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संस्कृत शिक्षा के मूलाधार : गुरुकुल शिक्षा प्रणाली
May 1, 2017 • Pan. Ajay Sagar Shukl

गुरुकुल  शिक्षा-प्रणाली विशुद्ध भारतीय पद्धति है। हमारे प्राचीन मनीषियों ने छात्र के विकास को गुरु के सान्निध्य में सुनिश्चित किया था। पूर्व में एकाधिक ज्ञानी, जिन्हें हमारी भाषा में ‘ऋषि' शब्द से सम्बोधित किया जाता था, छात्रों को गृह का त्याग कराकर गुरु-सान्निध्य में बुलाकर शिक्षा प्रारम्भ करते थे। इस प्रकार शिक्षा में विस्तार प्रारम्भ हुआ। छात्रों की संख्या-वृद्धि होने पर विद्यालय की व्यवस्था की गयी। इन विद्यालयों में देश-देशान्तर से छात्रों का आगमन हुआ तथा शिक्षा का विकास हुआ। प्राचीनतम विश्वविद्यालयों में प्रथम स्थान तक्षशिला विश्वविद्यालय का आता है, इसी क्रम में नालन्दा महाविहार का नाम भी आता है। विश्व के प्राचीनतम विश्वविद्यालयों की गरिमा को प्राप्त ये सभी विश्वविद्यालय भारतवर्ष के इतिहास के सर्वाधिक देदीप्यमान नक्षत्र हैं।

क्या आप जानते हैं कि विश्वविद्यालय बनाने की योजना जब धरती के किसी भी भाग में नहीं थी, शिक्षा क्या होती है, यह तक लोगों दुनिया को पता नहीं था, खाने व पहनने का ज्ञान ही नहीं था तो शिक्षा का विचार कौन करेगा, उससे भी हजारों वर्ष पूर्व भारतवर्ष में कहा गया, सा विद्या या विमुक्तये और अपने देश के कोने-कोने में बड़े-बड़े गुरुकुल और विश्वविद्यालय ज्ञान का प्रकाश फैला रहे थे।

प्रगतिवान् रही है। इसके इतिहासपुराणों, वेदों का सही समय ज्ञान आज भी ज्ञात नहीं हो सका। तथापि विद्वान् लोग वेदों का समय ईसापूर्व 5,000 साल बताते हैं और संसार का सबसे प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेद ही माना जाता है। आज से सात हजार वर्ष पूर्व इतने बड़े और महान् ग्रन्थ की रचना भारतवर्ष में हुई। वह समय शिक्षा का श्रेष्ठतम समय रहा होगा। उल्लेखनीय है कि आज के समय में सब कुछ सरल होता चला जा रहा है। प्राचीन समय में उपकरणों के कितना अभाव रहा होगा, तथापि भारतवर्ष में इतने महान् ग्रंथ की रचना हुई, वह भी आज के वैज्ञानिकता से बहुत आगे की। आज भी वेदों में लिखे एक भी वाक्य को संसार का कोई भी ज्ञानी गलत सिद्ध नहीं कर सकता है। ये बातें इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि हमारे पूर्वज अति प्राचीन से ज्ञान का दीप जलाए बैठे थे। यह भारतीयों के लिए गौरव का विषय होना चाहिए, किन्तु अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि हमारा यह गौरवपूर्ण इतिहास आज हमारे ही द्वारा उपेक्षित है। जबकि धरा के अन्य भागों में इस ज्ञान को लोग अलौकिक ज्ञान जानकर इस पर खोज व अनुसंधान कर रहे हैं।

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