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हँसाती-रुलाती जीवन्त फिल्म आनन्द
June 1, 2016 • Parffulla Chandra Thakur

मृत्यु सत्य है, उसी तरह जीवन भी सत्य है। मौत के भय से हम जीना नहीं छोड़ सकते।' आनन्द' फिल्म मृत्यु से हँसकर मिलने का संदेश देती है। 'आनन्द' हिंदी-सिनेमा के इतिहास में सर्वश्रेष्ठ और सार्वकालिक फिल्मों में से एक है। 1971 में बनी यह फिल्म हृदयस्पर्शी एवं मर्मस्पर्शी है। मृत्यु के समीप जा रहे व्यक्ति में इतना आन्तरिक साहस है कि वह अपना शेष जीवन प्रसन्नता और उल्लास के साथ जीता है। वह दूसरों के जीवन में भी खुशी भरना चाहता है। जीवन जब तक है, तब तक हर क्षण को आनन्दपूर्वक जीवना चाहिए। मृत्यु सच है, उसे हँसकर गले लगाना चाहिए न कि रो-

फ़िल्म का प्रारंभ होता है। सरस्वती पुरस्कार समारोह से। कैंसर-विशेषज्ञ डॉ. भास्कर बनर्जी को उनकी प्रथम कृति (उपन्यास-आनन्द) पर ही यह पुरस्कार मिलता है। समारोह में जब डॉ. भास्कर को ‘आनन्द लिखने की प्रेरणा कहाँ से मिली' विषय पर बोलना पड़ा, तब ज्ञात होता है कि उनकी डायरी के पन्नों ने ही उपन्यास का रूप ले लिया। डॉ. भास्कर का कथन- आनन्द मरा नहीं है, क्योंकि आनन्द मरते नहीं' से कहानी शुरू होती है। फ़िल्म में मूल कथा के साथ कई कथाएँ समानान्तर रूप से विकसित हुई हैं।

मूल कथा है- आनन्द सहगल (राजेश खन्ना), डॉ. प्रकाश कुलकर्णी (रमेश देव) के निजी अस्पताल में अपनी गंभीर बीमारी के इलाज के लिए आता है। वहाँ डॉ. कुलकर्णी का मित्र भास्कर बनर्जी (अमिताभ बच्चन) भी है। डॉ. भास्कर आनन्द की बकबक से गुस्सा होकर उसे बीमारी का नाम ‘लिम्बोसमा ऑफ द इंटस्टाइन' बताता है। आनन्द बीमारी का डॉक्टरी नाम सुनकर मजाकिया लहजे में कहता है- वाह! वाह! क्या बात है ! बीमारी हो तो ऐसी, वरना हो ही ना। लगता है जैसे किसी वायसराय का नाम है!' आनन्द के मजाकिया लहजे को देखकर डॉ. भास्कर को क्रोध आता है। तब आनन्द कहता है- 'बाबू मोशाय, जिन्दगी बड़ी होनी चाहिए, लम्बी नहीं।' यह मिलन ही डॉ. भास्कर के लेखक बनने का पहला दिन साबित होता है। आदर्शवादी डॉ. भास्कर गरीबों के बीच काम करता है जबकि डॉ. प्रकाश अपना निजी अस्पताल चलाता है। देश की आर्थिक राजधानी कहलानेवाली बम्बई महानगरी में अमीरी और गरीबी का समानान्तर जीवन चलता है। फिल्मकार ने इसका यथार्थ और सटीक चित्रण कर बताया है कि आजादी के वर्षों बाद भी भूख, गरीबी गंभीर मुद्दे बने हुए हैं। उसने डॉक्टरी पेशे के दोहरे चरित्र को भी रूपायित किया है।

आदर्शवादी डॉ. भास्कर का उद्देश्य बीमारी का इलाज कर मानव सेवा करना है। दूसरी तरफ डॉ. प्रकाश कुलकर्णी-जैसे डॉक्टर का उद्देश्य केवल धनोपार्जन करना है। रोगी को बिना कारण जाँच परीक्षण कराने पर डॉ. भास्कर अपने मित्र डॉ. प्रकाश को लताड़ता है। डॉ. कुलकर्णी का प्रत्युत्तर है- तो क्या करता, अगर दूध बेचता तो उसमें पानी मिलाता, वकील होता तो खूनी से पैसे लेकर उसे खून से बचाता, यहाँ कम-से-कम पेट का दर्द तो कम कर सकता हूँ।' फ़िल्मकार का वर्षों पूर्व डॉक्टरी पेशे पर लगाया गया प्रश्नचिह्न आज भी उसी रूप में विद्यमान है।

फ़िल्म का नायक आनन्द डॉ. कुलकर्णी के अस्पताल में कार्यरत प्रधान नर्स डीसा (ललिता पवार) से माँ-बेटे का भावनात्मक संबंध जोड़ लेता है। आनन्द डॉ. भास्कर से भी रोगी के अलावा मित्र बनकर जीवन का नया और आशावादी रूप सिखाता है। घरेलू नौकर रघु काका से भी जुड़ जाता है। आनन्द बताता है कि उसे बकबक करने और खाना खाने का शौक है। रघु काका भास्कर की शादी पर जोर देता है। भास्कर के पिता भी एक डॉक्टर थे। आनन्द को भास्कर के संकोची स्वभाव की जानकारी मिलती है। आनन्द भास्कर और रेणु की संवादहीनता को समाप्त कर देता है। वह रेणु की माँ को भी इस शादी के लिए तैयार कर देता है।

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