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स्वाधीन भारत में गोरक्षा-आन्दोलन
November 1, 2017 • And. Parmanand Mittal

गोवंश के प्रति हमारी इतनी प्रगाढ़ श्रद्धा रही है कि हम उसकी हत्या होते हुए कभी नहीं देख सके। इस विषय में हमारे आक्रोश को देखते हुए हुमायूँ, अकबर तथा शाहजहाँजैसे मुगल-शासकों को भी गोवंश-हत्या पर कड़ी सजा के फरमान जारी करने पड़े थे। सन् 1857 में अंग्रेजों ने भारतीय सैनिकों को गाय की चर्बी लगे कारतूस दिये, जिनको उन्हें दाँत लगाकर खोलना पड़ता। भारतीय सैनिकों ने ऐसे कारतूसों का इस्तेमाल करने से इंकार कर दिया। मंगल पाण्डे के नेतृत्व में युद्ध छिड़ गया। स्वाधीनता संग्राम के कर्णधार महात्मा गाँधी, बाल गंगाधर टिळक, लाला लाजपत राय, पं. मदनमोहन मालवीय, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन आदि ने अंग्रेजों के विरुद्ध आन्दोलन में जनता का सहयोग प्राप्त करने के लिए बार-बार घोषणा की थी कि आजादी मिलते ही गोहत्या पर प्रतिबन्ध लगा दिया जायेगा।

स्वाधीनता मिलने पर महात्मा गाँधी तथा राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के प्रयत्नों दिनांक 19.11.47 को भारत सरकार के कृषि मंत्रालय द्वारा गोरक्षण-संवर्धन पर विचार कर सम्मति देने के लिए सर दातार सिंह की अध्यक्षता में ‘गोरक्षण एवं विकास कमेटी बनाई गयी। उसने दिनांक 6.11.49 को अपनी रिपोर्ट दी, जिसमें सिफारिश की गई कि 14 वर्ष की आयु तक के पशुओं का वध तुरन्त रोका जायगो-सदनों की स्थापना हो तथा दो वर्ष के अन्दर गोवध पूर्णतः बन्द हो जाय। किन्तु सरकार ने इसे लागू नहीं किया। जनवरी1950 में भारतीय संविधान लागू हुआ जिसके अनुच्छेद 48 में गाय व बछिया- बछड़ों तथा अन्य दूध देनेवाले व कृषि- कार्य व भारवाहन करनेवाले पशुओं का वध न होने देना राज्य की नीति निर्धारित की गई, किन्तु भारत सरकार ने इन सभी प्रावधानों की भी उपेक्षा कर दी। यही नहीं, 20 दिसम्बर 1950 को भारत सरकार ने राज्य-सरकारों को निर्देश दिया कि गोवध पूर्णतया बन्द न करें, केवल उपयोगी पशुओं का वध बन्द करने का कानून बनाएँ, अन्यथा निर्यात हेतु बढ़िया खालें नहीं मिल पायेंगी। परिणामस्वरूप राज्यसरकारें गोवंश की हत्या पर पूर्ण प्रतिबन्ध न लगा सकीं।

सन् सन् 1952 की गोपाष्टमी से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबन्ध के लिए हस्ताक्षर-संग्रह अभियान चलाया। मात्र चार सप्ताह में पौने दो करोड हस्ताक्षर प्राप्त करके राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को भेंट किये गये। संघ के तत्कालीन सरसंघचालक माधवराव सदाशिवराव गोळवळकर (गुरुजी), लाला हरदेव सहाय, संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी, स्वामी करपात्री जी महाराज, महात्मा रामचन्द्र 'वीर' तथा आर्यसमाजी नेताओं ने गोरक्षार्थ जन-जागरण किया। सर्वदलीय गोरक्षा महाभियान समिति बनी।।

दिनांक 7 नवम्बर, 1966 को संसद भवन के पास विराट् सभा हुई जिसमें लगभग 12 लाख गोभक्त सम्मिलित हुए। सरकार ने उसे विफल करने के लिए अश्रुगैस, लाठी-प्रहार तथा गोली-वर्षा करके जलियाँवाला काण्ड का दृश्य उपस्थित कर दिया। सैकड़ों गोभक्त मारे गये। 

संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी तथा गोवर्धन मठ, पुरी के शंकराचार्य स्वामी निरंजनदेव तीर्थ ने सरकार की इस नृशंसता के विरुद्ध दीर्घकालीन अनशन किया। सरकार ने जनरोष को देखकर गोहत्या-बन्दी के सभी पहलुओं पर विचार करने के लिए 12 सदस्यों की एक उच्चस्तरीय समिति के गठन की घोषणा की और समय-समय पर संसद को गोवध-बन्दी के लिए आश्वस्त किया। सन्त विनोबा भावे ने गोवंश-हत्या-बन्दी के लिए अनशन किया। देवनार कत्लखाने कोबन्द कराने के लिए सत्याग्रह आरम्भ किया। सरकार ने उन्हें भी आश्वासन देकर उनका अनशन तुड़वा दिया, किन्तु गोवंश-हत्या दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती ही गई है।

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