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सिख विवाहित विराट हिंदू-समाज के अभिन्न अंग हैं।
February 1, 2017 • Gunjan Aggrawal

श्रीचन्द्र जी ने हिंदू-धर्म रक्षार्थ ही कार्य किया था। वैदिक धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा की थी। आप केवल एक विरक्त संत ही नहीं बल्कि हिंदू संस्कृति के परमोद्धारक भी थे। सिंध में यवनों के हिंदुओं पर अत्याचार से क्रुद्ध होकर उन्होंने योगबल से वहाँ के शासक को परास्त किया और हिंदुओं की धार्मिक स्वतंत्रता की घोषणा करवायी।

भारत में मुगल-शासन के समय हिंदू-धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए भारतवर्ष के भिन्न-भिन्न प्रांतों से भक्ति और शक्ति की लहरें उठीं। पंजाब में इसके जन्मदाता गुरु नानक देव (1469-1539) हुए। उन्होंने अपनी तपस्या, भक्ति और ज्ञान के प्रभाव से हिंदू-संस्कृति की ध्वजा मक्का, बगदाद और दूसरे देशों में भी फहरायी। उस समय की दशा का वर्णन स्वयं गुरु नानक देव ने इन शब्दों में किया है

कलि काती राजे कसाई धर्म पंखकर उड़ि रया। कूड़ अमावस सच्च चन्द्रमा दीसे नाहीं कहि चढ़िया॥

अर्थात्, कलियुग छुरी की तरह है, इस युग के राजे कसाई हैं, धर्म पंख लगाकर उड़ गया है। झूठ की अमावस्या छाई हुई है। इसमें सच्चाई का चन्द्रमा कहीं दिखाई नहीं देता।

बाबा गणेशदास जी वेदी अपनी कृति ‘नानक जन्म साखी' में गुरु नानक देव के जन्म का हेतु इसी प्राचीन विचारधारा की रक्षा लिखते हैं

राज विनाश भयो नृप हिंदुप, फैल पर्यो जग में तुरकाना। घात गवादिक पातक पुंज सु होन लगे उत्पात महाना॥ संयम नेम गयो छवि कै, कलि काम और क्रोध भयो परधाना। भूप भयो मति अंध महा, निरखै न कछु न सुनै कछु काना॥

सन् 1571 में गुरु नानक देव के सुपुत्र श्रीचन्द्र जी (1494-1643) पर कुछ दुष्टों ने आक्रमण कर दिया। उस समय उनके शिष्यों ने उनकी रक्षा हेतु ईश्वर से प्रार्थना की। उस प्रार्थना में उनलोगों ने अपने गुरु को हिंदुओं को रक्षणकर्ता बताया है

जगत गुरु श्रीचन्द्र मनाओ। सब हिंदू मिल के यह गाओ। जगत गुरु श्री चन्द्र हमारा। है सब हिंदुन का रखवारा॥

ऐतिहासिक सत्य है कि श्रीचन्द्र जी ने हिंदू-धर्म रक्षार्थ ही कार्य किया था। वैदिक धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा की थी। आप केवल एक विरक्त संत ही नहीं बल्कि हिंदू संस्कृति के परमोद्धारक भी थे। सिंध में यवनों के हिंदुओं पर अत्याचार से क्रुद्ध होकर उन्होंने योगबल से वहाँ के शासक को परास्त किया और हिंदुओं की धार्मिक स्वतंत्रता की घोषणा करवायी। लोकहित के लिए आपने अनेक चमत्कार दिखाए और अत्यन्त संकट काल में भी हिंदू-धर्म की ध्वजा को देश-विदेश में फहराए रखाहिंदू-जागरण तथा वैदिक ज्ञान के प्रचारप्रसार के लिए चार विद्वानों को नियुक्त किया।

पंचम सिख-गुरु श्री अर्जुन देव (1581-1606) ने हिंदू समाज एवं हिंदू-धर्म की रक्षा हेतु महान् बलिदान दिया। उनके बलिदान की गाथा सुनकर कौन ऐसा होगा जो रो न पड़े। गुरु अर्जुन देव ने अत्याचारों से घबराकर इस्लाम स्वीकार नहीं कर लिया। जब उनपर अनेक प्रकार के जुल्म ढाए जा रहे थे, उस समय एक ही अरदास उनके मुँह पर थी

तेरा भाणा मीठा लागे। हरिनाम पदारथ नानक मांगे॥

इस प्रकार, सिख-गुरुओं ने हिंदू समाज की रक्षा के लिए बलिदान कीअद्भुत परम्परा को आगे बढ़ाया। नवम गुरु श्री तेग बहादुर ने भी हिंदू-धर्म रक्षार्थ बलिदान दिया था। जब औरंगजेब (1658-1707) ने उनसे हिंदू-धर्म छोड़कर इस्लाम स्वीकार करने को कहा, तब उन्होंने औरंगजेब को दो टूक उत्तर दिया था

धरम हम हिंदू। अति प्रिय को किम करहिं निकन्दू॥ लोक प्रलोक विखै सुखदानी। आन न पईयति जांहि समानी॥मन मलीन मूरख मति जोई इसे त्यागहि पामर होई॥ दीन दुखी महिं दुख को पावै। जम सजाई दे नही त्रिपतावै। सुमतिवंत हम कहु क्यों त्यागहिं त्रितीह प्रान हीव की बात सो हम सहैं अपने गात॥ हिंदू धरम रखहिं जग मांही। तुमरे करे विनस है नांही॥ -भाई संतोष सिंह कृत श्री

-भाई संतोष सिंह कृत श्री गुरु प्रताप

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