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सफर सुहाना रेल का
February 1, 2018 • Veena Singh

आवागमन का सबसे सुगम व सरल साधन रेल ही है।रेल हमें सरल साधन रेल ही है। रेल हमें हमारे गंतव्य तक तो पहुंचाती ही है, साथ ही हमें अनेक सुखद अनुभव भी दे जाती है। यदि रेल यात्रा न होती तो हम अनगिनत रोमांचक दृश्यों व रोमांचक किस्सों से वंचित रह जाते। रेल हमारे देश का सबसे बड़ा यातायात साधन है जो प्रति वर्ष लगभग आठ अरब यात्रियों को सुखद सफ़र कराती है। रेल यात्रा हमेशा से सामाजिक संबंध स्थापित करने का भी माध्यम रही है। रेल यात्रा अलग-अलग संस्कृतियों, शहरों और भिन्न-भिन्न भाषाओं के लोगों को जोड़ती है। यात्रा के दौरान एक ही डिब्बे में बैठे अलग-अलग जाति, धर्म, भाषा, संस्कृति के अपरिचित लोग कुछ ही समय में ऐसे घुल-मिल जाते हैं जैसे वर्षों से जानते हों।

कुछ वर्ष पहले तक यह स्थिति थी कि रेल-सफर में पास बैठे अपरिचित व्यक्ति कुछ ही समय में अच्छे मित्र बन जाते थे और बिना भेदभाव के एकसाथ घर के बने सुस्वादिष्ट पकवान मिल-बाँटकर खाने-पीने के साथ गप-शप में सफ़र तय हो जाता, पता ही नहीं चलता था। सहयात्री कुछ घंटों की यात्रा के दौरान ही देश व समाज के गम्भीर मुद्दों पर विचार-विमर्श कर लेते थे तथा देश की अनेक समस्याओं से अवगत होकर निदान खोजने का प्रयत्न करते थे और भी नये-नये विषयों पर अनेक नयी-नयी जानकारियाँ प्राप्त कर लेते थे। जब मोबाइल चलन में नहीं था, तब लोग अपने निवास स्थान का पता दे देते थे और बाद में भी पत्र-व्यवहार द्वारा संबंध बनाए रखते थे। समय के साथ सुविधा में भी बदलाव हुआ। चूंकि अब हर हाथ में मोबाइल है तो जानपहचान बनाए रखना और भी आसान है। मोबाइल नम्बर के आदान-प्रदान से दूरस्थ लोगों से भी नजदीकियों का एहसास होता रहता है और संबंध मजबूत होते रहते हैं। कभी-कभी तो मन मुताबिक घर-परिवार जाति-धर्म का मिलान हो जाने पर माता- पिता अपने बेटे-बेटियों के रिश्ते तक तय कर लेते थे और इस तरह एक सफ़र, दो परिवारों के जीवनभर का सफ़र बन जाता था।

बदलते समय में रेल के हर पहलू पर बदलाव हुआ है। पहले कोयले के इंजन होते थे, स्टेशनों पर घुमन्तू जातियों के लोग रहते थे वे कोयला बीनकर जीविकोपार्जन करते थे। तब रेल-इंजनों की गति धीमी हुआ करती थी। लोग लम्बी यात्रा से बचा करते थे, यदि जाते भी तो खाने-पीने की पूरी व्यवस्था के साथ जाते थे। समय के साथ परिवर्तन हुआ और डीजल इंजन आ गये। इससे प्रदूषण की समस्या चारों ओर छाने लगी। तब वैज्ञानिकों ने बिजली के इंजन का आविष्कार किया जिससे प्रदूषण घटने के साथ रेल की गति में भी तीव्रता आयी व कम समय में लोग लम्बी-लम्बी यात्राएँ करने लगे। खानपान की बोगी भी साथ में लगने लगी जिससे राह में खाने-पीने की समस्या भी समाप्त हो गयी। पहले रेलगाड़ियों की सीट लकड़ी की ही होती थी जो लम्बी यात्रा के लिए कष्टदायक होती थीं। अब सीटें फोम की होती हैं जो काफ़ी आरामदायक होती हैं। वातानुकूलित डिब्बे तो पहले नाममात्र के थे, अब कई गाड़ियाँ तो पहले नाममात्र के थे, अब कई गाड़ियाँ पूरी-की-पूरी ए.सी. हो गई हैं। पहले आरक्षण के लिए दो से तीन दिन लग जाते थे, अब बढ़ती टेक्नोलॉजी के साथ घरबैठे सभी जानकारी व आरक्षण, पूरे भारत में, जहाँ की आवश्यकता हो, चन्द मिनटों में हो जाता है। पहले स्टेशनों व रेल के डिब्बों की समुचित सफाई नहीं हो पाती थी, पर अब साफ़-सफ़ाई पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है। पहले लोग रात्रि विश्राम के लिए होटल आदि ढूँढ़ते थे, परन्तु अब स्टेशनों पर ही अच्छे कमरों की व्यवस्था हो गई है, जिसे तत्काल घर बैठे ही बुक करा सकते हैं। अब रेल में सफर करना अपने घर में बैठे होने जैसा लगता है।

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