना के लोगों की भागीदारी

सितम्बर 1940 में महात्मा गाँधी ने व्यक्तिगत सत्याग्रह' आन्दोलन शुरू किया। इसमें क्षेत्रपाल सिंह ने 1941 में पूना जाकर गाँधी जी के साथ व्यक्गित सत्याग्रह किया था। बसंत सिंह उर्फ वालिएंटर साहब पुत्र न्यादर सिंह ने गाँव में रहकर ही सत्याग्रह किया था।

‘अंग्रेजो भारत छोड़ो आंदोलन में फीना के लोगों की भागीदारी की कहानी

भूमिका- नमक सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा आंदोलन तथा द्वितीय विश्व युद्ध के समय व्यक्तिगत सत्याग्रह' जैसे अनेक आंदोलनों को गाँधीजी चला चुके। इस कारण देश को अंग्रेजों से मुक्त करने के लिए पूरे देश के लोगों ने गाँधी जी को अपना सबसे बड़ा नेता मान लिया था। लोगों के विश्वास से मिले बल के आधार पर गाँधी जी देश के अन्य बड़े नेताओं तथा आम जनता के सहयोग से देश को अंग्रेजों से मुक्त कराने का यथासंभव प्रयास कर रहे थे, फिर भी अंग्रेजों द्वारा देश छोड़ने की दूर-दूर तक कोई संभावना नजर नहीं आ रही थी। गाँधी जी एवं अन्य स्वतंत्रता सेनानियों पर देश को स्वतन्त्र कराने का दबाव बढ़ता जा रहा था। इसी क्रम में 7-8 अगस्त 1942 से महात्मा गाँधी ने अंग्रेजों भारत छोड़ो आन्दोलन शुरू किया। 8 अगस्त सन् 1942 की रात को गाँधी जी ने कांग्रेस प्रतिनिधियों के साथ एक सभा की और उसमें स्वतंत्रता के लिए अंतिम लड़ाई की रूपरेखा प्रस्तुत कीसभा में उन्होने एक अत्यंत महत्वपूर्ण भाषण दिया था जिसका सार इस प्रकार था- “आपने मुझे देश की स्वतंत्रता के लिये आगे किया है। अंग्रेजों का झूठ और कपट अकड़कर चल रहा है। मैं तुरंत स्वतंत्रता चाहता हूँ। हम अब और गुलामी नहीं सह सकते। पूर्ण स्वतंत्रता से कम किसी भी चीज से हम संतुष्ट नहीं होगें। इसलिए स्वतंत्रता की अंतिम लड़ाई के लिए मैं आपको एक मंत्र दे रहा हूँ- 'करो या मरो' अब हम भारत को हर जतन करके स्वतंत्र कराएंगे या इस प्रयास में मर मिटेंगे।'' उनके भाषण की गम्भीरता देखकर अंग्रेज सरकार ने 9 अगस्त 1942 को ही गाँधी जी एवं अन्य प्रमुख देशभक्त नेताओं को गिरफ्तार कर अज्ञात स्थान पर भेज दिया और कांग्रेस को गैरकानूनी संगठन घोषित कर दिया। महात्मा गाँधी तथा देश के बड़े नेताओं की गिरफ्तारी से देशवासियों में भारी आक्रोश पैदा हो गयासाथ ही महात्मा गाँधी द्वारा दिए गए 'करो या मरो' के मंत्र का देशवासियों पर अद्भुत असर हुआ। जनता के आक्रोश के कारण देशभर में जगह-जगह हड़ताल होने लगी, कारखाने, स्कूल और कॉलेज बंद हो गएअनेक जगह भीड़ हिंसक हो गई। लोगों ने अनेक स्थानों पर अंग्रेजी सत्ता के प्रतीकों जैसे-टेलीफोन, टेलीग्राफ, रेल लाइन, सरकारी इमारतों में तोड़फोड़कर भारी नुकसान पहुँचाना शुरू कर दिया। अंग्रेजी ध्वज को गुलामी का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाने लगा, इसलिए जहाँजहाँ अंग्रेजी झंडा मिलता, लोग उसे उतारकर भारतीय तिरंगा फहराने लगे। यह कार्य अचानक तथा देर-सवेर किए जाते थे, ताकि अंग्रेजी सरकार इन कार्यों को विफल न कर दे

इसी क्रम में 11-12 अगस्त 1942 की रात में जिला बिजनौर के नूरपुर क्षेत्र के देशभक्त कार्यकताओं ने एक गुप्त मीटिंग कीउसमें यह निर्णय लिया गया कि आज से 5 दिनों बाद अर्थात 16 अगस्त को हम लोग नूरपुर थाने में भारतीय तिरंगा फहराएगेंयह भी निर्णय लिया गया कि क्षेत्र की आम जनता भी इस दिन अधिक-से-अधिक संख्या में थाने पर पहुँचे, ताकि अंग्रेजी सरकार को जन-आक्रोश का संकेत जाए। कार्यवाही को आगे बढ़ाते हुए गाँव-गाँव जाकर गोपनीय रूप से 16 अगस्त को नूरपुर पहुँचने के लिए बताया जाने लगा।

16 अगस्त को जूरपुर जाने के लिए फीनावासियों की तैयारी

फीना गाँव के अग्रणी स्वतंत्रता सेनानियों ने निर्णय लिया कि गाँव के अन्य कार्यकताओं तथा आम जनता को नूरपुर चलने के लिए काफी पहले न बताकर 16 अगस्त की सुबह-सुबह अचानक बताया जाए। इससे पुलिस को हमारी योजना का पता नहीं चल पाएगा। इस हिसाब से 16 अगस्त 1942 को सुबह लगभग 7-8 बजे होलियान मुहल्ले में स्थित गिदड़यों के घेर में एक मीटिंग बुलाई गई। इस मीटिंग में फीना के अग्रणी स्वतंत्रता सेनानियों जैसे क्षेत्रपाल सिंह दिसौन्धी, डॉ. भारत सिंह, बसंत सिंह उर्फ वालिएंटर साहब, रणधीर सिंह पोटिया, होरी सिंह डंड तथा कुछ अन्य लोगों ने अपनी बात रखी। इन लोगों ने महात्मा गांधी द्वारा दिए गये 'करो या मरो' के संदेश को अपनी भाषा में लोगों के सामने रखा, जिसका सार इस प्रकार था- ‘‘लंबे समय से अंग्रेजों ने हमारे देश को गुलाम बनाया हुआ है, यह हमारे लिए बहुत अपमान की बात है। देश के बड़े नेतागण अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए बार-बार समझा चुके है, परंतु अंग्रेज सरकार पर कोई असर नहीं पड़ता। अंग्रेज सरकार सोचती हैकि देश की आम जनता तो चुप है, केवल कुछ नेता ही हमारे विरोध में हैं, और हजार-दो हजार नेता हमारा क्या बिगाड़ लेगे। उनकी इस सोच का उत्तर देने के लिए महात्मा गाँधी ने, अंग्रेजों के साथ आर-पार की लड़ाई का संदेश दिया है। उनका कहना है कि अब हम और अधिक गुलामी बर्दाश्त नहीं कर सकते। अंग्रेजों के खिलाफ जो कुछ भी किया जा सकता है करो, अथवा इस प्रयास में मर मिटो। इसलिए भाइयों अब हमें उनके संदेश को लागू करना है, आज से आप और हम अंग्रेजों की शासन प्रणाली में किसी भी प्रकार का सहयोग नहीं करेंगे। जहाँ-जहाँ अंग्रेजों ने अपने झंडे लगाए हुए हैं, उनको हटाकर अपने देश का तिरंगा झंडा फहरा दो। जो लोग अंग्रेजों की नौकरी कर रहे हैं, वे इस्तीफा दे दें और स्वतंत्रता के आंदोलन में शामिल हो जाएँ। ऐसी परिस्थितियाँ पैदा कर दो कि सड़क, रेल, टेलीफोन, टेलीग्राम, डाकघर आदि सरकारी तंत्र नष्ट हो जाए और कुछ भी काम नहीं कर पाए। अंग्रेजों को पता लग जाना चाहिए कि भारतवासियों के सहयोग के बिना वे भारत में नहीं टिक सकते। हमारे अनेक प्यारे देशवासी यह मानते हैं कि, अंग्रेजी शासन हमारे लिए बहुत कुछ कर रहा है। परंतु सच्चाई यह है कि अंग्रेज भारत में जो भी काम करते हैं वह अपने फायदे के लिए ही करते हैं। अंग्रेज लाख कष्ट सहने के बावजूद भारत में टिके हुए हैं, क्योंकि उनका बहुत बड़ा फायदा है। उन्हें भारत और यहाँ के लोगों की भलाई से कुछ लेना-देना नहीं है। अंग्रेजों ने टेलीफोन इसलिए लगवाए हैं, ताकि वे, आपस में बिना समय गवाएँ बात कर सके, स्वतंत्रता सेनानियों के आंदोलन और गतिविधियों का तत्काल पता लगा सके, न कि भारत के लोगों की सुविधा के लिए। अंग्रेजों ने नहरें इसलिए बनवाई हैं ताकि अधिक से अधिक उपज हो और इससे उनका राजस्व बढ़ जाए, न कि इसलिए, कि भारत के किसानों का लाभ होअंग्रेजों ने रेल गाड़ियाँ इसलिए चलवायी हैं ताकि उनके फायदे का सामान यहाँ-वहाँ आसानी से एवं जल्द से जल्द ढोया जा सके, न कि भारत की आम जनता के लिएअंग्रेज सड़के इसलिए बनवाते हैं ताकि उनकी सेना आसानी से कहीं भी पहुँच सके, न कि इसलिए, कि भारत के लोग उसका फायदा उठाएँ। सच्चाई तो यह है कि भारत की संपदा लूट-लूट कर आसानी से इंग्लैंड को भेजने के मूल मकसद से ही अंग्रेज रेलगाड़ी और सड़क बनवाते हैं।

भाईयों, हमें अंग्रेजों के ऐसे छल-कपट समझने की आवश्यकता है। अंग्रेज हमारे हितैषी नहीं हैं वे अपना हित साधने के लिए, हमारा हितैषी होने का ढोंग रचते हैं। उनके ढोंग ज्यादा समय नहीं चलने वाले। महात्मा गाँधी और देश के अन्य बड़े नेताओं ने अंग्रेजों के कपट और ढोंग को उजागर करने का प्रयास किया है, जिससे सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर अज्ञात स्थानों पर कैद कर लिया है। हमारे पूज्य नेताओं को बिना किसी दोष गिरफ्तार कर अंग्रेजों ने हमे और हमारे देश को बहुत बड़ी चुनौती दी है। अभी तक हमने कई बार अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन किए हैं, पर एकमत और एकजुट न हो पाने के कारण हमें सफलता नहीं मिल पाई। किंतु आज परिस्थितियाँ बदली हुई हैं, पूरे देश में अंग्रेजों के खिलाफ भारी आक्रोश है। हर जगह, हर सूबे की जनता अंग्रेजों से सीधी टक्कर लेने के लिए उठ खड़ी हुई है। अभी तक हमारे एकजुट होने भर की देर थी। आप यह सच्चाई जान लीजिए, कि जिस दिन हम एकजुट हो गए, उस दिन दुनियाँ की कोई ताकत नहीं है जिसके बल पर अंग्रेज भारत में टिक सकें। इस समय पूरा देश अंग्रेजों के खिलाफ खड़ा है, जिससे शत्रु बहुत कमजोर हो गया है। अतः अंग्रेजों को देश से भगाने का यह बहुत अनुकूल अवसर है। अब हमें मातृभूमि की रक्षा की निर्णायक लड़ाई लड़नी है, चाहे जो नुकसान हो जाए। हम चाहते हैं कि हमारी आने वाली पीढ़ीयाँ, आजाद भारत में जन्म लें और उसे यह कहने को न रह जाए, कि हमारे पूर्वज भारत को आजाद कराने के काबिल ही नहीं थे। भाईयों, याद रखिए, हमारा गाँव क्षत्रिय लोगों का गाँव है, जिसका मूल धर्म देश और प्रजा की रक्षा करना होता है। इतिहास गवाह है, कि हम लोग मातृभूमि की रक्षा के लिए, मरने से भी पीछे नहीं हटते। अब हम अंग्रेजों को देश से बाहर करके ही दम लेंगे भले ही हमें जान की बाजी क्यों न लगानी पड़ जाए।

ऐसे ओजस्वी वक्तव्यों को सुनकर वातावरण देशभक्तिमय हो गया और किसी ने भारत माता की जय। अंग्रेजी हुकूमत मुर्दाबाद। हिंदुस्तान जिंदाबाद। महात्मा गाँधी जिंदाबाद। भारत माता की जय। के नारे लगाने शुरू कर दिए। मौजूद लोगों ने भी पूरे मनोयोग से नारे लगाएवह परिसर गगनभेदी नारों से गूंज उठा। मुहल्लेवासी तथा घेर में बंधे पशु नारों की गूंज से चौकने तथा अचंभित हो गए और सभा की ओर देखने लगे।

सभा में मौजूद अनेक लोग आगे की रणनीति जानने के लिए बेचैन हो उठे और आश्वासन देने लगे कि देश के लिए जो भी हो सकेगा हम करेंगे। आप बताएँ, हमें क्या करना है। सभा की अगुवाई कर रहे क्षेत्रपाल सिंह, डॉ. भारत सिंह, बसंत सिंह उर्फ वालंटियर साहब, रणधीर सिंह पोटिया तथा होरी सिंह डंड ने मिल-जुल कर बताया कि हमारे क्षेत्र के बड़े देशभक्त कार्यकर्ताओं ने 11 अगस्त की रात को एक गुप्त मीटिंग की थी, और उसमें तय किया था कि 16 अगस्त 1942 को यानी कि आज, नूरपुर थाने पर भारतीय झंडा फहराना है। यह काम शांतिपूर्वक किया जाएगा। हमें अंग्रेजों को संदेश देना है कि नेतागण ही नहीं बल्कि देश के आम नागरिक भी अंग्रेजों के खिलाफ है, इसलिए आज हमें अधिक से अधिक संख्या में नूरपुर चलना है। इसके बाद जब तक आजादी नहीं मिल जाती, तब तक, सभा की शुरूआत में कही जा चुकीं बातों के अनुसार सरकारी तंत्र का असहयोग तथा विरोध करना है

इस सभा में आए लोगों की संख्या का ठीक-ठीक पता तो नहीं चल पाया, परंतु वहां मौजूद रहे श्री प्रताप सिंह सैनी 'बेचैन' एवं श्री रामपाल सिंह ‘सब्दलपुरिया से हुई मेरी वार्ता के आधार पर कहा जा सकता है, कि इस सभा में 300 से 350 लोग आए थे। थाने में तिरंगा फहराने की बात सुनकर 10-15 लोग इस बात का स्पष्ट विरोध करते हुए, सभा को मिलजुल कर समझाने लगे, कि ऐसा करना उचित नहीं होगा। समझाने वाले अधिकांश बुजुर्ग थे, जो जीवन को व्यावहारिक दृष्टिकोण से समझने के पक्षधर थे। परंतु इनकी बात अनसुनी कर दी गई, इससे ये लोग चेतावनी के लहजे में साफ-साफ कहने लगे कि, तिरंगे को फहराना ही है तो कहीं और फहरा लो। सरकारी इमारत पर तिरंगा फहराने का मतलब, सरकार से खुल्लम-खुल्ला झगड़ा करना है। अंग्रेज लोग तिरंगे को किसी सूरत में नहीं फहरने देंगे, भले ही इसके लिए उन्हे लाठीचार्ज करना पड़े या गोली चलवानी पड़े। हम किस प्रकार उनका मुकाबला कर सकते हैं? उपस्थित सेनानियों ने इस बात का जवाब देते हुए कहा कि, हम लोग थाने में लड़ाई-झगड़ा करने थोड़े ही जा रहे हैं। पहले थाने के सरकारी कर्मचारियों से ठंडे दिमाग से यह बात कही जाएगी कि, हमारे क्षेत्र की जनता, थाने पर भारतीय तिरंगा लहराते हुए देखना चाहती है, और सरकार को लोगों की भावनाओं का आदर करना चाहिए। फिर हम शांतिपूर्वक तिरंगा फहरा देगें। अंग्रेज सरकार के पास चाहे जितना गोला बारूद क्यों न हो, परंतु जब हजारों लोग एक साथ वहां पहुंचेंगे तो हमारी एक अलग ताकत होगी, जिसका सामना करना आसान नहीं होगा। महात्मा गाँधी ने जनता की इसी ताकत के बल पर नमक कानून को खुलेआम तोड़ दिया था। हर प्रकार के हथियार होने के बावजूद भी अंग्रेज सरकार कुछ नहीं कर पाई थीहमें महात्मा गाँधी के सिद्धांतों पर विश्वास रखना चाहिए। रही बात आमने-सामने की लड़ाई की तो महात्मा गाँधी कह ही चुके हैं, कि गुलामी का जीवन जीने से कहीं अच्छा है, आजादी लेने के लिए देश के नाम पर मर जाना है। इसलिए हर प्रकार का संशय एवं डर निकालकर बड़ी संख्या में हम लोगों को नूरपुर चलना चाहिए। दूर-दूर तक के लोगों तक यह बात पहुँच चुकी है कि आज नूरपुर के आस-पास के लोग अंग्रेजी झंडा उतार कर देश का तिरंगा फहराएंगे। यदि हम अपनी बात से पीछे हटते हैं और बड़ी संख्या में नूरपुर नहीं पहुँचते तो देश भर में हमारे क्षेत्र के नाम पर थूथू होगी। तभी किसी सेनानी ने बोल दिया कि-सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजु-ए-कातिल में है। इस बात पर किसी को कोई जबाब नहीं सूझा।

अपनी बात न मानी जाती देख नूरपुर जाने का विरोध कर रहे 10-15 लोग यह कहते हुए वहाँ से चले गए कि तुम लोग अभी अंग्रेजों की ताकत का अन्दाजा ठीक से नहीं लगा पाए हो। अंग्रेजी राज इतना बड़ा है कि उसके किसी ना किसी हिस्से में सूरज निकला ही रहता है। थाने तक पहुँचना तो दूर, पुलिस तुम्हे नूरपुर में भी नहीं घुसने देगी। लकड़ी पर कत्तर बांधे फिर रहे हो, इस झण्डे को दिखाकर तुम आजादी ले लोगे? अंग्रेजों की पीठ पीछे नारे लगाकर शोर मचाने से तुम्हें आजादी मिल जाएगी? जिसको पुलिस के हाथों मरने का शौक है, वह मरे। कुछ अन्य लोग भी सभा छोड़कर जाने लगे। दो-चार लोग बहुत फुर्ती से उठे, और चले गए, जैसे कि पुलिस सभा में पहुँच गई हो और यहीं गोलाबारी शुरू करने वाली हो। कुछलोगों के जाने से, थोड़ी देर के लिए वहाँ अफरा-तफरी का माहौल हो गया। गाँव का मामला था, सब एक दूसरे का उम्र के हिसाब से लिहाज और सम्मान करते थे, इसलिए दो-चार मिनट तक सभा को संचालित करने वाले लोग चुप ही रहे। आखिरकार किसी को जबरदस्ती तो आंदोलन में शामिल नहीं किया जा सकता था।

उल्लेखनीय बात यह है कि इस घटना के बाद भी अधिकांश लोग वहीं बैठे रहे और आगे होने वाली चर्चाओं की तरफ ध्यान देने लगे। उचित अवसर देखकर क्षेत्रपाल सिंह ने लोगों को समझाते हुए कहा कि, अब कदम वापस खींच लेना, देश और क्षेत्र के नाम पर कलंक होगा। इसलिए हमें कोई नकारात्मक बात नहीं सोचनी चाहिए। डॉ. भारत सिंह, बसंत सिंह उर्फ वालंटियर साहब तथा होरी सिंह ने लोगों को नूरपुर चलने के लिए पुनः प्रेरित करना शुरू कर दिया। इसी बीच 30-40 अन्य लोग नजर बचाकर, दायें-बायें होकर या पेशाब आदि के बहाने सभा से खिसक लिए। शेष लोग वहीं जमे रहे और आगे की बात सुनते रहे, हालांकि सभा में, अन्त तक बैठे रहने वालों में से भी अनेक लोग नूरपुर नहीं गए थे। परन्तु कुछ लोग ऐसे थे जो इस सभा में तो उपस्थित नहीं थे, परंतु पता लगने पर नूरपुर की तरफ गए थे। ज्यादातर लोग हाव-भाव से सेनानियों के साथ लग रहे थे, इसलिए अनुमान लगाया गया कि फीना से कम से कम ढाई सौ लोग नूरपुर पहुँचेगे। ये बातें होते-होते नौ-साढ़े नौ बज गए थे और 12.00 बजे नूरपुर भी पहुँचना था। फीना गाँव नूरपुर से लगभग 10 किलोमीटर दूर है, और यदि लगातार एवं फुर्ती से चला जाए तो भी वहां तक पैदल पहुँचने में लगभग डेढ़-दो घंटे लगते। इसलिए सभा को समाप्त की ओर ले जाते हुए क्षेत्रपाल सिंह ने आगे की योजनाबतायी, और कहा कि सरकार को भनक न लगे इसलिए हमें 10-10, 15-15 लोगों की टोली में ही नूरपुर पहुंचना है। तिरंगा फहराने का कार्यक्रम दोपहर को 12.00 से 1.00 बजे के बीच किया जाना तय हुआ है। इसलिए सभी लोगों को 10.00 बजे तक, फीना से नूरपुर के लिए चल देना होगा। लगभग सभी प्रकार की बातें हो चुकी थी और 10.00 बजने में थोड़ा ही समय शेष बचा था, इसलिए यह सभा यहीं समाप्त कर दी गई। अब जिन लोगों का जाने का मन हुआ, वे जल्दी-जल्दी नूरपुर जाने की तैयारी करने लगे। लोगों में गजब की स्वस्फूत प्रेरणा थी। आधे-पौन घंटे में ही कई दल तैयार हो गए और एक-एक करके, पैदल-पैदल अमरोहा मार्ग पर नूरपुर की ओर जाने लगे। कुछ अग्रणी सेनानी अपने घर जाए बगैर, सभा से ही नूरपुर के लिए चल दिए, जबकि कुछ अग्रणी सेनानी गाँव के अन्य लोगों का मार्गदर्शन करने के लिए सभा स्थल पर ही रुक गए। जो लोग नूरपुर जाने की तैयारी के लिए घर गये उनमें से कुछ के माता-पिता तथा परिचितो ने नूरपुर न जाने की सलाह दी। कुछ को अपने माता-पिता की कड़ी डाँट-फटकार का सामना भी करना पड़ा। जो लोग नूरपुर जा रहे थे उन पर कुछ लोगों ने दबी जुबान से ताने भी कसे जैसे कि- भाई, आज तो ये लोग आजादी लेकर ही लौटेंगे! थाने में लगा अंग्रेजी झंडा उतारकर साथ लाना, तभी मानेंगे तुम्हारी बहादुरी! ये हैं देश की सच्ची फिक्र करने वाले, बाकी तो सब दुश्मन हैं!

नूरपुर की तरफ कूच फीना से नूरपुर की तरफ चलने पर क्रमशः रतनगढ़, लिंडरपुर, ‘जाफराबाद कुरई' और तंगरोला गाँव मिलते हैं। वर्तमान में यह सड़क स्टेट हाई-वे 77 कहलाती है। सेनानियों की पहली टोली गाँव से निकलकर इसी सड़क पर आ गयी इसमें क्षेत्रपाल सिंह, प्रताप सिंह सैनी, डॉ. भारत सिंह, रणधीर सिंह, होरी सिंह, वालंटियर साहब, सुखलाल सिंह सांगी, घासीराम आदि लोग थे। संभवतया ग्राम मझौला से आए चंद्रपाल सिंह भी इसी टोली में थे, क्योंकि दो पुस्तकों में जिक्र हुआ है कि, नूरपुर में फीना की तरफ से जा रही टोली की अगुवाई क्षेत्रपाल सिंह तथा चंद्रपाल सिंह कर रहे थे। हालांकि इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिला कि चंद्रपाल सिंह फीना की टोली के साथ ही नूरपुर गए थे, अथवा किसी और जगह से फीना के दल के साथ हो गए थे। अमरोहा-नूरपुर मार्ग के किनारे बहुत पेड़ खड़े थे। गाँव से बाहर आने पर क्षेत्रपाल सिंह, प्रताप सिंह सैनी, घासीराम तथा सुखलाल सिंह सांगी ने इन पेड़ों की इंडेनुमा डालियाँ तोड़ ली। लाठीचार्ज से बचाव में डंडे काम आते हैंसेनानियों को नूरपुर में पुलिस द्वारा लाठीचार्ज की भी आशंका थी। देशभक्ति की भावना तथा पुलिस को चकमा देने के लिए इन डंडों पर अनेक लोगों ने भारतीय तिरंगा बाँध लिया था। स्वतंत्रता सेनानी प्रताप सिंह सैनी के अनुसार उन्होंने शीशम के पेड़ से डाल तोड़ कर डंडा बनाया था और इस पर तिरंगा बाँध लिया था, वे तिरंगा घर से साथ लाए थेलाठियाँ इसलिए नहीं ली गई ताकि पुलिस सुनियोजित हिंसा फैलाने का आरोप न लगा सके। टोली तेज कदमों से नूरपुर की तरफ बढ़ रही थी, अब लोगों के पास चलने के अलावा कोई और काम नहीं बचा था। कुछ लोग भूख मिटाने के लिए पटोली खोलकर गुड़ तथा चना खानेखिलाने लगे। अनेक लोग बिना कुछ खाए ही नूरपुर की तरफ चल दिए थे। कई लोगों को सुबह नाश्ता करने या खाना खाने का समय ही नहीं मिल पाया, क्योंकि गाँव में सभा अचानक बुलाई गई थी और नूरपुर कूच करने से थोड़ा पहले ही खत्म हुई थी। यह सभा अचानक इसलिए बुलाई गयी थी, ताकि पुलिस-प्रशासन को सभा की भनक न लगे।

चलते-चलते आंदोलन से जुड़ी बातों पर चलते-चलते आंदोलन से जुड़ी बातों पर चर्चा तथा विचार-विमर्श होने लगा। इस दल में हर उम्र के लोग थे। जहाँ एक ओर बसंत सिंह उर्फ वालंटियर साहब तथा क्षेत्रपाल सिंह प्रौढ़ अवस्था में थे, वहीं प्रताप सिंह सैनी जैसे सेनानियों की उम्र 20 वर्ष से भी कम थी। कम उम्र के लोगों ने अनेक प्रकार के सवाल किएयथा-अंग्रेज सरकार पिछले 30-40 सालों से हमारे नेताओं को बातों में फँसा कर राज कर रही है, अगर इस बार भी अंग्रेजों ने हमारे बड़े नेताओं को समझा-बुझा लिया तो क्या होगा? जिस तरीके से हमारे गाँव से सैकड़ों लोग आज नूरपुर पहुँच रहे हैंक्या उसी सोच के साथ दूसरे गाँवों के लोग भी आएंगे? अगर पुलिस ने झंडा न फहराने दिया तो क्या किया जाएगा? पूरे जिले में केवल हम लोग ही आज थाने में तिरंगा फहरायेंगे इस बात से पूरे जिले में हमारा क्षेत्र और नाम अग्रणी हो जाएगा। दांडी यात्रा में महात्मा गाँधी कुल कितने कोस पैदल चले होंगे? गाँधी जी को अंग्रेज सरकार ने किस जगह नजर बंद करके रखा हुआ है? क्या हमारे द्वारा तिरंगा फहराने की योजना, देश के बड़े नेताओं को बताई गई है? जो लोग सभा से उठ कर चले गए थे क्या उन्हें देश की चिन्ता नहीं होती? नूरपुर चलने के बारे में तुम्हारे घर के लोगो ने क्या कहा? कौन-कौन भरपेट खाकर आया है? अनेक लोग सभा छोड़ कर चले गए, क्या उन्हे हमारी जान की कोई कीमत नहीं लगती? इन प्रश्नों के जवाब भी साथ-साथ मिल रहे थे। यथा-पूरी दुनिया में जहाँ-जहाँ अंग्रेजों का राज है, वहाँ-वहाँ के लोग उनके खिलाफ आवाज उठा रहे हैंदुनिया के बड़े बुद्धिजीवी दूसरे देशो में राज करने को बुरा बता चुके हैं। हमारे देशवासियों द्वारा किए गए लंबे आंदोलन के कारण अंग्रेज अंदर से टूट चुके हैं, इसलिए देर-सवेर अंग्रेजों को देश छोड़ना ही पड़ेगा। फिर एक सच्चाई यह भी है कि, यदि देशवासी चुप बैठ गए तो अंग्रेज अपनी मर्जी से तो देश छोड़ने वाले हैं नही, इसलिए हमारे पास देश को आजाद कराने के लिए आंदोलन के सिवाय और कोई रास्ता भी तो नहीं है। किसी को तो बिल्ली के गले में घंटी बाँधने का खतरा मोल लेना पड़ेगा और सब बातें जानने के बाद अगर यह खतरा हम लोग नहीं लेंगे तो और कौन लेगा? फैसले अपने विवेक और क्षमता के अनुसार लेने चाहिए, ना कि अन्य लोगों की मनोदशाओं एवं कथन को देखकर। इसलिए थाने पर तिरंगा फहराने का हमने जो फैसला लिया है, उससे हम पूर्णरूप से संतुष्ट हैं।

जितने भी लोग नूरपुर जा रहे थे वे सब अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों से अच्छी तरह परिचित थे, इसलिए हर परिस्थिति के लिए तैयार थे। जेल जाना पड़ सकता है, लाठी या गोली खानी पड़ सकती है। इस पर भी चर्चा हुई कि यदि संख्या के बल पर जबरदस्ती तिरंगा फहराया गया तो, पुलिस कोई ना कोई कार्यवाही जरूर करेगी। पुलिस को यह पता लगाना मुश्किल नहीं है कि किस गाँव से कौन-कौन व्यक्ति नूरपुर पहुँचा है। क्योंकि अंग्रेज पुलिस मुखबरी के लिए हर गाँव में कुछ लोगों को अपने साथ मिलाए रखती है। जब 'करो या मरो' की घोषणा करने मात्र से महात्मा गाँधी को अज्ञात स्थान पर ले जाकर नजरबंद कर दिया गया, तो देश के आम सेनानियों को भी जरूर जेल भेजा जाएगा। किसी ने प्रश्न किया यदि सभी अग्रणी क्रांतिकारियों एवं आंदोलनकारियों को जेल में डाल दिया गया तो आंदोलन का संचालन कौन करेगा? इन सभी बातों के उत्तर में अनुभवी लोगों ने बताया कि यदि पुलिस हमें गिरफ्तार करने की कोशिश करती है तो उसकी पकड़ से बचने का प्रयास करना होगा। सरकार तो यह चाहती ही है, कि आंदोलन को चलाने वाले लोगों को जेल में डाल दिया जाए तो आंदोलन खुद ही ठप्प हो जाएगा। इसलिए गिरफ्तारी की नौबत आने पर भूमिगत रहकर आंदोलन को चलाना आज की परिस्थितियों में सबसे उपयुक्त रहेगा। किसी ने पूछा कि, यदि हम छुप गए तो पुलिस हमारे घर के लोगों की नाक में दम कर देगी। तो किसी ने उत्तर दिया कि, इस प्रकार की छोटी-बड़ी कुर्बानियाँ तो हमें और हमारे परिवार वालों को देनी ही पड़ेंगी, तब ही हमारा देश अंग्रेजों से मुक्त हो पाएगा। यदि हमारे परिवार वाले, हमारे कारण, अंग्रेजों का जुल्म सहते हैं, तो एक प्रकार से वे भी देश की सेवा कर रहे हैं। दल सकारात्मक विचारों से भरा था। इस प्रकार की बातें करते-करते कब रतनगढ़ आ गया पता ही नहीं चला, जोकि फीना से लगभग 3.5 किलोमीटर दूर है। रतनगढ़ को मराठा सर्मथक भारतीय योद्धाओं ने बसाया था। यह पहले से ही बुद्धिजीवियों का गाँव माना जाता है, इसलिए उस जमाने में भी यहाँ एक छोटा सा डाकघर था। जब सेनानी रतनगढ़ पहुँचे तो उस समय वहां पोस्टमास्टर मौजूद था। डाकघर के अन्दर एक पुराना सा सन्दूक रखा था, तथा बाहर लेटरबॉक्स लगा था। लेटरबॉक्स को फीना के निडर सेनानी सुखलाल सिंह सांगी ने डंडा मार-मारकर क्षतिग्रस्त कर दिया। फिर सेनानी डाकघर के अन्दर घुस गये, और वहाँ रखे संदूक पर डंडे बजाकर उसे पिचका दिया। पोस्टमास्टर चुपचाप एक कोने में खड़ा हो गया। किसी सेनानी ने उससे सरकारी नौकरी छोड़कर, आन्दोलन में शामिल होने को कहा, जिसे सुनकर उसका हलक सूख गया। यहाँ भारत माता की जय, अंग्रेजी हुकूमत मुदाबंद, हिंदुस्तान जिंदाबाद, महात्मा गाँधी जिंदाबाद के नारे लगाये गए। इसी बीच फीना के कुछ लोगों का एक और दल रतनगढ़ पहुँचा गया और उसने जल्द से जल्द नूरपुर पहुँचने के लिए कहा। इस पर सभी लोग डाकघर से निकलकर, तेजी से नूरपुर की तरफ चलने लगे।

बातों का दौर फिर शुरू हो गयापीछे कौन-कौन लोग आ रहे हैं? घर में माहौल ठीक है न? देर से निकले हो लग रहा पेटपूजा करके आए हो। खाने-पीने का कुछ सामान साथ लाए हो या बस हाथ हिलाते हुए चले आए? लगभग आधा घंटा चलने के बाद ग्राम लिंडरपुर आ गया। वहाँ लिंडरपुर के श्री बलदेव सिंह पुत्र चुन्ना सिंह तथा रामौरूपपुर से आए इन्दर सिंह वत्स अपने साथियों सहित पहले से ही सबका इंतजार कर रहे थे। ये सब लोग फीना के सेनानियों के साथ मिल गएसबने मिलकर हिंदुस्तान जिंदाबाद, अंग्रेजी हुकूमत मुर्दाबाद, भारत माता की जय, महात्मा गाँधी जिंदाबाद के नारे लगाये। लिंडरपुर से लगभग आधा किलोमीटर आगे जाफराबाद कुरई गाँव है, यहाँ के स्वतंत्रता सेनानी नौबहार सिंह पुत्र चतुर्भुज सिंह, भीम सिंह पुत्र फतेह सिंह, कल्लन खां पुत्र कादर, उमराव सिंह पुत्र फतेह सिंह, न्यादर सिंह पुत्र रघुवीर सिंह अपने साथियों के साथ फीना की तरफ से आने वाले सेनानियों का इंतजार कर रहे थे। ये सब भी इसी समूह में मिल गये। एक बार फिर महात्मा गांधी जिंदाबाद, अंग्रेजी हुकूमत मुर्दाबाद, भारत माता की जय, हिंदुस्तान जिंदाबाद के नारे लगे। जाफराबाद कुरई', लिंडरपुर तथा रामौ-रूपपुर के स्वतंत्रता सेनानियों के एक साथ आ जाने से एक तो दल की संख्या काफी अधिक हो गई दूसरा सभी लोगों का मनोबल और अधिक ऊँचा हो गया था। जब यह दल जाफराबाद कुरई से निकला तो स्वतंत्रता सेनानियों की संख्या बढ़कर कम से कम 300-350 हो गयी थी। सेनानी ग्राम ‘तंगरौला से गुजरते हुए, तेजी से नूरपुर की तरफ बढ़ने लगे। लगभग डेढ़ घंटा चलने के बाद नूरपुर कस्बे की सीमा आ गयी। उस समय नूरपुर में सरकारी डाक बंगला बनना शुरू ही हुआ था, उसकी दीवारों की चिनाई हो रही थी। हालांकि तब यह बस्ती से काफी बाहर था। वर्तमान में यह पी.डब्लू.डी. के डाक बंगले के नाम से जाना जाता है। यह उसी अमरोहा मार्ग पर बन रहा था, जिससे फीना की ओर से आने वाले सेनानी नूरपुर थाने जा रहे थे। सेनानियों को यह सरकारी बंगला अंग्रेजी प्रतीक लगा, इसलिए अनेक सेनानी निमार्णाधीन बंगले में घुस गये और जितना हो सका दीवारें गिरा दी। आस-पास रखा सामान भी तोड़ दिया गया।

पुलिस का सतर्क होना और नूरपुर की नाकाबंदी

पूर्व में उल्लेख किया जा चुका है कि 11-12 अगस्त 1942 की रात में नूरपुर क्षेत्र के देशभक्त कार्यकर्ताओं की सभा हुई थी। इसमें नूरपुर थाने पर तिरंगा फहराने की योजना तथा इसके लिए बड़ी संख्या में नूरपुर चलने की बात कही गई थी। सरकार से छिपाने के लिए ग्राम फीना में यह बात ग्रामवासियों को 16 अगस्त को सुबह-सुबह ही बताई गई थी, परंतु अनेक गाँवों में यह योजना लोगों को पहले ही बता दी गई थी। 13-14 अगस्त तक घूम फिर कर इस गुप्त सूचना की थोड़ी-बहुत बातें नूरपुर की पुलिस तक पहुँच गई। परन्तु पुलिस को सेनानियों की योजना का ठीक-ठीक पता नहीं लग पाया। उन्हें सिर्फ इतनी जानकारी ही हो पायी कि इस सप्ताह बड़ी संख्या में सेनानी नूरपुर में इकट्ठा होंगे। वह क्या करेंगे? और कहाँ इकट्ठा होंगे इसकी कोई पुख्ता जानकारी पुलिस को नहीं मिल पायी। पुलिस ने संदेह की नजर से नूरपुर के स्वतंत्रता सेनानी नन्हे सिंह को थाने बुलाकर पूछताछ की। परंतु वीर तथा परम देशभक्त सेनानी नन्हे सिंह ने कोई बात उन्हें नहीं बताई। इस पर अंग्रेजी पुलिस ने उन्हें काफी यातनाएँ दी।

16 अगस्त 1942 को सुबह से ही लोग नूरपुर पहुंचना शुरू हो गए थे। तिरंगा फहराने का कार्यक्रम दोपहर 12.00 से 1.00 बजे के बीच रखा गया था, परन्तु सैकड़ो लोग इस समय से पहले ही पहुँच गए थे। उनमें से अधिकांश लोग नूरपुर के बाजार या सड़कों पर इधर- उधर टहल रहे थे। अनेक लोगों की पहले से ही इच्छा थी, कि जब नूरपुर जा ही रहे हैं तो बाजार भी घूम लिया जाए, और जरूरत का छोटा-मोटा सामान भी खरीद लिया जाए। इनमें कुछ ऐसे लोग भी थे जो अपने स्तर से पुलिस का सामना नहीं करना चाहते थे और उचित नेतृत्व के अभाव में यहां-वहां घूमकर समय गुजार रहे थे। सौ से पचास लोग सीधे नूरपुर थाने पहुँच गये थे और उसके आस-पास मंडरा रहे थे। 15 अगस्त को पुलिस को गहरा आभास हो गया था कि लोग आजकल में थाने का घेराव करेंगे क्योंकि नूरपुर में थाना ही सरकार का सबसे महत्वपूर्ण कार्यालय है। इसलिए पुलिस ने नूरपुर आने वाले सभी रास्तों पर बैरिकेटिंग कर नाकाबंदी शुरू कर दी। थाने में पुलिस की संख्या सीमित थी, जिसके द्वारा किसी विशाल जनसमूह को नियंत्रित करना संभव न था, यह बात सोचकर पुलिस ने नूरपुर के स्थानीय लोगों को यह कहा, कि आस-पास के गाँवों के लोग नूरपुर को लूटने आ सकते हैं। इसलिए कल यानि 16 अगस्त को अपनी रक्षा के लिए आप सभी नूरपुरवासी, पुलिस का सहयोग करें, और लाठी-डंडा तथा सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए हथियारों के साथ आएं। पुलिस ने अंग्रेजों का साथ देने वाले लोगों तथा जमींदारों को भी शस्त्रों सहित बुलवा लिया। जो लोग सहायता के लिए थाने पहुँचे उनमें से कुछ को पुलिस ने थाने पर तथा कुछ को नूरपुर आने वाली सड़कों पर की गई बैरिकेटिंग/नाकेबंदी पर सिपाहियों के साथ भेज दिया। इस प्रकार हर नाकेबंदी पर थोड़े सिपाही तथा अंग्रेजों के सहयोगी कुछ स्थानीय लोग खड़े हो गये थे।

फीना के सेनानियों का नूरपुर पहुँचना और पुलिस द्वारा लाठीचार्ज

फीना की तरफ से आने वाले स्वतंत्रता सेनानियों को नूरपुर के बाहर ही रोकने के लिए पुलिस ने स्थानीय लोगों एवं अपने समर्थक जमींदारों के गुर्गों की सहायता से बिजनौरचाँदपुर तिराहा पर नाकेबंदी की थी। जैसे ही फीना की तरफ से आने वाले लोगों ने पुलिस की बैरिकेटिंग को दूर से देखा तो उनकी आशंका सच सिद्ध हुई। उधर सत्याग्रहियों के दल को देखकर पुलिस ने उन्हें संकेत देने के लिए लाठियों को ऊपर उठा दिया, जिसका मतलब यह था कि जो भी बैरिकेटिंग को पार करेगा, उस पर लाठीचार्ज किया जाएगा। ऐसे क्षण नेतृत्वकर्ताओं के लिए निर्णायत्मक तथा कठिन परीक्षा के समान होते हैंऐसे मौके पर यदि साहस तथा प्राणोत्सर्ग की भावना से पेश न आया जाता तो कुछ ही क्षणों में लोग इधर-उधर भाग जाते तथा भारी भीड़ भी देखते-देखते छूमंतर हो जाती। इन परिस्थितियों को भांपकर क्षेत्रपाल सिंह, चंद्रपाल सिंह (निवासी झुझुला), प्रताप सिंह सैनी, डॉ. भारत सिंह, बसंत सिंह उर्फ वालंटियर साहब, इंदर सिंह (निवासी रामौ-रूपपुर), नौबहार सिंह (निवासी जाफराबाद कुरई), घासीराम, रणधीर सिंह पोटिया, होरी सिंह इंड, आदि लोग अपने दल के ठीक आगे आ गए। इनमें से कुछ लोग लाठी-डंडा चलाना तथा उसके वार से बचना भी जानते थे। परंतु क्षेत्रपाल सिंह, चंद्रपाल सिंह (निवासी झुझुला) तथा डॉ. भारत सिंह इनमें भी सबसे आगे थे। फीना के जयदेव सिंह, रणधीर सिंह पोटिया, सुखलाल सिंह सांगी, बलकरन सिंह ‘कटीर', परवीन सिंह (निवासी मोहल्ला-भूत), रामपाल सिंह ‘सब्दलपुरिया', दिलीप सिंह, दौलत सिंह, महाराज सिंह, मियाँ जी (गिदड़यो में), बक्शे एवं अमीरी सिहं भी मौजूद थे।

जैसे ही स्वतंत्रता सेनानी बैरिकेटिंग के पास पंहुचने को हुए, पुलिस ने उन्हें हाथ के इशारे से वापस जाने के लिए संकेत कियाइस पर सभी लोग मिलकर भारत माता की जय, अंग्रेजों भारत छोड़ो, देश हमारा राज तुम्हारा नहीं चलेगा नहीं चलेगा, भारत देश हमारा है, अंग्रेजी हुकूमत मुर्दाबाद, हिंदुस्तान को आजाद करो, कांग्रेस जिंदाबाद, हिंदुस्तान जिंदाबाद, महात्मा गाँधी जिंदाबाद, पुलिस के कुत्ते हाय-हाय के जोरदार नारे लगाने लगे। कुछ ही क्षणों में सब लोग बैरिकेटिंग पर पहुँच गये और इन्होने नारेबाजी तेज कर दी, 5-10 मिनट की नारेबाजी से ही घबराकर पुलिस ने बैरिकेटिंग के उस तरफ से स्वतंत्रता सेनानियों पर अचानक लाठी बरसानी शुरू कर दी। कुछ स्थानीय लोग भी पुलिस का साथ दे रहे थेइस पर जिन सेनानियों के पास डंडा था उन्होंने उनकी सहायता से पुलिस की लाठियों के वार को जितना हो सका रोका। निहत्थे लोगों ने पीछे हटकर या नीचे बैठकर अपना बचाब किया। स्वतंत्रता सेनानियों का अंतिम लक्ष्य थाने पहुँचना था न कि बैरिकेटिंग पर पुलिस से संघर्ष। बैरिकेटिंग से थाना लगभग सवा-डेढ़ किलोमीटर दूर था। ऐसे में उन्होंने निर्णय लिया कि बैरिकेटिंग पर पुलिस के साथ संघर्ष करने की बजाय, नूरपुर की गली-कूचों या खेतों से होते हुए, थाने पहुंचा जाए। इसलिए स्वतंत्रता सेनानी धीरे-धीरे वहाँ से हटने लगे और 15-20 मिनट में ही अग्रणी सेनानियों को छोड़कर अन्य लोग खेतों तथा इधर-उधर से भागकर थाने की तरफ चले गएफीना से एक-साथ आने वाला दल यहां पूरी तरह बिछड़ गया, बहुत थोड़े लोग ही थाने तक साथ-साथ पहुंच पाए।

इसी बीच पुलिस से नोक-झोंक में फीना के एक स्वतंत्रता सेनानी को सिर में लाठी लग गई। संभवतया वह फीना के डा. भारत सिंह थे, लाठी लगने के कारण उनके सिर से खून बहने लगा था। चूंकि इस समय तक अधिकांश सेनानी बैरिकेटिंग के पास से थाने की तरफ जा चुके थे। इसलिए तब शेष बचे अग्रणी सेनानियों ने भी थाने पहुँचने का निर्णय लिया, पुलिस को चमका देने के लिए पहले वे दो-ढाई सौ मीटर पीछे की ओर गए, ताकि पुलिस समझे कि ये लोग डरकर वापस घर चले गए हैं। फिर खेतों के रास्ते थाने पहुँच गये। इनके बाद शेष बचे स्वतंत्रता सेनानी भी एक-एक, दो-दो करके खेतों के रास्ते थाने की तरफ जाने लगे। हालांकि इन के एक साथी के सिर से खून बह रहा था। परंतु फिर भी इनका हौसला किसी तरीके से कम नहीं हुआ था। खून को रोकने के लिए खेतों में खड़ी दूब घास (दूबड़ा) को चबाकर घाव पर रखा गया तथा पट्टी बाँध दी गई। जब तक यह टोली थाने तक पहुँची तब तक वहाँ पर भारी भीड़ जमा हो चुकी थी इस भीड़ के आंकड़े को कुछ लोगों ने 3000 से 4000 तथा कुछ इतिहासकारों ने 10000 से 15000 तक माना है। फीना के जो लोग शुरूआत में थाने की तरफ गए थे, उन्हें थाने की बाउंड्री के पास खड़े होने का मौका मिल गया। परंतु जो बाद में पहुँचे थे, भीड़ के कारण उनका बाउंड्री तक पहुँचना संभव नहीं हो रहा था। फलतः फीना के अग्रणी क्रांतिकारी थाने की इमारत के एकदम पास नहीं पहुँच पाए।

16 अगस्त को दोपहर से पहले का घटनाक्रम

16 अगस्त 1942 को सुबह से ही सेनानी, नूरपुर पहुँचने लगे थे, दोपहर बारह से एक बजे के आस-पास तिरंगा फहराया जाना तय था। उस समय थाने की इमारत के आगे, छोटा-सा मैदान था, इसी में तिरंगा लगाया जाना था। बारह बजते-बजते आंदोलनकारी आआकर थाने की सीमा के बाहर जुटने लगे। कुछ लोगों का कहना है कि थाने की सीमा पर चाहरदीवारी थी, हालांकि कुछ का मानना हैकि वहाँ खाई खुदी हुई थी। प्रतीत होता है कि उस समय थाने के चारों तरफ चारदिवारी बनना शुरू ही हुई थी और उसके कुछ हिस्से में नींव भरने के लिए खाई खुदी पड़ी थी तथा कुछ हिस्से में दीवार बन चुकी थी। इस वजह से हो सकता है कि, जो लोग दीवार के सामने खड़े थे, उन्होंने बताया कि वहां दीवार बनी हुई थी तथा जो लोग खाई के सामने खड़े थे, उन्होंने बताया कि वहाँ खाई बनी हुई थी।

एक बजे के आस-पास, लगभग सभी आंदोलनकारी थाने पर जमा हो गए। उनकी संख्या अनुमान से भी अधिक हो गई थी, इससे सभी लोगों में अद्भुत उत्साह था। अब तिरंगा फहराने की बारी थी। नूरपुर के सेनानी वैद्य जगनंदन प्रसाद तथा ताजपुर की तरफ से आए डॉ. राजकुमार, थानेदार के पास गए और उन्होंने शांतिपूर्वक तिरंगा फहराने की अनुमति चाही, जिसे थानेदार ने साफ मना कर दिया, और इन दोनों सेनानियों को आँखें दिखाई। आंदोलनकारियों के सामने पुलिस बंदूक तथा लाठी लिए खड़ी थी। पुलिस की ताकत बढ़ाने के लिए पंद्रह-बीस स्थानीय लोग भी थाने में खड़े थेये लोग पुलिस के साथ मिलकर आंदोलनकारीयों को बार-बार मना कर रहे थे कि थाने के अंदर आने तथा तिरंगा फहराने की कोशिश मत करो, वरना मारे जाओगे, जेल जाओगे, मुकदमा चलेगा, सीधे काले पानी की सजा होगी। भला इसमें है कि शांति से अपने घर वापस चले जाओ। अपनी सामने खड़ी मौत को अनदेखा मत करो। परन्तु आंदोलनकारी किसी भी दशा में वहाँ से हटाने के लिए तैयार नहीं थेअपनी बात सुनता न देख, पुलिस ने बंदूक के साथ अलर्ट की पोजीशन ले ली, और आंदोलनरत सेनानियों को चुनौती दी कि जो कोई भी थाने में घुसेगा उसे गोली मार दी जाएगी, अब जिसको हिम्मत है, वह इधर आकर दिखाएचुनौती बड़ी थी, जीने-मरने का सवाल था। फीना के श्री रामपाल सिंह (सब्दलपुरिया) ने इन पंक्तियों के लेखक को बताया कि वह उस समय वहीं खड़े थे, और पुलिस की चुनौती को सबसे पहले गुनियाखेड़ी के परवीन सिंह ने स्वीकार किया। उनके अनुसार सड़क के किनारे छोटी और कच्ची नाली बह रही थी, तथा नाली के बाद दीवार खड़ी थी। श्री परवीन सिंह हाथ में तिरंगा लेकर थाना परिसर में लहरा रहे अंग्रेजी झंडे की ओर बढ़े, सामने दीवार थी। उन्होंने वहाँ खड़े किसी व्यक्ति को झंडा पकड़ाया और दीवार पर चढ़ने के लिए छलांग लगाईपरवीन सिंह एक ही छलांग में दीवार पर जा चढ़े, और तिरंगा पुनः अपने हाथ में ले लिया। दीवार पर खड़े होकर उन्होंने भारत माता की जय', 'देश हमारा राज तुम्हारा नहीं चलेगा नहीं चलेगा', तथा ‘अंग्रेजी हुकुमत मुर्दाबाद'-'हिंदुस्तान जिंदाबाद', 'अंग्रेजो भारत छोड़ो' के नारे लगाए और थाना परिसर में कूद गए। 5-6 और लोग भी आगे बढ़े और उन्होंने थाने में घुसने के लिए दीवार पर चढ़ने का प्रयास किया। परवीन सिंह बहुत हष्ट-पुष्ट, ताकतवर तथा फुतीलें थे, इस कारण एक ही छलांग में दीवार पर चढ़ गए थे, परंतु बाद में चढ़ने का प्रयास करने वाले लोग एक बार में नहीं चढ़ पाए थे। परवीन सिंह के थाने में कूदने के कुछ पल बाद ही ताबड़तोड़ गोलियाँ चलने की आवाज आई। इसी बीच छः-सात सेनानी थाने की दीवार पर जा खड़े हुए थे, जो शायद तिरंगे को शुरू से फहरते देखना चाहते थे, इनमें ग्राम असगरीपुर के रिक्खी सिंह भी थे। आगे खड़े लोगों ने देखा कि पुलिस ने परवीन सिंह पर निशाना साधकर कई फायर किए, जिनमें से चार-पाँच गोलियाँ उनको लगी, जिससे उनका शरीर छलनी हो गया है। गोली लगने से उनके सिर, पेट, सीने तथा टॉग से खून निकलने लगा। बहुत ज्यादा घायल होने के बाद भी परवीन सिंह आगे बढ़ने की कोशिश करते रहे परंतु आठ-दस कदम तक लड़खड़ा कर चलने के बाद बेहोश होकर नीचे गिर पड़ेबताया जाता है कि गोली लगने के बाद, कुछ मिनटों में ही उनका शरीर निष्प्राण हो गया था। पीछे खड़े लोग तिंरगा फहराने की खबर सुनने को बेचैन हो रहे थे, उनमें बात फैल चुकी थी कि कोई सेनानी तिरंगा लेकर थाने में घुस चुका है। परंतु परवीन सिंह के अचेत होने से तिरंगा फहराने का काम अधूरा रह गया। उनको गोलियों से घायल होकर गिरते देखने वाले वहाँ मौजूद लोग हतप्रभ रह गए और कुछ क्षण के लिए ठिठक गए, जिससे पुलिस को लगा कि एक आदमी को गोली से मरणासन्न होते देख, किसी दूसरे को सामने आने की हिम्मत नहीं होगी। जो भी तिरंगा लेकर आगे बढ़ता, उसको गोली लगना तय था। आजादी के लिए खून और बलिदान की जरूरत थी। थाने की दीवार पर खड़े रिक्खी सिंह ने देश और तिरंगे की शान के लिए प्राण न्योंछावर कर देने का दुर्लभ फैसला लिया, और अदम्य साहस तथा वीरता का परिचय देते हुए, थाने में छलांग लगा दी। उन्होंने बहुत फुर्ती से परवीन सिंह के हाथ से तिरंगा झंडा निकाला तथा उसे फहराने की कोशिश करने लगे।

रिक्खी सिंह को तेजी से तिरंगा लेकर आगे बढ़ते तथा चतुरता से उसे फहराने का प्रयास करते देख पुलिस अचंभित रह गई। पुलिस ने रिक्खी सिंह के हाथों तथा पैरों को निशाना बना कर गोलियाँ चलाई। ताकि एक तो वे गिर जाएँ, दूसरे झंडा न फहरा पाए। एक गोली उनके पैर में लगी जिससे वह गिर गए। पैर के साथ उनके शरीर में अन्य स्थानों पर भी गोली लगी, परंतु गिरने से पहले रिक्खी सिंह ने थाना परिसर के फर्श में मौजूद किसी दरार में तिरंगा लगा दिया था। यह बात, जैसे ही सेनानियों को पता लगी, वे उल्लासित हो गए। देशभक्तिपूर्ण नारों से आसमान गूंज उठा। देश के लिए मर मिट जाने की भावना, बंदूकों पर भारी पड़ी। रिक्खी सिंह के चेहरे पर परम संतोष तथा प्रसन्नता के भाव थे। आगे अग्रेज हुकूमत चाहे जो उत्पीड़न करे, पर हमने छोटा सा ही सही पर इतिहास बना दिया है, वे सोच रहे थेकाम पूरा होते देख बड़ी संख्या में सेनानियों ने अपनेअपने घर या गंतव्य की ओर जाना शुरू कर दियावापस लौटने वाले अनेक लोगों को पुलिस की गोली द्वारा परवीन सिंह के मरणासन्न स्थिति में पहुंचने तथा रिक्खी सिंह को गोली लगने का भी पता नहीं था, क्योंकि तिरंगा फहराने से जुड़ी बातें तीन-चार मिनट में ही घटित हो गई थीं। बताया जाता है कि कुछ अन्य सेनानियों को भी गोली लगी थी। लगभग 85 साल बाद नूरपुर के थाने में भारतीय झंडा लहराया था, जो वहाँ मौजूद ब्रिटिश झंडे के लिए चुनौती थाब्रिटिश झंडा एक ऐसा झंडा था, जो उस समय दुनिया के अनेक देशों में मजबूती के साथ जमा था। अंग्रेज हुकूमत की नजर में ब्रिटिश झंडे की अहमियत, अपने अधिकारियों, विश्वासपात्र लोगों तथा सहयोगियों से भी अधिक थी। ब्रिटिश झंडे को हटाना या उसका अपमान करना अंग्रेजी सत्ता की खिलाफत करने के बराबर माना जाता था। ब्रिटिश झंडा कपड़े का कोई मामूली टुकड़ा नहीं था, यह एक ऐसे विश्वव्यापी साम्राज्य का सर्वोपरि प्रतिनिधि तथा प्रतीक था, जिसके राज में सूरज कभी छिपता नहीं था। एक ऐसा साम्राज्य जिसकी सेना के सामने दुनिया के किसी भी देश के मूल निवासियों की सेना टिक नहीं पाती थी। एक ऐसी सेना जिससे हथियारों के बल पर जीतना उस कालखण्ड में असम्भव सा हो गया था। इन परिस्थितियों में निहत्थे लोगों द्वारा बंदूकधारी पुलिस की मौजूदगी में नूरपुर सहित देश की अनेक सरकारी इमारतों पर अंग्रेजी झंडे को हटाकर या उसकी मौजूदगी में तिरंगा फहराना असाधारण, ऐतिहासिक और उल्लेखनीय घटना मानी जाएगी। यह गाँधी जी के 'करो या मरो' सिद्धांत का असर एवं स्वतंत्रता के लिए देश की आम जनता में जागरूकता का फल था।

तिरंगा फहराए जाने के बाद की घटनाएँ

तिरंगा फहराने की बात पीछे खड़े क्रांतिकारियों तक पहुँच चुकी थी। इस समय बारिश भी होने लगी। इन वजहों से अनेक लोग वापस अपने घर की तरफ जाने लगे। अभी तक तो आगे खड़े आंदोलनकारियों का ध्यान तिरंगे की तरफ था, परंतु इसको फहराए जाने के बाद सबका ध्यान परवीन सिंह तथा रिक्खी सिंह की तरफ गया। तिरंगा फहराने से पुलिस सकपका गई थी, वह इन दोनों को गिरफ्तार करने के लिए आगे बढ़ी। उधर सेनानियों ने अपने दोनों साथियों को घायल देख इलाज तथा पुलिस से बचाने के लिए अपनी निगरानी में लेने का विचार किया और उन्हें उठने के लिए आगे बढ़े।

 

इससे पुलिस और बौखला गई, क्योंकि पुलिस दोनों को सजा देने का मन बनाये थी। पुलिस को लगा कि यदि परवीन सिंह तथा रिक्खी सिंह को सेनानी अपने साथ ले गए तो, उन्हें सजा न दिलवाई जा सकेगी, तथा जनता भी बहुत क्रुद्ध होगी और बदले की भावना से अग्रेजों को मार भी सकती है। आंदोलनकारी संख्या में बहुत अधिक थे इसलिए उनको थाने में घुसने से रोकने के लिए लाठीचार्ज तथा बंदूकों का मुँह आसमान की तरफ करके फायरिंग शुरू कर दी गई, और परवीन सिंह तथा रिक्खी सिंह को थाने के बने कमरे के अंदर घसीट लिया। आधे घण्टे के अन्दर कुछ को छोड़कर कर सभी सेनानी या तो चले गए या पुलिस द्वारा तितर-बितर कर दिए गए, जो नहीं गए उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

जब से तिरंगा फहराने की कोशिश की जा रही थी तब से पुलिस बार-बार लागों को सजा भुगतने के लिए तैयार रहने की बात कह रही थी। तिरंगा फहराए जाने से क्रुद्ध, पुलिस ने पहले गोलीबारी तथा लाठीचार्ज से भीड़ को तितर-बितर किया, फिर अग्रणी नेताओं को गिरफ्तार करना शुरू कर दिया। कुछ लोगों को थाने पर ही गिरफ्तार कर लिया गया। जिन गाँवों से लोग अधिक संख्या में नूरपुर आए थे, सबसे पहले वहाँ छापेमारी की गई। शाम होते-होते पुलिस ग्राम फीना में भी पहुँची थी। नूरपुर से लौटते समय फीना के लोग, तीन-चार स्थानों पर चले गए थे, कुछ सीधे गाँव पहुँचे, कुछ अपनी रिश्तेदारियों में तथा कुछ भूमिगत होने के लिए जंगलों में चले गए। सायं छः बजे के आसपास जब कुछ क्रांतिकारी फीना पहुँचे तो उन्होंने देखा कि पुलिस वहाँ पहले से ही मौजूद है, और पकड़े गए, परन्तु इनमें से कुछ पुलिस को देखकर जंगलों में जा छिपे। अग्रणी सेनानियों ने पहले से ही तय किया हुआ था, कि आंदोलन को छिपकर चलाया जाएगा, ताकि यह कमजोर न पड़े। फीना के अग्रणी सेनानी क्षेत्रपाल सिंह, रणधीर सिंह पौटिया, होरी सिंह, प्रताप सिंह सैनी 'बेचैन', बसंत सिंह उर्फ वालंटियर साहब आदि लोग एक साथ थे। इन्होंने भी आन्दोलन को निरन्तर बनाए रखने के लिए भूमिगत होना उचित समझा। ये लोग फीना के पूर्व-उत्तर स्थित गन्ने के खेतों में छुप गए।

जितना संभव हुआ, पुलिस ने क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया और जेल में डालते हुए राजद्रोह का मुकदमा कायम कर दिया। लगभग तीन महीने तक फीना के अनेक स्वतंत्रता सेनानियों ने जंगलों में छुपकर आंदोलन चलाया। इस दौरान क्रांतिकारियों ने बहुत कष्ट सहे, जैसे- खाना न मिलना, जंगली जानवरों से खतरा, बारिस से भीगना, बीमार होना और दवाओं का अभाव, मुखबिरो से खतरा, पुलिस द्वारा राजद्रोह का मुकदमा करना, परिवार वालों को परेशान किया जाना एवं घर की कुर्की, घर पर अकारण गोलीबारी, पुलिस के दबाब में इनके परिजनों का समाज द्वारा अघोषित बहिष्कार आदि। कहा जाता है कि फीना के कुछ स्वतंत्रता सेनानियों की मृत्यु जंगलों में भूमिगत रहने के दौरान वर्षाकालीन बीमारियों के कारण हो गई थी, इनमें बलकरन सिंह पुत्र बनवारी सिंह कटीर भी एक थे। सरकारी सूची के अनुसार फीना के 14 स्वतंत्रता सेनानियों ने नूरपुर थाना कांड में भाग लिया थाइनमें अधिकांश पर मुकदमा चलाया गया और कड़ी सजा दी गई, जबकि नूरपुर पहुँचे अन्य क्रांतिकारियों के नाम पुलिस ग्रामवासियों से हासिल नहीं कर पायी थी।

देश को आजाद कराने के लिए इन स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना तन-मन-धन न्योछावर करते हुए अधिकतम प्रयास किया और अपने व्यक्तित्व तथा कृतित्व से ग्राम फीना एवं आस-पास के क्षेत्र में अपना नाम सदैव के लिए अमर कर दिया। आने वाली पीढ़ियों के लिए ऐसे क्रांतिकारी सदैव प्रेरणा के स्रोत बने रहेंगे। अपवाद को छोड़कर किसी एक गाँव से इतने अधिक लोगों ने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग नहीं लिया, जितना ग्राम फीना के लोगों ने लिया था। फीना के अन्य सेनानियों में धर्म सिंह, रघुनाथ सिंह, रघुवीर सिंह, रामस्वरूप, शेर सिंह, रामस्वरूप चौहान, शिवनाथ, चन्द्रपाल सिंह भी हैं। ऐसे कई लोगों के नाम सामने आए हैं, जो नूरपुर गए थे, परंतु उनका नाम पुलिस तक नहीं पहुँच पाया था, जैसे- सुखलाल सिंह सांगी, रामपाल सिंह ‘सब्दलपुरिया', बलकरन सिंह ‘कटीर', परवीन सिंह (निवासी मोहल्ला-भूत), बलवंत सिंह (दीवान), कूड़े सिंह (जी वाले), पृथ्वी सिंह (दीवान), घासीराम, मियाँ जी (गिदड़यो में), बक्शे, प्रताप सिंह सैनी एवं अमीरी सिंह आदि।

शेष अगली बार...

(लेखक उत्तर प्रदेश सरकार के सिंचाई विभाग में सहायक-अभियंता के पद पर कार्यरत हैं)