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सामाजिक सौहार्द का सन्देशवाहक स्वर्ण मन्दिर
October 1, 2016 • Prof. Svantra Kumar

पंजाब भारतमाता की खड्ग और ऋषियों-मुनियों-गुरुओं की पवित्र धरती है, इसी पवित्र भूमि पर वेदों का संकलन हुआ। इसी धरती पर मानवता एवं भाईचारे व प्रेम का संदेश देनेवाले श्री हरिमन्दिर साहिब का निर्माण हुआ। सिखों के धार्मिक स्थान श्री दरबार साहिब, जिसे हरिमन्दिर या स्वर्ण मन्दिर भी कहा जाता है, पंजाब की धरती अमृतसर में विराजमान है। इस महान् गुरुद्वारे का शिलान्यास 1588 ई. में पाँचवें गुरु अर्जुनदेव द्वारा किया गया। 30 अगस्त, 1604 ई. को यह बनकर सम्पूर्ण हुआ। बाबा बुड्ढा जी हरिमन्दिर के पहले ग्रंथी थे जो अपनी सेवाएँ मानवता के भले के लिए देते थे।

हरिमन्दिर साहिब के चार दरवाजे हैं जो चारों दिशाओं में खुलते हैं। ये दरवाजे यह कि अकबर के दरबारी लेखक अबुल फजल भी इस विषय में चुप है (दि गोल्डन टेम्पल : पास्ट एण्ड प्रैजेण्ट, पृ. 6)।

गुरु रामदास द्वारा चक्क गुरु का' नामक । नगर की स्थापना करना

तत्पश्चात् गुरु अमरदास ने अकबर की ओर से आश्वस्त होकर उस प्राचीन भूमि के एक भाग में एक नगर बसाने की योजना पर कार्य करना प्रारम्भ कर दिया। उन्होंने इस कार्य की सिद्धि के लिए अपने शिष्य और जामाता श्री रामदास को प्रेरित किया। इसके कुछ वर्ष उपरान्त श्री रामदास जी को चौथे गुरु के पद पर प्रतिष्ठित करने उपरान्त गुरु अमरदास 1631 विक्रमी की भाद्रपद पूर्णिमा को परलोक सिधार गए।

भाई केसर सिंह छिब्बर बताते हैं : ‘संवत् 1633 विक्रमी में गुरु रामदास अमृतसरवाले स्थान पर आ विराजे। वे बहुत सारी संगत साथ लेकर आए थे। उन्होंने कुलालों को बुलवाकर ईंटें बनाने-पकाने के काम पर लगा दिया। फिर यहाँ नगर-निर्माण का उपाय किया। इसका नाम 'चक्क गुरु का रखा। कोट की उसारी करके उसमें घरों का निर्माण करवाया। फिर खतरी इत्यादि लोगों का बुला बसाया। शास्त्रों में वर्णित पावन तीर्थ अमृत-सरोवर का पुनरुद्धार किया। संवत् 1634 विक्रमी के अन्त तक नगर- निर्माण का कार्य पूरा हुआ।' (बंसावलीनामा दसां पातशाहीआं का, 1826 वि., प्रो.प्यारा सिंह पदम द्वारा सम्पादित, सिंह ब्रदर्ज, अमृतसर, 1997 ई, 4.17-21) भाई केसर सिंह छिब्बर आगे लिखते हैं : ‘सुधासर नामक प्राचीन तीर्थ के पुनरुद्धार करने पर दो नाम लोक-प्रचलित हुए। कुछ लोग इसे रामदास-सर कहते हैं और कई अमर-सर। श्रीगुरु जी ने उस नगर में अपने लिए भी धाम बनवाए थे। कुछ काल तक वहाँ स्वयं भी बसते रहे। सभी कार्य गुरु अमरदास और गुरु रामदास ने सम्पन्न कराए थे (वही, 4.25-26)।

इस प्रकार तीसरे गुरु की सत्प्रेरणा से चौथे गुरु ने यह शुभ कार्य साकार कर दिखाया था। किन्तु अमृत सरोवर अभी कच्चा बन पाया था। एक दिन श्रीगुरु रामदास ने यह शुभ संकल्प किया कि अमृत सरोवर को पक्का बनवाने के साथ-साथ उसके मध्य में श्रीहरि के पावन मन्दिर का भी निर्माण किया जाए। उन्होंने मन-ही-मन दोनों की रूपरेखा तैयार कर ली। यह रूपरेखा उन्होंने अपने पुत्र श्री अर्जुनदेव को बता दी।

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