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‘घारा 35-ए तथा जम्मू-कश्मीर' विषय पर गोष्ठी
September 1, 2017 • Parmod Kumar Kaushik

विश्व संवाद केन्द्र, देहरादून एवं अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद् के संयुक्त तत्वावधान में गत 27 अगस्त, 2017 को एक विचार-गोष्ठी का आयोजन जिला न्यायालय, देहरादून के बार एसोसिएशन सभागार में किया गया। मुख्य वक्ता सर्वोच्च न्यायालय के एडवोकेट ऑन रिकार्ड श्री संजय त्यागी ने कहा कि जम्मू-कश्मीर और धारा 35-एसदा से ही लोगों में उत्सुकता का विषय रहा है। धारा 35-ए को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि 1947 में जब भारत आज़ाद हुआ था, तब लगभग 561 रियासतों ने विलय-पत्र पर सहमति देते हुए अपने हस्ताक्षर किए थे। विलय की प्रक्रिया और नये संविधान के निर्माण के दौरान यह तय हुआ कि सभी राज्यों का संविधान अलग-अलग होगा। इसके लिए सभी राज्यों में संविधान सभा का गठन होना था, जो नहीं हो सका। अतः तय हुआ कि एक मॉडल संविधान बनाया जाए, जिसके अनुसार सभी राज्यों का संविधान बनेगा और भारत के संविधान को सभी राज्यों से जोड़ा जाएगा। देश- विभाजन के समय पश्चिमी पाकिस्तान से भारी संख्या में आए लोगों को जम्मू-कश्मीर में बसाया गया। वहाँ के तत्कालीन शासन ने कहा कि वह उनकी देखभाल करेंगे और रहने के लिए उन्हें स्थान उपलब्ध करायेंगे।

श्री संजय त्यागी ने कहा कि धारा 35-ए और अनुच्छेद 370 को लेकर लोगों में भ्रम है कि भारत का कोई नागरिक वहाँ सम्पत्ति नहीं खरीद सकता और भारत का संविधान वहाँ लागू नहीं होता। जबकि जम्मू-कश्मीर के संविधान के सेक्शन छह में स्पष्ट लिखा है।

कि जो जम्मू-कश्मीर का नागरिक है, वह भारत का भी नागरिक है; पर धारा 35-ए की आड़ में जम्मू-कश्मीर को रोजगार, सम्पत्ति, छात्रवृत्ति, आदि के जो अधिकार भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति ने दिये, पृथकता का खेल खेला गया। संविधान की धारा 35-ए में वर्णित अधिकार भारत के सभी नागरिकों के लिए समान हैं, पर जम्मूकश्मीर शासन ने इसका दुरुपयोग कर अपने राज्य की नागरिकता के प्रावधान स्वयं तय कर लिये हैं, जो पूरी तरह गलत हैं।

इस धारा के अन्तर्गत संविधान के भाग तीन में अनुबन्धित मूल अधिकारों पर भी प्रतिबन्ध लगाए जा सकते हैं। इसकी आड़ में जम्मूकश्मीर की नागरिकता और सम्पत्ति के अधिकार से देश के अन्य राज्यों के लोगों को वंचित रखा जाता रहा है। उन्होंने कई उदाहरण देकर इस धारा को राज्य की अनुसूचित जाति, जनजाति और महिलाओं के अधिकारों का घोर विरोधी बताया। जैसे डॉ. फारुख अब्दुल्ला से विवाह कर एक विदेशी महिला जम्मू-कश्मीर में सम्पत्ति खरीदने की अधिकारी बन जाती है; पर उसी फारुख अब्दुल्ला की बेटी राजस्थान निवासी सचिन पायलेट से विवाह कर अपने पैतृक राज्य में सम्पत्ति खरीदने तथा सरकारी नौकरी पाने का अधिकार खो देती है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि वर्ष 2017 में ही इस बारे में सुखद निर्णय आ जाएगा और धारा 35-ए समाप्त होते ही अनुच्छेद 370 भी नख-दंतविहीन हो जाएगा।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए बार एसोसिएशन, देहरादून के अध्यक्ष श्री राजीव शर्मा ने कहा कि धारा 35-ए को आधार बनाकर जम्मू-कश्मीर में जो व्यवस्था गयी, वह 'चोर दरवाजे से लाभ' वाली कहावत को चरितार्थ करती है। उन्होंने कहा कि इस विषय की चर्चा अब बुद्धिजीवियों होने लगी है, इसलिए अब इस पर निर्णय होकर ही रहेगा।