स्वयंसेवक नरेंद्र मोदी
July 27, 2019 • नरेंद्र शुक्ल

प्रधानमंत्रित्व के काल में नरेंद्र मोदी ने सम्पूर्ण विश्व के समकालीन राजनैतिक परिदृश्य में एक अलग पहचान बनायी है। प्रधानमन्त्री के रूप में भारत के उत्थान के लिए उनके अनवरत संघर्ष और परिश्रम का लोहा आज उनके धुर विरोधी भी मान रहे हैं। यह पहली बार है जब भारत का कोई प्रधानमन्त्री विश्व की बड़ी से बड़ी शक्ति से आँख मिलाकर बात कर रहा है, जबकि छोटी शक्तियों को उतना ही सम्मान दे रहा है। आज जब पूरे भारत में एक बार पुनः आशा की किरण बंधी है तब यह जानना और जरूरी हो जाता है कि वह कौन सी शक्ति है जिसने नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व को इतनी ऊर्जा प्रदान की है। वडनगर की प्राचीन सांस्कृतिक धरती पर १७ सितम्बर १९२५ के दिन श्री दामोदर दास व हीरा बा के घर नरेंद्र मोदी का जन्म हुआ। आर्थिक हालात ऐसे कि छह भाई बहन में कोई भी उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर सका। किन्तु यह परिवार के संस्कार, अनुशासन और सेवप्रियता ही थी जिसने सभी में करुणा, आध्यात्म, परस्पर प्रीति और जिज्ञासा का भाव दियाचाय वाले से लेकर प्रधानमन्त्री तक के सफर की ये आधारभूमि थी।

किन्तु भारत माँ के आँचल की इस कच्ची सोंधी मिटटी को माँ भारती के स्वर्णिम मंदिर के निर्माण की ईंट बनने के लिए अभी बहुत - बहुत तपना था, जिसकी शुरुआत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा से हुई। वडनगर में भागवताचार्य हाई स्कूल के हिंदी भाषा के आचार्य चंद्रकांत दबे संघ की शाखा का संचालन करते थे। नरेंद्र मोदी इसी समय संघ के संपर्क में आये। संघ की शाखा में जो सबसे पहला प्रशिक्षण होता है, वह है 'समरसता'। वहां सब एक दूसरे को नाम से जानते हैं, जात-पांत, गरीबी-अमीरी से नहीं। शाखाओं पर अक्सर ऐसे 'चन्दन ' कार्यक्रम होते रहते हैं जिसमें प्रत्येक स्वयंसेवक अपने घर से कुछ भोजन लाता है और वहां सब एक दूसरे में मिला दिया जाता है। फिर सबमिलकर एक परिवार की तरह खाते हैं। वडनगर के दानेश्वर मंदिर में ऐसे ही एक कार्यक्रम के समय झिझकते हुए खड़े एक स्वयंसेवक रमेश ओझा से उनका 'कुल्हर' ( बाजरे का आटा, घी, और गुड़ से बना) लेते हुए नरेंद्र मोदी बोले " भैया, सुदामा के चावलों जैसी इतनी स्वादिष्ट चीज छिपाकर थोड़े ही रखी जाती है।" इस तरह स्वयंसेवकों में समरसता, एकात्मभाव, और भातृ भाव- एक ही परिवार के अंगभूत, ये संस्कार नरेंद्र मोदी को बचपन से संघ की शाखा में मिले थे।

संघ की शाखा वस्तुतः एक प्रयोगशाला है जहाँ मानव मूल्य अपने सर्वोच्चतम रूप में स्वयंसेवकों के मन मस्तिष्क में 'इनबिल्ड' की जाती हैअपने देश और समाज के प्रति जागरूक किया जाता है, और यह भाव भरा जाता है की उनका कष्ट वस्तुतः हमारा कष्ट हैसूरत के पास तापी नदी की बाढ़ से त्रस्त लोग मेरे अपने लोग हैं, जब यह भाव दिन रात सताता रहा तब स्वयंसेवक मोदी सावन मेला देखने के लिए खुद को मिले एक रुपये को भी अपने मित्रों के साथ मिलकर मेले में चाय का ठेला लगाने के लिए खर्च कर देता है, और उससे हुई पूरी आय बाढ़ पीड़ितों को समर्पित कर देता है।

प्रत्येक दिन एक घंटे की शाखा में किशोर सीखता है अनुशासन, समर्पण और राष्ट्रप्रेम, जो उसे लगातार देश के लिए उसके कर्तव्यों की याद दिलाता रहता है। यह बीज जो बचपन में उसके मनमस्तिष्क में आरोपित किया जाता है वह जीवन भर फलता फूलता रहता है। इस प्रकार एक किशोर अपना सर्वस्व देश व समाज पर अर्पित करने के लिए तैयार होता जाता है । यह यूँ ही नहीं है कि महज बारह साल का बालक नरेंद्र मोदी भारत-चीन युद्ध के लिए जाते सैनिकों की प्राणपण से सेवा सुश्रुषा करता है और सिर्फ सत्रह वर्ष की आयु में आध्यात्मिक प्रगति के लिए गृह त्याग देने वाला युवक जब वापस लौटता है तो वह संघ के प्रचारक के रूप में अपना जीवन राष्ट्र को समर्पित कर देता है । इस तरह; सभ्यता, मानव मूल्यों के जिन दो स्वरूपों में अपने सर्वोच्च को प्रगट करती है, ऐसे दोनों स्वरुप, यथा साधु और संघ प्रचारक के रूप में नरेंद्र मोदी ने स्वयं को राष्ट्र सेवा के निमित्त समर्पित कर दिया।

अपनी आध्यात्मिक यात्रा से आने के बाद नरेंद्र मोदी १९७९ से संघ कार्यालय पर ही रहने लगे थे। १९७२ में औपचारिक रूप से इन्हें संघ का प्रचारक घोषित किया गया। अपने प्रचारक जीवन में संघ की शाखाओं के प्रसार के साथ जब भी इन्हें कोई अतिरिक्त काम सौंपा गया इन्होने पूरी लगन के साथ पूरा किया। बिलकुल शुरुवात में डॉ वणिकर के मार्गदर्शन में विश्व हिन्दू परिषद ने सिद्धपुर में अपना गुजरात सम्मलेन आयोजित किया। इसकी समस्त व्यवस्था का कार्य नरेंद्र मोदी के हाथों में था। यहाँ उनके प्रबंध कौशल की सराहना हुई। १९७३ में गुजरात में फूड बिल के विरोध में एक विद्यार्थी आंदोलन चला जिसमे नरेंद्र मोदी ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के साथ जुड़कर अत्यंत सक्रिय भूमिका निभाई। कुछ समय बाद आपातकाल लगा दिया गया। आपातकाल में नरेंद्र मोदी का जुझारूपन काम आया। इन्होने न केवल भूमिगत रहकर आपातकाल विरोधी आयोजनों में भाग लिया बल्कि अन्य राज्यों से संपर्क स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाईइस दौरान नरेंद्र मोदी की जार्ज फर्नाडीस से मुलाक़ात हुई। दोनों ने लोकतंत्र और समकालीन तानाशाही पर अपने विचार साझा किये। नरेंद्र मोदी ने योजनानुसार, आपातकाल का विरोध कर रही 'लोक संघर्ष समिति के अध्यक्ष नानाजी देशमुख से जार्ज फर्नाडीस से मुलाक़ात करवाई। आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी ने राष्ट्रमंडल देशों के संसदीय प्रतिनिधियों का एक अन्तर्राष्ट्रीय सम्मलेन नई दिल्ली में आयोजित किया। उस दौरान नरेंद्र मोदी ने राजधानी दिल्ली में इंदिरा सरकार को नागवार गुजरने वाली अनेक पुस्तकें तैयार कर वितरित कीं। जिनके शीर्षक कुछ यूँ थे - भारतीय प्रेस प्रतिबंधित, तथ्य बनाम इंदिरा के झूठ, इंदिरा गांधी के बीस झूठ ,जब क़ानून अवज्ञा एक कर्तव्य हो, और आर्थिक अराजकता का एक दशक आदि। बाद में अपनी उच्च शिक्षा प्राप्ति के दौरान गुजरात में आपातकाल पर अलग से एक पुस्तक लिखी। १९७९ में जब मोदी शिक्षा और संघ कार्य के सिलसिले में दिल्ली में थे तब दत्तोपंत ठेंगडी जी ने इनकी आपातकाल पर पहली पुस्तक का आधार लेते हुए आपातकाल पर एक और पुस्तक के लिए शोधकर्ता की भूमिका दी। १९८० में मोदी पुनः गुजरात लौटे। नरेंद्र मोदी को गुजरात में अब विभाग प्रचारक का दायित्व सौंपा गया। इस विभाग में वडोदरा, पंचमहल, दहोद, आणंद, और खेड़ा जिले थे। कुछ ही दिनों बाद इनके कार्यक्षेत्र में सूरत विभाग भी जोड़ दिया गया। इस प्रकार वे संभाग प्रचारक बन गए। बाद में सह प्रांत व्यवस्था प्रमुख का दायित्व दिया गया। १९८१ से ही मोदी को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद , भारतीय किसान संघ, तथा विश्व हिन्दू परिषद के समन्वय का कार्य भी प्राप्त हो गया था। इस बीच इन्होने संघ के प्रकाशन विभाग- साधना प्रकाशन का भी प्रभार संभाला१९८१ के बाद विश्व हिन्दू परिषद ने पुरे देश में जनजागरण से जुड़े अनेक कार्यक्रम लेना प्रारम्भ कर दिए थे। गुजरात में नरेंद्र मोदी ने इनकी सफलता के लिए महती कार्य किया।

किन्तु तन, मन और सर्वस्व जीवन के बाद भी मातृभूमि को कुछ और देने की उनकी चाह उन्हें राजनीति में ले आई। १९८४ के आम चुनाव में कांग्रेस को अभूतपूर्व सफलता मिली। बाकी सभी दलों को हार का मुंह देखना पड़ा। किन्तु १९८६ में अहमदाबाद नगर निगम चुनाव हुए जिसका संचालन नरेंद्र मोदी ने किया था। भारतीय जनता पार्टी दो तिहाई बहुमत से जीती। पार्टी को इस जीत ने बड़ा सम्बल दिया। १९८७ में और नरेंद्र मोदी को कार्य करने के लिए भारतीय जनता पार्टी में भेज दिया गया। २००१ में जब गुजरात बीजेपी भारी संकट से गुजर रही थी तब मोदी को गुजरात के मुख्यमंत्री का दायित्व सौंपा गया।

जो लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की रीति-नीति से परिचित हैं, वे जानते हैं की वहां कुछ भी अनायास नहीं होता। भगवान के चरणों में जैसे सबसे ताजे, सुगन्धित, और सुन्दर फूल चुनकर चढ़ते हैं, वैसे ही भारत माता के मंदिर में राष्ट्र सेवा के लिए सबसे मेधावी, प्रत्युत्पन्नमति, और कर्मठ व्यक्ति को चुना जाता है। संघ की शाखा में सबसे तेज और अनुशासित किशोर को ही सबमे से गठनायक, मुख्यशिक्षक, का दायित्व दिया जाता है। उनमें से सबसे मेधावी व्यक्ति आगे मंडल, नगर, जिले की रचना में कार्य करते हैं। और इनमे से कोई एक ही संघ प्रचारक के लिए चुना जाता है। फिर देश के प्रधानमन्त्री का दायित्व, जो राष्ट्र को 'परम वैभव' पर ले जाने के स्वप्न को साकार करने की क्षमता रखता है उसका चुनाव किसी राजनैतिक गुणा गणित का परिणाम नहीं हो सकता था। यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की लगभग ९० वर्ष की स्वयंसेवक निर्माण की प्रयोगशाला के सर्वोत्तम उत्पाद में से ही एक होना था। कोई ऐसा जो दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के राष्ट्रपति को नाम से बुला सकने का आत्मविश्वास रखता हो, जो सम्पूर्ण विश्व के कोने - कोने में फैले भारतवंशियों में मातृभूमि के प्रति पुनः अपने कर्तव्य का भाव जगा सके, जो एक सौ पच्चीस करोड़ भारतवासियों को पुनः उनका बल याद दिला सकता हो, और वह था स्वयंसेवक नरेंद्र मोदी।

1- १७ सितम्बर १९२५ के दिन श्री दामोदर दास व हीरा बा के घर नरेंद्र मोदी का जन्म

2- दस वर्ष की आयु में संघ के स्वयंसेवक बने

3- १७ वर्ष की आयु में गृह त्याग

4- १९७१ में २१ वर्ष की आयु में संघ कार्यालय को अपना निवास बनाया

5- १९७२ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक बने, बांग्लादेश में पाकिस्तानी सेना द्वारा नरसंहार के विरुद्ध दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान गिरफ्तारी दी

6- १९७३ में प्रथम संघ शिक्षा वर्ग नाडियाड में

7- १९७५ में वतीय संघ शिक्षा वर्ग बाजवा ( बड़ौदा ) में

8- १९७८ में तृतीय संघ शिक्षा वर्ग नागपुर में

9- १९७३ में गुजरात में विद्यार्थी आंदोलन में अत्यंत सक्रिय भूमिका

10- १९८९ में दिल्ली लाया गया। ठेगडी जी ने आपातकाल पर पुस्तक के शोधकर्ता के रूप में कार्य दिया।

11- १९८० में विभाग प्रचारक

12- कुछ समय बाद संभाग प्रचारक का दायित्व प्राप्त हुआ

13- प्रान्त व्यवस्था प्रमुख बने

14- १९८७ में भारतीय जनता पार्टी में भेजे गए

15-२००१ में गुजरात के मुख्यमंत्री का दायित्व प्राप्त हुआ

16-२०१४ में भारत के प्रधानमंत्री चुने गए।