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समझौता
April 1, 2017 • Kiran Rajpurohit 'Nitila'

चाबी लगाकर फ्लैट का ताला खोलने लगी कि उसे लगा दरवाजा तोखोला जा चुका है। जय आ गये इतनी जल्दी? मन-ही-मन बुदबुदाई हर्षा। चिन्ता-सी हुई। घड़ी देखी। काँटे भागकर पौने छः बजाने जा रहे थे। ओह! वह खुद पूरे पौन घंटा देरी से घर पहुँची है। हर्षा को खुद पर ही हँसी आ गयी।

हर्षा का ऑफिस से देर से घर आना कतई पसंद नहीं है जय को। दो साल पहले नौकरी करने की इच्छा प्रकट की थी तब यही शर्त रखी थी जय ने कि मुझसे पहले घर पहुँचना होगा। मैं आऊँ, तब घर मुझे खुला मिलना चाहिये। ऑफिस से थका-माँदा आऊँ और मुझे दरवाजे पर लगा ताला ठेंगा दिखाये, यह नहीं चलेगा।

फुर्ती से वह अंदर दाखिल हुई। पर्स पटका । देखा जय स्नानघर में थे। वॉश बेसिन पर हाथ-मुँह धोकर फटाफट रसोई में घुसी चाय के लिये। जय को ऑफिस से आते ही चाय चाहिये मसाले की खुशबू वाली। नहीं तो उनकी पेशानी पर बल पड़ जाते हैं। पढ़ाई से लेकर नौकरी करने तक की स्त्रियों की खामियाँ गिना डालेंगे। उनके लिए चारदीवारी ही ठीक ठहरायेंगे। सुनकर मन-ही-मन हँसी आती कि सभी स्त्रियाँ चारदीवारी में सिमट जायेंगी तो आप ऑफिस में मन किससे बहलायेंगे ? लेकिन चुप रहती। जय उन पुरुषों में से हैं जो स्वयं के लिये तो हर रंग आधुनिकता का चाहेंगे, लेकिन पत्नी के कपड़े किस रंग के और किस तरह के आयेंगे, यह भी वे खुद तय करेगें। खुद की हर सोच और करतूत को नये ज़माने का जामा पहनायेंगे, लेकिन पत्नी बालकनी में खड़ी भी हो जाये, यह भी गवारा नहीं करेंगे।

जय को पहली बार देखा था तो मन दरक गया था। डबडबाई आँखों से माँ को देखती रही। माँ ने खुद की आँखें पोंछ उसके सिर पर हाथ फेर दिया था बस। उस स्पर्श में कई मजबूरियों की पीड़ा थी। वैधव्य से ग्रसित जवान होती बेटी की माँ जो स्वयं दूसरों की मोहताज़ हो, उसकी मजबूरियों की गठरी हमारा समाज उत्तरोत्तर बढ़ाता ही जाता है। ऐसे में महानगर में रोजगार पाए मोटे होंठवाले और लगभग बदसूरत व्यक्ति की कृपादृष्टि पड़ रही है तो यह बड़े सौभाग्य की बात है। पूरे कस्बे ने हर्षा के इस सौभाग्य को सराहा।।

अपने मनोभावों के जंगल से निकलकर गहरी उदास सांस भरी हर्षा ने देखा कि चाय की भगोली पड़ी थी। पी ली दिखती है। अब तैयार होना ही पड़ेगा एक अनचाही बहस के लिये बल्कि एकतरफा डाँट कहना ज्यादा ठीक होगा। अब अपनी सफाई में कुछ भी कहना छोड़ दिया है हर्षा ने। बस सिर झुकाए सुन लेती है। उनकी शर्तों पर नौकरी की है तो सुनना ही पड़ेगा। उन गलतियों की कोई माफ़ी नहीं है। हर्षा कुछ कहना ही नहीं चाहती। दिनभर की थकान और घर की समझौता उदासी के वातावरण के बाद उसमें इतनी जान ही नहीं बचती कि वह कुछ कह सके। बस तूफान को गुजार देना चाहती है ताकि उदास ही सही, शांति तो रहेगी कुछ लिखने-पढ़ने के लिये घर में।

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