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‘आयुर्वत्रम्' : आयुर्वेद की अनूठी देन
June 1, 2017 • Prafful Chandra Thakur

केरल में आयुर्वेदिक चिकित्सा के विभिन्न तरीकों के साथ ही आजकल एक नयी क्रांति का सूत्रपात हुआ है और वह है आयुर्वेदिक वस्त्र-‘आयुर्वस्त्रम्'। हालांकि अपने देश में आयुर्वेद के सिद्धान्तों के अनुसार वस्त्रों के निर्माण की तकनीक तो हजारों साल से प्रचलित थी, पर मशीनी और स्वचालित कल-कारखानों के आने से इन कपड़ों की मांग पर असर पड़ा था। परन्तु बदलते समय में आयुर्वेद के बढ़ते प्रभाव के चलते ऐसे ओषधीय वस्त्र एक बार फिर प्रचलन में आ रहे हैं। इन वस्त्रों के निर्माण में जुटे हैं तिरुअनन्तपुरम् जिले के बलरामपुरम में रहनेवाले हिंदू-बुनकर परिवार। ये परिवार विगत कई पीढ़ियों से, ठीक-ठीक कहें तो विगत छः शताब्दियों से इसी व्यवसाय में जुटे हैं।

आज उनके द्वारा बनाए गए औषधियुक्त वस्त्रों की मांग केवल भारत ही नहीं, बल्कि यूरोप के बड़े-बड़े वस्त्र-व्यापारी भी कर रहे हैं। पोलिएस्टर और उसी तरह के अन्य कृत्रिम धागों से बुने कपड़े पहनते-पहनते ऊब चुके यूरोप के लोग भी अब केरल के ‘आयुर्वस्त्रम्' की ओर आकर्षित हो रहे हैं। यही नहीं ऐसे कपड़ों से निर्मित बुर्के मध्य-पूर्व के देशों में निर्यात भी हो रहे हैं।

‘आयुर्वस्त्रम्' का निर्माण अष्टवैद्यार, आर्यवैद्यार, सिद्धवैद्यार और मर्म चिकित्सावैद्यर, जो विशेषज्ञ चिकित्सक हैं, के निर्देशों के अनुसार किया जाता है। तिरुअनन्तपुरम् के राजकीय आयुर्वेद कॉलेज में इनका गुणवत्ता-परीक्षण किया जाता है। इन वस्त्रों को रँगने और इनमें एक प्रकार की महक पैदा करने के लिए लगभग 50 पौधों और जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल होता है। उदाहरण के लिए, पीला रंग बनाने में हल्दी, काष्ठ हल्दी, कस्तूरी हल्दी और अन्य कई प्रकार की हल्दियों का प्रयोग किया जाता है। लाल रंग के लिए मंजीठे का प्रयोग होता है, हरे के लिए कुरुनथोटी, नीले के लिए नीलायमिरी; काला रंग खसखस, जामुन, अनार, काली मिर्च, लौंग तथा सफेद रंग नमक, पानी, घास और धूप की रोशनी आदि चीजों से बनाया जाता है। आयुर्वेदिक पद्धति से ही रंगों और महक को स्थायी बनाया जाता है। यह पूरी प्रक्रिया जैविक है। तैयार कपड़े को दो दिनों तक गोमूत्र में डुबोकर रखा जाता है। दिलचस्प बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में जो भी अवशेष पदार्थ बचता है, उससे जैविक खाद और बायोगैस बनाई जाती है।

भारत और विदेशों में इन वस्त्रों पर हुए शोध में यह बात सिद्ध हो चुकी है कि इनको पहननेवाले व्यक्ति को एलर्जी, चर्मरोग, कैंसर, मधुमेह सहित अन्य कई प्रकार की बीमारियों का खतरा कम हो जाता है। चिकित्सकों द्वारा अलग-अलग बीमारियों के लिए अलग-अलग बूटियों से बने कपड़े सुझाए जाते हैं। इसी तकनीक पर आयुर्वेदिक चादरें, शर्ट, साड़ी, चूड़ीदार कपड़े और गद्दे भी बनाए जा रहे हैं। बलरामपुर के इन बुनकरों के संगठन हैंडलूम वीवर्स डेवलपमेंट सोसायटी के प्रबंधक के. विजयन बताते हैं कि सऊदी अरब का शाही परिवार भी उनके बनाए कपड़े पहन रहा है। पिछले साल कुजिविला परिवार ने यूरोपीय देशों में 50 लाख रुपए के कपड़े भेजे थे। आज सोसायटी के पास सऊदी अरब के अलावा अमरीका, जर्मनी, इटली, फ्रांस, स्पेन, जापान, मलेशिया, सिंगापुर, ताइवान और जार्डन से बड़ी मात्रा में ऐसे कपड़ों की मांग आ रही है।

आयुर्वस्त्र पहनने से गर्मी के दिनों में ठण्ढ़ का एहसास होता है और ठण्ढ़ के दिनों में गर्मी का। वैसे बाहर के देशों में भले ही धीरे-धीरे इनकी लोकप्रियता बढ़ रही हो, मगर भारत में अभी यह उतना लोकप्रिय नहीं हुआ है। उसकी एक वजह यह है कि एक तो आयुर्वस्त्रम् साधारण कपड़ों से कुछ महंगे होते हैं, दूसरा इस तरह के कपड़ों को भारत में बढ़ाने के लिए अच्छे निवेशक नहीं मिल रहे हैं। जड़ी-बूटियाँ लाने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ती है। क्योंकि आम तौर पर वे मौसम से जुड़ी होती हैं। यदि इस दिशा में ठीक ढंग से काम हो और निवेश हो, तो भारत का यह उत्पाद अंतरराष्ट्रीय और घरेलू बाजार में धूम मचा सकता है। वैसे इन वस्त्रों की ऑनलाइन बिक्री शुरू हो गई है। आयुर्वस्त्रम् का काम मुख्य रूप से केरल में हो रहा है और यदि यह सफल हो जाता है तो ये वहाँ के बुनकरों के लिए तो अच्छी खबर होगी ही, साथ ही पहाड़ी क्षेत्रों में रहनेवाले उन जनजातीय लोगों के लिए भी खुशखबरी होगी जो आयुर्वेदिक महत्त्व के पौधे उगाकर ही जीविका कमाने की कोशिश करते हैं।