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सुदृढ़ शिक्षा-प्रणाली से ही सर्वांगीण विकास संभव
May 1, 2017 • Veena Singh

शिक्षा का मूल उद्देश्य विद्यार्थी को उसकीबाहरी और आंतरिक आवश्यकताओं से परिचित कराकर उसको पूरा करने की कला प्रदान करना है। शिक्षा नये मनुष्यों को गढ़नेवाले जीवन-मूल्यों को अर्थ प्रदान करती है जिससे उनका जीवन सुख-समृद्धि एवं प्रसन्नता की ओर अग्रसर होता है। मनुष्य जीवन के हर तल पर अपरिमित ऊर्जा समाई है। शिक्षा इस ऊर्जा का सही और सटीक उपयोग समझाती है। शिक्षा जीवन की भौतिक जरूरतें, जैसे- व्यवसाय, नौकरी एवं सुरक्षा आदि की पूर्ति के साथ ही बौद्धिक, नैतिक एवं आत्मिक मूल्यों की पहचान कराती है। मनुष्य के सर्वांगीण विकास की राह दिखाती है, परन्तु आज की शिक्षा-प्रणाली को एकांगी बना दिया गया है। आज की शिक्षा जीविकोपार्जन एवं व्यवसाय का एक जरिया बन गई है और इसी कारण शिक्षा के व्यावसायीकरण का दौर प्रारम्भ हो गया है। व्यावसायिक शिक्षा निःसंदेह काफ़ी आगे बढ़ी है जिसके परिणामस्वरूप देश में अनगिनत उच्च एवं प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना हुई है। इन प्रतिष्ठित संस्थाओं से प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में प्रतिभावान छात्र निकलते हैं और देश-विदेश में अच्छी नौकरी प्राप्त कर अपनी प्रतिभा को दर्शाते हैं। परन्तु इसका दूसरा एवं अन्य पहलू उतना ही निराशाजनक एवं चुनौतीपूर्ण है। जो प्रतिभाशाली छात्र उच्च शिक्षण-संस्थाओं से निकल रहे हैं, यदि इनके जीवन-मूल्यों और समाज एवं राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व के प्रति दृष्टिकोण का पता लगाया जाए, तो निराशा ही हाथ लगेगी। वर्तमान शिक्षापद्धति से जो ज्ञान प्राप्त हो रहा है, वह केवल बौद्धिक धरातल तक ही सीमित है। इससे व्यक्ति के अन्दर दबी पड़ी सुप्त क्षमताओं का जागरण संभव नहीं है। वह ज्ञान तो केवल व्यक्ति को जीविकोपार्जन तक ही सीमित रखता है।

हमारी शिक्षाप्रणाली ऐसी हो जो उच्च एवं गुणवत्तापरक शिक्षा सभी में उचित ढंग से पहुँचा सके। ग्रामीण अंचल के अधिकांश विद्यार्थी, विशेषकर लड़कियाँ विज्ञान की शिक्षा से दूर हैं। उनकी शैक्षिक गुणवत्ता बढ़ाने के लिए कोई विशेष साधन-संसाधन नहीं हैं। शिक्षा का स्वरूप ऐसा हो जिसमें सभी विद्यार्थियों की सम्पूर्ण प्रतिभा का विकास हो, साथ ही उनकी रचनात्मकता में भी वृद्धि हो। अध्ययन का आधार विश्लेषणात्मक और रचनात्मक हो। विश्लेषणात्मक अध्ययन में सुचारू रूप से तर्क, तथ्य, प्रमाण एवं आँकड़ों आदि के प्रयोग का ज्ञान कराया जाए। रचनात्मक अध्ययन में सृजनशीलता के महत्त्व पर बल दिया जाये। वर्तमान शिक्षा में विद्या का समावेश होना आवश्यक है। शिक्षा के साथ छात्रों को जीवन जीने की कला, जीवन-प्रबंधन एवं जीवन-मूल्यों की भी समझ हो। स्कूली पाठ्यक्रमों में जो विषय पढ़ाए जाएँ, उनमें भी रोचकता हो ताकि विद्यार्थी उन्हें सहजता से समझ सकें। हम अपनी सुदृढ़ शिक्षा-पद्धति को विकसित न कर पाने का दंभ झेल रहे हैं। छात्र अपनी मौलिकता, प्रतिभा एवं रचनात्मकता को पीछे छोड़ते जा रहे हैं। शिक्षण संस्थानों की संख्या लगातार बढ़ रही है। ये शिक्षण-संस्थान डिग्रियाँ तो बाँट रहे हैं, परंतु उनके अनुरूप न तो रोज़गार दे पा रहे हैं और न ही विद्यार्थियों के व्यक्तित्व गढ़ पा रहे हैं, जिसका परिणाम भयावह हो रहा है। छात्रों में धैर्य और विश्वास की कमी हो रही है, जिसके चलते वे कुंठा, अवसाद, निराशा, हताशा, आदि से घिरते जा रहे हैं।

इस समस्या का समाधान यही है कि शिक्षा में गुणवत्ता पैदा की जाये ताकि कुशल एवं योग्य नागरिक समाज को मिल सकें। इसके लिए एक ऐसी शिक्षाप्रणाली की स्थापना करने की आवश्यकता है जिसमें युवा इतने स्वावलंबी बन सकें कि वे स्वतः ही अपना व्यवसाय खड़ा कर सकने में सक्षम हों, साथ ही वे अपने जीवन के प्रति गम्भीर दृष्टि रखें। जीवनमूल्यों को समझें और उसके अनुरूप जीवन जीने की कला को विकसित करें। यही शिक्षा-प्रणाली आज की आवश्यकता है।