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हिंदू-संस्कृति और गो-रक्षा
November 1, 2017 • Lala Hardevsahay

सस्कृति स्वाभाविक गुण है, यह शिक्षाप्रचार या प्रयत्न से उत्पन्न नहीं होती। जिस तरह अग्नि का गुण उष्णता, जल का शीतलता तथा पृथिवी का गुरुता है, उसी प्रकार गोरक्षा हिंदू का स्वाभाविक गुण है। हिंदू-संस्कृति को जानने का मुख्य आधार गोरक्षा है। जो लोग गोरक्षा को मुख्य कर्तव्य मानते हैं, वे ही हिंदू हैं। जैन, सिख आदि (जो हिंदू- धर्म की ही शाखा-विशेष हैं) ही नहीं, आर्यसमाजी, सनातनधर्मी, विष्णोई तथा देश के भिन्न-भिन्न भागो में बसनेवाले सभी हिंदुओ के आचार-व्यवहार, रहन- सहन, जन्म-मरण, विवाह आदि के कृत्य अलग-अलग ही हैं। कितनी ही बातों में उनका परस्पर विरोध भी रहता है। पर गोरक्षा के बारे में सब एकमत हैं। आर्य समाज के प्रवर्तक स्वामी दयानन्द सस्वती, जो रूढ़िवाद को नहीं मानते, सुधारक कहे. जाते हैं, उन्होंने गोवंश के महत्त्व को बतलाने के लिये ‘गोकरुणानिधि' पुस्तक लिंखी तथा एक गाय से हजारों मनुष्यों के भोजन का हिसाब बताते हुए ‘गोकृष्यादिक्षिणी सभाएँ स्थापित करने का आदेश दिया। 

जैन-धर्मावलम्बी वेदों तथा हिंदुओं के अन्य ग्रन्थों और उनमें लिखे संस्कारों को महत्त्व नहीं देते, पर प्राचीन समय में जैन धर्मावलम्बी अपनी सम्पत्ति की गणना. गोवंश की संख्या पर करते थे। व्रज और गोकुल उसके आधार थे। राजगृह के संहाशतक तथा काशी के चूलनि पिता के पास अस्सी-अस्सी हजार गायें थीं। गोहत्या तथा गोभक्षण के सम्बन्ध से होनेवाले पाप के बाबत महावीर स्वामीजी ने उज्झिय के कष्टों की कथा लिखी है। श्रीहरिविजयसूरिजी ने अकबर बादशाह सेकहकर गोहत्या बन्द करवायी। हरियाणा, वोगड़ तथा युक्तप्रान्त के कुछ जिलों में रहनेवाले विष्णोई, जो चोंटी नहीं रखते, भूमि मे गाड़े जाते हैं, पर गोरक्षा परम धर्म मानते हैं। इनके गुरु श्रीजम्भेश्वर महाराज ने ग्वाला बनकर गायों को चराया था। सिखों के पूज्य धर्मशास्त्री, भाई गुरुदासजी ने पञ्चगव्य को पवित्र और गोहत्या को पातक माना है।गोबर गोमूत्र परमपवित्र भये। 

(कवित्त 201) (कवित्त 201)

वामण गाय बंस घातक करारे॥ 

(वार 24, पौंडी 16)

राज्य के बुरे समय में भी गोरक्षा के लिये बड़ा त्याग किया। कितने ही फाँसी चढेजेल मये।

 संस्कृति तथा साहित्य का अधिार- आधेयसम्बन्ध है। हमारे प्राचीन ग्रन्थ गो- महिमा से भरे पड़े हैं। ब्राह्मण तथा गौं- दोनों को बड़ा महत्त्व दिया गया है। राजा नहुष से अपना मूल्ये गाय के बराबर स्वीकार करके महर्षि च्यवन ने गाय के महत्त्व को राज्य तथा संसार के सब पदार्थ से अधिक बताया। चक्रवर्ती राजा दिलीप गोरक्षा के लिए अपना शरीर तक देने को तैयार हुए। पूर्णकला-अवतार भगवान् श्रीकृष्ण ने स्वयं गोचारण करके हमारे सम्मुख गोसेवा का आदर्श रखा। हमारे शास्त्रों में गोवंश के महत्त्व का ही नहीं, उपयोगिता के बाबत भी बहुत कुछ वर्णन मिलता है। पारस्करगृह्यसूत्र के तीसरे काण्ड की नवीं कण्डिका में अच्छे तथा बुरे साँड़ों के लक्षण लिखे हैं। ब्रह्मवैवर्त, अग्नि, भविष्य, पद्म, मत्स्य आदि पुराणों में गायों के इलाज, गो-दुग्धादि के गुण स्थानस्थान पर दिए हैं।

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