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समाज का आखिरी व्यक्ति भी उनके लिए महत्वपूर्ण था-निरंजना बेन कलार्थी
November 1, 2018 • गुंजन अग्रवाल

बारडोली, गुजराज-स्थित ‘स्वराज आश्रम' सरदार वल्लभभाई पटेल के अनुयायियों के लिए किसी तीर्थस्थान से कम नहीं है। यह वह आश्रम है जिसकी स्थापना 1928 में बारडोली के करबन्दी सत्याग्रह आन्दोलन के दौरान सत्याग्रहियों के रहने के लिए सरदार ने की थी। तब से इस आश्रम ने स्वाधीनता आन्दोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। आश्रम की वयोवृद्ध सदस्या और ट्रस्टी तथा सरदार पटेल के सान्निध्य में पली-बढ़ीं श्रीमती निरंजना बेन कलार्थी का जन्म 1939 में इसी आश्रम में हुआ और स्वराज आश्रम के विस्तार और उसकी गतिविधियों के संचालन में उनका अविस्मरणीय योगदान है। ‘दी कोर के कार्यकारी सम्पादक गुंजन अग्रवाल ने बारडोली-प्रवास के दौरान श्रीमती कलार्थी से मुलाकात की और उनसे सरदार पटेल से जुड़े संस्मरणों तथा स्वराजआश्रम की गतिविधियों की विस्तृत जानकारी ली। प्रस्तुत है उस वार्ता के महत्त्वपूर्ण अंश। –सम्पादक

  • आपको सरदार पटेल के साथ कितना समय व्यतीत करने का अवसर मिला? उस कालखण्ड की क्या उपलब्धियाँ रहीं?

बाल्यकाल में सरदार साहब की सन्निधि प्राप्त करने का मुझे बड़ा सौभाग्य मिला। सरदार साहब हम सब आश्रम के बच्चों के ‘दादाजी' थे। आश्रम परिवार हमारा एक बड़ा परिवार और सब सरदार साहब से जुड़े हुए। स्वजन थे। सरदार साहब को मैंने बचपन में देखा, परिवारजनों से सूना, बड़े होकर उनके कार्य के बारे में पढ़ा, सोचा, समझा तो उनका अनोखापन और उनकी विशिष्टताएँ समझ में आयीं। सरदार साहब का कैसा अद्भुत व्यक्तित्व था! और हम कितने भाग्यशाली थे कि उनकी छाँव में बचपन बीता !! सरदार साहब बड़े-बड़े व्यक्तियों से लेकर आश्रम के छोटे-से-छोटे। कार्यकर्ता का ध्यान रखते थे। यह सरदार साहब की बड़ी आश्चर्यकारक ताकत थी और सरदार साहब उसे बहुत अनूठे तरीके से पेश लाते थे। इम्पॉर्टेंस ऑफ ह्यूमन रिलेशनशिप, वेल्यू ऑफ सेक्रीफाइस एण्ड डेडिकेशन ऑफ़ अ ह्यूमन- सरदार साहब के लिये काफ़ी महत्त्व रखता था। मुझे याद आ रहा है कि स्वराज आश्रम, बारडोली परिसर में सरदार साहब की अँगुलि पकड़कर घूमने का सौभाग्य मुझे कई बार प्राप्त हुआ है।

सरदार साहब अपनी व्यस्तता बीच भी आश्रम के बच्चों के लिये समय निकालते थे। हमको अपने हाथों से सेतूर एवं आश्रम में लगे हुए वृक्षों से फल तोड़कर खिलाते थे।

  • सरदार पटेल के जीवन में स्वराज आश्रम का क्या महत्त्व है?

आश्रम परिवार सरदार साहब के साथ सामूहिक कताई करता था। हम सब सूत निकालकर उनको सूत की आंटी (गुंडी) देते थे, जिससे उनके कपड़े बनते थे। सरदार साहब की बेटी मणि बेन सरदार साहब के लिए सूत निकालकर उनको खादी बनाने के लिये बुनकर को देती थीं। बुनकर उसकी खादी बनाकर वापस देते थे।

सरदार साहब को बागवानी अति प्रिय थी। स्वराज आश्रम में उन्होंने बागवानी बनाई थी। रस्सी पकड़कर पौधे लगाये थे। पौधों को पानी पिलाना, हम सब बच्चों की ‘वानरसेना' से साफ़-सफ़ाई करवाना और हम सबके साथ उनका जुड़ना, सब बच्चों को हँसाना- ये सब स्मृतियाँ आज स्मृति पर आकर खड़ी हो गई हैं। सरदार साहब की उपस्थिति, आश्रम-परिसर का वातावरण, आश्रम में मिली जीवन-शिक्षा की नींव ने बचपन को, सादगीमय जीवन को हरा-भरा रखा था।

  • आप स्वराज आश्रम से कब और कैसे जुड़ीं?

मेरा जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जो आजादी के लिये सत्याग्रही बनकर समर्पित हो चुका था। माँ-पिताजी श्री उत्तमचन्द शाह एवं संतोक बेन- स्वराज आश्रम की स्थापना से लेकर जीवनभर सेवाकार्य में संलग्न रहे। पिताजी भरुच जिले के जमीन्दार परिवार के बेटे थे। सोलिसिटर बनने के लिए बम्बई पढ़ने के लिए गए थे। विल्सन कॉलेज में उनकी पढ़ाई चल रही थी। उसी समय उन्होंने गाँधीजी के आह्वान को सुना। सुनते ही चैन पड़े नहीं चित्त जैसी स्थिती हुई। सबकुछ छोड़कर गाँधीजी के पीछे चल पड़े। ज़मीन्दारी छोड़ी, परिवार छोड़ा। मेरी माँ भी मेरे पिताजी के पीछे चल पड़ी। रास्ता कठिन था। लेकिन दोनों ने जिंदगीभर सेवाकार्य को अपना ध्येय समझा।

दिनांक 17 अक्टूबर, 1939 को स्वराज आश्रम, बारडोली में मेरा जन्म हुआ। जब मेरा जन्म हुआ, तब स्वतंत्रता संग्राम पूरे जोर से चल रहा था। पिताजी जब जेल जाते थे तब माँ हम सबको लेकर अहमदाबाद या साबरमती आश्रम अथवा बारडोली के निकट भुवासण आश्रम में रहने के लिये चली जाती थीं; क्योंकि स्वराज आश्रम, बारडोली को अंग्रेज़ सरकार सील कर देती थी।

बचपन से मैंने आश्रम-परिवारों की त्याग-तपस्या, समर्पण एवं निःस्वार्थ सेवाभावना देखी है। देश की आजादी के पीछे कई नामी-अनामी कार्यकर्ताओं का समर्पण है। सरदार साहब उनसे जुड़े सब कार्यकर्ताओं का बहुत ध्यान रखते थे। मैंने बचपन से यह सब देखा और उसकी गहरी छाप मेरे दिल पर पड़ी है। यह सब देखकर मुझे यह समझ में आया कि जीवन तो वही है कि जो निःस्वार्थ रूप से जिया जाय!

सरदार साहब के साथ मेरे जीवन के थोड़े प्रसंग, जो मैंने प्रत्यक्ष देखे हैं या मेरे साथ और मेरे सामने बने थे, वह मुझे याद आ रहे हैं। मेरी माँ और पिताजी बारडोलीआश्रम के कार्यकर्ता थे। गाँधीजी के आह्वान को सुनकर वे बारदोली आ गये थे। बारडोली-सत्याग्रह की वजह से सरदार साहब से जुड़े। बारडोली सत्याग्रह के समय से लेकर जिंदगी की आखिरी साँस तक स्वराज आश्रम के लिए समर्पित होकर कार्यरत रहे। मैं, मेरी बड़ी बहन इंदु, मेरा बड़ा भाई भरत यहाँ आश्रम में ही बड़े हुए। पिताजी आश्रम में कार्यरत थे। व्यवस्थापक के रूप में आश्रम का कार्य सरदार साहब के आदेश से सम्भाल रहे थे। आश्रम से महीने के खर्च की राशि पिताजी बहुत कम ले रहे थे। सरदार साहब को इस बात का पता चला। सरदार साहब ने पिताजी को बुलाया और कहने लगे कि, “उत्तमचन्द, तुम मासिक खर्च के पैसे बहुत कम ले रहे हो, बच्चे अब बड़े हो रहे हैं। पैसे थोड़े ज्यादा लो।'' पिताजी ने सरदार साहब को नम्रता से उत्तर दिया, “हमारी जिंदगी अच्छी तरह चल रही है। इसलिए जितने पैसे मिल रहे हैं, वे काफ़ी हैं।'' सरदार साहब ने कहा कि, संतोक (मेरी माँ) को बुलाओ। उत्तमचन्द, तुम तो आश्रम का और सत्याग्रह का कार्य कर रहे हो, घर तो संतोक चलाती है। माँ आयी, तब मैं माँ के साथ थी। माँ भी पिताजी से कम नहीं थीं। माँ के साथ सरदार साहब की बात हुई। माँ ने सरदार साहब को उत्तर दिया, ‘‘बापू, हमारी जिंदगी आपके आशीर्वाद से अच्छी चल रही है। मैं भी तो आश्रम में कार्य करके थोड़ा कमा लेती हूँ। हमे आपके साथ। रहने का बड़ा सौभाग्य मिला है, आपका आशीर्वाद मिल रहा है, उसमें हम संतुष्ट हैं।'' यह सुनकर सरदार साहब ने माँ पिताजी को सराहा, मुझे दुलारा और बहुत प्यार से पिताजी की ओर देखकर बोले, ‘‘उत्तमचंद, आप सबकी निःस्वार्थ सेवा और त्याग से आश्रम खड़ा है। आप जैसे कार्यकर्ता मुझे मिले हैं तो आश्रम का कार्य सुचारू रूप से चलता रहा है।'' सरदार साहब ही खुद परम त्यागी थे।

सरदार साहब ही खुद परम त्यागी थे। सरदार साहब तो अपनी वकालत की कमाई, अपनी शानो-शौकत और वैभव से भरी जिंदगी को पीछे छोड़कर गाँधीजी के साथ स्वतंत्रता के संग्राम में चल पड़े थे। ऐसे परम त्यागी सरदार साहब अपने कार्यकर्ताओं को सराहते थे।

जब सरदार साहब दिल्ली में थे, तब हमारा पूरा परिवार दिल्ली गया। सरदार साहब बहुत व्यस्त थे। शाम को भोजन के साथ लेने का तय हुआ। हम सब उनको संसद में बैठे हुए देखने के लिए गये। देखा, फिर भोजन लेने के लिये संसद से सीधे उनके घर गये। भोजन के दौरान स्वराज आश्रम की बातें चलीं। मैं उनके बगल में बैठी थी। सरदार साहब ने मेरी ओर मुड़कर मुझसे पूछा, नानी (छोटी), हमारी बोई हुई बेल पर फूल आये? मैंने उत्साहभरी आवाज से तुरन्त जवाब दिया। कि, हाँ दादाजी बहुत सारे फूल आये। मेरी बात दादाजी प्रसन्नता से सुन रहे थे। मैं अन्य वर्णन भी किये जा रही थी। आज सोच रही हूँ कि कैसी बड़ी-बड़ी जिम्मेवारी निभानेवाले देश के प्रधानमंत्री पद पर आरुढ़ व्यक्तित्व हम छोटे बच्चों के साथ कैसे कोमल भाव से बातें करते थेमृदुनानि कुसुमादपि।

कुछ और प्रसंग याद आ रहे हैं। एक बाद स्वराज आश्रम में एक कार्यकर्ता काम करने के लिए बगल के गाँव से आया करता था। बहुत दिनों से वह कार्यकर्ता दिखाई नहीं दे रहा था। सरदार साहब से रहा नहीं गया। उन्होंने उस कार्यकर्ता के बारे में पूछताछ शुरू की। सरदार साहब को बताया गया कि वह बीमार हो गया है, इसलिये वह नहीं आ रहा है। यह सुनकर सरदार साहब ने तुरन्त मेरे पिताजी को बुलाया, उस कार्यकर्ता का पता लिया और खुद उसके गाँव और घर गये। उसके इलाज़ का प्रबन्ध किया। वह कार्यकर्ता अच्छा हो गया और पूरे आश्रम के परिवार से प्रेम से मिला। पिताजी ने सरदार साहब को पत्र से विदित किया कि अब वह कार्यकर्ता स्वस्थ हो गया है। सरदार साहब के लिए समाज का आखिरी व्यक्ति भी उतना ही महत्त्वपूर्ण था जितना समाज का अग्रणी।

आश्रम के बाग की सफाई करनेवाली खाल्पी माँ को, जब-जब सरदार साहब आते थे, तब मिलते थे। सरदार साहब को देखकर वह बोलती थी, “सरदार भाई, तू आ गया? मुझे तुझे देखकर बहुत खुशी हो रही है। परमात्मा तुझे अच्छा रखे।'' सरदार साहब मुस्कुराकर खाल्पी माँ से कहते थे, “हाँ माँ, मैं आ गया। तू भी ठीक है क्या? नहीं तो तेरे आश्रम में मेरी ख़बर कौन रखेगा?'' इस तरह सरदार साहब छोटे व्यक्तियों के बीच भी उनके जैसे बनकर रहते थे।

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