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सनातन संस्कृति का इस्लाम से संघर्ष
August 1, 2017 • Sachin Singh God

इस्लामीक आक्रान्ताओं ने सन् 634 से ही भारतवर्ष पर आक्रमण करना " शुरू कर दिया, जिनका हमारे शासकों ने मुँहतोड़ जवाब दिया था। भारतीय इतिहास गवाह है कि भारतीय राजाओं के इस्लाम से निरंतर संघर्ष का, प्रतिरोध का जो कुछ एक वर्ष या दशक नहीं सदियों तक चला।

अक्सर हम 800 साल की गुलामी की बात सुनते हैं। यह गुलामी हम 1192 में तराइन के युद्ध में मुहम्मद गोरी की पृथ्वीराज चौहान पर विजय से मानते हैं। पृथ्वीराज चौहान और गोरी के बीच हुआ 1192 के तराइन का द्वितीय युद्ध भारतीय इतिहास के सबसे निर्णायक युद्धों में से एक है जिसने भारतवर्ष के इतिहास की धारा को सदा-सदा के लिए मोड़ दिया। विडम्बना देखिये, यूँ तो मध्यकालीन इतिहास की शुरूआत 7वीं शती से मानी जाती है, लेकिन जो इतिहास हमें पढ़ाया जाता है, उसमें मध्यकालीन इतिहास की शुरूआत यहीं से होती है और 7वीं शती से 13वीं शती के इतिहास को मात्र औपचारिकतावश कुछ पन्नों में समेटकर पढ़ा दिया जाता है और मुहम्मद गोरी से शुरू कर सल्तनत काल, मुगल-काल पर पूरे ग्रन्थ लिखे गए हैं। विडम्बना देखिये महान् परमारवंशी राजा भोज, नागभट्ट परिहार, बप्पा रावल पर जहाँ छात्रों को चंद पंक्तियाँ पढ़ाई जाती हैं, वहीं जहाँगीर, शाहजहाँ, औरंगजेब आदि पर कई-कई अध्याय हैं। यहाँ तक कि बलबन, कुतुबुद्दीन ऐबक तक के बारे में अधिक जानकारी उपलब्ध कराई जाती है। यह देश का दुर्भाग्य है कि छद्म धर्मनिरपेक्ष वामपंथियों द्वारा लिखित और काँग्रेसियों द्वारा पोषित हमारा पाठ्यक्रम और शिक्षाव्यवस्था आत्मविश्वासी नौजवान नहीं, बल्कि गुलाम मानसिकता से प्रेरित, हीनभावना से ग्रस्त नौजवान ही तैयार कर सकती है जिनके लिए अपना इतिहास, अपनी संस्कृति, अपनी परम्पराएँ, अपना धर्म- सब हीन ही हो सकता है।

विदेशी मुस्लिम आक्रान्ताओं के साथ हिंदुओं के संघर्ष की एक लम्बी गाथा है जो सातवी शती के प्रारंभ और मुगल-सल्तनत के पतन होने तक अनवरत चलती है। हम इस्लाम के साथ भारतीयता के इस संघर्ष को दो भागों में विभक्त कर सकते हैं- सल्तनत काल से पहले का संघर्ष और सल्तनत काल के दौरान का प्रतिरोध।

सल्तनत काल से पहले का संघर्ष

सन् 636-37 में ही दूसरे खलीफा ने अरब से ठाणे (बम्बई) पर हमला करने के लिए एक समुद्री बेड़ा भेज दिया था, लेकिन चालुक्य (सोलंकी-राजपूत) शासकों ने उस हमले को विफल कर दिया था। इसके बाद भी भारत पर अगले 80 सालों में 15 से 20 हमले हुए जो स्थानीय शासकों द्वारा विफल कर दिए गए। 712 में मुहम्मद बिन कासिम का सिंध पर किया गया हमला एक सुनियोजित और अब तक सबसे बड़ा आक्रमण था। उसने देवल (वर्तमान में कराची) को जीत लिया, उसके बाद वो ब्राह्मणाबाद की तरफ बढ़ाब्राह्मणाबाद में सिंध के राजा दाहिर सेन ने एक भयंकर संघर्ष किया। राजा दाहिर युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए, उनकी भार्या ने जौहर किया। दाहिर की दोनों पुत्रियों ने भी अपने सतीत्व की रक्षा के लिए प्राण त्याग दिए। कासिम ने सिंधु नदी के साथ लगे सिंध और पंजाब क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया। यह अभियान भारतीय उपमहाद्वीप में आनेवाले मुस्लिम राज का एक बुनियादी घटनाक्रम था। यह इस्लाम की भारत में पहली बड़ी विजय थी। लेकिन अबू बिन कासिम का अरब जाते ही भारतीयों ने विद्रोह शुरू कर दिया। कुछ समय बाद खलीफा ने कासिम की हत्या करवा दी। इसके बाद मुस्लिमों द्वारा कुछ और हमले किए गए, लेकिन उन्हें प्रतिहारों और चालुक्यों ने मिलकर ध्वस्त कर दिया।

अबू बिन कासिम के बाद अरब आक्रमणकारी जुनैद ने भीषण हमले किये। ऐतिहासिक साक्ष्यों से स्पष्ट है कि नागभट्ट परिहार (प्रथम) एवं चालुक्य राजा अवनिजनाश्रय ने अरबों को मालवा व गुजरात से मार भगाया। जब जुनैद ने राजस्थान में मारवाड़ से जैसलमेर-जोधपुर तथा कच्छ और सौराष्ट्र तक के प्रदेश जीत लिए, तब उसने उज्जैन में अपने पाँव जमाने का प्रयास किया। तब राष्ट्रीय नायक के रूप में नागभट्ट परिहार का उदय हुआ। नागभट्ट ने सर्वप्रथम उज्जैन को मुक्त किया, फिर जहाँ जहाँ मुस्लिम सेनाएँ थीं, वहाँ उसकी सेनाएँ पहुच गयीं और मुस्लिमों को खदेड़ दिया।

मेवाड़ की गाथाएँ बप्पा रावल को ईरान जीतनेवाले प्रथम हिंदू नरेश के रूप में वर्णित करती हैं। दाहिर सेन की दूसरी पत्नी अपने पाँच-वर्षीय पुत्र के साथ चित्तौड़ में बप्पा रावल के पास चली आयी। बप्पा ने दोनों को संरक्षण दिया तथा काबुल-कंधार तक सेना ले जाकर मुस्लिम आक्रमण का सफल प्रतिकार किया। बप्पा रावल ने ईरान के सुल्तान सलीम को परास्त किया। ऐसा कहा जाता है कि सुल्तान ने अपनी पुत्री का विवाह बप्पा रावल से किया। बप्पा रावल महान् गोरक्षक, स्त्रीरक्षक एवं सनातन धर्म एवं संस्कृति के रक्षक थे।

सन् 1056 में जब गजनी के राजा इब्राहीम के पुत्र महमूद ने कन्नौज पर फिर से आक्रमण किया और उज्जैन तक उसकी सेनाएँ जा पहुँचीं। कन्नौज पूरी तरह ध्वस्त हो चुका था। ऐसे समय में गहड़वालवंशीय नरेश चंद्रदेव ने वहाँ की आराजकता का अंत कर समर्थ शासन खड़ा किया। गजनी की अधीनता अस्वीकार की। काशी, उत्तर कोसल और अयोध्या तक का प्रदेश सुरक्षित किया।

म का अफगान या प्रतिरोध

इस्लाम का उदय सातवीं शती में हुआ था और अरब के लोग ईरान जीतकर गंधार (वर्तमान अफगानिस्तान) अर्थात् भारतीय भूमि पर आ धमके थे। अरब से लेकर ईरान को इस्लाम के झण्डे के नीचे लाने में महज दस साल लगे, परन्तु गंधार ने 300 साल तक इस्लाम का प्रतिरोध किया। इस समय काबुल पर तुर्की शासन था (तुर्क उस समय तक मुसलमान नहीं थे और कनिष्क को अपना मूल पूर्वज मानते थे)।

बुन्देलखण्ड में चंदेल वंश का शासन । राजा धंग (950-1002) सुबुक्तगीन और महमूद का समकालीन था। महोबाअभिलेख से संकेत प्राप्त होता है कि धंगराज ने तुर्की सेना को पराजित किया । ‘पृथ्वी के लिए जो भार थे, ऐसे शत्रुओं संहार कर श्रीधंग ने अपनी भुजाओं का सामर्थ्य सिद्ध किया'... चंदेल नरेश विद्याधर ने भी तुर्को को पराजित किया था। 11वीं शती में चंदेलराज कीर्तिवर्मन ने भी तुर्को को परास्त किया था। 

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