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सिंहस्थ उज्जयिनी का अमृत-पर्व
May 1, 2016 • Rajsekhar Vyas

सकन्दपुराण के संबंध में एक कथा दी गई है। समुद्र-मंथन के पश्चात् अमृत- कलश से कुछ । प्रयाग, हरिद्वार, नासिक और उज्जयिनी में छलकीं तभी से यहाँ पर कुंभ और सिंहस्थ-पर्व की नींव पड़ी। सिंहस्थ पर्व का उज्जयिनी से घनिष्ठ संबंध है। भारत की प्राचीन महानगरियों में उज्जयिनी को अत्यन्त पवित्र नगरी माना गया है।

प्रयाग, नासिक, हरिद्वार और उज्जयिनी- इन स्थानों की पवित्रता और श्रेष्ठता यहाँ होनेवाले कुंभ अथवा सिंहस्थ-महापर्व के कारण भी मानी जाती है। कुंभ या सिंहस्थ पर्व इन्हीं स्थानों पर क्यों मनाया जाता है, इस संबंध में स्कन्दपुराण में एक अत्यन्त रोचक कथा उल्लिखत है : देवताओं और दानवों ने समुद्र-मंथन किया, उसमें अनेक रत्न प्राप्त हुए, उनमें एक अमृत कुंभ भी प्राप्त हुआ। उस कलश के लिए देवता और दानवों में संघर्ष होने लगा। इंद्र का पुत्र जयंत उस कलश को लेकर भागा, अमृत हेतु सभी उसके पीछे लग गये। कलश भी एक हाथ से दूसरे हाथ पहुंचने लगा। देवताओं में भी सूर्य, चन्द्र और गुरु का कलश-संरक्षण में विशेष सहयोग रहा था, चन्द्र ने कलश को गिरने से, सूर्य ने फूटने से तथा बृहस्पति ने असुरों के हाथ में जाने से बचाया था। फिर भी इस संघर्ष में कुंभ में से अमृत की बूंदें छलकीं। ये अमृत-बूंदें प्रयाग, हरिद्वार, नासिक और उज्जयिनी नगरी में छलकीं थीं, अतः ये ही स्थल कुंभ पर्व के स्थल बन गये। ये ही वे चार तीर्थ हैं जो अमृत-बिन्दु के पतन से अमृत्व पा गये। धार्मिक गणों की आस्था है कि कलश से छलकी बूंदों से न सिर्फ यह तीर्थ, अपितु यहँकी पवित्र नदियाँ भी (गंगा, यमुना, सरस्वती, गोदावरी एवं क्षिप्रा अमृतमयी हो गई हैं।

इस कथा में धार्मिक पवित्रता के साथ-साथ खगोलीय एवं वैज्ञानिक महत्त्व भी समाहित है। गृहों और नक्षत्रों की विशिष्ट गतिविधि के कारण ही सिंहस्थ अथवा कुंभ पर्व 12 वर्षों में एक बार एकबार एक नगरी में मनाया जाता है। ये विशिष्ट ग्रहयोग भी प्रत्येक पवित्र स्थल के लिए पृथक्-पृथक् हैं, जैसे प्रयाग में होनेवाले कुंभ पर्व पर मकर राशि में सूर्य, वृष राशि में गुरु तथा माघ मास होना आवश्यक है।

उज्जयिनी के कुंभ पर्व को अन्य पर्वो से अधिक महत्त्व प्राप्त है; क्योंकि इसमें सिंहस्थ भी समाहित है। सिंहस्थ माहात्म्य में उज्जयिनी में सिंहस्थ पर्व होने के लिए दस योगों का होना अत्यावश्यक माना गया है। वे योग हैं- वैशाख मास, शुक्ल पक्ष, पूर्णिमा, मेष राशि पर सूर्य, सिंह राशि पर बृहस्पति, तुला राशि पर चन्द्र, स्वाति नक्षत्र व्यतिपात योग, सोमवार एवं उज्जयिनी की भूमि।

सिंह राशि पर गुरु न होने की स्थिति में यहाँ यह पर्व नहीं मनाया जा सकता। अन्य नवयोग होने पर भी यह पर्व नहीं होता। यहाँ सिंह राशि में गुरु की स्थिति। को परम तेजस्वी माना गया है। तभी यहाँ के पर्व का नाम कुंभ पर्व न होकर 'सिंहस्थ' है। संवत् 2012 में अन्य नवयोगों के होने पर भी सिंह के गुरु के न होने से यहाँ सिंहस्थ नहीं मनाया गया था।

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