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संस्कृत-वाङ्मय में कृषि
March 1, 2017 • Dr. Praveen Kumar Diwedik

वैदिक ऋषि कहते हैं कि हे भूमि! तुम्हारी पहाड़ियाँ, हिमाच्छादित पर्वत, वन, पुष्टि देनेवाली भूरे रंग की मिट्टी, कृषियोग्य काली मिट्टी, उपजाऊ लाल रंग की मिट्टी, अनेक रूपोंवाली, सबका आश्रयस्थान, स्थिर भूमि पर अजेय, अवध्य और अक्षत रहकर हम निवास करें।

किसी सी भी समाज का आधार कृषि होती है। कृषि एक ऐसा सशक्त साधन है, जिसके माध्यम से मानव द्वारा प्रकृति को पूजा जाता है। भारतीय परम्परा कृषिप्रधान रही हैऋग्वेद विश्व का प्राचीनतम साहित्यिक उत्स है। इसमें भी कृषि को सभी कर्मों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। वैदिक वाङ्मय में पृथिवी के लिये गौ, भूमि, वसुन्धरा, धरा, धरणीअवनी, मेदिनी, स्थिरा, विश्वम्भरा, रसा, क्षमा, गोत्रा, सर्वसहा, अचला, अनन्ता आदि अभिधानों का प्रयोग किया गया है। शतपथब्राह्मण (14.1.2.9-10) के मतानुसार अग्नि और जल के मेल से फेन उत्पन्न होकर ठोस आकृति में परिवर्तित हो गया और उसी ठोस आकृति को मृदा (मिट्टी) अर्थात् पृथिवी कहा गया। तत्पश्चात् अश्ममयी पृथिवी, रत्नगर्भा पृथिवी, अग्निगर्भा पृथिवी, परिमण्डल पृथिवी, हरित भूमि और गन्धवती पृथिवी हुई। विश्व के 71 प्रतिशत खाद्य-पदार्थ मिट्टी से ही उत्पन्न होते हैं जबकि सम्पूर्ण भूमण्डल के 2 प्रतिशत भाग में ही कृषियोग्य भूमि है, जिसको निम्नलिखित तालिका के माध्यम से अवबोध किया जा सकता है।

वैदिक वाङ्मय में कृषि-पद्धति

वैदिक वाङ्मय में कृषि के लिए सर्वप्रथम भूमि को संस्कारवान बनाने का निर्देश प्राप्त होता है। भूमि को प्रदूषण से बचाने के लिए उसमें मलिन और विषयुक्त खाद डालकर उसे दूषित करने से रोका गया है। यजुर्वेद में बैलों द्वारा खेतों (क्षेत्रों) को जोतकर उत्तम अन्नों के बीजवपन का निर्देश प्राप्त होता है। खेतों में गोबरयुक्त खाद डालने का और विष्ठा आदि मलिन तत्त्व नहीं डालने का निर्देश है। बीजों का वपन (बोना) सुगन्ध आदि से उपचारित करके होना चाहिये, जिससे अन्न भी रोगरहित होकर मनुष्य की बुद्धि का वर्धन करें। खेतों को घी, शर्करा (गुड़) और जल आदि से संस्कारित करना चाहिये। पृथिवी को ऋग्वेद (10.18), यजुर्वेद (9.22), अथर्ववेद (12.1.12 आदि) आदि में पृथिवी को माता कहा गया है। ऋग्वेद (1.67.3) में भूमिसंरक्षण के सम्बन्ध में कहा गया हैकि ऋषि द्वारा विद्वानों को सत्यलक्षणों से युक्त ज्ञान से प्रकाशित मंत्रों के द्वारा भूमि को धारण करना चाहिये। राजा को धन, ओषधि और जल आदि को धारण करनेवाली पृथिवी की सुरक्षा करने का भी निर्देश है। यजुर्वेद के अनुसार अपने दुष्कर्मों से भूमि को प्रदूषित करना भूमिहिंसा है। भूमिहिंसा हमें और हमारी हिंसा भूमि को नहीं करनी चाहिये। अथर्ववेद के मत में यज्ञभूमि में देवतार्थ अलंत हव्य हम प्रदान करें। उसी भूमि में मरणशील मनुष्य स्वधा और अन्न से जीवन धारण करते हैं।

वह भूमि वृद्धावस्था तक प्राणप्रद (शतपथब्राह्मण के अनुसार 1 सेकेण्ड के 17वें भाग को प्राण कहते हैं) वायु प्रदान करें। पृथिवी की गोद हमारे लिये निरोग और सम्पूर्ण रोगों से रहित हो। दीर्घकाल तक जागते हुए हम अपने जीवन को इसकी सेवा में लगायें। भूमिसूक्त के मत में निवासयोग्य तथा विभिन्न कार्य में प्रयोग होनेवाली भूमि का संरक्षण करने से वह सुखदा होती है। वैदिक ऋषि कहते हैं कि हे भूमि! तुम्हारी पहाड़ियाँ, हिमाच्छादित पर्वत, वन, पुष्टि देनेवाली भूरे रंग की मिट्टी, कृषियोग्य काली मिट्टी, उपजाऊ लाल रंग की मिट्टी, अनेक रूपोंवाली, सबका आश्रयस्थान, स्थिर भूमि पर अजेय, अवध्य और अक्षत रहकर हम निवास करें। वेदों में मनुष्य को समृद्धवाली उर्वरा भूमि के लिए कृषकों एवं वैज्ञानिकों को प्रेरणा दी गई है कि वे उसकी उर्वरा-शक्ति बनाए रखने के लिए पर्यावरण-प्रदूषित करनेवाले खाद के स्थान पर गोबर-खादयुक्त खेती को ही उत्तम फलवती मानकर, मधुर अन्न उत्पन्न करनेवाले खाद के स्थान पर उन्नत करें। बार-बार बुआई करने से भूमि की उर्वरा-शक्ति नष्ट होने की ओर संकेत किया गया है।

सब कुछ देनेवाली जिस विस्तृत पृथिवी की विविध व्यवहारों में कुशल विद्वान् प्रजाजन प्रमादरहित होकर रक्षा करते हैं, उस भूमि को हम प्रिय मधु दिया करें तथा हम उसके तेज को बढ़ायें। प्रदूषणरहित कृषि ही राष्ट्र के निवासियों को बलवान् बनाती है। प्रदूषणरहित कृषि अपनाने से ही मनुष्यों में तेज और बल बढ़ने से ही उत्तम राष्ट्र उन्नतिशील होता है। अतः राजा को प्रदूषणरहित खेती को बढ़ावा देने का सदा निर्देश दिया गया है। यज्ञों के सम्पादन द्वारा पृथिवी को सस्यादि सम्पन्न बनाया जा सकता है। विस्तृत द्युलोक तथा भूमि द्वारा इस यज्ञ का सेवन करना चाहिये। भूमि यज्ञ से पोषण प्राप्त करती है और पोषित और स्वस्थ भूमि ही हमारा सम्यक् भरण-पोषण कर सकती है। यजमान द्वारा अनुष्ठीयमान यज्ञ वर्षाकारक इन्द्र की शक्ति को बढ़ाता है और भूमण्डल को विविध अन्नादि से पृष्ट करता है। आचार्य सायण कहते हैं कि अमृत (मिथ्या भाषणादि) का परिणाम प्रदूषण है, जिसके कारण भूमि फलवती नहीं होती है।

यजमान द्वारा यज्ञादि में दी गई आहुति से देवगण नवीन जीवन प्राप्त करते हैं। अग्नि में घी-सामग्री की हवि देने से भूमि महती होती है और वर्षा द्वारा अन्नादि की वृद्धि के कारण ओषधि से प्रवर्धित पृथिवी बलवती और समर्थ होती है। यज्ञ की भस्म के द्वारा उत्तमोत्तम ओषधियों का क्षारतत्त्व पृथिवी को प्राप्त होता है, अतः पृथिवी को भस्म से भरने का भी निर्देश है। यदि उत्तान भूमि (लेटी हुई भूमि) का हृदय क्षतिग्रस्त हो गया है और उसकी उपजाऊ-शक्ति क्षीण या समाप्तप्राय हो गई हो, तो कुछ समय उसमें खेती न करके तथा उसे रिक्त (खाली) रखकर उसमें शुद्ध वायु, सूर्य-रश्मि, वर्षा आदि के द्वारा पुनः शक्ति-सन्धान करना चाहिये। सुश्रुतसंहिता (कल्पस्थान, 3.12) में भूमिचिकित्सा के विषय में कहा गया है कि अनंता (सारिवा) को एलादिगण (सर्वगंधा) के साथ सुरा में पीसकर दूध तथा काली मिट्टी अथवा वाल्मीकि मिट्टी मिलाकर इससे छिड़काव करें। इसके अतिरिक्त वायविडंग, पाटा, कटभी (अपराजिता) आदि द्रव्यों के काढ़े से प्रदूषित भूमि में परिषेक क्रिया करनी चाहिये। भूमि वृक्षादि की हुरितिमा से सुरक्षित रहती है। वेदकाल का लोकजीवन वनस्पतियों से परिपूर्ण था। यज्ञ भी वनस्पतिपरक थे। 

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