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सनातन परम्परा में पाशुपत-सम्प्रदाय
February 1, 2017 • Vandana Diwedi

पाशुपत सम्प्रदाय का प्रारम्भ वेदों में उल्लिखित पशुपति शब्द से माना जाता है। इसके प्रतिपादक दर्शन द्विविध हैं (1) पाशुपतदर्शन तथा (2) सिद्धान्तशैवदर्शन। इन दोनों में प्रमुख भेद यह है कि पाशुपत शैव दर्शन दस शैवागमों (कामिकादि से लेकर अंशुमानागमपर्यन्त) में प्रतिपादित है जबकि सिद्धान्त शैव दर्शन अष्टादश रुद्रागमों (विजयागम से लेकर वातूलागमपर्यन्त) में निरूपित है।

(1) पाशुपत दर्शन : सम्प्रति इस दर्शन का प्रतिपादक कोई ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है। उपलब्ध आगमों में भी इसके दार्शनिक प्रक्रिया को प्रतिपादित करनेवाले समग्र कारक अनुपस्थित दृष्टिगोचर होते हैं। इसके तात्त्विक स्वरूप का अधिगम करने के लिये बादरायणीय ब्रह्मसूत्र और उसकी टीकाओं में तथा हरिभद्रसूरि एवं राजशेखर द्वारा विरचित क्रमशः षड्दर्शनसंग्रह एवं षड्दर्शनसमुच्चय नामक ग्रन्थों में खण्डन के लिए उपन्यस्त सिद्धान्त का अवलोकन किया जा सकता है। महर्षि बादरायण व्यास द्वारा विरचित ब्रह्मसूत्र के पत्यधिकरण में निराकरण के लिए पत्युरसामञ्जस्यात् सूत्र की उपस्थापना में पाशुपत मत का निराकरण किया गया है। हरिभद्रसूरि ने अपने षड्दर्शनसमुच्चय में पाशुपत-मतावलम्बियों को मुख्य तपस्वियों में परिगणित किया है। किए कुछ विद्वानों के मत में उपर्युक्त सूत्र में निराकृत दर्शन लकुलीश-पाशुपतदर्शन है। लिङ्गपुराण चार्वाकदर्शन के सदृश ही पाशुपतदर्शन के सिद्धान्त को अन्य दार्शनिक-ग्रन्थों में पूर्वपक्ष के रूप में उपस्थापन के द्वारा ही जाना जा सकता है। वीरशैवदर्शन ने इसको प्रतिष्ठा का विषय मानते हुए कहा है कि इसका खण्डन किसी भी प्रकार से नहीं करना चाहिये। तदनुसार आगमों के अनेक प्रकार में पाशुपतागम भी था। रामानुजाचार्य ने ब्रह्मसूत्रश्रीभाष्य के पत्यधिकरण में पाशुपत मत को वेदविरोधी तथा अनादरणीय बताया है। ब्रह्मसूत्रश्रीकरभाष्य के अनुसार मिश्र, रौद्र, पाशुपत, गाणपत्य, सौर, शाक्त, कापालिक और वैष्णवादि मत शैव मत आभासक मत में परिगणित हैं। पाशुपत मत और लकुलीशपाशुपत मत के मोक्षस्वरूप भेद दृष्टिगोचर होता है। पाशुपत मत अनुसार सभी दुःखों का अन्त मोक्ष जबकि लकुलीश पाशुपत मत के अनुसार केवल दुःखान्त ही मोक्ष नहीं है अपितु परमैश्वर्य की प्राप्ति मोक्ष है। इस दर्शन कारण, कार्य, योग, विधि तथा दुःखान्तरूप पञ्च पदार्थ हैं और ये पदार्थ पाशुपत तथा लकुलीश पाशुपत- दोनों मत में स्वीकार किए गए हैं। यहाँ ईश्वर पति और निमित्तकारण है तथा दुःखान्त ही मोक्ष है। लिङ्गपुराण के पूर्वभाग के 80वें अध्याय (60 श्लोक) में पाशुपत-व्रत के माहात्म्य का वर्णन है। 81वें अध्याय (58 श्लोक) में पशु और पाश के विमोचनकर्ता करनेवाले लिंगपूजादि का कथन किया गया है। 108वें अध्याय (19 श्लोक) में पाशुपत-व्रत का वर्णन किया गया है। उत्तर भाग के नवम अध्याय (56 श्लोक) में तथा 18वें अध्याय (67 श्लोक) में पाशुपत-व्रत का वर्णन किया गया है। लकुलीश, शिव के अष्टादशावतारों में परिगणित हैं। पाशुपत शैव सम्प्रदायों में प्राचीन काल की लकुलीश की मूर्तियाँ राजस्थान, गुजरात, मालवा, बंगाल में प्राप्त होती हैं। इस मूर्ति में शीश पर जटा, दो भुजाएँ (बायीं भुजा में लकुट अर्थात् दण्ड और दायीं भुजा में बिजौरा अर्थात् बीजपूर) तथा पद्मासनावस्था प्राप्त होती हैं। मूर्ति के अधरू में कहीं-कहीं नन्दी और कहीं-कहीं दोनों ओर एक-एक जटाधारी साधु भी निर्मित होता है। ऐसा माना जाता हैकि इस मत को माननेवाले प्रायः साधु कनफटे (नाथ) होते थे। इस अवतार का विशेष प्रभाव मेवाड़ में रहा। एकलिङ्ग, मेनाल, तिलिस्था, बालोड़ी आदि स्थानों के अति प्राचीन शिव-मन्दिर इसी सम्प्रदाय के हैं। इनके पुजारी कनफटे साधु शरीर पर भस्म रमाकर आजीवन ब्रह्मचारी रहते थे। लकुलीश के चार शिष्य कुशिक, गार्य, मैत्रेय और कौरुष नाम से अन्य चार सम्प्रदाय के प्रचलन का भी अभिज्ञान होता है। इनमें एकलिङ्ग के मठाधीश कुशिक सम्प्रदाय के अनुयायी थे। अब इस सम्प्रदाय के लोग लकुलीश को विस्मृत कर गोरखनाथ को अपना आदिगुरु मानते हैं।

कहीं-कहीं पाशुपत की तीन कोटियाँ मानी गई हैं। इनमें जो शूलादि धारण करता है वह तान्त्रिक पाशुपत है। जो लिङ्ग, रुद्राक्ष, भस्मादि धारण करता है वह वैदिक पाशुपत है और जो सूर्य, शिव, शक्ति, गणेश और विष्णु की समभाव से पूजा करता है, वह मिश्र पाशुपत है। महाभारत में पाशुपत को पाँच मतों के अन्तर्गत माना है। लकुलीश और गोरक्ष के समान ही श्रीकण्ठाचार्य भी इसके प्रणेता के रूप में विख्यात रहे हैं। आचार्य अभिनवगुप्त ने तंत्रालोक के द्वादश आह्निक में कहा है कि लकुलीश और श्रीकण्ठ- दोनों ही शिवशासन में आप्त हैं। आगे उन्होंने लकुलीश को शिवावतार बताकर श्रीकण्ठ को उनके यश का उद्घोषक बताया है। पाशुपत मत में नाथ सम्प्रदाय- जैसा कोई सम्प्रदाय था या नहीं, इस विषय में अनेक विवाद हैं। मत्स्येन्द्रनाथ के काल तक तो गोरखनाथ ही उसके प्रतिनिधि रहे हैं। पाशुपत संन्यासियों में गोरक्षनाथ स्वयं को माहेश्वर मानते हैं। नाथपंथी योगियों में कनफटा और औघड़ द्विविध सम्प्रदाय हैं। इनमें औघड़नाथ की सम्पूर्ण दीक्षा प्रक्रिया में सम्मिलित नहीं होते हैं और अपने नाम के अन्त में वे नाथ के स्थान पर दास पद का प्रयोग करते हैं। कर्णभेद से सम्पन्न विशिष्ट नाड़ी के भेदन से योगज सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं- ऐसी मान्यता है

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