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सात सखियों का संगीत
September 1, 2016 • Narmal Agasty

भारत का उत्तर-पूर्व सात राज्यों की कलात्मकता और सृजनशीलता से ऐसे सुशोभित है मानो प्रकृति कला की देवी सरस्वती के साथ यहाँ विराजमान हों। यह समूचा क्षेत्र विभिन्न प्रकार की कलाओं से भरा पड़ा है। हालाँकि ये सभी राज्य एक समूह में हैं, फिर भी इन राज्यों के सांस्कृतिक प्रतिमान अपने-अपने तरीके से प्रखर भी हैं और अलग भी। यद्यपि कहीं-कहीं समानताएँ और प्रभाव भी है, तथापि उनकी अपनी सांस्कृतिक विरासत का रंग कहीं भी धूमिल होता नहीं जान पड़ता है। सिक्किम उस क्षेत्र का आठवाँ राज्य है जो इन सात राज्यों की तरह ही अपने लोकसंगीत के कारण अपनी विशेष पहचान रखता है।

आईये, सबसे पहले भारत के सबसे उत्तर-पूर्व राज्य अरुणाचलप्रदेश के संगीत और नृत्य की चर्चा करते हैं जहाँ सूर्य अपनी किरणों को सबसे पहले बिखेरते हैं। अरुणाचलप्रदेश के संगीत और नृत्य में परी-कथाओं, लोककथाओं, किंवदन्तियों, रीति-रिवाजों और मान्यताओं का सम्प्रेषण होता है। यदि संगीत के साथ नृत्य की बात करें तो ये भी पारम्परिकता से जुड़े होते हैं। कुछ पारम्परिक नृत्यों में परिवार और गाँववालों के उत्थान, अच्छा स्वास्थ्य और प्रसन्नता का वर्णन किया जाता है। कुछ विशेष अवसरों पर कृषि, पशुपालन और अच्छी उपज को इंगित करते संगीत को पारम्परिक नृत्य के साथ गाया-बजाया जाता है। इसके अलावा श्राद्ध से सम्बन्धित संगीत भी यहाँ प्रचलित है। सबसे अलग और अनोखा वह संगीतमय नृत्य है जिसमें स्त्रीपुरुष समागम की विभिन्न मुद्राओं का प्रदर्शन इस धारणा से किया जाता है कि ऐसा करने से स्त्री और पुरुष की सन्तानोत्पत्ति की क्षमता में कमी नहीं होगी। यहाँ वीररस से भरे शौर्य-गाथाओं को संगीत के माध्यम से व्यक्त करने का प्रचलन है। जिसमें ये अपने अतीत की वीरगाथाओं का वर्णन करते हैं। इस संगीत को ‘बरई' के नाम से जाना जाता है। किसी खुशी, विवाह या संगीति के अवसर पर गाए जानेवाले गीतों को ‘जा-जिन-जा' के नाम से जाना जाता है। इसके अलावा यहाँ के नृत्य और संगीत में धारणाओं और आस्थाओं को व्यक्त करने का विशेष महत्त्व है। ‘अजी लामू', 'रोप्पी', 'बुइया', ‘हुरकानि', ‘पोपिर', 'चालो' और 'पोनिंग' इत्यादि यहाँ के प्रमुख नृत्य हैं। अरुणाचलप्रदेश के ठीक नीचे असम प्रदेश है जो कई आकर्षक नृत्यों और कर्णप्रिय संगीत के लिए जाना जाता है। असम का संगीत अपने पारम्परिक लोक वाद्ययन्त्रों के कारण अपनी अलग पहचान रखता है। जहाँ ये संगीत-प्रस्तुति के लिए पेपा', 'टोका', 'गोगोना', 'जिंगा', 'बहि' और 'दोतारा' -जैसे सुरवाले वाद्य-यन्त्रों का उपयोग करते हैं, वहीं ताल वाद्य के रूप में ढोल', 'खोल', 'डोबा', 'मृदंग', और नगाड़ा' का प्रमुखता से उपयोग करते हैं। बाँसुरी की श्रेणी में आनेवाले कई वाद्य- यन्त्र यहाँ के संगीत की विशिष्ट पहचान हैं। लोकसंगीत के अलावा ये भारत के सीमावर्ती देशों के संगीत के कई तत्त्वों को अपने संगीत में इस्तेमाल करते हैं। इनके संगीत में हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के कई रागों की झलक भी मिलती है। हालाँकि, इधर कई वर्षों से असम के प्रमुख शहरों में पाश्चात्य संगीत और पाश्चात्य वाद्य-यन्त्रों ने भी अपनी जगह बनाई है, फिर भी यहाँ के पारम्परिक संगीत की कर्णप्रियता और प्रसिद्धि में कोई विशेष कमी नहीं आई है। पारम्परिक गीतों में ‘झूमर' और 'भरिगान', भक्ति-गीतों में ‘बोरगीत', 'जिकिर-जारी', 'ऐनाम', 'दिहिनाम’ और ‘हिरानाम', बिहूसंगीत में ‘बिहू' और 'हुज़री' इत्यादि प्रमुख हैं। नृत्यों में बिहू नृत्य' अत्यंत आकर्षक नृत्य है जो समूह में पारम्परिक वेशभूषा मेंकिया जाता है। 'बगुरंग’, ‘भोरताल' और ‘झूमर' यहाँ के अन्य लोकनृत्य हैं जिन्हें अलग-अलग कबीलेवाले करते हैं।

असम से नीचे लेकिन पूर्व की ओर नागालैण्ड है जो मुख्यतः कबीलों से बना है। सोलह मुख्य कबीलों के अलावा कई छोटे कबीले हैं जिनकी सांस्कृतिक विरासत बड़ी समृद्ध है। संगीत यहाँ के लोगों का जीवन है और ऐसी मान्यता है कि सदियों पुरानी लोककथाएँ ही पीढ़ी-दर-पीढ़ी यहाँ तक आई हैं। यहाँ के संगीत में पूर्वजों, उनकी गाथाओं और इतिहास का बड़ी सुंदरता से वर्णन किया जाता है। इसके अलावा यहाँ के संगीत में प्रेम और कल्पना को व्यक्त करने का सुन्दर प्रचलन है। कबीलों में बँटे होने के कारण नागालैण्ड की संस्कृति के कला-सम्प्रेषण में कबीलाई रंग दिखना स्वाभाविक है। इनके लोकसंगीत में तार-वाद्य की प्रधानता है जिसकी ध्वनि वायलिन और सारंगी से काफी मिलती- जुलती है। साथ-ही-साथ ये लकड़ी के गोल और खोखले डब्बेनुमा टुकड़ों पर चमड़े की छावनी किए हुए ताल-वाद्यों का भी बहुतायत से उपयोग करते हैं। इन ताल- वाद्यों में 'जेमजी' नाम का ताल-वाद्य बड़ा कौतुहल उत्पन्न करता है जो जंगली भैंसे मिथुन के सिंग से बनाया जाता है। इसके अलावा बाँस के बने सुर और ताल-वाद्यों का भी यहाँ के संगीत में सुन्दर तरीके से उपयोग होता है। मूल तौर पर ये कबीलाई लोग अपने आस-पास उपलब्ध ऐसी किसी भी सामग्री से वाद्य-यंत्र का निर्माण करते हैं जिनसे अनोखी कर्णप्रिय या विशेष तरह की ध्वनि निकलने की सम्भावना होती है।

नागालैण्ड के ठीक नीचे मणिपुर है। मणिपुर के लोग संगीत से बड़ा प्रेम रखते हैं। यहाँ के पहाड़ी इलाकों और घाटी में रहनेवाले लोगों में संगीत का समान प्रचलन है। ये संगीत-प्रस्तुति में ‘पेना' नाम के वाद्य का बहुतायत से उपयोग करते हैं जिसकी आकृति एकतारा या छोटी वीणा के समान होती है और इसे सारंगी की तरह धनुषनुमा लकड़ी से बजाया जाता है जिसमें तार पर रगड़वाले हिस्से में जानवरों जैसे घोड़े की पूँछ के बाल का इस्तेमाल किया जाता है। ‘पेना इशेयि’ प्रकार के संगीत-प्रस्तुति में इस वाद्ययन्त्र का इस्तेमाल विशेष तौर पर होता है जिसमें ‘खम्बा-थोइबी' के प्रेमकथा का वर्णन किया जाता है। यहाँ के नृत्य अपनी पोशाकों और संचालन के कारण बड़े ही मनमोहक हैं। अधिकांश नृत्य कथाप्रधान हैं अर्थात् इन नृत्यों के माध्यम से ये कथा कहते हैं। इन नृत्यों में पौराणिक कथाओं, प्रेमकथाओं, सांस्कृतिक कथाओं, लोककथाओं और मान्यताओं का वर्णन किया जाता है। इन नृत्यों में धार्मिक और देवी-देवताओं पर आधारित नृत्य भी हैं। यहाँ के महत्त्वपूर्ण नृत्यों में ‘लाई हरूब इशेयि’, ‘खम्बा-थोईबी’, ‘माइबि', 'पुंग चोलोम’, ‘रासलीला' और 'जगोई बड़े प्रसिद्ध हैं। ‘जगोई यहाँ का शास्त्रीय नृत्य है जिसे भारत के सभी कोनों में शास्त्रीय नृत्य की श्रेणी में महत्त्वपूर्ण स्थान मिला है।

मणिपुर के नीचे मिजोरम है जहाँ के संगीत को ‘मिजो संगीत' के नाम से जाना जाता है। यहाँ के संगीत में ताल-वाद्य ही प्रमुख हैं। हालाँकि, ये बाँसुरी का इस्तेमाल भी करते पाए गए हैं। इनके संगीत में उल्लास, अल्हड़पन, उमंग और ऊर्जा का मुख्य रूप से वर्णन होता है। यहाँ के नृत्य बड़े लुभावने होते हैं जो समूहों में किए जाते हैं। इन नृत्यों में 'चेराव' सर्वाधिक प्रसिद्ध है जिसे हम सभी बैम्बू डान्स' के नाम से भी जानते हैं। अन्य नृत्यों में छह लम', 'सावलकिया', ‘चई लम’ और ‘पर लम' भी बड़े आकर्षक और प्रसिद्ध हैं। पश्चिम में असम के नीचे त्रिपुरा है जहाँ लोकसंगीत के ढेर सारे रंग हैं। बॉस से बनी बाँसुरी-जैसे वाद्ययन्त्रों का बहुतायत से उपयोग करते हैं। जिनमें ‘सुमुई', 'सारिंदा', 'चोंगप्रेग', 'लेबांग-लेबांगटी' प्रमुख हैं। ताल-वाद्य के रूप में ये ‘खम' का उपयोग करते हैं। ‘डांगडू' यहाँ का एक महत्त्वपूर्ण साज है जो बहुत हद तक ‘हार्प' से मिलता-जुलता है। त्रिपुरा के नृत्यों में ‘गोरिया', 'हुक कईमणि', 'लेबांग बुमानी' और 'उआ बैम्बू' बड़े प्रचलित हैं।

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