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सनातन पटपटा में वीरशैव अथवा लिङ्गायत सम्प्रदाय
February 1, 2017 • Praveen Kumar Duvdi

सानातन परम्परा का आधार स्तम्भ निगमागम संस्कृति है और इसमें स्वयम्भू शिव को सृष्टि को आदिदेव माना गया है। हड़प्पा और मोहनजोदड़ों से प्राप्त सामग्री भी शिव की प्राचीनता सिद्ध करती है। शिव को परब्रह्म के रूप में माननेवाले शैव कहे जाते हैं। सिद्धान्तशिखामणि तथा सिद्धान्तागम के अनुसार शिव के द्वारा उपदेश दिए गएआगमों में यह वर्णन है कि सम्पूर्ण आगमिक सम्प्रदाय शैव, पाशुपत, सोम तथा लाकुल भेद से अनेक प्रकार के हैं, जिनमें शैव के चार भेद हैं- वाम शैव, दक्षिण शैव, मिश्र शैव तथा सिद्धान्तशैव। वाम शैव शक्तिप्रधान, दक्षिण शैव भैरव प्रधान, मिश्र शैव सप्तमातृप्रधान तथा सिद्धान्तशैव वेदप्रधान थे। पारमेश्वरागम के अनुसार शैव सप्तविध हैं- वीरशैव, अनादिशैव, आदिशैव, अनुशैव, महाशैव, योगशैव तथा ज्ञानशैव। सूक्ष्मागम में इन्हीं सप्तविध शैवों के नामभेद पाए जाते हैं- आदिशैव, अनादिशैव, महाशैवअनुशैव, अवान्तरशैवप्रवरशैव तथा अन्त्यशैव। इनमें शिव अनादिशैव, आदिशैवों में (शिव के पञ्चमुख से प्रथम दीक्षित होने के कारण) कौशिक, काश्यप, भारद्वाज, अत्रि तथा गौतम परिगणित हैं। शैवागमों में उल्लिखत दीक्षाविधि से दीक्षित ब्राह्मण महाशैव तथा दीक्षासम्पन्न क्षत्रिय एवं वैश्य अनुशैव कहलाते हैं। यदि कोई शूद्र भी योग्यता के आधार पर शिवदीक्षा प्राप्त करता है तो वह अवान्तर शैव कहलाता है। कुलाल (कुम्हार), पार्श्वक (पीठमर्दक) इत्यादि दीक्षा प्राप्त कर लेने पर प्रवरशैव कहलाते हैं। तदभिन्न अन्य जातियों के दीक्षासम्पन्न व्यक्ति अन्त्यशैव की कोटि में परिगणित किए जाते हैं। यह शैवों का सप्तविध विभाजन जाति पर आधारित है। सिद्धान्तशिखोपनिषद् के अनुसार शिव के पञ्चमुखों में सद्योजात मुख से ब्राह्मण, वामदेव मुख से क्षत्रिय, अघोर मुख से वैश्य, तत्पुरुष मुख से शूद्र तथा ईशान मुख से पञ्चशिवगणों (वीर, नन्दी, भृङ्गी, वृषभ तथा स्कन्द) का आविर्भाव हुआ

सद्योजाताद् ब्राह्मणाः सम्बभूवुः वामदेवात्।

क्षत्रिया विशश्च।

अघोरात् शूद्रास्तत्पुरुषात् शिवस्य,

पञ्चात्मकस्य गणा ईशानतः स्युः॥

तत्पश्चात् आचाराधारित शैवों का विभाजन भी सूक्ष्मागम में अवलोकित होता है। तदनुसार आचार-भेद से शैवों के चार प्रकार हैं- सामान्य शैव, मिश्रशैव, शुद्ध शैव तथा वीरशैव। शिव के दर्शन और सामान्य पूजा करनेवाले सामान्य शैव, शिव-विष्णुब्रह्मा-स्कन्द-गणेश-आदित्य तथा अम्बिका की समान भाव से पूजा करनेवाले मिश्रशैव, शिव को एकमात्र सर्वशक्तिशाली माननेवाले तथा उनकी पूर्ण भक्तिभाव से विधिवत् पूजा करनेवाले शुद्धशैव एवं जिनके रागद्वेषादि दोष दूर हो गए हैं, आत्मतत्त्व की विचारणा में जो सदा लगे रहते हैं तथा जिनके सारे विकल्पजाल नष्ट हो गए हैं, वे ही वीरशैव कहलाते हैं। चन्द्रज्ञानागम में अष्टविध शैवों का वर्णन है। इनके नाम इस प्रकार हैं- अनादिशैव, आदिशैव, पूर्वशैव, मिश्रशैव, शुद्धशैव, मार्गशैव, सामान्य शैव तथा वीरशैव । षड्दर्शनसमुच्चय के टीकाकार गुणरत्न ने शैव, पाशुपत, महाव्रतधर तथा कालामुख- इन्हीं चारों वर्गों को माना है। वामनपुराण के अनुसार भी चतुर्विध शैव ही है- शैव, पाशुपत, कालवदन तथा कापालिक। स्वच्छन्दतन्त्र के अनुसार भी पाशुपत, लाकुल, मौसुल तथा कारुकवैमल- ये चार शैव सम्प्रदाय हैं। यह भी कहा गया है कि ब्राह्मण शैव मत से, क्षत्रिय पाशुपत मत से, वैश्य कालामुख मत से तथा शूद्र कापाल मत से शिव की अर्चना करे। यामुनाचार्य प्रणीत आगमप्रामाण्य में कापालिक तथा कालामुख एवं रामानुजाचार्य प्रणीत ब्रह्मसूत्रश्रीभाष्य में कापाल तथा कालामुख द्विविध शैव ही वर्णित है। कर्णाटक प्रदेश में बहुतायत रूप में प्रचलित कालामुख का ही आधुनिक अभिधान वीरशैव है। जगन्नाथ शास्त्री तैलङ्ग के मत में वेदान्त के आठ ही सम्प्रदाय हैं- शाङ्कर, वीरशैव, रामानुज, माध्व, वल्लभ, निम्बार्क, गौड़ तथा रामानन्द। सिद्धान्तप्रकाशिकाकार के अनुसार वेदान्त के केवल चार ही सम्प्रदाय हैं- भास्करीय, मायावादी, शब्दब्रह्मवादी, क्रीडाब्रह्मवादी । शिव ने अपने सद्योजात मुख से ऋग्वेद, वामदेव मुख से यजुर्वेद, तत्पुरुषमुख से सामवेद, अघोरमुख से अथर्ववेद और ईशानमुख से अट्ठाईस आगमों को उत्पन्न किया।

सिद्धान्तशिखामणि में ही यह कथा । वर्णित है कि स्वयम्भू शिव ने ब्रह्माजी को सृष्टि के लिए नियुक्त किया और सृष्टि के लिए। उपाय भी बताए, किन्तु ब्रह्माजी ऐसा करने में असमर्थ रहे। पुनः ब्रह्मा जी प्रार्थना पर शिव ने पाँच गणों को उत्पन्न किया और उन पाँच गणों का अनुकरण करके ब्रह्मा ने चातुर्वर्ण्य (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) की रचना की। वीरशैवमतावलम्बी उन पाँच गणों की सन्तान स्वयं को मानते हैं और शिवसायुज्य अथवा शिवसामरस्य इनका परम लक्ष्य होता । है। सिद्धान्तशिखामणि में यह भी कथा है कि विभीषण ने रावण की प्रतिज्ञा (नौ करोड़ शिवलिङ्ग की स्थापना) को उसकी मृत्यु के पश्चात् पूरा किया था।

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