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होली के रंग बापू के संग
March 1, 2019 • Ashok Vyas

देखो होली खेलने वालों के रंग सब कितने रंगीन लग रहे हैं'' बापू खुश हो कर बोले। “बापूइन पर होली का रंग नही खून लगा है, किसी ने नक्सलवाद की होली खेली है कोई धर्म की कोई जातिवाद की कोई आतंकवाद की और कोई अलगाववाद की होली खेल रहा है। इनके वादों के चक्कर में जो निर्दोष मारे गये हैं उनका ही खून सबके हाथों और कपड़ो पर फैला हुआ है''।गाँधीजी से यह द्रश्य देखा नही गया वे तेजी से आगे बड़ गये उनकी आँखों में क्रोध का भाव था।

फ़ागुन के महीने में आम के वृक्ष पर बोर क्या आ गये मेरा मन भी बोराने लगा। बोराया मन कुछ भी अंड-बंड सोचने लगता है। मैंने सोचा की इस फागुनी बयार में होली के दिन गाँधीजी से मुलाकात हो जाये तो कैसा रहे। वैसे आधुनिक पीढ़ी तो आज के गाँधीवादी अन्ना हजारे को ही गाँधी मानती है। गाँधीजी भले ही आउटडेटेड हो गए उनके नाम का सिक्का आज भी चल रहा है। होली की रंगीनी के तरंग में इस तरह की बातें संभव तो है पर वास्तव में होती नहीं। परन्तु गणित के सवाल की तरह माना की गाँधीजी मिल ही गये तो क्या होगा? लेकिन मान लिया कि मिले तो उन्हें देख कर मुझे घोर आश्चर्य हुआ कि बेकार है स्वर्ग में रहकर भी वैसे ही किडीकान्ट याने कृषकाय बने हुए हैं कृष 1,2,3, या 4 नहीं बन सके। अब गाँधीजी को कौन नर्क में भेजेगा सोचते ही खि-खि- खि करके हँसी आने लगेगी।

उन्हें प्रणाम करके ओपचारिकता वश आने का कारण पूछा “बापू आप यहाँ कैसे?

“स्वर्ग में वैष्णव जन गाते-गाते आत्मा उब गई थी सोचा चलकर भारत में होली का आनंद लिया जाये' गाँधीजी बोले . “बापू आपके साथ कौन होली खेलेगा? इस पुरानी लंगोटी पर रंग कौन डालेगा, चोराहे के मुन्ना भाइयों ने पकड़ कर जादू की झप्पी देकर एकाध पसली चटका दी तो गाँधीगिरी के लायक भी नही रहोगे फिर में जिम्मेदार नही'

"मैं होली खेलना नहीं देखना चाहता हूँ' गाँधीजी उवाच।

“आप भले न खेलो मैं तो होली खेलूंगा अभी तैयार होकर चलते है'' मैंने फटाफट जगह-जगह से फटी हुई नये फेशन की जींस और टी शर्ट पहन ली“ये कौन से फटे कपड़े पहन लिए, होली के दिन तो सफेद कुर्ता पजामा पहनते है इस पर टेसू से बनाया रंग कितना खिलता है''

गाँधीजी को होली देखने की बाल सुलभ उत्सुकता थी इसलिए झक मार कर मेरे साथ चल दिए। जैसे ही बाहर निकले चोराहे पर पन्द्रह से पच्चीस वर्ष के झूमते युवाओं की टोली मिल गई। उन सबकी आँखे चडी हुई थी, सब मस्त थे और होली है का नारा बार-बार लगा कर गालियों से युक्त अलंकारिक भाषा का उपयोग करके जता रहे थे की वाकई में आज होली ही है। “होली पर युवा शक्ति कितनी मस्त होती है, परंतु अमर्यादित भाषा का उपयोग क्यों कर रहे है

“बापू यह होली की मस्ती और भाषा की शक्ति सब राष्ट्रीय पेय का कमाल है' “हमारा राष्ट्रिय पेय तो दूध है, हाँ कुछ लोग उस समय चाय भी पीने लगे थे “दूध नही बापू आजकल हमारा राष्ट्रिय पेय मदिरा, शराब, वाइन हो गई है इतनी कम उम्र में शराब पीने लगे?'' “बापू आजकल शराब पीना राष्ट्रीय संस्कृति और शराब बनाना राष्ट्रीय उद्योग बन गया है मैंने गाँधीजी का हाथ पकड़ कर आगे चलने का प्रयास किया उनका हाथ धीरे-धीरे काँप रहा था वे मुड़-मुड़ कर भारत के भविष्य की और देख रहे थे।'

अगले चोराहे पर कुछ लोग तरह-तरह के रंग के कपड़े अपने सर पर कफन की तरह बाँधे हुए थे। किसी के लाल, किसी के हरा, किसी के भगवा, और किसी के सर पर नीले रंग का कपड़ा बँधा था। एक समानता उन सब में थी कि सब के कपड़ो और हाथों पर लाल रंग लगा था।

"देखो होली खेलने वालों के रंग सब कितने रंगीन लग रहे हैं' बापू खुश हो कर बोले‘‘बापू इन पर होली का रंग नही खून लगा है, किसी ने नक्सलवाद की होली खेली है कोई धर्म की कोई जातिवाद की कोई आतंकवाद की और कोई अलगाववाद की होली खेल रहा है। इनके वादों के चक्कर में जो निर्दोष मारे गये हैं उनका ही खून सबके हाथों और कपड़ो पर फैला हुआ है। गाँधीजी से यह दृश्य देखा नहीं गया वे तेजी से आगे बड़ गये उनकी आँखों में क्रोध का भाव था।

आगे चलने पर वी. आई. पी. यों का क्लब नजर आया इस क्लब में बड़े सभ्रांत अधिकारी, बड़े व्यापारी, बड़े नेता, बड़े फिल्म स्टार जैसे समाज और राष्ट्र को चलाने वाले उच्च प्रतिष्ठितो की भीड़ थी जो होली खेलती नही देखती थी। सत्ता के असली सूत्र इन्ही अति महत्वपूर्ण व्यक्तियों के पास थे। सभी के चमकदार चेहरों पर काली गुलाल लगी थी वे सब अपना काला मुँह न देख कर बड़ी सभ्यता से एक दुसरे को काले चेहरे वाला कह रहे थे। ‘‘इनके मुँह पर काली गुलाल किसने लगाई है और यह सब बहस क्यों कर रहे है'' बापू को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। ‘‘बापू यहाँ से जल्दी निकल चलो वर्ना अपने मुँह पर भी भ्रष्टाचार की काली गुलाल लग जायेगी, यह संपन्न और प्रतिष्ठित तबका है इनके यहाँ कोई कमी नही है परन्तु अगली सात पीड़ियो की चिंता में बिना भ्रष्टाचार किये नही रह सकते इन्हें दूसरों का ही काला मुँह दीखता है लेकिन इनमे एकता बहुत है सुख-दुःख में एक दुसरे का साथ अवश्य देते है।

हम दोनों बातें करते हुए एक विशाल और सुंदर आश्रम के सामने पहुँच गए। आश्रम का वातावरण बहुत रंगीन था चारों तरफ रंग-बिरंगे साधु, साध्वियाँ घूम रहे थे। तभी आश्रम में हलचल तेज हो गई विशाल द्वार के सामने कई विदेशी गाड़ियों की लाईन लग गई। सबसे मँहगी कार में से आश्रम के मुख्य संत बाहर निकले उनके चेहरे पर मेकप का तेज था चारों तरफ शांति छा गई भक्त पैर छु रहे थे। धर्म भी भारतीय की तरह हम दोनों ने स्वाभाविक रूप से संतजी को हाथ जोड़कर नमस्कार किया उनके पास भी हम पहुँच नही सकते थे। संतजी हम जैसे तुच्छ भक्तों की और बिना द्रष्टि डाले आगे बड़ गए। **भारतीय संस्कृति के विस्तार में संतों- महात्माओं का बहुत योगदान है'' गाँधीजी ने संत की और देखते हुए कहा।

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