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सत्यमेव जयते भारतीय संविधान में स्वास्थ्य की सुरक्षा
June 1, 2016 • And (Dr.) Balram Singh

केन्द्र या राज्य सरकार को कोई ऐसा कार्य करने का अधिकार नहीं है जो किसी व्यक्ति को उसके जीवन के भौतिक तत्त्वों का आनन्द लेने से रोक दे। बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत संघ (1984) 3 एस.सी.सी. 161 के बाद में सर्वोच्च न्यायालय की तीन सदस्यीय पीठ ने व्यवस्था दी कि जहाँ राज्य ने जनता की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए और विशेष रूप से कमजोर वर्ग के व्यक्तियों के लिए उन्हें पूर्ण मानवीय सम्मान सहित रहने के लिए कानून और अधिनियम बनाए हुए हैं तो उन्हें क्रियान्वित करना राज्य का दायित्व है क्योंकि ऐसा न करना अनच्छेद 21 में प्रदत्त जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा का उल्लंघन है।

जीवन और रतीय संविधान व्यक्तियों को जीवन और व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की सुरक्षा का अधिकार प्रदान करता है। जीवन के अधिकार में स्वास्थ्य का अधिकार सम्मिलित है। भारत एक कल्याणकारी राज्य है। राज्य का दायित्व व्यक्तियों के स्वास्थ्य की रक्षा करना है। संविधान के अनुच्छेदों- 21, 39, 41, 42 और 47 के अनुसार राज्य का कर्तव्य है कि व्यक्तियों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए पर्याप्त व्यवस्था करे और किसी व्यक्ति को उपचार न मिलने के कारण मृत्यु का सामना करना पड़े।

पश्चिम बंगा खेत मजदूर समिति एवं अन्य बनाम पश्चिम बंगाल राज्य एवं अन्य (1996) 4 एस.सी.सी. 37 के वाद में उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि भारतीय संविधान संघीय एवं राज्य स्तर पर कल्याणकारी राज्य की स्थापना करता है। कल्याणकारी राज्य का प्राथमिक कर्त्तव्य जनता का कल्याण करना है। एक कल्याणकारी राज्य में जनता को पर्याप्त चिकित्सा-सुविधाएँ प्रदान करना एक आवश्यक कार्य है। यह दायित्व पूर्ण करने के लिए सरकार अस्पताल और स्वास्थ्य- केन्द्र चलाती है जो जरूरतमन्द लोगों को चिकित्सा-सुविधा प्रदान करते हैं। अनुच्छेद 21 के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के जीवन की रक्षा करना राज्य का दायित्व है। मानवीय जीवन की रक्षा करना सर्वोपरि है। राज्य द्वारा संचालित अस्पताल और उनमें कार्यरत चिकित्सा-अधिकारियों का कर्तव्य चिकित्सकीय सहायता प्रदान करना और मानवीय जीवन की रक्षा करना है। सरकारी अस्पतालों का आवश्यकता के समय जरूरतमंद व्यक्ति को चिकित्सा प्रदान न करना अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है।

केन्द्र या राज्य सरकार को कोई ऐसा कार्य करने का अधिकार नहीं है जो किसी व्यक्ति को उसके जीवन के भौतिक तत्त्वों का आनन्द लेने से रोक दे। बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत संघ (1984) 3 एस.सी.सी. 161 के वाद में सर्वोच्च न्यायालय की तीन सदस्यीय पीठ ने व्यवस्था दी कि जहाँ राज्य ने जनता की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए और विशेष रूप से कमजोर वर्ग के व्यक्तियों के लिए उन्हें पूर्ण मानवीय सम्मान सहित रहने के लिए कानून और अधिनियम बनाए हुए हैं तो उन्हें क्रियान्वित करना राज्य का दायित्व है क्योंकि ऐसा न करना अनुच्छेद 21 में प्रदत्त जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा का उल्लंघन है।

विनसेन्ट बनाम भारत संघ (1987) 2 एस.सी.सी. 165 के बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने ड्रग्स एवं कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 की धाराओं- 5, 6 और 7 को क्रियान्वित करने के आदेश पारित किए हैं।

कोई रोगी चाहे वह निर्दोष हो या समाज के कानून के अन्तर्गत दण्डनीय हो, तो जो व्यक्ति सामाजिक स्वास्थ्य की रक्षा करने का दायित्व संभाले हुए हैं, उन्हें उनके स्वास्थ्य की रक्षा भी करनी चाहिए जिससे निर्दोष की रक्षा हो सके और दोषी की सजा हो जाए। सामाजिक नियम लापरवाही के मृत्युकारित करने की सजा देने की आज्ञा नहीं देते। प्रत्येक सरकारी या गैर-सरकारी चिकित्सक, चाहे वह सरकारी अस्पताल में हो या निजी अस्पताल में हो, उसका दायित्व है कि जीवन की रक्षा के लिए वह सम्पूर्ण विलक्षणतासहित कार्य करे। यह दायित्व सर्वोपरि है, इसलिए कोई प्रक्रिया-संबंधी कानून, जो इसमें हस्तक्षेप करता हो, अवैधानिक है। सर्वोच्च न्यायालय ने सभी सरकारी एवं गैर-सरकारी अस्पतालों को निर्देश दिए कि चाहे रोगी का मामला कानूनी ही क्यों न हो उसे शीघ्र ही चिकित्सकीय सहायता प्रदान की जाए, सरकारी अस्पतालों के रोगियों को प्राथमिक उपचार भी उपलब्ध न कराने और उन्हें दूसरे अच्छे अस्पतालों में भेजने की परम्परा मात्र इसलिए कि उसका कानूनी मामला है, अवांछनीय है। परन्तु यदि उस अस्पताल में रोगी का उपचार करने के लिए आवश्यक साधन नहीं है तो रोगी को आवश्यक प्राथमिक उपचार के पश्चात् दूसरे सुविधासम्पन्न अस्पताल में भेजा जा सकता है।

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