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सुरक्षा का असली अर्थ
September 1, 2017 • Dr. Murli Manohar Joshi

जब कभी भारत की एकता- अखण्डता एवं सुरक्षा की चर्चा होती है, तब अनायास ही देश की सीमाओं पर गहराते हुए संकटों की ओर ध्यान जाना स्वाभाविक है। आखिर उधर ध्यान जाए भी क्यों न? जब उत्तर में नाभिकीय शस्त्रों से लैस चीन, जिसने हमारी हजारों वर्गमील भूमि दबा रखी हो और आज भी अरुणाचल में अतिक्रमण कर रहा हो, उत्तर-पश्चिम में महाशक्तिशाली रूस अफगानिस्तान में डटा हुआ कश्मीर से सटा हुआ हो और अब चीन से मैत्री कर रहा हो, पश्चिम में अणुबम से सज्जित पाकिस्तान हो, हिंद महासागर में नाभिकीय अस्त्रों की मार करने में सक्षम अमेरिकी युद्धपोत चक्कर लगा रहा हों, पूर्व में बांग्लादेश की तरफ से लाखों घुसपैठिए हमारी सीमा पार करके चले आ रहे हों, तब सीमारेखा की रक्षा की तरफ ध्यान जाना आम नागरिक की सहज प्रतिक्रिया ही होगी।

सच तो यह है कि देश की भौगोलिक सीमाओं का अतिक्रमण देश पर होनेवाले आक्रमण का ऐसा रूप है जिसे प्रत्येक व्यक्ति देख और समझ सकता है। इसलिए ऐसी परिस्थिति उत्पन्न होने की आशंकाओं तक पर चिन्ता होने लगती है। परन्तु देश की सुरक्षा का अर्थ मात्र उसके भौगोलिक आकार का बाहरी हमले से बचावभर करना, बहुत संकुचित अर्थ होगा, भले ही वह अधिक बोधगम्य हो। देश, देश में रहनेवाला समाज, उसकी संस्कृति, उसके जीवन-मूल्य, उन पर आधारित समाज रचना, उसकी चिति, इन सबका विनाश भी तो राष्ट्र का ही विनाश करना होगा। इसलिए राष्ट्रजीवन का संरक्षण करना एक व्यापक परिकल्पना है और सुरक्षा का असली मतलब इन सब तत्त्वों की सुरक्षा करना होगा। इसलिए हमें सीमा पर या सीमा के बाहर से होनेवाले आक्रमणों के साथ-साथ सीमा के अंदर उत्पन्न किए जा रहे अनेक संकटों से भी देश को बचाने पर विचार करना चाहिए।

प्रकृति के इस नियम को कौन नहीं जानता कि स्वस्थ एवं सबल शरीर पर रोगों का प्रभाव नगण्य होता है, किन्तु दुर्बल एवं जर्जर शरीर बाहरी रोगों को निमंत्रित करता है। समाज और राष्ट्रों के लिए भी यह नियम लागू होता है। इतिहास साक्षी है कि जब तक भारतीय समाजजीवन का स्वास्थ्य सुदृढ़ रहा, तब तक इसकी भौगोलिक सीमाएँ भी सुरक्षित रहीं। वे अरब-आकांता, जिन्होंने मुहम्मद साहब के देहावसान के पचास वर्षों में आधी दुनिया जीत ली थी, वे भी भारत की सीमाओं में प्रवेश करने का दुस्साहस नहीं कर सके थे। जब हर्ष का तिरोधान हो गया और भारतीय सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन विशृंखलित हो गए, तब ही भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमाओं से आक्रमणकारी देश में गहरे पैठ सके, जबकि सिकंदर और सेल्यूकस तो झेलम भी पार न कर सके थे। अतः वर्तमान परिप्रेक्ष्य में हमें अपने अंदर झाँककर देखना और अपनी दुर्बलताओं को समझना ज़रूरी है। कहीं ऐसा न हो जाए कि सीमा पर सैनिक अपनी प्राणों की बाजी लगाकर मातृभूमि की रक्षा के लिए मर मिटें और सीमा के अंदर का समाज हार जाए। आर्थिक दृष्टि से जर्जर, सामाजिक दृष्टि से विघटित, नैतिक एवं सामाजिक निष्ठाओं से रहित समाज जब दुर्बल, भ्रष्ट एवं विलासी नेतृत्व द्वारा संचारित हो, तब उसके विनाश के लिए बाहरी आक्रमण की जरूरत ही क्या है? वाल्मीकि के अनुसार अराजक राज्य किसी भी राष्ट्र के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा संकट हुआ करता है।

विघटित भारतीय समाज के रहते देश कैसे सुरक्षित रह सकेगा? यदि समाज की बहुसंख्या के मन में परस्पर आत्मीय भाव न हो, विभिन्न वर्गों और समूहों को एक- दूसरे पर विभिन्न स्तरों पर अविश्वास एवं शंकाएँ विद्यमान हों, विभिन्न वर्गों और समूहों को एक-दूसरे की नीयत पर शक हो, तब राष्ट्रजीवन कैसे सुरक्षित रह सकता है? पुराने इतिहास को छोड़ भी दें, तो सत्तर वर्ष पूर्व इस देश में क्या कुछ नहीं देखा हमने? इसी देश में जन्मे, यहीं के निवासियों ने यह कह दिया कि हम एक- दूसरे के साथ मिलकर नहीं रह सकते। देश टूट गया। भारत का भूगोल 1947 में बाहरी आक्रमण से नहीं बदला था, वरन् आंतरिक विघटन और अविश्वास के कारण बदल गया था। आजादी और विभाजन के सत्तर वर्षों बाद भी क्या हमारे समाज से विघटन एवं अलगाव के यह विषवृक्ष हटाए जा सके? क्या कम किया जा सका साम्प्रदायिक उन्माद आज तक? विभिन्न पंथों और सम्प्रदायों में अविश्वास का बढ़ते रहना भारतीय राष्ट्र की अस्मिता के लिए गहरा संकट है। यदि भारत में रहनेवाले विभिन्न पंथों के अनुयायी एक-दूसरे के रक्त के प्यासे बने रहेंगे, तब बाहरी आक्रमण की आवश्यकता ही क्या है? साम्प्रदायिक आधार पर टूटा-बिखरा समाज राष्ट्र के अस्तित्व को ही संकटापन्न कर देगा। इसलिए सुरक्षा के दोनों पक्ष समझना आवश्यक है। एक, बाहरी

आक्रमणों से देश का बचाव करना और दूसरा, आंतरिक बिखराव को रोकना। अंदर से किया जानेवाला छद्म आक्रमण नागरिक आसानी से नहीं समझ पाता। कई बार तो प्रबुद्ध वर्ग को भी यह भीतरघात समझना बहुत कठिन हो जाता है। पर देश तो ऐसे भी पागल हुआ करते हैं जो चिल्ला-चिल्लाकर राष्ट्र को खोखला बनाए जानेवाले क्रियाकलापों से सावधान करते । उस समय उनकी बात कोई ध्यान नहीं देता, पर जब देश में सर्वनाश सामने आ खड़ा होता है, तब लोग पछताया करते हैं।

भारत को भीतर से तोड़ने की कहानी नयी नहीं है। वह शुरू होती है भारत में अंग्रेजी शासन से। अंग्रेज ने देख लिया था कि यदि भारत पर राज्य कायम कर लिया जाए, तो यहाँ की विशाल जनसंख्या के रूप में बहुत बड़ा बाजार उपलब्ध हो जाएगा और मिल जाएगा यहाँ का अच्छा कच्चा माल लिवरपूल और मानचेस्टर के कारखानों के लिए। लेकिन हजारों मील दूर, सात समंदर पार का इतना बड़ा देश कब्जे में कैसे रखा जाए? क्या फौज़ के बल पर रखा जा सकेगा गुलाम, इस भारत को? नहीं, यह तो सम्भव नहीं था। इसलिए भारत को टूटा-फूटा-बिखरा बनाए रखना ज़रूरी था उन चालाक फिरंगियों की नज़र में। वह समझ गए थे कि भारत एक महान् संस्कृति का उत्तराधिकारी है। एक गौरवशाली अतीत का स्वामी है। यदि इसे अपने इतिहास का बोध और अपनी वास्तविक महानता का ज्ञान हो गया तो मुश्किल होगा इस पर राज करना। इसलिए, धूर्त अंग्रेजों ने रचा भारत के मर्म पर संघातक प्रहार करने का षड्यंत्र।

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