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संस्कार परम्परा का पुनर्जीवन
June 20, 2019 •  पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

प्राणि जगत में मनुष्य का अपना, विशेष स्थान है। ऊँचा भी, असाधारण भी, वरिष्ठ भी। इसी प्रकार उसके कर्तव्यों और दायित्वों के साथ भी उत्कृष्टता जुड़ी हुई है, जिसे सभ्यता, सुसंस्कारिता, शालीनता आदि नामों से जाना जाता है। व्यक्तिगत नीतिनिष्ठा और सामूहिक क्षेत्र में समाज निष्ठा इसी को कहते हैं। स्वतन्त्र-स्वच्छन्द दीखते हुए भी मनुष्य वस्तुतः अनेक अनुशासनों में बँधा हुआ है। इसके लिए उच्चस्तरीय मर्यादाओं के परिपालन का अनुबन्ध है, साथ ही उन कुटेवों का निषेध भी है, जो उसकी गौरव- गरिमा को हेय स्तर का बनाते हैं।

शारीरिक समर्थता, मानसिक बुद्धिमत्ता और आर्थिक सम्पन्नता का अपना महत्त्व है। उनके आधार पर सुविधा साधन खरीदे जा सकते सकते हैं। पर इतने से ही काम नहीं चलता। असभ्य, अशिष्ट, दुर्गुणी, दुर्व्यसनी, अनाचारी होने पर मनुष्य अपने लिए और दूसरों के लिए विपत्तियों का कारण ही बनता है, बदनाम भी होता है, सहयोग सम्मान से वंचित रहता है और स्तर की दृष्टि से गया गुजरा समझा जाता है। वानरों एवं मनुष्यों की आकृति मिलती-जुलती होने पर भी, प्रकृति में हीनता रहने के कारण वानरों की भर्त्सना ही होती है। नर पशु वे कहलाते हैं, जिन्हें कर्तव्यों का ज्ञान नहीं, जिन्हें अनुशासन रास नहीं आता। इसमें भी एक निकृष्ट दर्जा नर पिशाचों का है, जो भ्रष्ट चिन्तन और दुष्ट कार्यों में ही रस लेते और वैसा ही कुछ घिनौना करते कराते रहते हैं। घिनौना करते कराते रहते हैं।

इस धरती पर मनुष्य शरीर वाले करोड़ों- अरबों हैं। असंख्यों गुजर चुके और असंख्यों अगले दिने अगले दिनों जन्मने की प्रतीक्षा में हैंयदि उनमें मानवोचित उत्कृष्टता का समावेश न हो सक सका, तो इतना ही समझना चाहिए कि धरती के लिए भार और संसार के लिए संकट बनने के अतिरिक्त वे और कुछ कर या बन न सके। इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि अपेक्षाकृत अधिक साधन-सम्पन्न होते हुए भी मनुष्य को अनगढ़ असभ्य रहना और निकृष्टता का कलंक लादकर जीना पड़े।

जन्म से अन्य प्राणियों की तरह मनुष्य भी असभ्य ही होता है। आरम्भ में असमर्थ रहने तक ही अभिभावकों का सहारा मिलना जीव जगत का प्रचलन हैसमर्थ होने पर वह शरीर यात्रा चलाने भर की प्रकृति प्रदत्त कुशलता प्राप्त कर लेते हैं। पेट भरने और प्रजनन की परम्परा चलती रहने भर की कुशलता जीवों को प्राप्त होती है। अनगढ़ मनुष्य भी इतना ही कुछ कर पाताहै। मानसिक दृष्टि से तनिक अधिक विकसित होने के कारण शरीरचर्या ही लोभ-मोह और अहंकार का रूप धारण कर लेती है। क्षुद्रता की यही परिधि है। मनुष्य में से अधिकांश इन्हीं सब बन्धनों में जकड़े हुए चित्र-विचित्र क्रियाएँ करते रहते हैंऐसी दशा में किन्हीं से ऐसा कुछ करते कदाचित ही बन पड़ता है, जिसे मानवी गरिमा के उपयुक्त कहा जा सके। कारण उसका एक ही है कि व्यक्तित्व का स्तर उत्कृष्ट बनाने के लिए जिन प्रयत्नों की आवश्यकता है, उनकी उपेक्षा होती रहती है।

शिष्टाचार अथवा सभ्य आचरण का अभ्यास कराना अभिभावकों और अध्यापकों का प्रधान कर्त्तव्य माना जाता है। पर वे भी कतिपय जानकारियों के अतिरिक्त अल्प वयस्कों के प्रति कुछ अधिक कर नहीं पाते। वातावरण भी ऐसा उपलब्ध नहीं हो पाता, जिसके प्रभाव से मनोवांछित उत्कृष्टता का अनुसरण एवं अभ्यास करते बन पड़े। आमतौर से जो सामने रहता है, जो प्रभावोत्पादक होता है, उसी का अनुसरण स्वाभाविक रूप से बन पड़ता है। कलाकौशल भी विशेषज्ञों की सहायता से उपलब्ध हो जाता है। अधिक सुविधा संचय की इच्छा भी कई प्रकार की योजना बनाने एवं उन्हें पूर्ण करने के लिए पराक्रम करने का प्रोत्साहन देती है। सामान्य जनों की जीवनचर्या इसी परिधि में सटी रहती है और इसी चक्र में परिभ्रमण करते हुए अन्तिम साँसें पूरी होने की नियति आ पहुँचती है

वस्तुतः मनुष्य असामान्य है। उसकी शरीर संरचना और मानसिक विलक्षणता ऐसी है, जिसके रहते उसे कुछ ऐसा करना चाहिए, जिससे इन उपलब्धियों की सार्थकता सिद्ध हो सके। मनुष्य भगवान का ज्येष्ठ पुत्र युवराज है, उसे स्वयं पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचने के लिए पैदा किया गया है। यह दायित्व सौंपा गया है कि विश्व उद्यान को अधिक सुन्दर-समुन्नत, उत्तम-उत्कृष्ट बनाने के लिए प्रयास करे। इसी में स्रष्टा की इस अनुपम कलाकृति की सार्थकता है। शरीर निर्वाह भर की बात जहाँ तक है, वहाँ तक हर जीवधारी उतना तो किसी प्रकार कर ही लेता है। मनुष्य भी यदि उतना ही कर सके, तो समझना चाहिए कि स्थिति नरपशु जैसी दीन-दयनीय ही बनी रही। यह अलभ्य अवसर यदि ऐसा ही गुजर जाय, तो उसे दुर्भाग्य के अतिरिक्त और क्या कहा जा सकेगा?

मानवी गरिमा सुसंस्कारिता के साथ जुड़ी हुई है। इसे दूरदर्शिता, विवेकशीलता के आधार पर उपलब्ध किया जाता है। यह चेतना स्वउपार्जित भी हो सकती है और हुई भी। जो भी हो, मनुष्य जीवन की सार्थकता और सराहना सुसंस्कारिता की बढ़ी-चढ़ी उपलब्धि के सहारे ही हस्तगत होती है।

आँखों से शरीर, परिवार और वस्तु जगत ही दीखता है। मस्तिष्क पर भी वे ही छाए रहते हैं। उसी क्षेत्र की सुविधा ही प्रायः हर किसी को अभीष्ट होती है। इस मानसिकता में मात्र निर्वाह ही बन पड़ता है। अन्यों की तुलना में अधिक बड़प्पन पाने की अहंता भी नशे की खुमारी जैसी छायी रहती है। इन प्रयोजनों में योजनाएँ बनती चेष्टाएँ होती हैं, परिस्थितियाँ उभरती और घटनाएँ घटित होती रहती हैं। संक्षेप में इतना ही कहा जा सकता है कि संकीर्ण स्वार्थपरता के निर्वाह भर में, सुरदुर्लभ जीवन वरदान का पश्चाताप भरा समापन हो जाता है। वह नहीं बन पड़ता, जिसकी आवश्यकता थी। चेतना को संतोष और गौरव प्रदान कर सकने वाली नीतियाँ अपनायी जा सकती थीं। इसी शरीर से देव मानव बना जा सकता था। अपने लिए, विश्वविकास के सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन के लिए बहुत कुछ कर सकना मनुष्य के लिए सम्भव था। पर किया क्या जाय? संकीर्ण स्वार्थपरता से आगे बढ़कर और कुछ सोचते-करते- बन ही नहीं पड़ता। फिर मानवी गरिमा के अनुरूप बरिष्ठता कैसे उपलब्ध हो?

मनुष्य भटका हुआ देवता है। उसका भटकाव यदि किसी प्रकार निरस्त हो सके, तो समझना चाहिए कि वह उस राजमार्ग पर चल सकता है, जिस पर अग्रसर होने वाला अपने लिए अभ्युदय की संरचना कर सकताहै। ऐसे ही दृष्टिकोण, क्रिया कलाप एवं वातावरण का समन्वय स्वर्ग कहलाता है। स्वर्ग आसमान पर नहीं, अपने ही इर्द-गिर्द है। सन्मार्गगामी, उसे अपने ही प्रयत्नों से विनिर्मित कर सकता है। मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है।'' आमतौर से वह अपने लिए सुनसान श्मशान और नरक दो ही संरचनाएँ करता रहता हैपर यदि दिशा मिले और सही राह पर सही रीति-नीति अपनाते हुए चल सकना सम्भव हो सके, तो वह भी बन पड़ सकता है, जिसमें अपने को पार करना और असंख्यों को अपनी नाव पर बिठाकर पार उतारना सम्भव हो सके

भाषा, व्यवहार, आहार, रहन-सहन, रीति-रिवाज, आचार गुण, कर्म आदि स्वभावतः यह बातें बच्चे बड़ों से सीखते हैं। ठीक इसी प्रकार चिन्तन, चरित्र, रुचि, रुझान पर आधारित व्यक्तित्व भी किन्हीं वरिष्ठों के तत्वावधान में उपलब्ध करना पड़ता है। इसी हस्तान्तरण की प्रक्रिया को संस्कार विधान कहते हैंदेखने में यह प्रचलन सामान्य रीति-रिवाज जैसा प्रतीत होता हैपर यदि उसे सही रीति से गम्भीरतापूर्वक सम्पन्न किया जा सके, तो उसके प्रभाव, परिणाम बहुत ही उपयोगी, महत्त्वपूर्ण एवं श्रेयस्कर हो सकते हैं। प्राचीन काल में इस सामान्य दीखने वाली प्रक्रिया ने, जनमानस को समुन्नत बनाने में महती भूमिका निभायी थी, व्यक्तियों को उच्चस्तरीय बनाया था और उनके द्वारा जो गतिविधियाँ अपनायी गयी थी, उनके कारण समूचा वातावरण सतयुगी प्रेरणाओं से भर गया था। सतयुग जैसी मंगलमयी परिस्थितियाँ इसी आधार पर बनी थीं। व्यक्तियों का समुदाय ही तो समाज है और परिस्थितियाँ मनःस्थिति के आधार पर ही विनिर्मित होती हैं। व्यक्तित्व भी अन्तःकरण की गरिमा के अनुरूप उभरता है। स्वास्थ्य, कौशल और साधन तो बहिरंग कलेवर मात्र हैं।

मलीनता भी अहिर्निश उभरती और बरसती रहती है। इसलिए बार-बार सफाई की आवश्यकता पड़ती है। शरीर नहलाने, कपड़ों को धोने, मलमूत्र त्यागने, घर बुहारने, बर्तन माँजने आदि की आवश्यकता इसीलिए पड़ती है कि जहाँ-तहाँ से आ धमकने वाली मलीनता को जमा न होने दिया। जाय। उसे बार-बार स्वच्छ रखा जायमानवी स्वभाव की स्थिति प्रायः ऐसी ही है। उस पर कषाय-कल्मषों के मैल जमते रहते हैं। यदि उनकी सफाई का नियमित उपक्रम बनाये न रखा जाय, तो फिर गंदगी का भार क्रमशः बढ़ता ही जाएगा। स्थिति बदतर होती जायेगी। इसलिए आप्तजनों ने मानसिक, आत्मिक स्वच्छता के लिए संध्या-वंदन जैसी आत्मशोधन प्रक्रिया को नित्यकर्म में सम्मिलित किया हैउसे दिनचर्या का अभिन्न अंग माना है। शर्त एक ही है कि उन विधाओं को लकीर पीटने भर के लिए ने निपटाया जाय। उनके साथ भावनाओं का , गहरा पुट लगा रहे और जो कुछ सोचा समझा गया है, उसे व्यवहार में उतारने के लिएँ भी तत्पर रहा जाय। इस आधार पर मलीनता से बचने और आन्तरिक सौन्दर्य निखारने का अवसर मिलता है। संध्या-वंदन को इसीलिए दैनिक संस्कार माना और सुसंस्कारिता संवर्धन के लिए अनिवार्य कहागया है।

इसके अतिरिक्त नैमित्तिक संस्कार हैं, जिन्हें जीवन के हर मोड़ के साथ जोड़ा गया है। षोडश संस्कारों की परम्परा इसी दृष्टि से बनायी और चलायी गई थी। अब उसकी उपेक्षा होने लगी है, फिर भी उसे जब भी अपनाया जायगा, वह अपना चमत्कारी प्रभाव प्रदर्शित करने लगेगी। व्यक्तित्व निखारने के लिए, प्रतिभा उभारने के लिए और गरिमा का स्तर ऊँचा करने के लिए संस्कार पद्धति की उपयोगिता अभी भी यथावत् बनी हुई है। यह दूसरी बात है कि उसे उपेक्षा में डाल दिया जाय, प्रयोग में न लाया जाय, तो उसे अपना प्रभाव दिखाने का अवसर ही न मिलेगा।

संस्कार विधा की गरिमा और उपयोगिता समझने का हमें नये सिरे से प्रयत्न करना होगा। पूर्वजों की उस बहुमूल्य धरोहर को कार्य रूप में परिणत करते हुए वह लाभ उठाना होगा, जिसकी कि आज की परिस्थितियों में अत्यधिक आवश्यकता है।