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हास्य विनोदी सरदार
November 1, 2018 • Acharya Chandrasekhar Shastri

सरदार विनोदी स्वभाव के थे। वह मनोरञ्जन के लिये तो हँसते ही थे, आलोचना के लिए व्यंग्य भी करते थे। अपने हास्य एवं विनोद से उन्होंने अपने अध्यापकों तथा पिता को भी नहीं बख्शा।

बड़ौदा हाई स्कूल में विद्यार्थी वल्लभभाई के संस्कृत न लेकर गुजराती लेने के कारण आपके अध्यापक छोटेलाल आपसे रुष्ट हो गये। उन्होंने बिगड़कर एक से लेकर दस तक के पहाड़े लिखकर लाने की आज्ञा दी। एक दिन हुआ, दो दिन हुए, किन्तु वल्लभभाई पहाड़े लिखकर नहीं लाये। मास्टर साहब प्रतिदिन रुष्ट होते और प्रतिदिन दण्ड बढाते जाते। “कल दो बार,'' “कल चार बार,'' “कल आठ बार'' कहते-कहते दो सौ पहाड़े लिखने की आज्ञा दी गयी। किन्तु उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। फिर अध्यापक ने पूछा, ‘‘लिखकर लाना है या कुछ अन्य दण्ड देने पर विचार करूं?'' शिष्य ने उत्तर दिया :

“दो सौ पाड़े लाया तो था, परन्तु उनमें एक इतना मरखना निकला कि उससे बिदककर सभी दरवाजे के सामने से भाग गये। इसलिए एक भी पाड़ा नहीं रहा।''

पाड़ा गुजराती भाषा में पहाड़े के अतिरिक्त भैंस के बच्चे को भी कहा जाता है। अध्यापक ने शिष्य को धमकाकर ताकीद कर दी। दूसरे दिन फिर पूछा गया तो विद्यार्थी ने बिना घबराए हुए उत्तर दिया कि ‘‘हाँ साहिब, लिख लाया हूँ।'' यह कहकर अध्यापक को एक कागज दिखलाया जिस पर लिखा था, 'दो सौ पहाड़े''। अब विद्यार्थी को हेडमास्टर के सम्मुख उपस्थित किया गया। वहाँ विद्यार्थी ने कहा, “यह भी कोई दण्ड है। पहाड़े नकल कराने से मुझे क्या लाभ हो सकता है। मेरी पाठ्यपुस्तक से नकल करने को कहा जाता तो इससे मुझे लाभ भी होता।'' निदान हेडमास्टर ने केवल शिक्षा देकर ही आपको छोड़ दिया। अब एक व्यंग्य का विवरण दिया जाता है-

एक वृद्ध किन्तु स्वस्थ एवं गठे हुए शरीरवाले सशक्त पुरुष सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर आये। वह बिल्कुल श्वेत वस्त्र पहने हुए थे। धोती, कुर्ता, खेस और पगड़ी- सभी दूध के समान सफेद थे। उन्हें देखते ही मुँह में से हुक्के की नली निकालकर वल्लभभाई खड़े हो गए और बोले, ‘‘पिताजी आप कहाँ से?''

“भाई, तुमसे काम पड़ा है। इसीलिए तो आया हूँ।''

“परन्तु मुझे क्या नहीं कहलवा दिया? करमसद आ जाता। लाडबाई से भी मिलना हो जाता।''

“परन्तु काम तो बोरसद में है। इससे तुम्हें वहाँ बुलाकर क्या करता?''

‘‘ऐसा क्या काम है?''

“सारे जिले में तुम्हारी धाक है और हमारे महाराज पर वारण्ट निकले। क्या यह ठीक है? तुम्हारे बैठे महाराज को पुलिस पकड़ सकती है?''

“महाराज पर और वारण्ट? यह कैसे? वह तो पुरुषोत्तम भगवान् के अवतार कहलाते हैं। सबको संसार-सागर से पार उतारनेवाले हैं। उन्हें कौन पकड़ सकता है?''

"इस समय तुम अपनी दिल्लगी रहने दो। मैंने पक्के तौर पर सुना है कि वडताल और बोचासन के मन्दिरों के बारे में झगड़ा हुआ है और उसमें हमारे महाराज पर भी वारण्ट निकला है। तुम्हें यह वारण्ट रद्द कराना ही पड़ेगा। महाराज को पकड़ लें तब तो मेरे साथ तुम्हारी इज्जत भी जायेगी।'' ।

“हमारी इज्ज़त क्यों जायेगी? जो ऐसे कर्म करेगा उसकी जायेगी। परन्तु मैं जाँच करूंगा। वारण्ट यों ही थोड़े निकला करतेहैं। मुझसे जो कुछ हो सकेगा, सब करूंगा।''

बाद में तनिक गम्भीर होकर किन्तु नम्रता से पिता जी से बोले, “अब आप इन साधुओं को छोड़ दीजिए। जो इस प्रकार के प्रपञ्च करते हैं, झगड़े करके अदालतों में जाते हैं और जो इस लोक में अपनी रक्षा नहीं कर सकते, वे परलोक में हमें क्या तारेंगे? हमारा क्या उद्धार करेंगे?''

“यह सब झंझट हम क्यों करें? परन्तु देखो, तुम्हें इतना ध्यान रखना है कि महाराज पर वारण्ट निकला है तो वह रद्द होना चाहिए।'' यह कहकर पिता जी दफ्तर से चले गए।

बाद में सरदार ने मामले में पड़कर दोनों पक्ष का समझौता करा दिया, जिससे वारण्ट रद्द हुआ।

यहाँ यह बात स्मरण रखने की है कि वल्लभभाई अपनी माता को लाडबाई कहकर पुकारा करते थे।

उनकी हाज़िरजवाबी अद्भुत थी। उनके । हँसमुख स्वभाव का उदाहरण काँग्रेस में तो क्या, भारतभर में मिलना कठिन है। एक बार गाँधी जी किसी कॉलेज के एक प्रिंसिपल की नियुक्ति के सम्बन्ध में विचार विनियम कर रहे थे तो सरदार बोले :

“आप वहाँ का प्रिन्सिपल मुझे बना दीजिए।''

“वहाँ आप विद्यार्थियों को क्या पढ़ायेंगे?''

‘‘भारत के विद्यार्थियों को आज याद करने की आवश्यकता न होकर पढ़े हुए पाठ को भूल जाने की आवश्यकता है।''

अगस्त क्रान्ति के सम्बन्ध में उन्होंने अगस्त क्रान्ति के सम्बन्ध में उन्होंने कहा था : ‘‘भूतपूर्व भारतमन्त्री ने कहा था कि गाँधी जी की गिरफ्तारी पर भारत में एक कुत्ता भी नहीं भौंका और सारा कारवाँ निकल गया। किन्तु इस बार कुत्ता भौंककर नहीं बैठा रहेगा, वरन् काट भी खायेगा। आगामी संघर्ष में ऐसे कुत्तों के काटने के अनेक उदाहरण मिलेंगे।''

आगे. ..